कूर्म महा पुराण
25 अध्याय
सूतजी बोले-मेरु शिखरके स्वर्णिम कैलास पर्वतपर पहुँचकर महेश्वर भगवान् शंकर केशव (श्रीकृष्ण)- के साथ विहार करने लगे। कैलास पर्वतपर निवास करनेवालोंने उन देवाधिदेव, अच्युत, महात्मा श्रीकृष्ण को देखकर उनकी पूजा की। उन्होंने चार भुजावाले, उदार अङ्गीवाले, प्रलयकालीन मेघके समान प्रभावाले, मुकुटधारी, हाथ में धनुष धारण किये, श्रीवत्ससे सुशोभित वक्षःस्थलवाले, दीर्घ भुजावाले, विशाल नेत्रोंवाले, पीताम्बर धारण किये, वक्षःस्थलपर उत्तम वैजयन्तीकी माला धारण किये, शोभासे सुशोभित दिव्य अति कोमल, युवावस्थावाले, कमल (वर्ण)-के समान (रक्त) चरण एवं नेत्रवाले, अत्यन्त सुन्दर, मुसकराते हुए अच्छी गति प्रदान करनेवाले अच्युत (श्रीकृष्ण)-की पूजा की॥१-५॥
वहाँ किसी समय माता देवकीके आनन्दको बढ़ानेवाले शोभासम्पन्न श्रीकृष्ण लीलाके निमित्त कैलास पर्वत की गुहामें विचरण करने लगे। सभी प्रमुख गन्धर्वो, अप्सराओं, नागकन्याओं, सिद्धों, यक्षों तथा गन्धर्वो ने वहाँ उन जगन्मय (श्रीकृष्ण)-को देखा और परम आश्चर्यचकित होकर वे आनन्दसे प्रफुल्लित नेत्रवाले हो गये तथा उन महात्माके मस्तकपर पुष्पों की वर्षा करने लगे। दिव्य गन्धर्वांकी कन्याएँ तथा उसी प्रकार श्रेष्ठ अप्सराएँ कृष्णको देखकर अव्यवस्थित वस्त्राभूषणवाली होकर उनकी कामना करने लगीं। गायनमें पारंगत कुछ सुन्दरियाँ काममोहित होकर देवकीपुत्रकी ओर देखकर विविध प्रकारके गीत गाने लगीं ॥६-१०॥
कुछ अत्यन्त विलासप्रिय (कन्याएँ) उनके आगे नृत्य करने लगी और कुछ वहीं स्थित होकर उनकी ओर देखकर उनके वदनामृतका पान करने लगीं ॥११॥
कुछ कामिनियाँ (कन्याएँ) अपने अङ्गोंसे श्रेष्ठ आभूषणों को उतारकर उनसे लोकभूषण कृष्णको आदरपूर्वक आभूषित करने लगीं। कुछ उनके अङ्गोंसे श्रेष्ठ आभूषणों को लेकर अपनेको तथा अपने आभूषणोंसे माधवको सजाने लगीं। कतिपय मुग्ध मृगके समान नयनोंवाली काम-मोहित (कन्याएँ) हरि कृष्णके समीपमें जाकर उनके मुखकमलका स्पर्श करने लगीं। उनकी मायासे मोहित कुछ अप्सराएँ लोकों के आदि कारण गोविन्द का हाथ पकड़कर उन्हें अपने भवनमें ले गयीं ॥ १२-१५॥
उन कमललोचन भगवान् श्रीकृष्णने बहुतसे रूप धारणकर लीलापूर्वक उनकी अभीष्ट कामनाओंकी पूर्ति की। इस प्रकार श्रीमान् नारायण हरिने संसार को (अपनी) मायासे मोहित करते हुए देवाधिदेव शंकर के नगर में बहुत समयतक रमण किया॥१६-१७॥
बहुत दिन व्यतीत होनेपर द्वारिकापुरीके रहनेवाले लोग गोविन्दके विरहमें भयभीत एवं विह्वल हो गये। तब पहले कृष्णद्वारा छोड़ दिये गये बलवान् गरुड उनको ढूँढ़ते हुए उस हिमालय पर्वतपर गये। वहाँ गोविन्द को न देखकर उन उपमन्युको विनयपूर्वक प्रणामकर पुनः द्वारवतीपुरीमें लौट आये। इसी बीच अत्यन्त भयंकर हजारों महादैत्य तथा राक्षस भय उत्पन्न करते हुए सुन्दर द्वारकामे आ पहुँचे। कृष्णके समान पराक्रमवाले बलवान् सुपर्ण (गरुड)-ने महान् युद्धद्वारा उन्हें मारकर उस शुभ पुरीकी रक्षा की॥१८-२२॥
