22 अध्याय

व्यासजी बोले-सावधानीपूर्वक गोबर और जल से (श्राद्ध) भूमिको शुद्धकर सभी ब्राह्मणोंकी सेवा में पहुँचकर सज्जन पुरुषोंद्वारा उन्हें निमन्त्रित करना चाहिये। श्राद्धके पहले दिन ब्राह्मणोंकी (नम्रभाव से आदरपूर्वक) पूजाकर उनसे कहना चाहिये-'कल हमारे यहाँ श्राद्ध होगा (आपलोग कृपाकर पधारें)। ऐसा असम्भव होनेपर दूसरे (दिन) अर्थात् श्राद्ध के ही दिन यथोक्त लक्षणोंसे समन्वित ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करना चाहिये ॥१-२॥

मनके समान शीघ्र गतिवाले पितर जब यह सुन लेते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित है, तब परस्पर विचारकर श्राद्धकर्ताके यहाँ एकत्र हो जाते हैं। अन्तरिक्ष में विचरण करनेवाले पितर वायुरूपसे स्थित रहते हैं, ब्राह्मणोंके साथ भोजन करते हैं और भोजन करके परमगति प्राप्त करते हैं। श्राद्धका समय आनेपर सभी आमन्त्रित ब्राह्मणोंको संयमी और ब्रह्मचर्यपरायण होकर रहना चाहिये ॥३-५॥

श्राद्ध करनेवालेको क्रोध, उतावलापन तथा प्रमाद का त्यागकर समाहित होना चाहिये, सत्य बोलना चाहिये। उसे भारका ढोना, मैथुन, मार्गगमन (यात्रा आदि) और जपका (किसी कामनापरक यज्ञादिका श्राद्धके समय) परित्याग करना चाहिये॥६॥

 (पहलेसे ही) निमन्त्रित ब्राह्मण (यदि) किसी दूसरेका निमन्त्रण स्वीकार करता है तो वह घोर नरकमें जाता है और बादमें सूकरकी योनि प्राप्त करता है। (किसी एक) ब्राह्मणको आमन्त्रित करके जो मोह से दूसरेको आमन्त्रित करता है, वह व्यक्ति उससे भी अधिक पापी होता है (जो निमन्त्रित होनेपर भी दूसरी जगह जाता है) और विष्ठाका कीड़ा होता है। श्राद्धमें निमन्त्रित जो ब्राह्मण मैथुन करता है, वह ब्रह्महत्या (के पाप)-को प्राप्त करता है और बादमें तिर्यक्-योनिमें उत्पन्न होता है॥७-९॥

श्राद्धमें निमन्त्रित जो दुर्बुद्धि ब्राह्मण यात्रा करता है, उसके पितर उस महीने धूलिका भक्षण करते हैं श्राद्ध में निमन्त्रित जो ब्राह्मण कलह करता है, उस महीने में उसके पितर मलका भोजन करते हैं, इसलिये श्राद्ध में निमन्त्रित ब्राह्मणको नियतात्मा, क्रोधशून्य तथा शौचपरायण रहना चाहिये और श्राद्धकर्ताको भी जितेन्द्रिय होना चाहिये ॥१०-१२॥

श्राद्ध-दिनके पूर्व दिन समाहित होकर दक्षिण दिशामें जाकर अत्यन्त निर्मल, जड़सहित और दक्षिण की ओर झुके हुए कुशों और जलको लाना चाहिये। दक्षिणकी ओर झुके हुए, स्निग्ध, अन्यके सम्बन्धसे रहित (अर्थात् स्व-स्वत्ववाले) शुभ लक्षणोंवाले, पवित्र तथा एकान्त स्थानका गोमयसे उपलेपन करना चाहिये। नदियोंके किनारों, तीर्थों, अपनी भूमिमें, पर्वतके शिखरों तथा एकान्त स्थानोंपर श्राद्ध करनेसे पितर सदा संतुष्ट रहते हैं। १३-१५॥

