कूर्म महा पुराण
24 अध्याय
सूतजी बोले-हृषीकेश भगवान् पुरुषोत्तम देवने पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्याके निदान*-रूपमें (सर्वोत्कृष्ट) घोर तपस्या की। अपनी इच्छासे ही अवतीर्ण कृतकृत्य, विश्वको धारण करनेवाले ये श्रीकृष्ण (अपने) स्वरूप के मूल ईश्वर-भावका परिज्ञान करानेके लिये (उत्तम तपः- स्थलके अन्वेषणके बहाने पक्षिराज गरुड़पर आरूढ़ होकर) विचरण करने लगे। हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा लिये तथा श्रीवत्सके चिह्नसे चिह्नित (श्रीकृष्ण) योगियोंद्वारा सेवित, अनेक प्रकारके पक्षिसमूहोंसे व्याप्त मुनीन्द्र महात्मा उपमन्युके आश्रममें पहुँचे ॥१-४॥
वह आश्रम विविध प्रकारके वृक्ष और लताओं से व्याप्त, अनेक प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित, ऋषियों के आश्रमोंसे युक्त तथा वेदमन्त्रोंकी ध्वनियोंसे निनादित था। सिंह, भालू, शरभ, व्याघ्र और हाथियोंसे व्याप्त था; स्वच्छ, स्वादयुक्त, पीने योग्य जलवाले सरोवरोंसे सुशोभित
था; विविध प्रकारके उद्यानों तथा शुभ देवमन्दिरों से सम्पन्न था। ऋषियों, ऋषिपुत्रों, महामुनिगणों, वेदाध्ययनसम्पन्न तथा अग्निहोत्र करनेवालोंसे सेवित था। नासिकाके अग्रभाग में जिनकी दृष्टि लगी हुई है, ऐसे ध्यानपरायण योगियोंसे युक्त, सभी प्रकारसे पवित्र, तत्त्वदर्शी ज्ञानियोंसे सेवित और चारों ओर नदियोंसे घिरा था। वह आश्रम ब्रह्मवादी
जापकों, शंकरकी आराधनामें निरत पवित्र तपस्वियोंसे सेवित, सत्यसंकल्पवाले, परम शान्त, शोक तथा उपद्रवरहित, यथाविधि सभी अङ्गोंमें भस्म लगाये हुए रुद्रके जपमें परायण, मुण्डित या मात्र जटा रखे हुए तथा जटाके समान शिखावाले अन्य तपस्वियों, ज्ञानियों और ब्रह्मचारियोंसे नित्य सेवित था॥५-११॥
वहाँ सिद्धोंके आश्रमोंसे सुशोभित उस रमणीय श्रेष्ठ आश्रममें पापोंका नाश करनेवाली भगवती गङ्गा नित्य प्रवाहित रहती थीं। उन विश्वात्मा माधवने उन कल्मषरहित तपस्वियोंको ढूँढ-ढूँढ़कर उनके समीप जाकर उन्हें सविधि प्रणाम किया और स्तुतिपूर्वक उनकी पूजा की॥१२-१३॥
उन शङ्ख, चक्र, गदाधारी, योगियोंके परम गुरु, जगद्योनि (श्रीकृष्ण)-को देखकर उन्होंने (तपस्वियोंने) भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और अव्यक्त, आदिदेव, महामुनि तथा उन सनातन (देव)-का हृदयमें ध्यानकर वैदिक मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे और आपसमें कहने लगे- ॥१४-१५॥
ये वही अद्वितीय परम साक्षात् नारायण भगवान् हैं। स्वयं पुराणपुरुष देव ही इस समय आये हुए हैं। ये ही अव्यय हैं, सृष्टि करनेवाले, संहार करनेवाले तथा पालन करनेवाले ये ही हैं। अमूर्त होते हुए भी ये मूर्तिमान् होकर मुनियोंको देखनेके लिये यहाँ आये हुए हैं। ये धाता, विधाता और सर्वव्यापी ही आ रहे हैं। ये अनादि, अक्षय, अनन्त, महाभूत और महेश्वर हैं ॥ १६-१८॥
वाणीके अगोचर गोविन्द हरि उन (तपस्वियों) के वचनोंको सुनते हुए शीघ्र ही उन महात्मा (उपमन्यु) के स्थानपर गये ॥१९॥
उन यदुवंशी देवकीपुत्र श्रीकृष्णने प्रत्येक तीर्थ में श्रद्धापूर्वक आचमनकर (मार्जनकर) देवता, ऋषि और पितरोंका तर्पण किया और मुनीश्वरोंके द्वारा नदियों के किनारे स्थापित अमिततेजस्वी शंकरके लिङ्गोंकी पूजा की॥ २०-२१॥
