27 अध्याय

ऋषियों ने कहा-सूतजी! सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि-ये चार युग हैं, अब (आप) इनके स्वभाव का संक्षेप में वर्णन कीजिये॥१॥

सूतजी बोले-नारायण कृष्णके अपने परमधाम चले जानेपर शत्रुओंको पीड़ा पहुँचानेवाले परम धर्मात्मा पाण्डुपुत्र पार्थ (अर्जुन) औदैहिक क्रिया करके महान् शोकसे आवृत हो गये। (उन्होंने) मार्गमें जाते हुए ब्रह्मवादी कृष्णद्वैपायन (व्यास) मुनिको शिष्यों, प्रशिष्यों से चारों ओरसे घिरे हुए देखा। तब शोकका परित्याग कर अर्जुन ने भूमिपर दण्डवत् गिरकर प्रणाम किया और परम प्रीतिसे कहा-महामुने! प्रभो! आप कहाँसे आ रहे हैं और किस देशकी ओर इस समय शीघ्रतापूर्वक जा रहे हैं? आपका दर्शन करनेसे ही मेरा महान् शोक दूर हो गया है। कमलपत्रके समान नेत्रवाले (व्यासजी महाराज)! इस समय मेरा जो कर्तव्य हो, उसे आप बतलायें। तब शिष्योंसे घिरे हुए महायोगी कृष्णद्वैपायन मुनिने नदीके किनारे बैठकर स्वयं कहा- ॥२-७॥

व्यासजी बोले-पाण्डुके पुत्र (अर्जुन)! यह घोर कलियुग आ गया है। इसलिये मैं भगवान् शंकर की महापुरी वाराणसी जा रहा हूँ। इस भयंकर कलियुग में लोग पापाचरण करनेवाले, वर्ण तथा आश्रमधर्मसे रहित महान् पापी होंगे। कलियुगमें सभी पापोंका शमन करने के लिये वाराणसीपुरीके सेवनको छोड़कर अन्य दूसरा कोई प्रायश्चित्त मैं नहीं देखता॥८-१०॥

सत्य, त्रेता तथा द्वापर-इन सभी (युगों)-में मनुष्य महात्मा, धार्मिक तथा सत्यवादी होते हैं। आप संसार में प्रजावत्सल तथा धृतिमान्के रूपमें विख्यात हैं, अतः अपने परम धर्मका पालन करें, इससे आप भयसे मुक्त हो जायेंगे। द्विजोत्तमो! भगवान् (व्यास)-के द्वारा ऐसा कहनेपर शत्रुके पुरको जीतनेवाले पृथा (कुन्ती)के पुत्र पार्थ (अर्जुन)-ने इन्हें प्रणामकर युगधर्मोंको पूछा। सत्यवतीके पुत्र व्यासमुनिने भगवान् शंकरको प्रणामकर सम्पूर्ण सनातन युगधर्मोको उन्हें बतलाया॥११-१४॥

व्यासजी बोले-नरेश्वर! पार्थ! संक्षेपमें युगधर्मो को तुम्हें बतलाता हूँ, मैं विस्तारसे वर्णन नहीं कर सकता हूँ। पार्थ! विद्वानोंद्वारा पहला कृतयुग कहा गया है, तदनन्तर दूसरा त्रेतायुग, तीसरा द्वापर तथा चौथा कलियुग कहा गया है। कृतयुगमें ध्यान, त्रेतामें ज्ञान, द्वापर में यज्ञ तथा कलियुगमें एकमात्र दान ही श्रेष्ठ साधन बताया गया है। कृतयुगमें ब्रह्मा देवता होते हैं, इसी प्रकार त्रेतामें भगवान् सूर्य, द्वापरमें देवता विष्णु और कलियुगमें महेश्वर रुद्र ही मुख्य देवता हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा सूर्य-ये सभी कलियुगमें पूजित होते हैं, किंतु पिनाकधारी भगवान् रुद्र चारों युगोंमें पूजे जाते हैं। सर्वप्रथम कृतयुगमें सनातनधर्म चार चरणोंवाला था, त्रेतामें तीन चरणोंवाला तथा द्वापरमें दो चरणोंसे स्थित हुआ, किंतु कलियुगमें तीन चरणोंसे रहित होकर केवल सत्तामात्रसे स्थित रहता है।। १५-२०॥