दूसरेकी भूमिमें पितरोंका श्राद्ध नहीं करना चाहिये। यदि मोहवश मनुष्योंके द्वारा ऐसा किया जाता है तो वह कर्म (भूमिके) स्वामीके द्वारा विफल (नष्ट) कर दिया जाता है। जंगल, पर्वत, पुण्यतीर्थ, देवमन्दिर- ये सभी स्थान बिना स्वामीवाले (अर्थात् सार्वजनिक) कहे जाते हैं। इनपर किसीका स्वामित्व नहीं होता। (श्राद्धभूमिमें) सर्वत्र तिलोंको फैलाना चाहिये। तिलोंके द्वारा असुरोंसे उपहत अर्थात् आक्रान्त (श्राद्धभूमि) शुद्ध हो जाती है॥१६-१८॥

तदनन्तर अनेक प्रकारसे शुद्ध किये गये प्रशस्त अन्नसे ऐसे अनेक प्रकारके भोज्य पक्वान्न बनाने चाहिये, जो चोष्य, पेय आदि उत्तमोत्तम व्यंजनोंसे यथाशक्ति समृद्ध हों। तदनन्तर मध्याह्नकाल व्यतीत होनेपर कृतक्षौर (नख और बाल कटाये हुए) द्विजों (ब्राह्मणों)-से मार्गमें मिलकर उन्हें दन्तधावन प्रदान करे॥१९-२०॥

वैश्वदैवत्य मन्त्रका उच्चारण कर उन्हें उदुम्बरके पात्रोंद्वारा अभ्यञ्जनके लिये उपयोगी तैल, स्नानके लिये जल अलग-अलग दे। तदुपरान्त उनके स्नान कर

लेनेपर उठकर हाथ जोड़ते हुए उन्हें क्रमश: पाद्य एवं आचमन देना चाहिये। विश्वेदेवोंके निमित्त जो ब्राह्मण पहले निमन्त्रित हैं, उन्हें तीन कुश रखकर पूर्वाभिमुख आसन प्रदान करना चाहिये ॥ २१-२३॥

पितृ-ब्राह्मणोंको दक्षिणाग्र कुशके ऊपर तिलोदकसे प्रोक्षितकर दक्षिणाभिमुख आसन प्रदान करना चाहिये। श्राद्धकर्ता आसनका स्पर्श करते हुए 'आसध्वम्'- 'बैठिये' इस प्रकार कहकर उन पितृ-ब्राह्मणोंको पृथक्-पृथक् आसनपर बिठाये ॥२४-२५॥

(विश्वेदेव) देवसम्बन्धी दो ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख, पित्र्यसम्बन्धी तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख बैठाना चाहिये अथवा देवसम्बन्धी और मातामह (पित्र्यसम्बन्धी)-के भी निमित्त एक-एक ब्राह्मणको बैठाना चाहिये। (श्राद्धमें) सत्कार, देश, काल, पवित्रता और ब्राह्मणसम्पद्-इन पाँचोंका (अधिक) विस्तारके कारण नाश होता है, अतः विस्तारकी इच्छा नहीं करनी चाहिये, विस्तारकी अपेक्षा श्रुतशील आदिसे सम्पन्न अनपेक्षित क्षणोंसे रहित वेदके पारंगत एक ही ब्राह्मणको भोजन कराना उचित है॥२६-२८॥

किसी पात्रमें समस्त प्रकृत वस्तुओं (श्राद्धीय भोज्य पदार्थों मेंसे उचित मात्रामें भोज्य लेकर) देवमन्दिरमें देवताके उद्देश्यसे प्रथम निवेदित करके अन्य कार्य प्रारम्भ करना चाहिये, उस (श्राद्धीय लवणरहित सिद्ध) अन्नको अग्निमें छोड़ना चाहिये अथवा ब्रह्मचारीको देना चाहिये। अतः एक भी श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये ॥ २९-३०॥

