श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - श्री कृष्ण जनन खंड

13- मुनि गर्गजीका आगमन, यशोदाद्वारा उनका सत्कार और परिचय प्रश्न, गर्गजीका उत्तर, नन्दका आगमन, नन्द-यशोदाको एकान्तमें ले जाकर गर्गजीका श्रीराधा-कृष्णके नाम माहात्म्यका परिचय देना और उनकी भावी लीलाओंका क्रमशः वर्णन करना, श्रीकृष्णके नामकरण एवं अन्नप्राशन संस्कारका बृहद् आयोजन, ब्राह्मणों को दान मान, गर्गद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा गर्ग आदिकी विदाई

भगवान् नारायण कहते हैं-

महामुने! अब श्रीकृष्णका कुछ और माहात्म्य सुनो, जो विघ्नविनाशक, पापहारी, महान् पुण्य प्रदान करनेवाला तथा परम उत्तम है। एक दिनकी बात है। सोनेके सिंहासनपर बैठी हुई नन्दपत्नी यशोदा भूखे हुए श्रीकृष्णको गोदमें लेकर उन्हें स्तन पिला रही थीं। उसी समय एक श्रेष्ठ ब्राह्मण शिष्यसमूहसे घिरे हुए वहाँ आये। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे और शुद्ध स्फटिककी मालापर परब्रह्मका जप कर रहे थे। दण्ड और छत्र धारण किये श्वेत वस्त्र पहने वे महर्षि अपनी धवल दन्तपंक्तियोंके कारण बड़ी शोभा पा रहे थे। वेद और वेदाङ्गोंके पारंगत तो वे थे ही, ज्योतिर्विद्या के मूर्तिमान् स्वरूप थे। उन्होंने अपने मस्तकपर तपाये हुए सुवर्णके समान पिङ्गल जटाभार धारण कर रखा था। उनका मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रदेवकी कान्तिको लज्जित कर रहा था गोरे-गोरे अङ्ग और कमल-जैसे नेत्रवाले वे योगिराज भगवान् शंकरके शिष्य थे तथा गदाधारी श्रीविष्णुके प्रति विशुद्ध भक्ति रखते थे। वे श्रीमान् महर्षि प्रसन्नतापूर्वक शिष्योंको पढ़ाते थे। उनके एक हाथमें व्याख्याकी मुद्रा सुस्पष्ट दिखायी देती थी। वे वेदोंकी अनेक प्रकारकी व्याख्या लीलापूर्वक करते थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो चारों वेदोंका तेज मूर्तिमान् हो गया हो। उनके कण्ठमें साक्षात् सरस्वतीका वास था। वे शास्त्रीय सिद्धान्तके एकमात्र विशेषज्ञ थे और दिन-रात श्रीकृष्णचरणारविन्दोंके ध्यानमें तत्पर रहते थे। उन्हें जीवन्मुक्त अवस्था प्राप्त थी। वे सिद्धोंके स्वामी, सर्वज्ञ और सर्वदर्शी थे।

उन्हें देखकर यशोदाजी खड़ी हो गयीं। उन्होंने मस्तक झुकाकर मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और उन्हें बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन देकर आतिथ्यके लिये पाद्य, अर्घ्य, गौ तथा मधुपर्क निवेदन किया। मुस्कराती हुई नन्दरानीने अपने बालकसे मुनीन्द्रकी वन्दना करवायी।

मुनिने भी मन-ही-मन श्रीहरिको सौ-सौ प्रणाम किये और प्रसन्नतापूर्वक वेदमन्त्रों के अनुकूल आशीर्वाद दिया। यशोदाजीने मुनिके शिष्योंको भी प्रणाम किया तथा भक्तिभावसे उन सबके लिये पृथक्-पृथक् पाद्य आदि अर्पित किये। उन शिष्योंने यशोदाजीको आशीर्वाद दिया। मुनि अपने शिष्योंके साथ पैर धोकर जब सिंहासनपर बैठे, तब सती साध्वी यशोदा बालकको गोदमें ले भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर दोनों हाथ जोड़ मुनिके आगमनका कारण पूछनेको उद्यत हुईं वे बोलीं- 'मुने! आप स्वात्माराम महर्षि हैं, आपसे कुशल मङ्गल पूछना यद्यपि उचित नहीं है,

