7 अध्याय

तदनन्तर निरन्तर सत्यका ध्यान करनेवाले उन देव के चिन्तन करनेपर उसी समय अव्यक्त (प्रकृति) से (सृष्टि-विस्तारका) साधक अक्स्रिोतवाला साधक

सर्ग) उत्पन्न हुआ। वे (अक्स्रिोत प्राणी) प्रकाश ज्ञान)-के बाहुल्यवाले, तमोगुण तथा रजोगुण की अधिकतावाले, अधिक दुःखवाले और सत्त्वगुण से सम्पन्न मनुष्य नामसे कहे जाते हैं ॥९-१०॥

उस (मानुष-सर्ग)-को देखकर अजन्मा भगवान्ने अन्य सर्गकी रचनाका विचार किया और उनके ऐसे सर्ग-विषयक ध्यान करते ही भूतादि सर्ग उत्पन्न हुआ। वे सभी संग्रह न करनेवाले, फिर भी बाँटने के स्वभाववाले, उपभोग करनेवाले तथा शीलरहित 'भूतादि' इस नामसे कहे गये हैं। ब्राह्मणश्रेष्ठो! इस प्रकार ये पाँच सर्ग कहे गये हैं ॥ ११-१२॥

ब्रह्माका वह पहला सर्ग महत्सर्ग कहा गया है। तन्मात्राओंका दूसरा सर्ग भूतसर्ग कहलाता है। तीसरा वैकारिक सर्ग ऐन्द्रियक सर्ग कहा जाता है। इस प्रकार यह प्राकृत सर्ग अबुद्धिपूर्वक हुआ। चौथा सर्ग मुख्य सर्ग है। स्थावर (जड पदार्थ) मुख्य कहलाते हैं। तिर्यक्स्रोतसे जिस सर्गको बतलाया है वह तिर्यग्योनिवाला पाँचवाँ सर्ग है। तदनन्तर ऊर्ध्वस्रोतसोंका छठा सर्ग है जो देवसर्ग कहलाता है। तदनन्तर अक्स्रिोतसों का सातवाँ सर्ग है जो मानुष सर्ग है। भूतादिकोंका आठवाँ सर्ग भौतिक सर्ग कहा गया है। नवाँ सर्ग कौमार सर्ग

है। इस प्रकार ये नवों सर्ग प्राकृत तथा वैकृत दोनों प्रकारके हैं॥ १३-१७॥

मुनिश्रेष्ठो! पहलेके तीन सर्ग (महत्सर्ग, भूतसर्ग तथा ऐन्द्रियक सर्ग) प्राकृत सर्ग हैं, जो अबुद्धिपूर्वक होते हैं। और मुख्य आदि सर्ग (अवशिष्ट ६ सर्ग) बुद्धिपूर्वक होते हैं ॥१८॥

प्रजापति ब्रह्माजीने सबसे पहले अपने ही समान सनक, सनातन, सनन्दन, ऋभु तथा सनत्कुमार नामक मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया। हे ब्राह्मणो! ये पाँचों योगी थे, परम वैराग्यवान् थे और ईश्वरमें उनका मन आसक्त था। (इसलिये) उन्होंने सृष्टि (-के विस्तार)-में अपनी बुद्धि नहीं लगायी॥१९-२०।।

लोकसृष्टिके कार्यमें उनके इस प्रकार निरपेक्ष (उदासीन) हो जानेपर प्रजापति (ब्रह्मा) मायापति परमेष्ठीकी* मायाके द्वारा तत्काल मोहित कर लिये गये।

योगियोंके चित्तका अनुरञ्जन करनेवाले जगत्कर्ता महायोगी, महामुनि नारायणने (अपने) उस पुत्र (ब्रह्मा)-को प्रबुद्ध किया। (तब) उनके द्वारा प्रबुद्ध किये गये विश्वात्मा (ब्रह्मा)-ने परम तप किया, (किंतु) तप करनेपर भी उन भगवान् ब्रह्माको कुछ प्राप्त नहीं हुआ॥२१-२३॥

तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर (प्रयोजन सिद्ध न होनेके कारण उन्हें) दु:खके कारण क्रोध उत्पन्न हुआ। क्रोधसे आविष्ट उन (ब्रह्मा)-के नेत्रोंसे आँसू की बूंदें गिरीं। उनके (क्रोधके कारण) टेढ़ी भृकुटियोंवाले ललाटसे शरण देनेवाले नीललोहित परमेश्वर महादेव प्रकट हुए। वे ही तेजकी राशि सनातन भगवान् ईश हैं, जिन्हें विद्वान् लोग अपनी आत्मामें स्थित परमेश्वर (परमात्मा)के रूपमें देखते हैं ॥२४-२६॥

ओंकारका सम्यक् रूपसे स्मरणकर और प्रणामकर हाथ जोड़ते हुए भगवान् ब्रह्माने उन (महादेव)से कहा-इन अनेक प्रकारको प्रजाओंकी सृष्टि करें ॥२७॥