श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंके बैठ जानेपर भोजन के निमित्त उपस्थित हुए भिक्षुक अथवा ब्रह्मचारीको भी उनकी इच्छानुसार (श्राद्धमें जो यथेष्ट हो वह) भोजन कराना चाहिये। जिसके श्राद्धमें अतिथि भोजन नहीं करता, उसका श्राद्ध प्रशंसनीय नहीं होता। इसलिये द्विजोंको प्रयत्नपूर्वक श्राद्धोंमें अतिथियोंका पूजन करना चाहिये॥३१-३२ 11

जो द्विज (ब्राह्मण) आतिथ्यरहित श्राद्धमें भोजन करते हैं, वे कौएकी योनिमें जाते हैं और दाता की भी यही गति होती है, इसमें संदेह नहीं। श्राद्धमें हीन अङ्गवाला, पतित, कुष्ठरोगी, व्रणयुक्त, पुक्कस (जातिविशेष), नास्तिक, कुक्कुट, शूकर तथा कुत्ता-ये दूरसे ही हटा देने योग्य हैं॥३३-३४॥

वीभत्स, अपवित्र, नग्न, मत्त, धूर्त, रजस्वला स्त्री, नीला और कषाय वस्त्र धारण करनेवाले तथा पाखंडी का परित्याग करना चाहिये ॥ ३५ ॥

श्राद्धमें पितृ-ब्राह्मणोंके प्रति जो भी कर्म किया जाता है, वह सब वैश्वदेवकर्मके अनन्तर करना चाहिये। यथाविधि (श्राद्धीय भोजनमें) बैठे हुए उन सभी (ब्राह्मणों)-को आभूषण, माला, यज्ञसूत्र, शिरोवेष्टन, धूप, वस्त्र तथा अनुलेपन आदिके द्वारा अलंकृत करना चाहिये ॥ ३६-३७॥

तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे उत्तराभिमुख होकर यथाविधि 'विश्वे देवास०' इस ऋचाका पाठकर देवोंका आवाहन करना चाहिये। दो पवित्र (कुश) ग्रहणकर 'शं नो देवी०'-यह मन्त्र पढ़कर प्रक्षालित पात्रमें जल डाले और 'यवोऽसीति०' मन्त्रसे यव (जौ) भी डाले। 'या दिव्या०' इस मन्त्रसे (ब्राह्मणके) हाथ पर अर्घ (अर्घपात्रका जल) छोड़े और यथाशक्ति गन्ध, माला, धूप तथा दीप आदि प्रदान करे ॥ ३८-४०॥

तदनन्तर विद्वान् व्यक्तिको अपसव्य एवं दक्षिणाभिमुख होकर 'उशन्तस्त्वा०' इस ऋचासे पितरोंका आवाहन करना चाहिये। आवाहन करके उनकी आज्ञासे 'आ यन्तु नः०' इस मन्त्रका जप करना चाहिये। 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे पात्रमें जल डाले और 'तिलोऽसि०' इस मन्त्रसे तिल भी छोड़े। पहलेके समान अर्घ प्रदानकर अथवा ब्राह्मणोंके हाथमें (जलादि) प्रदानकर समाहित होकर पात्रमें संस्रव-अर्घका अवशिष्ट जल रखे। तदनन्तर 'पितृभ्यःस्थानम्' इस मन्त्रसे पात्र को अधोमुख (उलटकर) रखे। घृतयुक्त अन्न लेकर 'अग्नौ करिष्ये' ऐसा पूछे और (उन ब्राह्मणोंद्वारा) 'कुरुष्व- करो' ऐसी आज्ञा प्राप्त होनेपर उपवीती (सव्य होकर) हवन (अग्नौकरण) करे। हाथमें कुश लेकर और यज्ञोपवीती (सव्य) होकर होम करना चाहिये। पितृसम्बन्धी कार्य प्राचीनावीती (अपसव्य) होकर करे और वैश्वदेवसम्बन्धी कार्य होमके समान अर्थात् सव्य होकर करे॥४१-४५॥