इसी समय भगवान् नारद ऋषि कैलास शिखर पर श्रीकृष्णका दर्शनकर द्वारकापुरीमें गये। उन नारद ऋषि को देखकर वहाँ (द्वारकामें) निवास करनेवाले सभीने पूछा-'नारायण, नाथ, भगवान् हरि कहाँ हैं?' उन्होंने (नारदने) उनसे कहा कि भगवान् हरि कैलास शिखरपर रमण कर रहे हैं, मैं उन महायोगीको देखकर आज यहाँ आया हूँ॥ २३-२५॥
विप्रो! उनका वचन सुनकर आकाश में चलने वाले पक्षियोंमें श्रेष्ठ वे गरुड श्रेष्ठ पर्वत कैलासपर गये। उन्होंने देवकीपुत्र गोविन्द हरिको देवाधिदेव (शंकर)- के समीप रत्नमण्डित भवनमें एक श्रेष्ठ आसन पर विराजमान देखा। (वहाँ) देवता, दिव्य स्त्रियाँ, महादेव के गण, सिद्ध तथा योगीजन चारों ओरसे घेरकर उनकी उपासना कर रहे थे॥२६-२८॥
गरुड ने कल्याणकारी शंकरको भूमिपर दण्डवत् प्रणाम किया और द्वारकापुरीका समाचार हरिसे निवेदन किया। तदनन्तर नीललोहित शंकरको विनयपूर्वक प्रणामकर और उन हरकी आज्ञा प्राप्तकर स्त्रीसमूहों द्वारा पूजित और अमृतके समान मधुर स्वादुयुक्त वचनों से सत्कृत वे मधुसूदन श्रीकृष्ण कश्यपपुत्र गरुड पर आरूढ़ होकर अपनी पुरीको चले। शंख, चक्र तथा गदाधारी शत्रुहन्ता महायोगीको जाते हुए देखकर गन्धर्व तथा श्रेष्ठ अप्सराओंने उनका अनुगमन किया। विश्वात्मा गोविन्द हरि उन सभी अङ्गनाओंको विदाकर शीघ्र ही उस दिव्य पुरी द्वारवतीको गये ॥२९-३३॥
मुनिश्रेष्ठो! उन मुरारिके चले जानेपर वे कामिनियाँ चन्द्रमारहित रात्रिके समान शोभाहीन हो गयीं। पुरवासियों ने श्रीकृष्ण के आगमन के शुभ समाचारको सुनकर शीघ्र दिव्य एवं मङ्गलमयी द्वारवती पुरीको सुसज्जित किया। श्रीकृष्णके आमगनसे अति प्रसन्न द्वारका वासियों ने विशाल पताकाओं और रत्नोंसे जटित ध्वजों तथा लाजा आदि माङ्गलिक वस्तुओंसे सुन्दर पुरीको सजा दिया। मधुर स्वरवाले विविध वाद्यों, हजारों शंखों तथा वीणाओं को वे लोग बजाने लगे। गोविन्दके शुभपुरी द्वारवतीमें प्रवेश करते ही युवती स्त्रियाँ मधुर स्वरमें गान करने लगी। उन ईशान (कृष्ण)-को देखकर वे नृत्य करने लगी और महलोंके ऊपर स्थित स्त्रियाँ वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण के ऊपर फूल बरसाने लगीं ॥३४-३९॥
भवनमें प्रवेशकर महायोगी कृष्ण आशीर्वादों से अभिनन्दित होते हुए अत्यन्त रमणीय शुक्लवर्ण के मण्डपमें स्थित एक श्रेष्ठ आसनपर अपनी पत्नियों के साथ सुशोभित हुए। वे चारों ओरसे शङ्ख आदि प्रमुख पुत्रों तथा हजारों स्त्रियोंसे घिरे हुए थे॥ ४०-४१॥
वैजयन्ती मालासे विभूषित उस रमणीय श्रेष्ठ आसन पर अच्युत श्रीकृष्ण जाम्बवतीके साथ उसी प्रकार सुशोभित हुए जैसे देवी उमाके साथ महादेव। ब्राह्मणो! उन अव्यय तथा लोकोंके आदि कारण (श्रीकृष्ण)-का दर्शन करनेके लिये देवता, गन्धर्व और पूर्वज मार्कण्डेय आदि महर्षि वहाँ आये। तब उन भगवान् श्रीकृष्ण हरि ने मार्कण्डेयजी को आया देखकर आसनसे उठकर विनयपूर्वक प्रणाम किया और उन्हें आसन दिया॥४२-४४॥