वहाँके निवासियोंने जहाँ-जहाँ भी जनार्दन को आते हुए देखा, वहाँ-वहाँ पुष्पों तथा अक्षतोंसे उनकी पूजा की। शार्ङ्गधनुष, शङ्ख तथा असि धारण करनेवाले एवं शुभ अङ्गोंवाले उन वासुदेवका दर्शनकर वहाँ रहनेवाले सभी निश्चल-से खड़े हो गये। वहाँ (योगमें) आरूढ़ होनेके इच्छुक जिन लोगोंके मन समाधिस्थ थे, वे भी जनार्दन हरिको अपने सम्मुख देखकर उनका दर्शन करनेके लिये अपनी इन्द्रियोंको बहिर्मुख कर लिये ॥ २२-२४॥
इधर श्रीकृष्णने गङ्गामें अवगाहन करनेके पश्चात् देवताओं, पितरों आदिका दर्शन, तर्पण आदि कर उत्तमोत्तम पुष्प आदि लेकर श्रेष्ठ मुनि (उपमन्यु) के गृहमें प्रवेश किया। योगियोंमें श्रेष्ठ, भस्मसे अवलिप्त शरीरवाले, जटा और चीरधारी उन शान्त मुनिको देखकर (श्रीकृष्णने) सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया॥ २५-२६॥
कृष्णको आते हुए देखकर तत्त्वज्ञ उन मुनि ने योगियोंके प्रथम पूज्य उन्हें आसनपर बिठाया और उनकी पूजा की॥ २७॥
(मुनिने कहा-)हम जानते हैं कि वाणीके उत्पत्ति स्थान, परमपदरूप, अव्यक्त शरीरवाले विष्णु शिष्य के रूपमें उपस्थित हुए हैं। हृषीकेश! आपका स्वागत है, हमारे तप सफल हुए जो साक्षात् विश्वात्मा विष्णु ही मेरे घर आये हैं। प्रयत्न करते हुए भी योगी तथा मुनिजन आपको देख नहीं पाते, ऐसे आपके यहाँ आने का प्रयोजन क्या है? उपमन्युके उस वाक्यको सुनकर केशीका मर्दन करनेवाले महायोगी भगवान्ने उन्हें प्रणामकर कहा-॥ २८-३१॥
श्रीकृष्ण बोले-भगवन्! भगवान् शंकरके दर्शनों के लिये उत्सुक मैं आया हूँ। कृत्तिवासा गिरीश (भगवान् शंकर)-का दर्शन करनेकी मेरी उत्कट इच्छा है। योगविदोंमें श्रेष्ठ भगवान् ईशका शीघ्र ही कैसे दर्शन कर सकता हूँ, उन उमापति को मैं कहाँ देख पाऊँगा॥३२-३३॥
ऐसा कहे जानेपर भगवान् (उपमन्यु)-ने कहा-तीव्र भक्ति एवं तपस्याके द्वारा वे परमेश्वर देखे जा सकते हैं, इसलिये ऐसा ही प्रयत्न करो। ब्रह्मवादी मुनीन्द्र, जप करनेवाले तथा जो तपस्वी हैं वे, यहाँ उन देव ईश्वर देवाधिदेवका ध्यान करते हुए निवास कर रहे हैं। यहाँ भगवान् देव वृषभध्वज पत्नी (पार्वती)-सहित तथा विविध भूतों और योगियोंसे घिरे हुए सदा क्रीड़ा करते हैं ॥ ३४-३६॥
प्राचीन कालमें इस आश्रममें कठोर तप करके भगवान् वसिष्ठ ऋषिने महेश्वर रुद्रसे योग प्राप्त किया था। यहीं प्रभु कृष्णद्वैपायन भगवान् व्यासने उन ईश्वरों के भी ईश्वर (भगवान् शंकर)-का दर्शनकर परम ज्ञान प्राप्त किया था। इसी रमणीय श्रेष्ठ आश्रममें सुरभिने भक्तिपूर्वक तपस्या करके जटाधारी रुद्रसे पुत्रोंको प्राप्त किया था। पूर्वकालमें कालसे भयभीत देवताओंने यहींपर श्रीमान् हर (महाकाल)-का दर्शनकर भयसे रहित होकर शान्ति प्राप्त की थी। तपस्वियोंमें श्रेष्ठ द्विज सावर्णिने यहींपर महादेव की आराधना करके परम योग तथा उत्तम ग्रन्थरचनाकी शक्ति प्राप्त की थी। तभी उन्होंने कल्याणकारिणी सुन्दर पुण्य प्रदान करनेवाली पुराणसंहिताका निर्माणकर सत्-शिष्यों और द्विजातियोंमें उसका प्रवर्तन किया।। ३७-४२॥