पुरुषको दाहिना जानु जमीनपर रखकर देवों की परिचर्या करनी चाहिये और पितरोंकी परिचर्या बायाँ जानु जमीनपर रखना चाहिये । ४६ ।।

तब 'सोमाय वै पितृमते स्वधा नमः' इस मन्त्रका उच्चारणकर 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा' ऐसा कहकर हवन करे॥४७॥

अग्निके अभाव होनेपर सावधानचित्त होकर ब्राह्मण के हाथपर, महादेवके समीप अथवा गोशालामें हवनीय द्रव्य रखना चाहिये। तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्तकर दक्षिण दिशामें जाकर भूमिको गोमय (गोबर)-से लीपकर उस स्थानमें बालू बिछाये। तदनन्तर उस स्थानपर दक्षिण की ओर झुकी हुई गोल अथवा चौकोर शुभ (बालुकामय) बेदी बनाये, उस बेदीके बीचमें एक कुशसे तीन रेखा खींचे और उस स्थान (बेदी)-पर दक्षिणाग्र कुशों को बिछाकर हविके बचे हुए अंशसे निर्मित तीन पिण्ड उस (बेदी)-पर प्रदान करे॥ ४८-५१॥

पिण्ड-प्रदानके अनन्तर लेपभागके अधिकारी* पितरोंके लिये पिण्डाधार-कुशोंके मूलमें उस (पिण्ड शेष से संसृष्ट) हाथका प्रोक्षण करे। तदनन्तर मन्त्रवेत्ताको

चाहिये कि आचमन करे और धीरे-धीरे श्वास खींचकर अपने बायेंसे पीछे मुख करके धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए पिण्डोंके सामने अपना मुख कर पूरा श्वास छोड़े तथा उस अन्न एवं पितरोंको नमस्कार करे। पुनः पिण्डके समीप (ऊपर) धीरे-धीरे (अर्घपात्रका) शेष जल छोड़े (इसे अवनेजन कहते हैं)। तदनन्तर सावधानीके साथ रखे हुए उन पिण्डोंको झुककर क्रमानुसार सूंघे (और पाकपात्रमें रख दे।) ॥५२-५३ ॥

पिण्डदानसे बचा हुआ अन्न ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक खिलाना चाहिये। पूआ, कृसर, पायस (तिलके साथ पकाये चावलकी खीर), सूप, शाक, फल, ईख, दूध,

दही, घृत, मधु, अन्न तथा अनेक प्रकारके खाने और पीने योग्य पदार्थ उनकी (ब्राह्मणोंकी) रुचिके अनुसार खिलाने चाहिये॥५४-५५॥

श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको जो-जो रुचिकर हो (और श्राद्धमें विहित हो) वह सब देना चाहिये। साथ ही अनेक प्रकारके धान्य, तिल तथा शर्कराका दान करना चाहिये॥५६॥

कल्याण प्राप्त करनेकी इच्छावाले (श्राद्धकर्ताको चाहिये कि) ब्राह्मणोंको फल, मूल और पानक (विविध स्वादयुक्त पेय पदार्थविशेष)-को छोड़कर अन्य सभी

अन्न उष्ण-अवस्थामें (गरम-गरम) प्रदान करे॥५७॥

(श्राद्धकर्ता) कभी भी अश्रुपात न करे, न कोप करे, न झूठ बोले, पाँवसे अन्नको स्पर्श न करे और न अन्नका (पैरोंसे) अवधूनन (मर्दन) करे। क्रोध करके जो दिया जाता है, जल्दी-जल्दी जो भोजन किया जाता है और बोलते हुए जो खाया जाता है, उस पदार्थको राक्षस हर लेते हैं। ब्राह्मणों के समीप स्वेदयुक्त शरीरसे न रहे। श्राद्धस्थलसे श्येन, कौआ आदि पक्षियोंको हटाना नहीं चाहिये, क्योंकि (सम्भव है) इनके ही रूपमें पितृगण वहाँ खानेकी इच्छासे आये हों ॥५८-६०॥

