नन्दजीने कहा-
प्रभो! आप स्वयं वेदोंके अधीश्वर हैं; अतः वेद, ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवता तथा मुनि और सिद्ध आदि आपको जाननेमें असमर्थ हैं। आप कौन हैं- यह जाननेके लिये मेरे मनमें प्रबल उत्कण्ठा है; अतः इस निर्जन स्थानमें आप अपना सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे वर्णन कीजिये।
श्रीनारायण कहते हैं-
नारद! इसी बीच वहाँ श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये सहसा पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, भृगु, अङ्गिरा, प्रचेतागण, वसिष्ठ, दुर्वासा, कण्व, कात्यायन, पाणिनि, कणाद, गौतम, सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, कपिल, आसुरि, वायु (वोढु), पञ्चशिख, विश्वामित्र, वाल्मीकि, कश्यप, पराशर, विभाण्डक, मरीचि, शुक्र, अत्रि, बृहस्पति, गार्ग्य, वात्स्य, व्यास, जैमिनि, परिमित वचन बोलनेवाले ऋष्यशृङ्ग, याज्ञवल्क्य, शुक, शुद्ध जटाधारी सौभरि, भरद्वाज, सुभद्रक, मार्कण्डेय, लोमश, आसुरि, विटंकण, अष्टावक्र, शतानन्द, वामदेव, भागुरि, संवर्त, उतथ्य, नर, मैं (नारायण), नारद, जाबालि, परशुराम, अगस्त्य, पैल, युधामन्यु, गौरमुख, उपमन्यु, श्रुतश्रवा, मैत्रेय, च्यवन, करथ और कर मुनीश्वर आ पहुँचे। वत्स! वे सभी ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्हें आया देखकर श्रीकृष्ण सहसा उठ खड़े हुए और हाथ जोड़कर नमस्कार करनेके पश्चात् उन्हें आदरसहित रमणीय सिंहासनोंपर बैठाये। फिर श्रीकृष्णने कुशल प्रश्नपूर्वक परस्पर वार्तालाप करके उनकी विधिवत् पूजा की और स्वयं भी उन्हींके मध्यमें आसनासीन हुए। इसी समय श्रीकृष्णको आकाशमें एक समुज्ज्वल तेजोराशि दीख पड़ी। उसे मुनियोंने भी देखा। वत्स नारद! उस तेजके अंदर सुवर्णकी-सी कान्तिवाले, पञ्चवर्षीय नग्न बालकके रूपमें सनत्कुमारजी थे। वे सहसा उस सभाके बीच प्रकट हो गये। उन्हें एकाएक सामने खड़े देखकर सभी मुनिवरोंने प्रणाम किया तथा श्रीकृष्णने भी मुस्कानयुक्त एवं स्निग्ध नेत्रोंवाले कुमारको युक्तिपूर्वक सादर सिर झुकाया। तब सनत्कुमारजी उन सबको आशीर्वाद देकर उस सभामें विराजमान हुए और उन ऋषियों तथा सनातन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले।
सनत्कुमारने कहा-
मुनिवरो! आपलोगोंका सदा कल्याण हो और तपस्याओंका अभीष्ट फल प्राप्त हो; किंतु कल्याणके कारणस्वरूप इन श्रीकृष्णका कुशल प्रश्न निष्फल है। इस समय तो आपलोगोंका सर्वथा कुशल है; क्योंकि आप लोग उन परमात्माका दर्शन कर रहे हैं, जो प्रकृतिसे परे होनेपर भी भक्तोंके अनुरोधसे शरीर धारण करते हैं; निर्गुण, इच्छारहित और समस्त तेजोंके कारण हैं तथा इस समय पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही आविर्भूत हुए हैं।
श्रीकृष्णने पूछा-
विप्रवर! जब सभी शरीरधारियोंके लिये कुशल प्रश्न अभीष्ट होता है, तब भला मेरे विषयमें वह कुशल प्रश्न क्यों नहीं है ?
सनत्कुमारजी बोले-
नाथ! प्राकृत शरीरके विषयमें कुशल प्रश्न करना तो सर्वदा शुभदायक है; परंतु जो शरीर नित्य और मङ्गलका कारण है, उसके विषयमें कुशल प्रश्न निरर्थक है।
श्रीभगवान्ने कहा -
विप्रवर ! जो-जो शरीरधारी है, वह वह प्राकृतिक कहा जाता है; क्योंकि उस नित्या प्रकृतिके बिना शरीर बन ही नहीं सकता।
सनत्कुमारजी बोले-
प्रभो ! जो शरीर रज वीर्यसे उत्पन्न होते हैं, वे ही प्राकृतिक क जाते हैं; किंतु जो प्रकृतिके स्वामी और कारण हैं उनका शरीर प्राकृत कैसे सकता है? आप तो समस्त कारणोंके आदिकारण, सभी अवतारोंके प्रधान बीज, अविनाशी स्वयं भगवान् हैं। वेद आपको सदा नित्य, सनातन, ज्योतिः स्वरूप, परमोत्कृष्ट, परमात्मा और ईश्वर कहते हैं। प्रभो ! वेदाङ्ग तथा वेदज्ञ लोग भी आप मायापति निर्गुण परात्परको मायाद्वारा सगुणरूप हुआ बतलाते हैं।
श्रीकृष्णने कहा-
विप्रवर! इस समय मैं वसुदेवका पुत्र वासुदेव हूँ। मेरा शरीर रक्त वीर्यके ही आश्रित है; फिर यह प्राकृत कैसे नहीं है और इसके लिये कुशल प्रश्न अभीष्ट क्यों नहीं है ?
