कूर्म महा पुराण
6 अध्याय
श्रीकूर्मने कहा-(सृष्टिके पूर्व) केवल एकमात्र समुद्र ही था अर्थात् सर्वत्र जल-ही-जल था और कुछ नहीं। कोई विभाग नहीं था, घोर अन्धकारमय था। उस
समय वायु आदि सभी शान्त थे। कुछ भी जाना नहीं जाता था। स्थावर तथा जंगम (सम्पूर्ण सृष्टि)-के उस एकार्णव में नष्ट हो जानेपर (विलीन हो जानेपर) उस समय हजार नेत्रों तथा हजार चरणोंवाले ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। हजार सिरवाले, सोनेके समान वर्णवाले, अतीन्द्रिय, ब्रह्मा जो नारायण नामवाले पुरुष कहलाते हैं, उस समय जलमें (एकार्णवमें) सोये हुए थे॥१-३॥
सम्पूर्ण संसारके सृष्टि एवं विनाशके कारण, ब्रह्मस्वरूप नारायण देव के विषयमें यह श्लोक कहा जाता है-॥४॥
वेदमें 'अप्' अर्थात् 'जल' को 'नार' इस नाम से पहले कहा गया है और वह नार (जल) नरका अयन अर्थात् आश्रय-स्थान है, इस कारण वे 'नारायण' कहे जाते हैं। हजार युगों के बराबर रात्रि का उपभोग करके वे नारायण (उस प्रलयकालीन) रात्रिके बीत जानेपर सृष्टि करने के लिये ब्रह्मत्व ग्रहण करते हैं। तदनन्तर उस जल (एकार्णव)-में प्रलीन पृथ्वीको अनुमानद्वारा जानकर
प्रजापतिने उसके उद्धारकी कामना की॥५-७॥
जलमें क्रीडा करते समय (वे) अत्यन्त सुन्दर वराहरूपमें अवस्थित हो गये। (भगवान्का वह स्वरूप)अन्य लोगोंके द्वारा मनसे भी न जाना जा सकने योग्य, वाक्स्वरूप तथा ब्रह्मसंज्ञक है। धराको धारण करनेवाले (उन) धराधर एवं आत्माधारने पृथ्वी का उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश करके अपनी दाढ़ (द्रष्ट्रा)-द्वारा इसे (रसातलमें डूबी पृथ्वीको) ऊपर निकाला। (नारायणकी) दंष्ट्राके अग्रभागमें अवस्थित पृथ्वीको देखकर जनलोकमें रहनेवाले सिद्धों तथा ब्रह्मर्षियोंने अपने पौरुषको व्यक्त करनेवाले हरि की (इस प्रकार) स्तुति की॥८-१०॥
ऋषि बोले-देवाधिदेव, पुराणपुरुष, सनातन, जयस्वरूप परमेष्ठी ब्रह्मको नमस्कार है। सृष्टि करनेवाले तथा सभी अर्थोके ज्ञाता स्वयम्भू! आपको नमस्कार है। हिरण्यगर्भ, वेधा परमात्माको नमस्कार है। विश्व के उत्पत्ति-स्थान, देवोंके हितकारी, वासुदेव, नारायणदेव | विष्णुको नमस्कार है। शाङ्ग (धनुष), चक्र (सुदर्शन) तथा तलवार (नन्दक) आदि धारण करनेवाले चतुर्मुख! आपको नमस्कार है। सभी प्राणियोंके आत्मरूप, कूटस्थ को बार-बार नमस्कार है॥११-१४॥
वेदके रहस्यरूपको नमस्कार है। वेद-योनि को नमस्कार है। शुद्ध-बुद्धको नमस्कार है। ज्ञानरूप को नमस्कार है। आनन्दस्वरूपको नमस्कार है। जगत्के साक्षी, अनन्त, अप्रमेय तथा कार्य एवं कारणरूप को नमस्कार है। पञ्चभूतरूपको नमस्कार है। पञ्चभूतात्मा (पञ्चभूतके अधिष्ठान आत्मा)-को नमस्कार है, मूलप्रकृति को नमस्कार है। मायारूप आपको नमस्कार है।। १५-१७॥
हे वराह ! आपको नमस्कार है। मत्स्यरूप धारण करनेवाले को नमस्कार है। योगद्वारा जानने योग्य को नमस्कार है। संकर्षण! आपको नमस्कार है। तीन
मूर्तियों एवं तीन धामों (स्थानों)-वाले दिव्य तेजःस्वरूप आपको नमस्कार है। तीन गुणोंको प्रवृत्त करनेवाले सिद्ध एवं पूज्य आपको नमस्कार है। आदित्यके समान वर्णवाले अर्थात् प्रकाशस्वरूप आपको नमस्कार है। पद्मयोनिको नमस्कार है। मूर्त एवं अमूर्तरूपको नमस्कार है। माधवको बारम्बार नमस्कार है॥१८-२०॥
आपके द्वारा ही सम्पूर्ण सृष्टि हुई है और आप में ही (वह) विलीन भी हो जायगी। इस सम्पूर्ण जगत्का आप पालन करें। आप ही रक्षक हैं, आप ही शरण देनेवाले आश्रय-स्थान हैं ॥ २१ ॥
सनक आदि (महर्षियों)-के द्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वराह-शरीर धारण करनेवाले सर्वसमर्थ उन भगवान् विष्णुने उनपर कृपा की। इसके बाद पृथ्वीके स्वामी प्रजापतिने पृथ्वीको उसके स्थान में प्रतिष्ठित कर दिया और मनसे उसको धारण करके अपने (वराह)-रूपको छोड़ दिया॥ २२-२३ ॥
उस महान् जलराशिके ऊपर विशाल नौका के समान स्थित पृथ्वी अपने देहके विस्तारके कारण डूबती नहीं है ॥२४॥
तदनन्तर पृथ्वीको समतल बनाकर उन्होंने पहली सृष्टिके दग्ध हुए समस्त पर्वतोंको पृथ्वी पर स्थापित किया और सृष्टि (करने)-में अपना मन लगाया ॥२५॥
Summary of chapter 6 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
When the vast cosmos was inundated by a single boundless ocean shrouded in dense darkness at the end of the previous Kalpa, Bhagavān Nārāyaṇa lay sleeping upon Śesha. Upon awakening to initiate creation, seeing the Earth submerged deep within the subterranean waters, the Supreme Creator assumed the form of a magnificent cosmic Boar, whose body was composed of the Vedas and sacrificial rites. Diving into the dark abyss of Pātāla, Bhagavān lifted the Earth Goddess upon His gleaming white tusk, bringing Her safely above the primordial waters. Great Ṛshis, Siddhas, and Sanaka-kumāras in Janaloka broke into magnificent Vedic hymns of praise, extolling Nārāyaṇa as the eternal Cause, the Soul of all beings, and the supreme Refuge. Placing the Earth firmly upon the waters like a giant vessel, Varāha flattened the terrain, re-established mountains, and set the stage for the orderly unfolding of the universe.