वहाँ (श्राद्धमें) हाथसे प्रत्यक्ष लवण नहीं देना चाहिये। लोहेके पात्रद्वारा और अश्रद्धासे कोई वस्तु नहीं देनी चाहिये। स्वर्ण, रजत या औदुम्बरके पात्रसे तथा विशेष रूपसे खड्ग नामके पात्रविशेषसे दिया हुआ पदार्थ अक्षय होता है। जो व्यक्ति श्राद्धमें मिट्टीके बर्तनोंमें पितरोंको भोजन कराता है, वह घोर नरकमें जाता है, ऐसे ही भोजन करनेवाले ब्राह्मण तथा (श्राद्ध करानेवाले) पुरोहित भी नरकमें जाते हैं॥६१-६३॥

एक पंक्तिमें (भोजन करनेवालोंके साथ परोसनेमें) विषम व्यवहार नहीं करना चाहिये। सबको समान रूपसे देना चाहिये। (भोजन करनेवालोंको भी विषम दृष्टिसे) न तो माँगना चाहिये न किसी दूसरेको दिलाना चाहिये, क्योंकि ऐसा (करनेपर) माँगनेवाला, दिलानेवाला और देनेवाला-ये तीनों भीषण नरकोंमें जाते हैं। शिष्ट लोगोंको मौन होकर भोजन करना चाहिये। (अन्नके) प्राकृत गुणोंका वर्णन नहीं करना चाहिये। पितर तभीतक भोजन करते हैं, जबतक भोज्य पदार्थ के गुणोंका वर्णन नहीं होता ॥ ६४-६५ ।।

अग्रासनपर (प्रथम पंक्तिमें) बैठे हुए किसी एक द्विजको उस पंक्ति या अन्य पंक्तिमें बैठे द्विजों (ब्राह्मणों)-के देखते-देखते (उनके द्वारा भोजन प्रारम्भ करनेके पूर्व) पहले अकेले भोजन आरम्भ नहीं करना चाहिये (अर्थात् अपनी तथा अन्य पंक्तियोंमें बैठे हुए सभी ब्राह्मणोंके साथ ही भोजन आरम्भ करना चाहिये)। क्योंकि ऐसा करनेपर वह अज्ञ (द्विज) पंक्तिमें बैठे हुए देखनेवालोंके पापका भागी होता है। श्राद्धमें नियुक्त श्रेष्ठ द्विजको किसी वस्तुका बहिष्कार नहीं करना चाहिये और दूसरेके अन्नकी ओर नहीं देखना चाहिये। श्राद्धमें भोजन करते हुए ब्राह्मणोंको वेद, धर्मशास्त्र, इतिहास-पुराण तथा शुभ श्राद्धकल्पों (श्राद्धीय नियमों)- को सुनाना चाहिये। ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर उनसे 'क्या आप लोग तृप्त हो गये?' इस प्रकार पूछना चाहिये और उनके भोजनपात्रके सम्मुख परिवेषणसे अवशिष्ट अन्नका विकिरण करना चाहिये (साथ ही वृद्ध प्रपितामह आदि लेपभागके अधिकारी पितरोंके लिये श्राद्धीय सिद्ध अन्नका उत्सर्ग करना चाहिये)। तदनन्तर तृप्त ब्राह्मणोंको आचमन कराना चाहिये॥६६-७० ॥

आचमन कर लेनेपर उन्हें 'चतुर्दिक् रमण करें' ऐसा कहना चाहिये। तब ब्राह्मण उसे 'स्वधाऽस्तु' कहकर आशीर्वाद दें। उनके (ब्राह्मणोंके) भोजन करनेसे शेष बचे अन्नको (उन ब्राह्मणोंको ही) निवेदित करे। अनन्तर वे ब्राह्मण जैसा कहें, वैसा ही उनकी आज्ञासे करे ॥७१-७२॥

