कूर्म महा पुराण
12 अध्याय
व्यासजी बोले-ऋषियो! आप लोग ब्राह्मणों को आत्यन्तिक (शाश्वत) फल प्रदान करनेवाले, अभी कहे जा रहे सनातन कर्मयोगको सुनें ॥१॥
पूर्वकालमें प्रजापति मनुने सुननेकी इच्छा रखनेवाले ऋषियोंको समस्त वेदोंमें प्रसिद्ध, ब्रह्माद्वारा बतलाये गये, सभी पापोंको दूर करनेवाले तथा पवित्र ऋषि-समूहों द्वारा सेवित इस सम्पूर्ण कर्मयोगको बतलाया था। मेरे द्वारा कहे जानेवाले इस कर्मयोगको समाहितबुद्धि होकर आप लोग भी सुनें द्विजोत्तमो! गर्भसे आठवें अथवा (जन्मसे) आठवें वर्षकी अवस्थामें अपने-अपने गृह्यसूत्रोक्त विधानके अनुसार यज्ञोपवीत-संस्कारसे युक्त होकर दण्ड, मेखला, यज्ञोपवीत तथा कृष्णमृगचर्म धारणकर मुनिवृत्तिवाले (ब्राह्मण-बालक)-को चाहिये कि वह भिक्षान्न ग्रहण करते हुए, गुरुके हितमें तत्पर रहकर गुरुके समीप में उनकी ओर देखते हुए वेदोंका अध्ययन करे॥२-५॥
प्राचीन कालमें ब्रह्माने यज्ञोपवीतके लिये कपास का निर्माण किया। ब्राह्मणोंका यज्ञोपवीत तिहरा होना चाहिये, वह कुशका हो अथवा वस्त्रका हो। द्विजको सदा यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये तथा शिखा बाँधे रखना चाहिये। अन्यथा (वह) जो कर्म करता है, वह न किये हुएके ही समान है अर्थात् निष्फल है॥६-७॥
कपास या रेशमका बना हुआ विकाररहित (जला- कटा न हो) वस्त्र पहनना चाहिये। ऐसे ही स्वच्छ, छिद्ररहित तथा उत्तम (शास्त्रविधिके अनुसार) वस्त्रको धारण करना चाहिये। उत्तरीय वस्त्रके रूपमें कृष्णमृगचर्म शुभ कहा गया है। इसके अभावमें दिव्य चर्म अथवा रुरु मृगके चर्मका विधान किया गया है।८-९॥
दाहिना हाथ उठाकर बायें हाथके ऊपर (बायें कंधेपर) स्थापित यज्ञसूत्रको 'उपवीत' कहा जाता है। नित्य ऐसे रहना चाहिये। कण्ठमें (मालाकी तरह) लटके रहनेपर (यज्ञसूत्र) 'निवीत' कहा जाता है। द्विजो! बायाँ हाथ बाहर निकालकर दाहिने बाहुके ऊपर (दाहिने कंधेके ऊपर) रखे हुए यज्ञसूत्रको 'प्राचीनावीत' (अपसव्य) कहा जाता है इसका प्रयोग पितृकर्ममें करना चाहिये॥१०-११ ॥
यज्ञशाला, गोशाला, होम, जप, स्वाध्याय, भोजन, ब्राह्मणोंकी संनिधि, गुरुओंकी उपासना, दोनों संध्याओं और साधुओंके समागम (सत्संग)-के समय नित्य उपवीती रहना चाहिये यह सनातन विधि है। विप्र (वटु)-की मेखला जसे बनी हुई, तिहरी, बराबर तथा चिकनी बनानी चाहिये। मूंजके अभावमें कुशकी एक या तीन ग्रन्थियोंसे युक्त मेखला बनानी चाहिये। द्विजको केशान्तपर्यन्त बिल्व अथवा पलाशका चाहे किसी यज्ञीय वृक्षका सुन्दर (चिकना) तथा छिद्र आदिसे रहित दण्ड धारण करना चाहिये ॥१२-१५॥
