कूर्म महा पुराण
21 अध्याय
रोमहर्षणने कहा-इलाका पुत्र राजा पुरूरवा राज्यका पालन करने लगा। उसको इन्द्रके समान तेजस्वी आयु, मायु, अमावायु, वीर्यवान् विश्वायु, शतायु तथा श्रुतायु नामवाले छः पुत्र हुए। ये उर्वशीके दिव्य पुत्र थे॥१-२॥
हमने सुना है कि आयुको स्वर्भानु (राहु)-की कन्या प्रभासे पाँच महान् ओजस्वी पुत्र हुए थे। उनमें नहुष प्रथम (पुत्र) था, जो धर्मज्ञ और लोकमें विख्यात था। पितरोंकी कन्या विरजासे नहुषको यति, ययाति, संयाति, आयाति तथा पाँचवें अश्वक नामवाले इन्द्रके समान तेजस्वी महाबलशाली पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। इन पाँचोंमेंसे ययाति महान् बलशाली और पराक्रमी था। उसने शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा वृषपर्वा की असुर-वंशमें उत्पन्न शर्मिष्ठा नामकी कन्याको पत्नी रूप में प्राप्त किया ॥३-६॥
देवयानीने यदु तथा तुर्वसुको जन्म दिया। इसी प्रकार शर्मिष्ठाने भी द्रुह्यु, अनु तथा पूरुको उत्पन्न किया। उस (ययाति)-ने अनिन्दित ज्येष्ठ पुत्र यदुका अतिक्रमण कर पिताके वचनका पालन करनेवाले छोटे पुत्र पूरुको ही (राजपदपर) अभिषिक्त किया॥७-८॥
राजा ययातिने दक्षिण-पूर्व दिशामें तुर्वसु नामक पुत्रको, दक्षिण-पश्चिम दिशामें ज्येष्ठ पुत्र यदुको, पश्चिम में | द्रुह्युको और उत्तर दिशामें अनुको (राजाके रूप में) नियुक्त किया। उन्होंने इस सम्पूर्ण पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। महायशस्वी राजा (ययाति) भी पत्नीसहित वन चले गये। यदुके भी देवपुत्रोंके समान सहस्रजित्, क्रोष्ट, नील, अजित तथा रघु नामक पाँच पुत्र हुए, उनमें सहस्रजित् सबसे बड़ा था॥९-११॥
सहस्रजित्का उसीके समान शतजित् नामका पुत्र राजा था। शतजित्के भी हैहय, हय और वेणुहय नामक परम धार्मिक तीन पुत्र थे। हैहयका पुत्र 'धर्म' नाम से विख्यात हुआ।। १२-१३॥
विप्रो! उसका (धर्मका) धर्मनेत्र नामवाला प्रतापी पुत्र हुआ। धर्मनेत्रका कीर्ति और उसका पुत्र संजित हुआ। संजितका महिष्मान् हुआ और उसका पुत्र भद्रश्रेण्य था। भद्रश्रेण्यका दुर्दम नामका पुत्र राजा था। दुर्दमका धनक नामवाला बुद्धिमान् और वीर्यवान् पुत्र था। धनकके लोकमें सम्मानित चार पुत्र हुए-कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा तथा चौथा कृतौजा। कृतवीर्यका पुत्र अर्जुन हुआ। वह हजार बाहुओंवाला, द्युतिमान् तथा धनुर्वेद जाननेवालोंमें श्रेष्ठ था। जमदग्निके पुत्र जनार्दन परशुराम उस (सहस्रार्जुन)-के लिये मृत्युरूप हुए। (अर्थात् परशुरामके द्वारा वह मारा गया)॥१४-१८॥
उस (सहस्रबाहु)-के सौ पुत्र थे, जिनमें पाँच पुत्र महारथी, अस्त्र-सम्पन्न, बली, शूर, धर्मात्मा तथा मनस थे॥१९॥
शूर, शूरसेन, धृष्ण, कृष्ण तथा पाँचवाँ पुत्र राजा जयध्वज बलवान् तथा नारायणका भक्त था। शूरसेन आदि चार पुत्र महात्मा एवं अति तेजस्वी और रुद्रके भक्त थे। वे सभी शंकरकी पूजा करते थे। धर्मपरायण एवं बुद्धिमान् जयध्वज नारायण देव हरि विष्णु देवताकी शरणमें गया। अन्य पुत्रों (उसके चार भाइयों)-ने उससे हा-अनघ! यह तुम्हारा धर्म नहीं है। हमारे पिता शंकरकी आराधना करते थे। २०-२३॥