पित्र्यकार्य (माता-पिताके एकोद्दिष्ट श्राद्ध)-में 'स्वदितम्', गोष्ठीश्राद्धमें 'सूनृतम्', आभ्युदयिक' श्राद्ध में 'सम्पन्नम्' तथा दैव (देवश्राद्ध)-में 'रोचते' ऐसा

कहना चाहिये॥७३॥

निमन्त्रित ब्राह्मणोंको बिदाकर मौन होकर दैव कार्य (पूर्वाभिमुख आचमन, विष्णुस्मरण आदि पुनः) करके दक्षिणाभिमुख होकर पितरोंसे इन वरोंकी याचना करे-॥७४॥

हमारे (कुलमें) दान देनेवालोंकी, वेद (ज्ञान) की तथा संततिकी वृद्धि हो। (शास्त्रों, ब्राह्मणों, पितरों, देवों आदिमें) हमारी श्रद्धा हटे नहीं। मेरे पास दान

देनेके लिये बहुतसे पदार्थ हों।७५ ॥

(श्राद्धके) पिण्डोंको गाय, अज (बकरा) अथवा ब्राह्मणको दे, ऐसा सम्भव न होनेपर अग्नि अथवा जल में विसर्जित करना चाहिये। पुत्रकी इच्छा करनेवाली

(श्राद्धकर्ताकी) पत्नीको मध्यम पिण्डका भक्षण करना चाहिये। तदनन्तर हाथोंको धोकर आचमन करके अवशिष्ट भोज्य पदार्थोंसे अपनी जातीय बान्धवोंको तृप्त करे, उन जातीय बन्धुओंके तृप्त हो जानेपर अपने भृत्यजनोंको भोजन कराये। तत्पश्चात् पत्नियोंके साथ स्वयं भी शेष अन्नको ग्रहण करे॥७६-७७॥

(श्राद्धस्थलसे) जूठा अन्न तबतक नहीं उठाना चाहिये, जबतक सूर्यास्त न हो जाय। श्राद्धकी उस रात्रिमें पति-पत्नीको ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना चाहिये। श्राद्ध करके और श्राद्धका भोजन करके जो मैथुन करता है, वह महारौरव नामक नरकमें जाता है, तदुपरान्त कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है। श्राद्धकर्ता तथा श्राद्धके भोजन करनेवालेको पवित्र, क्रोधरहित, शान्त, सत्यवादी तथा सावधान रहना चाहिये और स्वाध्याय तथा यात्राका त्याग करना चाहिये ॥७८-८०॥

(किसी एक) श्राद्धमें भोजन करनेके बाद जो ब्राह्मण दूसरे श्राद्धमें भोजन करते हैं, वे महापातकियों के समान हैं और बहुतसे नरकोंमें जाते हैं। इस प्रकार आप लोगोंसे मैंने इस सनातन श्राद्धकल्पका वर्णन किया। उदासीन (अनासक्त) तत्त्ववेत्ताको नित्य अपक्व अन्नसे श्राद्ध करना चाहिये। ८१-८२॥

अग्निहोत्रसे रहित, यात्रा करनेवाले अथवा व्यसन से युक्त (किसी प्रकारकी आपत्ति या रोगसे ग्रस्त) श्रद्धालु और विधिको जाननेवाले द्विजको आमश्राद्ध (अपक्व अन्नसे किया जानेवाला श्राद्ध) करना चाहिये। वह उसी अपक्व अन्नसे 'अग्नौकरण'* करे और उसीसे पिण्डदान भी करे। जो इस विधिसे शान्त-मन होकर श्राद्ध करता है, वह सभी कल्मषोंसे दूर होता हुआ योगियोंके नित्य पदको प्राप्त करता है ।। ८३-८४॥

इसलिये द्विजोत्तमको सभी प्रयत्नोंसे श्राद्ध करना चाहिये। इससे सनातन ईशकी सम्यक् रूपसे आराधना हो जाती है।। ८५ ॥