द्विजको सायं तथा प्रातः समाहित होकर संध्या करनी चाहिये। काम, लोभ, भय अथवा मोहसे संध्याका त्याग करनेसे वह (द्विज) पतित हो जाता है। तदनन्तर प्रसन्न-मनसे सायं और प्रातः हवन करना चाहिये। स्नानके उपरान्त देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। पत्र, पुष्प अथवा जलसे देवताओंका पूजन करना चाहिये। आयु तथा आरोग्यकी प्राप्तिके लिये आलस्य आदिसे सर्वथा मुक्त होकर 'यह मैं अमुक नामवाला आपको प्रणाम करता हूँ'-इस प्रकार धर्मपूर्वक वृद्धजनोंका नित्य अभिवादन करना चाहिये। अभिवादन किये जानेपर विप्रको 'आयुष्मान् भव सौम्य' अर्थात् 'सौम्य! तुम दीर्घायु होओ' इस प्रकार अभिवादनका उत्तर देना चाहिये। उसके नामके अन्तिम स्वर अथवा नामके अन्तिम अक्षरके व्यञ्जन होनेपर उसके ठीक पूर्वके स्वरको प्लुत (दीर्घतर) स्वरमें बोलना चाहिये॥१६-२०॥
जो द्विज अभिवादन करनेपर प्रत्यभिवादन (अभिवादनका उत्तर) नहीं करता, उसका अभिवादन विद्वान्को नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह शूद्रके समान ही है। अभिवादनके समय गुरुके चरणोंका स्पर्श व्यत्यस्तपाणि होकर करना चाहिये अर्थात् बायें हाथसे बायें पैरको और दाहिने हाथसे दाहिने पैरको स्पर्श करना चाहिये। जिससे लौकिक, वैदिक अथवा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया हो, उस (गुरु)-का सर्वप्रथम अभिवादन करना चाहिये। देवपूजन (देव, पित्र्य) आदि कर्मोंमें भिक्षामें प्राप्त जल, पुष्प तथा समिधा अथवा इसी प्रकारके अन्य पदार्थोंका ग्रहण (प्रयोग) नहीं करना चाहिये। २१-२४॥
(मिलनेपर) ब्राह्मणसे उसका 'कुशल' पूछना चाहिये, इसी प्रकार क्षत्रियसे 'अनामय' (रोगराहित्य), वैश्यसे 'क्षेम' और शूद्रसे 'आरोग्य' पूछना चाहिये॥ २५ ॥
उपाध्याय१, पिता, ज्येष्ठ भ्राता, राजा, मामा, ससुर, रक्षक, मातामह, पितामह, अपनेसे श्रेष्ठ वर्णवाले तथा चाचा-ये लोग गुरु कहे गये हैं। माता, मातामही, गुरुपत्नी, पिता एवं माताकी बहिन (बुआ एवं मौसी), सास, पितामही तथा ज्येष्ठ धात्री (शैशवावस्थामें पालन
करनेवाली)-ये सभी स्त्रियाँ गुरु हैं। द्विजो! माता और पिताके सम्बन्धसे यह गुरुवर्ग कहा गया है अर्थात् माताके पक्षसे तथा पिताके पक्षसे जो लोग श्रेष्ठ कोटिमें हैं उन्हें बताया गया। मन, वाणी और कर्मद्वारा इनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये ॥ २६-२८॥
गुरुको देखते ही आसनसे उठ जाना चाहिये और अभिवादनकी विधिसे उन्हें अभिवादन करना चाहिये, अनन्तर उनकी आज्ञा पाकर हाथ जोड़कर सम्मुख बैठना चाहिये, पर इनके साथ एक आसनपर नहीं बैठना चाहिये और अपने लिये (व्यक्तिगत स्वार्थके लिये) इनसे विवाद भी नहीं करना चाहिये। प्राणधारणके लिये भी द्वेषवश गुरुजनोंसे विवाद न करे। अन्य गुणोंके विद्यमान रहनेपर भी गुरुसे द्वेष करनेवालोंका अध:पतन होता है अर्थात् गुरुद्वेषीके सभी गुण व्यर्थ होते हैं ॥ २९-३०॥