लम्बी भुजाओंवाले हरि ने प्रणामके द्वारा उन ऋषिगणों की पूजा करके और उनके मनोरथोंको प्रदान करके उन्हें विदा किया॥४५॥
तदनन्तर मध्याह्नकालमें स्वयं देवाधिदेव हरिने स्नानकर शुक्ल वस्त्र धारण किये और हाथ जोड़कर सूर्य को आराधना की। दिवाकर सूर्यकी ओर देखते हुए उन्होंने विधिपूर्वक मन्त्रोंका जप किया। उन देवेश्वरने देवताओं, मुनिगणों और पितरोंका तर्पण किया॥४६-४७॥
(मुनि) मार्कण्डेयके साथ देवमन्दिरमें प्रवेशकर उन्होंने लिङ्गमें प्रतिष्ठित भस्मविभूषित भूतेश्वर (श्रीशंकर) की पूजा की। मनुष्योंके नियामक उन्होंने स्वयं सभी नियमोंको पूर्णकर ब्राह्मणोंकी पूजा की और मुनीश्वर (मार्कण्डेय)-को भोजन कराया। विप्रेन्द्रो! तदुपरान्त पुत्रों आदिसे घिरे हुए अच्युतने आत्मनिष्ठ होकर मार्कण्डेयजीसे पुराणोंकी पुण्यदायिनी कथाको सुना। इन सारे कर्मोंको देखकर महामुनि मार्कण्डेयने श्रीकृष्ण से हँसते हुए मधुर वचन कहा- ॥ ४८-५१॥
मार्कण्डेयजी बोले-(देव!) कर्मोद्वारा आपकी ही पूजा की जाती है और योगियोंके ध्येय भी आप ही हैं, फिर आप शुभ कर्मोंके द्वारा किस देवता की आराधना कर रहे हैं, यह मुझे बतलायें। आप ही वे परम ब्रह्म हैं, निर्वाणरूप हैं और निर्मल पद हैं। (पृथ्वीका) भार उतारनेके लिये आप प्रभु ही वृष्णि-कुल में अवतरित हुए हैं। सभी पुत्रोंके सुनते हुए ही ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ महाबाहु कृष्णने उनसे (मार्कण्डेयजी से) हँसते हुए कहा-॥५२-५४॥
श्रीभगवान्ने कहा-आपने जो कुछ भी कहा, सब सत्य ही कहा है, इसमें संशय नहीं है तथापि मैं सनातनदेव ईशान (शंकर)-की पूजा करता हूँ। विप्र! मुझे न तो कुछ करना है और न मुझे कुछ अप्राप्त है, फिर भी यह जानते हुए भी मैं परम शिव ईशकी पूजा करता हूँ। माया से मोहित लोग उन देव (शंकर)-का साक्षात्कार नहीं कर पाते। परंतु मैं अपने मूलका परिचय देते हुए उनकी पूजा करता हूँ। इस संसारमें लिङ्गार्चनसे अधिक कोई पुण्य और भयका नाश करनेवाला (कर्म) नहीं है। अत: इन लोकों (प्राणिमात्र)-के कल्याणके लिये लिङ्गमें शिव की पूजा करनी चाहिये॥५५-५८॥
वैदिक सिद्धान्तोंको जाननेवाले लोग इस लिङ्ग को मेरा ही स्वरूप कहते हैं। इसीलिये मैं स्वयमेव आत्मस्वरूप ईशानका पूजन करता हूँ। मैं उन्हीं (शंकर)-की परम मूर्ति हूँ, मैं शिवस्वरूप ही हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं। वेदोंमें ऐसा ही निश्चय किया गया है कि हम दोनोंमें कोई भेद विद्यमान नहीं है। संसार से भयभीत लोगोंको इन देव महादेवका सदा ध्यान, पूजन और वन्दन करना चाहिये तथा लिङ्गमें महेश्वरको सदा प्रतिष्ठित समझना चाहिये ॥५९-६१॥