तथापि इस समय मैं आपका कुशल समाचार पूछ रही हूँ अबला बुद्धिहीना होती है। अतः आप मेरे इस दोषको क्षमा कर देंगे। साधुपुरुष सदा ही मूढ़ मनुष्योंके दोषोंको क्षमा करते रहते हैं।'

तदनन्तर अङ्गिरा, अत्रि, मरीचि और गौतम आदि बहुत से ऋषि-मुनियों के नाम लेकर यशोदाने पूछा- 'प्रभो! इन पुण्यश्लोक महात्माओंमेंसे आप कौन हैं कृपया मुझे बताइये यद्यपि आपसे उत्तर पानेके योग्य मैं नहीं हूँ, तथापि आप मुझे मेरी पूछी हुई बात बताइये। आप जैसे महात्मा पुरुष प्रसन्नमनसे शिशुको आशीर्वाद देने योग्य हैं। निश्चय ही ब्राह्मणोंका आशीर्वाद तत्काल पूर्ण मङ्गलकारी होता है।'

ऐसा कहकर नन्दरानी भक्तिभावसे मुनिके सामने खड़ी हो गयीं। उस सतीने नन्दरायजीको बुलानेके लिये चर भेजा यशोदाजीकी पूर्वोक्त बातें सुनकर मुनिवर गर्ग हँसने लगे। उनके शिष्य समूह भी हास्यकी छटासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए जोर-जोरसे हँस पड़े। तब उन शुद्धबुद्धि महामुनि गर्गने यथार्थ हितकर, नीतियुक्त एवं अत्यन्त आनन्ददायक बात कही।

श्रीगर्गजी बोले-

देवि! तुम्हारा यह समयोचित वचन अमृतके समान मधुर है जिसका जिस कुलमें जन्म होता है, उसका स्वभाव भी वैसा ही होता है। समस्त गोपरूपी कमलवनोंके विकासके लिये गोपराज गिरिभानु सूर्यके समान हैं। उनकी पत्नीका नाम सती पद्मावती है, जो साक्षात् पद्मा (लक्ष्मी) के समान हैं। उन्होंकी कन्या तुम यशोदा हो, जो अपने यशकी वृद्धि करनेवाली हो भद्रे! नन्द और तुम जो कुछ भी हो, वह मुझे ज्ञात है। यह बालक जिस प्रयोजनसे भूतलपर अवतीर्ण हुआ है, वह सब मैं जानता हूँ निर्जन स्थानमें नन्दके समीप मैं सब बातें बताऊँगा। मेरा नाम गर्ग है। मैं चिरकालसे यदुकुलका पुरोहित हूँ। वसुदेवजीने | मुझे यहाँ ऐसे कार्यके लिये भेजा है, जिसे दूसरा कोई नहीं कर सकता।

इसी बीचमें गर्गजीका आगमन सुनते ही नन्दजी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर माथा टेक उन मुनीश्वरको प्रणाम किया साथ ही उनके शिष्योंको भी मस्तक झुकाया उन सबने उन्हें आशीर्वाद दिये। इसके बाद गर्गजी आसनसे उठे और नन्द-यशोदाको साथ ले सुरम्य अन्तःपुरमें गये उस निर्जन स्थानमें गर्ग, नन्द और पुत्रसहित यशोदा इतने ही लोग रह गये थे। उस समय गर्गजीने यह गूढ़ बात कही।