अभी बताये गये सभी गुरुओंमें भी पाँच विशेषरूपसे पूजनीय हैं। उनमें प्रथम तीन श्रेष्ठ हैं, उनमें भी माता अधिक पूज्य होती है। उत्पादक (पिता), उत्पन्न करनेवाली (माता), विद्याका उपदेश देनेवाले (गुरु), बड़े भाई और भरण- ग-पोषण करनेवाले स्वामी-ये पाँच
गुरु कहे गये हैं। कल्याण चाहनेवाले व्यक्तिको अपने सभी प्रयत्नोंके द्वारा प्राण ही क्यों न त्यागना पड़े, पर इन पाँचों (गुरुओं)-का विशेषरूपसे पूजन (आदर) करना चाहिये ॥३१-३३॥
जबतक माता और पिता ये दोनों निर्विकारर रहें, तबतक सब कुछ छोड़कर पुत्रको उनके परायण रहना चाहिये ।। ३४॥
यदि पुत्रके गुणों (सत्कर्मनिष्ठा-सेवाभाव आदि)- के कारण पिता-माता पुत्रपर प्रसन्न रहते हैं तो वह पुत्र अपने इन सत्कर्मनिष्ठा आदि कर्म (गुणों)-से सम्पूर्ण धर्मको प्राप्त कर लेता है (अर्थात् यज्ञ, दान आदि बड़े- बड़े कर्मोंसे होनेवाले सभी पुण्य माता-पिताकी प्रसन्नताके कारण पुत्रको प्राप्त होते हैं)। माताके समान कोई देवता नहीं है, पिताके समान कोई गुरु नहीं है। उनके उपकारका कोई भी प्रत्युपकार नहीं है॥ ३५-३६ ॥
उन दोनों (अर्थात् माता-पिता)-का मन, वाणी तथा कर्मसे नित्य ही प्रिय करना चाहिये। मोक्षसाधक (कर्मों) और नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको छोड़कर बिना उनकी आज्ञा प्राप्त किये दूसरे किसी धर्मका आचरण नहीं करना चाहिये। (उनकी सेवाको) धर्मका सार और मृत्युके अनन्तर मोक्षफल देनेवाला बताया गया है। उपदेष्टा (गुरु)-की अच्छी प्रकार आराधना करनेके अनन्तर उनकी आज्ञासे ब्रह्मचर्याश्रमका परित्यागकर गृहस्थाश्रम स्वीकार करनेवाला स्नातक शिष्य विद्याके फलका उपभोग करता है और मृत्युके उपरान्त स्वर्गलोक
प्राप्त करता है अर्थात् अभ्युदय (ऐहलौकिक उन्नति) तथा निःश्रेयस (पारलौकिक उन्नति) दोनों यथावत् प्राप्त करता है। जो पितृतुल्य बड़े भाईको मूर्ख समझता है, मरनेपर वह उस दोषके कारण घोर नरक प्राप्त करता है॥३७-४०॥
अच्छे मार्गमें स्थित (सत्कर्तव्यपरायण) पुरुषके लिये भरण-पोषण करनेवाला भर्ता (स्वामी) सदा पूज्य (आदरविशेषके योग्य) होता है। उपकार करनेके कारण दाता इस लोकमें अत्यधिक गौरव प्राप्त करता ही है। जो लोग भर्तासे प्राप्त जीविकाके बदले अपने प्राणोंतकका परित्याग कर देते हैं, उन्हें अक्षय लोक प्राप्त होते हैं, ऐसा भगवान् मनुने कहा है॥ ४१-४२॥
अपनेसे अल्प अवस्थावाले मामा, चाचा, ससुर तथा ऋत्विज्के प्रति प्रत्युत्थानपूर्वक (आसनसे उठकर) 'मैं अमुक नामवाला हूँ'-केवल ऐसा ही कहकर अपना सम्मानभाव व्यक्त करना चाहिये, इन्हें अभिवादन- विधिसे अभिवादन नहीं करना चाहिये* ॥ ४३ ॥