पुरुषोत्तम! इसी स्थानपर कापेय शांशपायनने महादेव का दर्शनकर उनकी आज्ञा प्राप्त करके बारह हजार श्लोकोंवाली इस (कूर्मरूपधारी भगवान् विष्णुके द्वारा वर्णित) पुराणसंहिताका निर्माण किया। वेदसम्मत पुण्य वायवीयपुराणसंहिताका सोलह हजार श्लोकोंवाला उत्तरभाग यहींपर प्रवर्तित हुआ। यहींपर शांशपायनद्वारा कही गयी पुराणसंहिताका प्रचार उनके शिष्योंने किया॥ ४३-४४॥
महायोगी याज्ञवल्क्यने यहींपर तपस्याद्वारा शंकर का दर्शन करके उनकी आज्ञासे श्रेष्ठ योगशास्त्रका निर्माण किया था। पूर्वकालमें भृगुने यहीं परम तप करके महेश्वरसे योगज्ञोंमें श्रेष्ठ शुक्र नामक पुत्रको प्राप्त किया था। इसलिये यहींपर तपस्या करके देवताओंके ईश, महेश्वर विश्वेश, उग्र, भीम कपर्दीका आप दर्शन करें। ऐसा कहकर महामुनि उपमन्युने सुन्दर कर्म करनेवाले कृष्णको पाशुपत-योग, पाशुपत-व्रत और पाशुपत-ज्ञान दान किया॥ ४५-४८॥
उन श्रेष्ठ मुनिके कहनेसे वे प्रभु मधुसूदन वहीं पर तपस्याद्वारा रुद्रकी आराधना करने लगे। सभी अङ्गों में यथाविधि भस्म धारण करके, मुण्डित एवं वल्कल वस्त्रधारी होकर अनन्य-मनसे शिवमें चित्तको समाहितकर निरन्तर रुद्रसम्बन्धी मन्त्रोंका जप करने लगे। तदनन्तर
बहुत समय बीत जानेके बाद अर्धचन्द्रमाको आभूषणरूप में धारण किये सोमरूप महादेव महेश्वर देवी पार्वती के साथ आकाशमें दिखलायी पड़े। ४९-५१॥
उन श्रीकृष्णने मुकुट, गदा, त्रिशूल, पिनाकधनुष तथा चित्र-विचित्र माला धारण किये हुए, सिंहके चर्म- रूपी वस्त्रसे समस्त अङ्गोंको आच्छादित किये हुए देवाधिदेव महादेवको देवी पार्वतीके साथ देखा। हाथ में परशु धारण किये हुए, नृसिंहके चर्मसे आच्छादित शरीरवाले, प्रणवका उच्चारण कर रहे तथा सहस्रों सूर्योंके समान श्रेष्ठ त्रिलोचन-भगवान् शंकरका श्रीकृष्णने दर्शन किया। उन्होंने (श्रीकृष्णने) अपने समक्ष पुराणपुरुष, सनातन प्रभु, योगी, ईश्वर, अणुसे भी सूक्ष्म, अनन्तशक्तियुक्त प्राणेश्वर शम्भुको देखा। जिन (रुद्र)-के प्रभाव का देवता, पितामह, इन्द्र, अग्नि, वरुण तथा यम भी आजतक वर्णन नहीं कर पाये, उन आदिदेव को श्रीकृष्णने सामने देखा। उस समय उन्होंने भगवान् शंकरके वामभागमें शङ्ख, तलवार तथा चक्र धारण किये आत्मरूप, अव्यक्त, अनन्त तथा अनन्तरूपवाले आदिदेव (विष्णु)-को देखा। वे भी बहुत-सी स्तुतियोंके द्वारा ईश (शंकर)-की ही स्तुति कर रहे थे। ५२-५६॥
उन (भगवान् शंकर)-के दक्षिण भागमें उन्होंने (श्रीकृष्णने) हंसपर आसीन, अत्यन्त प्रभाववाले, देवताओं के स्वामी लोकगुरु पितामहको आकाशमें हाथ जोड़े हुए ईशकी स्तुति करते देखा। उन्होंने (श्रीकृष्णने) तीनों लोकों के स्वामी (श्रीशंकर)-के सम्मुख हजारों सूर्यो के समान गणेश्वरों, अमित प्रभाववाले नन्दीश्वरादिकों तथा मयूरसहित अग्नि-सदृश कुमार कार्तिके देखा॥५७-५८॥
उनके पीछेकी ओर मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, प्रचेता, दक्ष, कण्व, पराशर, वसिष्ठ तथा स्वायम्भुव मनुको भी देखा ॥ ५९॥
उन उदार बुद्धिवाले विष्णु (कृष्ण)-ने भक्तिपूर्वक हाथ जोड़ते हुए देवी पार्वतीसहित शंकरको प्रणाम किया तथा अपने हृदयमें आत्म-स्वरूपका ध्यानकर देवताओं में प्रधान शंकरकी मन्त्रोंद्वारा स्तुति की-॥६०॥