सर्वथा निर्धन द्विजको मूल अथवा फलोंसे श्राद्ध करना चाहिये। अथवा स्नानकर समाहित होकर तिल और जलद्वारा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। जिसके पिता जीवित हों उसे श्राद्ध नहीं करना चाहिये अथवा उसके लिये होमपर्यन्त श्राद्ध करनेका विधान है। कुछ लोगोंका कहना है कि पिता जिन्हें पिण्डदान करते हों उन्हें ही (वह) पिण्डदान करे। पिता, पितामह तथा प्रपितामहमेंसे जिसकी मृत्यु हुई हो उसीके निमित्त श्राद्धकर्ताको पिण्डदान करना चाहिये, न कि अन्य किसी (जीवित व्यक्ति)-के निमित्त । अथवा जीवित पुरुषको इसकी अभिरुचिके अनुसार भक्तिपूर्वक भोजन कराये। श्रुतिमें कहा गया है कि (पितादि) जीवित व्यक्ति का अतिक्रमणकर पिण्डदान नहीं करना चाहिये। ८६-८९॥

व्यामुष्यायणिक' पुत्र बीजी एवं क्षेत्री दोनों पिताओंको पिण्डदान करे। यह पुत्र सम्पत्तिका आधा भाग ले सकता है। जो पुत्र नियोग-विधिसे उत्पन्न नहीं है, शुल्क (मूल्य) देकर गृहीत है, वह बीजी (जिस पुरुषके बीजसे उत्पन्न हुआ है वह बीजी है) को पिण्डदान करेगा और क्षेत्राधिकारी पिताके पिण्डदान का उसे अधिकार नहीं होता। (नियोगसे उत्पन्न पुत्रको) क्रमश: क्षेत्री और बीजीको दो पिण्ड देने चाहिये। एक-एक पिण्ड देते समय क्रमशः अलग-अलग दोनोंका नाम कीर्तन करना चाहिये ॥९०-९२॥

 (पिताकी) मृत्यु-तिथिमें विधिपूर्वक एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये। अपना अशौच समाप्त होनेपर इच्छानुसार काम्य श्राद्ध किये जा सकते हैं। ९३ ॥

अभ्युदयकी कामना करनेवालेको पूर्वाह्नों ही आभ्युदयिक (नान्दी) श्राद्ध करना चाहिये। देवकार्य के समान इसमें सभी कार्य करने चाहिये। तिलोंका कार्य जौसे करना चाहिये। इसमें सीधे कुशोंका प्रयोग करे (मोटकके रूपमें द्विगुणीकृत कुशोंका प्रयोग न करे)। युग्म ब्राह्मणोंको भोजन कराये और 'नान्दीमुखाः पितरः प्रीयन्ताम्' अर्थात् नान्दीमुख नामक पितर तृप्त हों ऐसा कहना चाहिये ॥ ९४-९५ ॥

पहले मातृश्राद्ध तदनन्तर पितृश्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद मातामहादिका श्राद्ध होता है। वृद्धिश्राद्धमें इन्हीं तीन प्रकारके श्राद्धोंका वर्णन हुआ है । देवकार्य (विश्वेदेव कार्य) करनेके अनन्तर पिण्डदान करना चाहिये। दाहिनी ओरसे ही विश्वेदेवकार्य करना चाहिये। एकाग्रचित्तसे सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो पिण्डदान करना चाहिये॥९६-९७॥

सर्वप्रथम (नान्दीश्राद्धके पूर्व) भक्तिपूर्वक गणेश्वरों से युक्त (षोडश) मातृकाओंका पूजन करना चाहिये। मनोरम स्थण्डिल, प्रतिमा अथवा ब्राह्मणोंमें पुष्प, धूप, नैवेद्य, गन्ध तथा अलंकारों आदिके द्वारा (षोडश मातृकाओंका) पूजन करना चाहिये। मातृगणोंकी पूजाकर विद्वान्को चाहिये कि वह तीनों श्राद्ध करे। मातृपूजन किये बिना जो श्राद्ध करता है, (षोडश) मातृकाएँ क्रुद्ध होकर उससे अप्रसन्न हो जाती हैं॥९८-१००॥