इसपर महातेजस्वी (जयध्वज)-ने उनसे कहा- यही मेरा श्रेष्ठ धर्म है। पृथ्वीपर जो भी राजा हुए हैं, वे सभी विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। राज्यका परिपालन करनेवालोंको चाहिये कि भगवान् पुरुषोत्तमकी अवश्य आराधना करें। क्योंकि हरि विष्णु संसारके पालनकर्ता हैं। स्वयम्भू (विष्णु)-की सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी- ये तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं, जो क्रमशः सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाली हैं। सत्त्वगुणसम्पन्न भगवान् विष्णु नित्य पालन करते हैं। रजोमूर्ति ब्रह्मा सृष्टि करते हैं और तमोगुणात्मक हर संहार करते हैं। अतएव राज्यका
पालन करनेवाले राजाओंके लिये केशीका मर्दन करनेवाले केशव भगवान् विष्णु आराधनीय हैं ॥ २४-२८॥
उस (जयध्वज)-का वचन सुनकर उसके दूसरे मनस्वी भाइयोंने कहा-मुक्तिप्राप्तिकी इच्छा करनेवालों के लिये संहार करनेवाले रुद्र ही पूजनीय हैं। ये ही कल्याणकारी प्रभु भगवान् रुद्र कल्पान्तमें तमोगुण का आश्रय लेकर इस सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं। इनकी जो अति घोर तेजोमयी परा मूर्ति है, वही विद्या (ज्ञान-विवेक)-स्वरूप है। शक्ति-रूपमें उसीके द्वारा त्रिशूल धारण करनेवाले शंकर सम्पूर्ण संसारका संहार करते हैं॥ २९-३१॥
तब वह राजा जयध्वज कुछ विचार करके उनसे बोला-सत्त्वगुणद्वारा ही प्राणी मुक्त होता है और वे भगवान् सत्त्वात्मक हैं॥३२॥
इसपर भाइयोंने उससे कहा-सात्त्विकजनोंके द्वारा सेवित रुद्र सत्त्वगुणसे सम्पन्न होकर मुक्त करते हैं, अतः ईश्वर हरकी पूजा करो। तब राजपुत्र जयध्वजने हँसते हुए कहा- -मुक्तिके लिये स्वधर्म-पालन ही एकमात्र मार्ग है। मुनिलोग अन्य (धर्म)-की इच्छा नहीं करते ॥३३-३४॥
साथ ही राजाओंके लिये वैष्णवी शक्ति ही सदा देवता-रूप है। अमित तेजस्वी मुरारिकी आराधना करना परम धर्म है।॥ ३५॥
तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजपुत्र कृष्ण (जयध्वज के भाई)-ने उससे (जयध्वजसे) कहा-हम लोगोंके पिता अर्जुनने (सहस्रार्जुन या कार्तवीर्यार्जुनने) जिसे स्वधर्म माना है (वही हम लोगोंको भी मान्य होना चाहिये)। इस प्रकार विवादके बढ़ जानेपर शूरसेन (जयध्वज के दूसरे भाई)-ने यह बात कही-इस विषयमें ऋषि ही प्रमाण हैं, अत: वे जैसा कहेंगे, हम लोगोंको वैसा ही करना चाहिये ।।३६-३७॥
तदनन्तर वे सभी राजश्रेष्ठ तैयार होकर सप्तर्षियों के आश्रममें गये और (उन) ब्रह्मवादियोंसे पूछा-वसिष्ठ आदि उन मुनियोंने तत्त्वकी बात बताते हुए उनसे कहा-जिस पुरुषको जो देवता अभिमत हो, वही उसका अभीष्ट देवता है। किंतु किसी विशेष कार्य से पूजित (तत्तद्-देवता) मनुष्योंको अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। राजाओ! विशेष अर्थात् किसी उद्देश्यसे की जानेवाली पूजा सदा नहीं की जाती, क्योंकि कामनापरक आराधनाके नियम दूसरे प्रकारके होते हैं (वे सदा सब स्थितियोंमें पालनीय नहीं हो सकते)। राजाओंके देवता