श्रीकृष्ण बोले-शाश्वत! सबके मूलकारण! आपको नमस्कार है। ऋषिलोग आपको ब्रह्माका भी अधिपति कहते हैं। संतजन तप, सत्त्व, रज एवं तमोगुण और सब कुछ आपको ही बतलाते हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु, विश्वयोनि, अग्नि, संहर्ता और सूर्यमण्डल में निवास करनेवाले हैं। प्राण, हुतवह (अग्नि) तथा इन्द्रादि विविध देव आप ही हैं। मैं अद्वितीय देव ईशकी शरणमें आया हूँ। सांख्यशास्त्रवाले आपको एकरूप और गुणातीत कहते हैं। योगिजन हृदय में रहनेवाले आपकी सतत उपासना करते हैं। वेद आपको रुद्र, अग्नि नामसे कहते हैं। मैं आप ईशदेवकी शरण में आया हूँ॥६१-६३ ॥
मनुष्य आपके चरणमें मात्र एक पुष्प अथवा एक बिल्वपत्र ही चढ़ाकर संसार-बन्धनसे विमुक्त हो जाता है। सिद्धों तथा योगियोंद्वारा सेवित आपके चरणकमलों का स्मरणकर आपकी कृपासे मनुष्य सभी पापोंको विनष्ट कर डालता है। तत्त्वज्ञ लोग जिन्हें सभी प्रकारके विभाग से रहित, निर्मल, अन्तर्हृदयमें अवस्थित, ज्योति, अनन्त, अद्वितीय, अचल, सत्य, पर, सर्वव्यापी तथा आदि, मध्य और अन्तसे रहित स्थानरूप कहते हैं और यह (संसार) जिनसे उत्पन्न होता है, ऐसे आप सत्यविभव, सनातन विश्वेश्वर शिवकी शरणमें मैं आया हूँ।६४-६५॥
प्रणवरूप नीलकण्ठ, त्रिलोचन और शक्तिरूप आपको नमस्कार है। आप महादेव तथा नित्य ईशानको बार-बार नमस्कार है। पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है, मुण्ड और दण्डधारण करनेवाले आपको नमस्कार है। हाथमें वज्र धारण करनेवाले, दिशारूपी वस्त्रवाले कपर्दी (जटाधारी) आपको नमस्कार है॥६६-६७॥
भयंकर नाद करनेवाले तथा दाढ़वाले कालस्वरूप आपको नमस्कार है। नागों को यज्ञोपवीत के रूप में धारण करनेवाले और अग्निस्वरूप वीर्यवाले आपको नमस्कार है। गिरीश! आपको नमस्कार है, स्वाहाकार! आपको नमस्कार है, उन्मुक्त अट्टहास करनेवाले आपको नमस्कार है और भीमरूप आपको बार-बार नमस्कार है। कामदेवका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है, कालका मन्थन करनेवाले आपको नमस्कार है, भयानक वेष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है और निषङ्ग (तरकस)-धारी हरको नमस्कार है॥ ६८-७०॥
तीन आँखोंवाले आपको नमस्कार है, गजचर्म धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। अम्बिकाके स्वामीको नमस्कार है और पशुपतिको नमस्कार है। आकाशरूप आपको और आकाशके अधिपतिको नमस्कार है। नर और नारीका शरीर धारण करनेवाले अर्धनारीश्वर तथा सांख्य और योगका प्रवर्तन करनेवाले आपको नमस्कार है। देवताओंके स्वामी और देवताओंद्वारा आराधित लिङ्गवाले आपको नमस्कार है। कुमारके गुरु (कार्तिकेयके पिता) आपको तथा देवाधिदेव आपको नमस्कार है। यज्ञके अधिपतिको नमस्कार है, ब्रह्मचारी को नमस्कार है। महान् मृगव्याध तथा ब्रह्माधिपति को नमस्कार है। हंसरूपको नमस्कार है, विश्वरूप तथा मोहित करनेवालेको बार-बार नमस्कार है। योगी, योगसे प्राप्त होने योग्य तथा योग ही जिनकी माया है ऐसे आपको नमस्कार है॥७१-७५॥
प्राणोंका पालन करनेवाले (प्राणिमात्रके प्राणरक्षक) और घंटानादप्रियको नमस्कार है। कपाली आपको नमस्कार है, नक्षत्रोंके स्वामीको नमस्कार है। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है, पुन: आपको बार-बार नमस्कार है। परमेश्वर! आप मेरी अभीष्ट इच्छाओंको सभी प्रकारसे मुझे प्रदान करें॥७६-७७॥