धर्म (वृषभ)-पर आरूढ़ होनेवाले धर्मवाहन मङ्गलकारी भगवान् शिवने (ब्रह्माके) वचनको सुनकर मनसे अपने ही समान जटाधारी, आतंकरहित, तीन नेत्रवाले एवं नीललोहित रुद्रोंको उत्पन्न किया ॥२८॥

उनसे भगवान् ब्रह्माने कहा-जन्म लेनेवाली और मृत्युको प्राप्त होनेवाली प्रजाकी सृष्टि करो। वे ईश बोले-हे जगन्नाथ! मैं मृत्यु एवं वृद्धावस्थाको प्राप्त होनेवाली प्रजाकी सृष्टि नहीं करूँगा। ऐसी अशुभ प्रजाओंको आप ही उत्पन्न करें ॥ २९ ॥

तब कमलसे उत्पन्न ब्रह्माने (सृष्टि-विस्तारके कार्यसे)रुद्रको रोककर (स्वयं) सभी स्थानाभिमानियोंको उत्पन्न किया, मैं उन्हें बता रहा हूँ (आपलोग) सुनें ॥३०॥

जल, अग्नि, अन्तरिक्ष, आकाश, वायु और पृथ्वी इसी प्रकार नदी, समुद्र, पर्वत, वृक्ष, वनस्पति, लव, काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन-रात, अर्धमास, मास, अयन, वर्ष तथा युग आदि॥ ३१-३२॥

स्थानाभिमानियोंकी सर्जना कर पुनः सृष्टिके सहायकों-मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ, धर्म एवं संकल्पको उत्पन्न किया ॥३३॥

सभी लोकोंके पितामह ब्रह्मदेवने प्राण (वायु)-से दक्षको उत्पन्न किया, इसी प्रकार नेत्रोंसे मरीचि, सिरसे अङ्गिरा, हृदयसे भृगु, कानोंसे अत्रि नामवाले (ऋषि)-को, व्यवसायसे धर्मको और संकल्पसे संकल्पको तथा ऐसे ही उदान (वायु)-से पुलस्त्य, व्यान (वायु)-से पुलह मुनि, अपान (वायु)-से शान्त स्वभाव क्रतु और समान (वायु)-से वसिष्ठको उत्पन्न किया ॥ ३४-३६॥

ब्रह्माके द्वारा उत्पन्न ये सभी गृहस्थ हैं तथा (सृष्टि-विस्तार के) सहयोगी हैं। मनुष्यका रूप धारणकर इन्होंने धर्मका प्रवर्तन किया। तदनन्तर देवता, असुर, पितर तथा मनुष्य-इन चारोंकी तथा जलकी सृष्टि करनेकी इच्छा से (ब्रह्माने) अपने-आपको नियुक्त किया॥ ३७-३८॥

संयुक्त आत्मरूपवाले प्रजापतिसे तमोगुणकी मात्राका उद्रेक हुआ। तदनन्तर उनकी जंघासे पहले (तमोगुणी) असुर (योनिके) पुत्र उत्पन्न हुए। असुरोंकी सृष्टिकर पुरुषोत्तमने उस (तमोमय) शरीरका परित्याग कर दिया। उनके द्वारा छोड़ा गया वह शरीर शीघ्र ही रात्रि के रूपमें परिवर्तित हो गया। वह (रात्रि) चूँकि अन्धकार की अधिकतावाली रहती है, अत: उसमें (रात्रि में) प्रजाएँ सोती हैं ।। ३९-४०॥

(पुनः) देवने सत्त्वगुणात्मक दूसरे शरीरको धारण किया और तब उनके मुखसे दीप्तिमान् देवता प्रादुर्भूत हुए। उन्होंने (प्रजापतिने) वह शरीर भी छोड़ दिया। वह सत्त्वगुणकी अधिकतावाला शरीर दिन हुआ। धर्मात्मा देवता इसीलिये दिनका सेवन करते हैं॥ ४१-४२॥

पुनः (उन्होंने) सत्त्वगुणात्मक ही एक दूसरे शरीरको धारण किया। पिताके समान माननेवाले उनके द्वारा पितर उत्पन्न हुए। विश्वकी रचना करनेवाले उन्होंने (ब्रह्माने) पितरोंकी सृष्टिकर उस शरीरको भी छोड़ दिया। वह छोड़ा गया शरीर शीघ्र ही संध्याके रूप में बदल गया ॥४३-४४॥

इसीलिये देवताओंके लिये दिन, देवविद्वेषी असुरों के लिये रात तथा दिन और रातके मध्यकी संध्या जो पितरोंकी मूर्तिरूप है, वह प्रशस्त है॥४५॥

इसीलिये देवता, असुर, (स्वायम्भुव आदि) सभी मनु तथा सभी मनुष्य दिन और रातके मध्यमें सदा स्थित रहनेवाले (संध्यारूपी) शरीर (मूर्ति)-की उपासना करते हैं।॥ ४६॥

(तब) ब्रह्माने रजोगुणकी अधिकतावाले अन्य शरीरको धारण किया, जिससे रजोगुणसे आवृत उनके पुत्र उत्पन्न हुए, जो मनुष्य कहलाये ॥ ४७ ॥