सनत्कुमारजी बोले-
जिसके रोमकूपोंमें सारे विश्व निवास करते हैं तथा जो सबका निवासस्थान है, उसे 'वासु' कहते हैं; उसका देवता परब्रह्म 'वासुदेव' ऐसा कहा जाता है। उनका 'वासुदेव' यह नाम चारों वेदों, पुराणों, इतिहासों और सभी प्रथाओं में देखा जाता है। भला, वेदमें आपके रक्तवीर्याश्रित शरीरका कहाँ निरूपण हुआ है? इसके लिये ये मुनिगण तथा धर्म सर्वत्र साक्षी हैं। इस अवसरपर वेद और सूर्य चन्द्रमा मेरे गवाह हैं।
भृगुने कहा-
विप्रेन्द्र ! आप ही वैष्णवोंमें अग्रगण्य हैं; आपका कहना बिलकुल सत्य है। आपका स्वागत है; सदा कुशल तो है न ? किस निमित्तको लेकर आपका यहाँ आगमन हुआ है ? सनत्कुमारजी बोले- श्रीकृष्ण ! इस समय मैं जिस निमित्तसे अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ उसका कारण श्रवण करो और ये सभी मुनि भी उसे सुन लें।
श्रीकृष्णने कहा-
भगवन् आप सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं। सर्वज्ञ! आप तो सब कुछ जानते हैं; क्योंकि आप ही विद्वानों में सर्वश्रेष्ठ हैं; अतः बताइये, किस प्रयोजनसे आप यहाँ पधारे हैं? सनत्कुमारजी बोले- भगवन् ! आप धन्य हैं। लोकोंके लिये भी आप सदा मान्य हैं और समस्त ईश्वरोंके भी ईश्वर आप ही हैं। विश्वमें आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। तदनन्तर मुनियोंके पूछनेपर सनत्कुमारजीने बताया कि मैं परम धन्य, मान्य, विधाताके भी विधाता, सर्वादि, सर्वकारक, परमात्मा, परिपूर्णतम प्रभुके दर्शनार्थ मथुरामें आया हूँ। यह सुनकर सभी देवता और मुनि हँसने लगे तथा उन्हें महान् विस्मय हुआ। नन्दजी भी आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने श्रीकृष्णके प्रति पुत्रभावका त्याग कर दिया और शोकसे व्याकुल हो वे सभाके बीच लज्जा छोड़कर रोने लगे। तब पार्वतीने 'मोहको त्याग दो'– यों कहकर उन्हें ढाढ़स बँधाया।
तब श्रीनन्दजी बोले-
देवेश ! जैसे कुजन्माके गृहमें स्थित अमूल्य रत्न और हीरेका मूल्य नहीं समझा जाता, उसी तरह प्रभो! मैं भी ठगा गया। भगवन्! आप प्रकृतिसे परे हैं; अतः मेरा अपराध क्षमा कर दीजिये। अब मैं पुनः यमुना तटपर स्थित गोकुलमें अपने घर नहीं जाऊँगा भला, आप ही बताइये, वहाँ जाकर मैं यशोदा तथा तुम्हारी प्रेयसी राधिकाको भी क्या उत्तर दूँगा और तुम्हारे प्रेमपात्र गोपबालकोंसे क्या कहूँगा ? नारद! इतना कहकर नन्दजी सभामें ही मूर्च्छित हो गये। तब जगदीश्वर श्रीकृष्ण उसी क्षण उन्हें गोदमें लेकर समझाने लगे। (अध्याय ८७ )
Summary of chapter 87 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
Outlining ethical guidelines for human society, this chapter expounds upon the specific moral duties, social responsibilities, and spiritual practices assigned to householders and renounced ascetics in Kali Yuga. Householders are instructed to earn wealth through honest means, perform daily charity, honor guests, and maintain devotional worship at home, while ascetics are urged to practice strict celibacy, non-attachment, and continuous meditation upon Śrī Kṛshṇa to set a noble example for society.