विप्रो! इस प्रकार वे माधव भक्तिपूर्वक देवेश की स्तुतिकर देव और देवी अर्थात् शंकर-पार्वतीके चरणों में दण्डवत् गिर पड़े। मेघके समान गम्भीर ध्वनिवाले भगवान् शंकरने केशीको मारनेवाले कृष्णको उठाकर मधुर वचन कहा-॥७८-७९॥
पुण्डरीकाक्ष! अव्यय! आपने तप क्यों किया है। (क्योंकि) आप ही कामना करनेवालोंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। आप ही मेरी नारायण नामवाली परम मूर्ति हैं। पुरुषोत्तम! तात! आपके लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं है। केशव! अपने योगद्वारा आप अपने को नारायण, अनन्त, परमेश्वर, महादेव और महायोगी जानें ॥८०-८२॥
उनका वह वचन सुनकर हँसते हुए श्रीकृष्ण ने विश्वेश्वर तथा हिमालय-पुत्री देवी पार्वतीकी ओर देखकर वृषध्वज शंकरसे कहा-प्रभो शंकर! आपको अपने योगद्वारा सब कुछ ज्ञात है। मैं अपने ही समान ऐसा पुत्र चाहता हूँ, जो आपका भक्त हो, श्रीशंकर! आप मुझे प्रदान करें। प्रसन्न-मन होकर विश्वात्मा हरने 'तथास्तु' ऐसा कहकर और देवी पार्वतीकी ओर देखकर केशवका आलिङ्गन किया॥८३-८५॥
तदनन्तर शंकरके आधे शरीरमें स्थित, संसार की माता हिमालय पर्वतकी पुत्री देवी (पार्वती) हृषीकेश से बोलीं। अच्युत! केशव! वत्स! मैं ईश्वर (शंकर)- में तथा मुझमें भी सर्वदा रहनेवाली आपकी अनन्त, निश्चल और अनन्य भक्तिको जानती हूँ। आप ही साक्षात् नारायण और सर्वात्मा पुरुषोत्तम हैं। पूर्वकालमें देवताओं के द्वारा प्रार्थना किये जानेपर आप देवकीके पुत्रके रूप में उत्पन्न हुए थे। आप अपने आत्मरूपको तथा अपने निर्मल पदको स्वयं देखें। हम दोनोंमें कोई भेद नहीं है। विद्वान् लोग (हम दोनोंको) एक रूपसे देखते हैं। केशव! आप इन अभीष्ट वरोंको मुझसे ग्रहण करें। आपको सर्वज्ञता, ऐश्वर्य, वह परमेश्वर-सम्बन्धी ज्ञान, शिवमें निश्चल भक्ति तथा अपने में श्रेष्ठ बल प्राप्त हो॥ ८६-९०॥
उन महादेवीके द्वारा ऐसा कहे जानेपर जनार्दन कृष्णने उनके (वररूपी) आशीर्वादको शिरोधार्य किया। देव महेश्वरने भी कृष्णसे ऐसा ही कहा अर्थात् आशीर्वाद प्रदान किया। तब देवताओं तथा मुनियों से पूजित होते हुए देवाधिदेव गिरीश भगवान् शंकर कृष्णका हाथ पकड़कर देवी पार्वतीके साथ कैलास पर्वतपर चले गये ॥ ९१-९२॥
Summary of chapter 24 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta extols the supreme auspiciousness and spiritual purity of the Yadu dynasty. In this royal lineage manifested righteous kings such as Vṛshṇi, Andhaka, Devarāta, and Śūrasena. The chapter recounts how listening to the holy names and deeds of the Yādava rulers destroys all past accumulated sins, bestows progeny, and attracts the divine grace of Bhagavān Vishṇu. The narration builds up to the supreme moment in cosmic history when Purushottama Nārāyaṇa and Śesha willed to incarnate within the Yadu clan for the destruction of evil and the re-establishment of Dharma.