जो अपनेसे छोटा भी (यज्ञादिमें) दीक्षित (पुरुष) हो तो उसका नाम लेकर नहीं पुकारना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषको 'भो भवत्' अर्थात् 'आप' शब्दका प्रयोग कर इसके (दीक्षितके) साथ सम्भाषण करना चाहिये। ऐश्वर्यको अभिलाषा करनेवाले क्षत्रियादिकोंके लिये ब्राह्मण सदा ही आदरपूर्वक अभिवादन करने योग्य, पूजन करने योग्य तथा सिरसे वन्दन करने योग्य है॥ ४४-४५ ॥
विप्रको कभी भी क्षत्रियादिका अभिवादन नहीं करना चाहिये, भले ही वे ज्ञान, कर्म एवं गुणोंकी दृष्टिसे उत्कृष्ट हों। ब्राह्मणको सभी वर्गों के प्रति 'स्वस्ति' अर्थात् कल्याण हो-ऐसा कहना चाहिये-यह विधान है। समान वर्गों में (कनिष्ठ व्यक्तियोंको ज्येष्ठ व्यक्तियोंका) अभिवादन करना चाहिये। द्विजातियोंके गुरु अग्नि और सभी वर्गों के गुरु ब्राह्मण हैं। स्त्रियोंके एकमात्र गुरु उनके पति हैं और अतिथि सबका गुरु है।। ४६-४८॥
विद्या, कर्म, अवस्था, बन्धु तथा पाँचवाँ धन-ये सम्मान प्राप्त करनेके पाँच स्थान कहे गये हैं। इनमें बादकी अपेक्षा पूर्व-पूर्वकी गुरुता है। (ब्राह्मणादि) तीन वर्णीक जिस व्यक्तिमें ये पाँच गुण (मान्यताके स्थान) अधिक हों तथा प्रबल हों वह अपेक्षाकृत माननीय होता है (अर्थात् श्रेष्ठतर, श्रेष्ठतम होता है)। दशमी अर्थात् नब्बे वर्षसे अधिक अवस्थाको प्राप्त शूद्र भी मान देनेके योग्य हो जाता है (अर्थात् ऐसे शूद्रके आनेपर उसे बैठनेके लिये आसन आदि आदरभावपूर्वक देना चाहिये) ॥ ४९-५० ॥
ब्राह्मण, स्त्री, राजा, नेत्रहीन व्यक्ति, वृद्ध, भारसे पीड़ित व्यक्ति, रोगी तथा दुर्बलके लिये रास्ता छोड़ देना चाहिये (अर्थात् एक ही रास्तेपर आमने-सामने होनेपर स्वयं हटकर इन्हें रास्ता दे देना चाहिये। इनके निकल जानेपर स्वयं जाना चाहिये)। (ब्रह्मचारीको) प्रयत्नपूर्वक प्रतिदिन शिष्टोंके घरोंसे भिक्षा लाकर गुरुको निवेदितकर उनकी (गुरुकी) आज्ञा प्राप्तकर मौन होकर भोजन करना चाहिये॥५१-५२॥
उपनयन-संस्कार होनेपर (ब्रह्मचारी) ब्राह्मणको पूर्वमें 'भवत्' शब्दका प्रयोगकर ('भवति! भिक्षां देहि' ऐसा कहकर) भिक्षा माँगनी चाहिये। क्षत्रियको बीचमें ('भिक्षां भवति! देहि' ऐसा कहकर) तथा वैश्यको अन्तमें 'भवत्' शब्द कहकर ('भिक्षां देहि भवति!' ऐसा कहकर) भिक्षा माँगनी चाहिये। अपनी माता, बहन तथा मौसीसे अथवा जो इस ब्रह्मचारीकी अवमानना न करे, उससे पहली (उपनयन-संस्कारकी अङ्गभूत प्रथम) भिक्षा माँगनी चाहिये। अपनी जातिके घरोंसे अथवा अपनेसे उच्च वर्णवाले सभी लोगोंके घरसे भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये, किंतु पतित आदि व्यक्तियोंके घरसे भिक्षाका ग्रहण करना वर्जित है॥५३-५५ ॥