विष्णु और इन्द्र हैं। ब्राह्मणोंके देवता अग्नि, सूर्य, ब्रह्मा तथा पिनाकधारी शिव हैं। देवताओंके देवता विष्णु और | दानवोंके त्रिशूलधारी शिव हैं। गन्धर्षों और यक्षों के देवता सोम कहे गये हैं ॥३८-४२॥
विद्याधरोंके देवता वाग्देवी तथा साध्योंके भगवान् सूर्य हैं। राक्षसोंके शंकर रुद्र और किंनरोंकी देवता पार्वती हैं। ऋषियोंके देवता ब्रह्मा और त्रिशूलधारी महादेव हैं। मनुष्योंके देवता उमा देवी, विष्णु तथा सूर्य हैं । गृहस्थों के लिये सभी देवता (पूज्य) हैं। ब्रह्मचारियोंके देवता ब्रह्मा, वैखानसोंके सूर्य तथा संन्यासियोंके महेश्वर देवता हैं। भूतोंके भगवान् रुद्र, कूष्माण्डों के विनायक और देवाधि-देव प्रजापति भगवान् ब्रह्मा सभीके देवता हैं ॥ ४३-४६॥
(सप्तर्षियों ने कहा) स्वयं भगवान् ब्रह्माने ही यह कहा है, इसलिये निश्चित ही जयध्वज विष्णुकी आराधना करनेके योग्य हैं। तब वे सभी उन्हें प्रणामकर परम सुन्दर अपनी पुरीको चले गये और युद्धमें सभी शत्रुओं को जीतकर पृथ्वीका पालन करने लगे॥ ४७-४८ ॥
विप्रेन्द्रो! तदनन्तर किसी दिन सभी प्राणियोंके लिये भयंकर विदेह नामका दानव उनकी पुरीमें चला आया। भयंकर दाढ़ोंवाला, प्रलयकालीन अग्निके समान उद्दीप्त (वह दानव) सूर्यके समान चमकते हुए शूलको लेकर दसों दिशाओंमें गरजने लगा। उसकी (भयंकर) गर्जना को सुनकर वहाँ रहनेवाले कुछ मनुष्योंने प्राण त्याग दिये और दूसरे भयसे विह्वल होकर भाग पड़े ॥ ४९-५१॥
तब कार्तवीर्यके सभी पुत्र सावधान होकर शक्ति (सेना), पर्वतशिला, तलवार तथा मुद्गरोंसे उस दानव के साथ युद्ध करने लगे। ब्राह्मणो! उस भयंकर दानव ने शूलसे उन सभीका हँसते हुए वैसे ही निवारण कर दिया जैसे प्रलयकालमें भैरव करते हैं। तब महाबली शूरसेन आदि वे पाँच राजा युद्धके लिये तैयारी कर विदेह दानवपर टूट पड़े।५२-५४॥
शूरने रौद्रास्त्र, शूरसेनने वारुणास्त्र, कृष्णने प्राजापत्यास्त्र, धृष्णने वायव्यास्त्र और जयध्वजने कौबेर, ऐन्द्र तथा आग्नेयास्त्र चलाया, किंतु उस दानवने शूलसे उन सभी अस्त्रोंको तोड़ डाला। तब महावीर्यशाली कृष्णने भीषण गदा लेकर मन्त्रसे उसे अभिमन्त्रित कर वेगपूर्वक फेंका और गर्जना की। वह गदा उस विदेहकी पत्थरके समान छातीपर लगकर भी यमराज-तुल्य उस दानव को विचलित करने में समर्थ न हो सकी॥५५-५८॥
उसके महान् पौरुषको देखकर भयग्रस्त हो वे सभी भागने लगे। तब बुद्धिमान् जयध्वजने अप्रमेय, अनामय, लोकादि, ग्रसिष्णु, त्राणकर्ता, पूर्वपुरुष, श्रीपति और पीताम्बरधारी जगत्पति विष्णुका स्मरण किया। स्मरण करते ही भक्तपर अनुग्रह करनेके लिये वासुदेवकी आज्ञा से दस हजार सूर्योंके समान प्रकाशमान चक्र प्रकट हुआ। राजा (जयध्वज)-ने जगद्योनि नारायणका ध्यानकर उस चक्रको ग्रहण किया और विदेह (दानव)-पर उसी प्रकार चलाया जैसे विष्णु दानवोंपर चलाते हैं॥५९-६२॥