कृतयुगमें स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पत्ति होती थी और लोगोंकी आजीविका साक्षात् (आनन्द) रस से उल्लसित रहती थी। सारी प्रजाएँ सर्वदा सात्त्विक आनन्दसे तृप्त और भोगसे सम्पन्न रहती थीं। पुरञ्जय! उन प्रजाओंमें उत्तम और अधमका भेद नहीं था, सभी निर्विशेष थे। उस कृतयुगमें प्रजाकी आयु, सुख और रूप समान था। सम्पूर्ण प्रजा शोकसे रहित, सत्त्वगुण के बाहुल्य से युक्त, एकान्तप्रेमी, ध्याननिष्ठ, तपोनिष्ठ तथा महादेव शंकरकी भक्त थी। परंतप! वे प्रजाएँ निष्कामकर्म करनेवाली, नित्य प्रसन्न मनवाली और पर्वतों एवं समुद्रके किनारे रहनेवाली थीं, उनका कोई घर नहीं होता था॥ २१-२४॥

तदनन्तर कालके प्रभावसे त्रेता नामक युगमें (सत्ययुग का) आनन्दोल्लास नष्ट हो जाता है, (कृतयुगकी) उस सिद्धिका लोप होनेपर अन्य सिद्धि प्रवर्तित होती है। मेघ में जलकी कमी होनेपर मेघ और विद्युत्से वृष्टि उत्पन्न हुई।* पृथ्वीतलपर एक बार ही उस वृष्टिका संयोग होनेसे उन प्रजाओंके लिये गृहसंज्ञक वृक्षोंका प्रादुर्भाव हुआ। उन (वृक्षों)-से ही उनके सब कार्य सम्पन्न होने लगे। त्रेतायुगके प्रारम्भमें वह समस्त प्रजा उनसे ही (अपनी जीविकाका) निर्वाह करती थी॥ २५-२८॥

तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेपर उन प्रजाओं के ही विपर्ययसे* उनमें अचानक ही राग और लोभ का भाव उत्पन्न हो गया। तदनन्तर उनके उलट-फेर (दिनचर्या में व्यत्यय)-के कारण उस समयके प्रभाववश वे गृह संज्ञक सभी वृक्ष नष्ट हो गये ॥२९-३०॥

तब उन (वृक्षों)-के नष्ट हो जानेपर मिथुनधर्म से उत्पन्न सत्यका ध्यान करनेवाले वे सभी प्रजाजन विभ्रान्त होकर उस पूर्व वर्णित सिद्धिका ध्यान करने लगे। उस समय (सत्यका ध्यान करनेके कारण) उन प्रजाओंके (लुप्त) वे गृह-संज्ञक वृक्ष पुनः प्रादुर्भूत हो गये। वे वस्त्रों, आभूषणों तथा फलोंको उत्पन्न करने लगे। उन प्रजाओंके लिये उन वृक्षोंके प्रत्येक पत्रपुटों में गन्ध, वर्ण और रससे समन्वित, बिना मधु-मक्खियों के बना हुआ महान् शक्तिशाली मधु उत्पन्न होता था। उसी (मधु)-से त्रेतायुगके आरम्भमें वे प्रजाएँ जीवन-निर्वाह करती थीं। उस सिद्धिके कारण वे सारी प्रजाएँ हृष्ट-पुष्ट तथा ज्वरसे रहित थीं। तदनन्तर कालान्तरमें वे सभी पुनः लोभके वशीभूत हो गये। अब वे उन वृक्षों तथा उनसे उत्पन्न अमाक्षिक (मक्षिकाद्वारा न बनाये हुए) मधुको बलपूर्वक ग्रहण करने लगे॥३१-३५॥

उनके इस प्रकार पुनः लोभ करनेके कारण उत्पन्न दुष्कर्मसे वे कल्पवृक्ष कहीं-कहीं मधुके साथ ही नष्ट हो गये। तब अत्यन्त शीत, वर्षा एवं धूपसे अत्यधिक दुःखी उन्होंने (शीत-उष्ण आदि) द्वन्द्वोंसे पीड़ित होते हुए आवरणोंकी रचना की। तब मधुसहित कल्पवृक्षों के नष्ट हो जानेपर उन्होंने द्वन्द्वोंके निराकरणका उपाय विचारकर जीविका-निर्वाहके साधनोंका चिन्तन किया। तदनन्तर त्रेतायुगमें उन प्रजाओंकी जीविकाको सिद्ध करनेवाली अन्य सिद्धि पुनः प्रादुर्भूत हुई और उनकी इच्छाके अनुकूल वृष्टि हुई ॥ ३६-३९॥