ब्राह्मणो! उन प्रजापतिने शीघ्र ही उस (रजोगुणात्मक)शरीर को भी छोड़ दिया। वह (छोड़ा गया शरीर) ज्योत्स्ना के रूप में हो गया, जिसे प्राक्संध्या कहा जाता है॥ ४८॥

हे ब्राह्मणो! भगवान् ब्रह्मा फिर तम तथा रजोमयी मूर्ति (शरीर)-को धारण कर पुनः योगयुक्त हुए। इस शरीरसे अन्धकारमें भूखसे व्याकुल होनेवाले राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए। तमोगुण तथा रजोगुणकी अधिकतावाले वे महान् बलशाली पुत्र निशाचर कहलाये। ऐसे ही सर्प, यक्ष, भूत तथा गन्धर्व उत्पन्न हुए। तदनन्तर रजोगुण तथा तमोगुणसे आविष्ट अन्य प्राणियोंको भी प्रभुने उत्पन्न किया ॥ ४९-५१॥

वयः (अवस्था)-से पक्षियोंकी सृष्टि करनेके अनन्तर (ब्रह्माने) वक्षःस्थलसे भेड़ोंको उत्पन्न किया। मुख से बकरोंको उत्पन्न किया और उदर-देशसे गौओंकी सृष्टि की। पैरोंसे हाथियोंसहित घोड़ों, गदहों, गायके समान ही दूसरे प्रकारकी गायों (नीलगाय आदि), मृगों, ऊँटों, खच्चरों, न्यङ्कुओं (मृग-विशेष) तथा अन्य (तिर्यक् आदि) योनियोंको उत्पन्न किया। फल-मूलवाली ओषधियाँ

उनके रोमोंसे पैदा हुईं ॥५२-५३॥

 (ब्रह्माजीने अपने) प्रथम (पूर्व) मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, त्रिवृत्साम, रथन्तर (साम) और यज्ञों में अग्निष्टोम (नामक यज्ञ)-को उत्पन्न किया। दक्षिण मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुभ् छन्द, पञ्चदश स्तोम (मन्त्रों का समूह-विशेष) बृहत्साम तथा उक्थ (नामक वेदमन्त्रों)का सृजन किया। पश्चिम मुखसे सामवेद, जगती छन्द, सप्तदश स्तोम (मन्त्रोंका समूह-विशेष) और वैरूप तथा अतिरात्र नामक यज्ञोंको उत्पन्न किया। उत्तर मुखसे इक्कीस शाखाओंवाले अथर्ववेद, अनुष्टुप् छन्द और आप्तोर्याम तथा वैराज (न (नामक यज्ञ) को उत्पन्न किया ।।५४-५७॥

प्रजापति ब्रह्माके द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि करते समय उनके शरीरसे उच्च एवं निम्न (कोटिके अन्य भी) प्राणियोंकी सृष्टि हुई। देवता, ऋषि, पितर तथा मनुष्य-इन चार प्रकारकी सृष्टि करके (ब्रह्माने) चर तथा अचर (सभी) प्राणियोंकी सृष्टि की॥५८-५९ ॥

यक्षों, पिशाचों, गन्धों तथा शुभ अप्सराओं, नरों, किन्नरों, राक्षसों, पक्षियों, पशुओं, मृगों तथा सोको उत्पन्न किया। नित्य एवं अनित्य-भेदसे चर एवं अचर सृष्टि दो प्रकारकी है। पहलेकी सृष्टियों में उन (प्राणियों)-के जो-जो कर्म निश्चित थे अगली सृष्टियोंमें भी उत्पन्न होकर वे बार-बार उन्हीं कर्मों को प्राप्त करते हैं॥६०-६१॥

इसीलिये उसी प्रकारकी भावना (संस्कार)-से प्रेरित होकर (वे प्राणी) हिंसक, अहिंसक, कोमल, क्रूर, धर्म-अधर्म तथा सत्य एवं असत्यकी प्रवृत्तियाँ प्राप्त करते हैं और वही (कर्म) उन्हें रुचिकर भी लगता है॥६२॥

विधाताने स्वयं ही प्राणियोंकी इन्द्रियोंके विषयों, | महाभूतों एवं मूर्तियोंमें भिन्नता और विनियोगकी व्यवस्था की है। उन महेश्वरने प्रारम्भमें वेदके शब्दों से ही प्राणियोंके नाम और रूप तथा कर्मोंकी विविधता का निर्माण किया। वेदोंमें जिन सिद्धान्तों और आर्ष नामोंका प्रतिपादन हुआ है, उन्हीं नामोंको ब्रह्मा (प्रलयकालीन) रात्रिके अन्तमें उत्पन्न पदार्थों को प्रदान करते हैं।६३-६५॥

प्रलयकालसे पूर्व जो ऋतुएँ और ऋतुओंके चिह्न तथा अनेक प्रकारके रूप (आकार) दिखलायी देते थे, अगले युगोंमें वे उन्हीं-उन्हीं (नाम-रूपों तथा)भावों में प्रकट होकर दिखलायी देते हैं॥६६॥