ब्रह्मचारीको चाहिये कि वह प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक ऐसे लोगोंके घरोंसे भिक्षा ग्रहण करे, जिनके घरोंमें वेद एवं यज्ञ आदिका लोप नहीं हुआ हो और जो (वेदशास्त्रानुसार) अपने कर्मों के पालनके कारण प्रशस्त हों। गुरुके कुल (सपिण्ड) तथा (अपने) बन्धुके कुल अर्थात् अपने कुल और बान्धवों (मातुल आदिके घर)-से भिक्षा नहीं माँगनी चाहिये। दूसरोंका घर न मिलनेपर पहले-पहलेका त्याग करना चाहिये। अर्थात् पहले बन्धु-बान्धवों (मातुल आदि)-के घर, यदि वहाँ भिक्षा न मिले तो अपने कुलमें और वहाँ भी न मिले तो अन्तमें गुरुके कुलमें भिक्षा माँगनी चाहिये। पहलेके कहे गये घरोंसे भी न मिलनेपर प्रयत्नपूर्वक वाणीको नियन्त्रित कर दिशाओंमें न देखते हुए, सम्पूर्ण ग्राममें भिक्षा-हेतु विचरण करना चाहिये (पर पातकी एवं हीन जातिवालेके घरकी भिक्षा न ले) ॥५६-५८॥
अपनी आवश्यकताके अनुसार बिना किसी छल- कपटके उस भिक्षाको एकत्रितकर प्रयत्नपूर्वक नित्य मौन होकर एकाग्रतापूर्वक भोजन करना चाहिये। (ब्रह्मचारी) नित्य भिक्षासे जीविकाका निर्वाह करे। ब्रह्मचारीको नित्य एक अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये। ब्रह्मचारीकी भिक्षान्नसे की गयी वृत्ति उपवासके समान ही कही गयी है॥५९-६०॥
नित्य अन्न (प्राप्त भिक्षान)-का पूजन (प्राणधारक रूपमें विष्णुस्वरूप समझकर ध्यान) करे और निन्दा न करते हुए उसे ग्रहण करे। (भोजनको) देखकर हर्षित और प्रसन्न होना चाहिये तथा सर्वथा उसकी (अन्नकी) प्रशंसा करनी चाहिये। अत्यधिक भोजन करना आरोग्य, आयुष्य, स्वर्ग और पुण्यका नाश करनेवाला तथा लोकमें। (अधिक भोजीके रूपमें) निन्दा करानेवाला है, इसलिये अतिभोजनका परित्याग करना चाहिये॥६१-६२॥
नित्य पूर्वकी ओर मुख करके अथवा सूर्यकी ओर मुख करके भोजन करे। उत्तरकी ओर मुखकर भोजन न करे-यह सनातन विधि है। दोनों हाथ एवं पाँव धोकर भोजनके आरम्भमें दो आचमन करे। पवित्र स्थानपर बैठकर भोजन करनेके अनन्तर पुन: दो बार आचमन करना चाहिये ॥६३-६४॥
Summary of chapter 61 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Ishvara reveals the secret of His unmanifest Parā-Shakti, which rests within Him as the ultimate divine womb from which the golden cosmic Egg manifests. Within this golden Egg, Hiranyagarbha Brahmā is born through divine impulse, while countless Jīvas emerge under the influence of Her enchanting Māyā. The Supreme Creator outlines His six divine limbs—omniscience, contentment, beginningless knowledge, absolute sovereignty, eternal potency, and infinite power—alongside the seven subtle Tattvas that constitute the spiritual blueprint of the universe.