निरन्तर वर्षाके कारण जो जल नीचेकी ओर प्रवाहित हुआ, उससे उन (प्रजाओं)-के लिये अनेक स्रोतों तथा नदियों की उत्पत्ति हुई। जब पृथ्वीतलपर थोड़ा जल एकत्र हो गया तो भूमि और जलका संयोग होने से अनेक प्रकारकी औषधियाँ उत्पन्न हो गयीं ॥ ४०-४१॥

बिना जोते-बोये ही विभिन्न ऋतुओंमें होनेवाले पुष्प एवं फलोंसे युक्त चौदह प्रकारके ग्राम्य एवं जंगली वृक्ष और गुल्म उत्पन्न हो गये। तदनन्तर त्रेतायुगके प्रभाव से भवितव्यतावश उन प्रजाओंमें निश्चितरूपसे सब प्रकार से राग और लोभ व्याप्त हो गया। तदुपरान्त उन लोगोंने अपनी अपनी शक्तिके अनुसार बलपूर्वक नदियों, क्षेत्रों, पर्वतों, वृक्षों, गुल्मों तथा औषधियोंपर अधिकार जमाना प्रारम्भ किया। उनके विपरीत आचरणके कारण वे सभी औषधियाँ पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गयीं। तब महाराज पृथुने पितामहके आदेशसे पृथ्वीका दोहन किया ॥ ४२-४५ ॥

तदनन्तर कालके प्रभावसे वे सभी प्रजाएँ क्रोधाभिभूत होकर एक-दूसरेकी जमीन, धन, स्त्री आदिको बलपूर्वक ग्रहण करने लगे। ऐसी अव्यवस्था देखकर भगवान् ब्रह्माने मर्यादाकी रक्षा करनेके लिये और ब्राह्मणों के कल्याणके लिये क्षत्रियोंकी सृष्टि की। प्रभुने त्रेतायुग में वर्ण तथा आश्रमको व्यवस्था और पशुहिंसासे रहित यज्ञों का प्रवर्तन किया। द्वापरमें लोगोंमें सदा मतभेद, राग, लोभ, युद्ध तथा तत्त्वोंके निश्चयका असामर्थ्य रहता है। एक ही वेद त्रेतामें चार पादोंमें विभक्त किया जाता है और द्वापर आदि युगोंमें वेदव्यासके द्वारा वही वेद चार भागोंमें बाँटा जाता है ॥ ४६-५०॥

ऋषिपुत्रोंने पुनः भ्रान्तदृष्ट्या मन्त्र और ब्राह्मणों के विन्यास तथा स्वर एवं वर्णके व्यतिक्रमसे विभक्त वेदों के पुनः विभाग किये। वैदिक ऋषियोंने कहीं-कहीं समानता, विशेषता और दृष्टि-भेदके आधारपर ऋक्, यजुः एवं साम-संज्ञक मन्त्रोंकी संहिताओंका संकलन किया। हे सुव्रत! (उन ऋषियोंने) ब्राह्मण, कल्पसूत्र, मन्त्रों, इतिहास-पुराण और धर्मशास्त्रोंका उपदेश किया है॥५१-५३।।

अवर्षण, मृत्यु, अनेक व्याधियों, उपद्रवों और मन, वाणी तथा शरीर-सम्बन्धी दु:खोंके कारण मनुष्यों को निर्वेद उत्पन्न होता है। फिर निर्वेदके कारण उनमें

दुःखसे मुक्ति पानेका विचार पैदा होता है और विचार से वैराग्य उत्पन्न होता है तथा वैराग्यसे अपने दोष दिखलायी पड़ते हैं॥५४-५५ ॥

दोष-दर्शनके कारण द्वापरमें ज्ञान उत्पन्न होता है। द्वापर में यह वृत्ति रजोगुण और तमोगुणसे युक्त कही गयी है। आद्य (सर्वप्रथम) कृतयुगमें धर्म प्रतिष्ठित था, वह त्रेतामें भी रहता है, द्वापरमें व्याकुल होकर वह धर्म कलियुगमें विलुप्त हो जाता है ॥ ५६-५७॥