श्रीमार्कण्डेयजीने पूछा-विशाल नेत्रोंवाले देवश्रेष्ठ कृष्ण! आप इस गूढ़ एवं श्रेष्ठ विषयको बतलायें कि लिङ्ग क्या है और लिङ्गमें किसकी पूजा होती है? ॥ ६२ ॥
श्रीभगवान्ने कहा-ज्योतिःस्वरूप, अक्षर, अव्यक्त आनन्द को लिङ्ग कहा गया है और वेद महेश्वरदेव को अव्यय तथा लिङ्ग धारण करनेवाला कहते हैं। प्राचीन कालमें जब सर्वत्र जल-ही-जल एकार्णव हो गया और स्थावर-जङ्गम सब नष्ट हो गया, तब ब्रह्मा तथा मुझे प्रबोधित करनेके लिये उसी एकार्णवमें शिव का प्रादुर्भाव हुआ। उसी समयसे लोकोंके कल्याण की कामनासे ब्रह्मा तथा मैं दोनों ही सदा महादेव की पूजा करते हैं ॥ ६३-६५॥
श्रीमार्कण्डेयजी बोले-श्रीकृष्ण ! अब आप यह बतलायें कि पूर्वकालमें आप लोगोंको ज्ञान देनेके लिये वह ईश्वरका परम पदरूप लिङ्ग किस प्रकार स्वयं
प्रकट हुआ॥६६॥
श्रीभगवान्ने कहा-(प्रलयकालमें) विभाग रहित, तमोमय भयंकर एकमात्र समुद्र (एकार्णव) ही था। उस एकार्णवके मध्यभागमें शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाला युक्तात्मा सनातन मैं हजारों सिर, हजारों आँख, हजारों चरण, हजारों बाहुवाला होकर शयन कर रहा था। इसी बीच मैंने दूर स्थित अमित प्रभावाले, करोड़ों सूर्य के समान प्रकाशमान, शोभासम्पन्न, कृष्णमृगका चर्म धारण किये हुए, ऋक्, यजुः तथा सामवेद द्वारा स्तुत हो रहे काञ्चनके समान आभावाले महायोगी चतुर्मुख देव पुरुषको देखा। क्षणभरमें ही वे योगज्ञानियों में श्रेष्ठ, महाद्युति ब्रह्मा मुसकराते हुए स्वयं मेरे पास आये और कहने लगे-॥६७-७१॥
प्रभो! मुझे बतलायें कि आप कौन हैं, कहाँ से आये हैं और किस कारणसे यहाँ स्थित हैं। मैं लोकों का निर्माण करनेवाला स्वयम्भू प्रपितामह (ब्रह्मा) हूँ। उन ब्रह्मा के द्वारा ऐसा कहे जाने पर मैंने उनसे (ब्रह्मा से) कहा-मैं पुनः-पुनः लोकोंकी सृष्टि करनेवाला हूँ और मैं ही संहार करनेवाला हूँ। परमेष्ठीको माया के कारण इस प्रकारका विवाद बढ़नेपर (हम लोगों को) यथार्थ स्थितिका ज्ञान करानेके लिये (उस समय) शिवरूप परम लिङ्ग प्रादुर्भूत हुआ। वह लिङ्ग प्रलय-कालीन अग्निके समान अनेक ज्वालामालाओं से व्याप्त, क्षय एवं वृद्धिसे मुक्त और आदि, मध्य तथा अन्त से रहित था ॥७२-७५॥
तब भगवान् शंकरने मुझसे कहा-तुम शीघ्र ही (इस लिङ्गके) नीचेकी ओर जाओ और इसके अन्त का पता लगाओ और ये अजन्मा ब्रह्मा (इसके) ऊपर की ओर जायँ। तदनन्तर शीघ्र ही प्रतिज्ञा करके हम दोनों ऊपर तथा नीचेकी ओर गये, किंतु पितामह तथा मैं सैकड़ों वर्षों में भी उसका अन्त नहीं जान सके। तदनन्तर त्रिशूलधारी देवकी मायासे मोहित, भयभीत एवं आश्चर्यचकित हम दोनों उन विश्वरूप ईश्वरका ध्यान करने लगे और परमपद महानाद ओंकारका उच्चारण करते हुए नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर श्रेष्ठ शम्भु की स्तुति करने लगे-॥७६-७९॥