द्विजोत्तमो! आहुकके दो पुत्र हुए-उग्रसेन और देवक। देवक के देवताओंके समान देववान्, उपदेव, सुदेव तथा देवरक्षित नामवाले चार वीर पुत्र हुए। इनकी सात बहनें थीं-वृकदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा, सुव्रता तथा देवकी। इनमें सुन्दर मध्यभागवाली देवकी सबसे बड़ी थी। ये सभी वसुदेवको दी गयीं॥६३-६५ ॥
उग्रसेनके न्यग्रोध, कंस, सुभूमि, राष्ट्रपाल, तुष्टिमान् तथा शङ्कु नामवाले पुत्र थे। भजमानका प्रख्यात विदूरथ नामवाला पुत्र हुआ। उसका पुत्र शूर, उससे शमि और शमिका प्रतिक्षत्र नामक पुत्र हुआ। उस (प्रतिक्षत्र) से स्वयम्भोज और उससे शत्रुओंको ताप पहुँचानेवाला पुत्र हृदिक हुआ। उसका पुत्र कृतवर्मा और उसका पुत्र देवर कहलाया। उस शूरसे धीमान् हुआ और उसका पुत्र वसुदेव था॥ ६६-६८॥
देवताओं के प्रार्थना करने पर महाबाहु जगद्गुरु वासुदेव विष्णु वसुदेवसे देवकी-पुत्रके रूपमें प्रकट हुए। वसुदेव की महाभाग्यशालिनी सुन्दर रोहिणी नामक पत्नीने हल को आयुधके रूपमें धारण करनेवाले ज्येष्ठ पुत्र संकर्षण राम (बलराम)-को जन्म दिया। वह परमात्मा (विष्णु) ही ये जगन्मय (वसुदेवपुत्र) वासुदेव हैं। हलायुध (बलराम) संकर्षण स्वयं साक्षात् प्रभु शेष हैं ॥ ६९-७१॥
भृगुके शापके कारण वे माधव विष्णु भी मनुष्य शरीर स्वीकार कर उन देवकी तथा रोहिणीसे उत्पन्न हुए। उमाकी देहसे उत्पन्न योगनिद्रारूप कौशिकी देवी वासुदेवकी आज्ञासे यशोदाकी पुत्री हुई ॥७२-७३ ।।
मुनिश्रेष्ठो! वसुदेवके अन्य जो वासुदेव नामवाले ज्येष्ठ पुत्र थे उन सबको कंसने पहले ही मार डाला। सुषेण, उदायी, भद्रसेन, महाबल, ऋजुदास, भद्रदास और पूर्व में उत्पन्न कीर्तिमान्-इन सभी (वासुदेवके बड़े भाइयों) के मारे जानेपर रोहिणीने वसुदेवसे संसारके स्वामी हलायुध बलभद्र राम (बलराम)-को जन्म दिया॥७४-७६ ॥
राम (बलराम)-के उत्पन्न होनेके पश्चात् देवकी ने देवताओंके आदि कारण, आत्मरूप, श्रीवत्स-चिह्न से सुशोभित वक्षःस्थलवाले अच्युत कृष्णको जन्म दिया।।७७॥
बलरामकी सुन्दर गुणोंसे युक्त रेवती नामकी भार्या थीं। उन्होंने उनसे निशठ तथा उल्मुक नामक दो पुत्रों को उत्पन्न किया॥७८॥
Summary of chapter 21 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta recounts the glorious Solar Dynasty descending from King Ikshvāku, who established Ayodhyā as his capital. In this illustrious lineage appeared heroic, righteous, and truth-abiding monarchs such as Vikukshi, Kakutstha, Anena, Prthu, Shravasta, Kuvalayāshva, Māndhātā, Muchukunda, and Harishchandra. The chapter narrates their unwavering adherence to Satya and Dharma, their performance of Rājasūya and Ashvamedha sacrifices, and their unwavering devotion to Bhagavān Nārāyaṇa and Mahādeva, which granted them righteous prosperity and heavenly salvation.