ब्रह्मा तथा विष्णुने कहा-विविध अनादि विकारों से मुक्त संसाररूपी रोगके अनादि वैद्यस्वरूप शम्भु, शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिवाले ब्रह्मको नमस्कार है। प्रलयकालीन समुद्रमें स्थित रहनेवाले, सृष्टि और प्रलयके कारणरूप शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिधारी ब्रह्मको नमस्कार है। ज्वालामालाओंसे घिरे हुए शरीरवाले, प्रज्वलित स्तम्भरूप शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिवाले ब्रह्मको नमस्कार है। आदि, मध्य और अन्तसे रहित स्वभावतः निर्मल तेजो रूप शिव, शान्त तथा लिङ्गरूपी मूर्तिको धारण करनेवाले ब्रह्मको नमस्कार है॥८०-८३॥
महादेव, महान्, ज्योतिःस्वरूप, अनन्त तेजस्वी लिङ्गविग्रह शिव, शान्त, ब्रह्मको नमस्कार है। प्रधान पुरुषके भी ईश, व्योमस्वरूप, वेधा (ब्रह्म) और लिङ्गविग्रह शिव, शान्त ब्रह्मको नमस्कार है। निर्विकार, सत्य, नित्य विमल तेजरूप लिङ्गविग्रह शान्त, शिव ब्रह्मको नमस्कार है। वेदान्तसार-स्वरूप, कालरूप, धीमान् लिङ्गमूर्ति शिव, शान्त ब्रह्मको नमस्कार है।। ८४-८७॥
इस प्रकार स्तुति करते रहनेपर महायोगी महेश्वर देव प्रकट हो गये और हजारों करोड़ मुखसे आकाश को मानो ग्रास बनाते हुए करोड़ों सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। हजारों हाथ और पैरवाले, सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निरूप (तीन) नयनवाले, पिनाकधनुषको हाथ में धारण करनेवाले, चर्माम्बरधारी, त्रिशूलधारी, सर्पका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले और मेघ तथा दुन्दुभि के सदृश स्वरवाले भगवान् महादेवने कहा- श्रेष्ठ देवो! मैं प्रसन्न हूँ। मुझ महादेवकी ओर देखो और समस्त भयका परित्याग करो। पूर्वकालमें तुम दोनों सनातन (देव) मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए थे। मेरे दक्षिण पार्श्वमें ये लोक पितामह ब्रह्मा, वाम पार्श्वमें पालनकर्ता विष्णु और हृदयमें हर स्थित हैं। मैं तुम दोनोंपर भलीभाँति प्रसन्न हूँ, इसलिये यथेष्ट वर प्रदान करूँगा। ऐसा कहकर महादेव शिव स्वयं मुझे तथा देव ब्रह्माका आलिङ्गन कर अनुग्रह प्रदान करनेके लिये उद्यत हुए॥८८-९३॥
तदनन्तर प्रसन्न मनवाले नारायण तथा पितामह ने महेश्वरको प्रणामकर उनके मुखकी ओर देखते हुए कहा-देव! यदि प्रीति उत्पन्न हुई है और यदि आप हम दोनोंको वर देना चाहते हैं तो (यह वर दें कि) हम दोनोंकी आप महेश्वरमें नित्य भक्ति बनी रहे। तब उन प्रसन्न हुए परम ईश्वर भगवान् ईश महादेवने प्रसन्न मनसे हँसते हुए मुझसे कहा- ॥९४-९६॥
देव बोले-धरणीपते! वत्स हरि! तुम सृष्टि, पालन और प्रलयके कर्ता हो। इस चराचर विश्व का पालन करो। हे विष्णो! मैं निर्गुण तथा निरञ्जन होते हुए भी सृष्टि, रक्षा तथा प्रलयके लिये अपेक्षित गुणोंके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु तथा हर नामसे तीन रूपोंमें विभक्त हूँ। विष्णो! मोहका परित्याग करो, इन पितामहका पालन करो। ये सनातन भगवान् आपके पुत्र होंगे॥ ९७-९९॥
कल्पके आदिमें मैं भी आपके मुखसे प्रकट होकर घोर रूप धारणकर हाथमें शूल धारण किये आपका क्रोधज पुत्र बनूँगा॥१००॥
मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार कहकर भगवान् महादेव मुझपर तथा ब्रह्मापर कृपा करके वहींपर अन्तर्धान हो गये। ब्रह्मन्! तबसे लोकमें लिङ्गका पूजन प्रतिष्ठित हो गया। लीन होनेसे वह लिङ्ग कहा जाता है। लिङ्ग ब्रह्मका श्रेष्ठ शरीर है॥१०१-१०२।।
अनघ! मैंने इस लिङ्गका माहात्म्य तुम्हें बताया। इसे न देवता जानते हैं न दानव, केवल योगज्ञ लोग ही जानते हैं। यह शिव नामवाला अव्यक्त परम ज्ञान है। ज्ञानदृष्टिवाले इसीके द्वारा उस सूक्ष्म अचिन्त्य (तत्त्व)-का दर्शन करते हैं। इस लिङ्गस्वरूप देवाधि-देव महादेव भगवान् रुद्रको हम नित्य नमस्कार करते हैं॥१०३-१०५॥
वेद के रहस्य रूप आपको नमस्कार है, नीलकण्ठ को नमस्कार है। विशेष भय* उत्पन्न करनेवाले, शान्त, स्थाणु तथा कारणरूपको नमस्कार है। वामदेव, त्रिलोचन, महिमावान्, ब्रह्म, शंकर, महेश, गिरीश तथा शिव को नमस्कार है। सदा इन्हें नमस्कार करो, मनसे शंकर का ध्यान करो। इससे शीघ्र ही संसारसागरसे पार हो जाओगे ॥१०६-१०८॥
इस प्रकार वासुदेवके द्वारा कहे जानेपर उन मुनिश्रेष्ठ (मार्कण्डेय) ने विश्वतोमुख देव ईशान (शंकर)-का ध्यान किया। श्रीकृष्णको विनयपूर्वक प्रणामकर उनकी आज्ञा प्राप्तकर महामुनि (मार्कण्डेय) त्रिशूल धारण करनेवाले
देवाधिदेवके अभीष्ट स्थानको चले गये॥१०९-११०॥
जो इस श्रेष्ठ लिङ्गाध्यायको सुनेगा, सुनायेगा अथवा पढ़ेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा। विप्रेन्द्रो! वासुदेव के इस श्रेष्ठ तपश्चरणको एक बार भी सुननेवाला मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है अथवा प्रतिदिन इसका निरन्तर जप करनेसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है ऐसा महायोगी प्रभु कृष्णद्वैपायनने कहा है॥१११-११३॥
Summary of chapter 25 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta joyfully describes the divine avatāra of Bhagavān Śrī Kṛshṇa and His elder brother Balarāma in Mathurā as the sons of Vasudeva and Devakī. The chapter highlights Kṛshṇa's divine childhood pastimes in Gokula, the slaying of demoniac forces such as Kaṁsa, Chāṇūra, Keshī, and Pralamba, and the protection of virtuous devotees. Kṛshṇa established Dvārakā in the western ocean, married Rukmiṇī, Satyabhāmā, and other noble princesses, and fulfilled the cosmic mission of relieving Earth's heavy burden while establishing eternal devotion to Hari-Hara.