श्रीगर्गजी बोले-

नन्द ! मैं तुम्हें मङ्गलकारी वचन सुनाता हूँ। वसुदेवजीने जिस प्रयोजनसे मुझे यहाँ भेजा है, उसे सुनो। वसुदेवने सूतिकागारमें आकर अपना पुत्र तुम्हारे यहाँ रख दिया है और तुम्हारी कन्या वे मथुरा ले गये हैं। ऐसा उन्होंने कंसके भयसे किया है। यह पुत्र वसुदेवका है और जो इससे ज्येष्ठ है, वह भी उन्हींका है। यह निश्चित बात है। इस बालकका अन्नप्राशन और नामकरण संस्कार करनेके लिये वसुदेवने गुप्तरूपसे मुझे यहाँ भेजा है। अतः तुम व्रजमें इन बालकोंके संस्कारकी तैयारी करो। तुम्हारा यह शिशु पूर्ण ब्रह्मस्वरूप है और मायासे इस भूतलपर अवतीर्ण हो पृथ्वीका भार उतारनेके लिये उद्यमशील है। ब्रह्माजीने इसकी आराधना की थी। अतः उनकी प्रार्थनासे यह भूतलका भार हरण करेगा। इस शिशुके रूपमें साक्षात् राधिकावल्लभ गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्ण पधारे हैं। वैकुण्ठमें जो कमलाकान्त नारायण हैं तथा श्वेतद्वीपमें जो जगत्पालक विष्णु निवास करते हैं, वे भी इन्होंमें अन्तर्भूत हैं। महर्षि कपिल तथा इनके अन्यान्य अंश ऋषि नर-नारायण भी इनसे भिन्न नहीं हैं। ये सबके तेजोंकी राशि हैं।

वह तेजोराशि ही मूर्तिमान् होकर उनके यहाँ अवतीर्ण हुई है। भगवान् श्रीकृष्ण वसुदेवको अपना रूप दिखाकर शिशुरूप हो गये और सूतिकागारसे इस समय तुम्हारे घरमें आ गये हैं। ये किसी योनिसे प्रकट नहीं हुए हैं; अयोनिज रूपमें ही भूतलपर प्रकट हुए हैं। इन श्रीहरिने मायासे अपनी माताके गर्भको वायुसे पूर्ण कर रखा था। फिर स्वयं प्रकट हो अपने उस दिव्य रूपका वसुदेवजीको दर्शन कराया और फिर शिशुरूप हो वे यहाँ आ गये। गोपराज! युग-युगमें इनका भिन्न-भिन्न वर्ण और नाम है; ये पहले श्वेत रक्त और पीतवर्णके थे। इस समय कृष्णवर्ण होकर प्रकट हुए हैं। सत्ययुगमें इनका वर्ण श्वेत था ये तेजःपुञ्ज से आवृत होनेके कारण अत्यन्त प्रसन्न जान पड़ते थे त्रेतामें इनका वर्ण लाल हुआ और द्वापर में ये भगवान् पीतवर्णके हो गये। कलियुगके आरम्भमें इनका वर्ण कृष्ण हो गया। ये श्रीमान् तेजकी राशि हैं, परिपूर्णतम ब्रह्म हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। 'कृष्णः' पदमें जो 'ककार' है, वह ब्रह्माका वाचक है 'ऋकार' अनन्त (शेषनाग) का वाचक है। मूर्धन्य 'षकार' शिवका और 'णकार' धर्मका बोधक है। अन्तमें जो 'अकार' है, वह श्वेतद्वीपनिवासी विष्णुका वाचक है तथा विसर्ग नर-नारायण अर्थका बोधक माना गया है। ये श्रीहरि उपर्युक्त सब देवताओंके तेजकी राशि हैं। सर्वस्वरूप, सर्वाधार तथा सर्वबीज हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। 'कृष्' शब्द निर्वाणका वाचक है, 'णकार' मोक्षका बोधक है और 'अकार' का अर्थ दाता है। ये श्रीहरि निर्वाण मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। 'कृष्' का अर्थ है निश्चेष्ट, 'ण' का अर्थ है भक्ति और 'अकार' का अर्थ है दाता भगवान् निष्कर्म भक्तिके दाता हैं; इसलिये उनका नाम 'कृष्ण' है। 'कृष्' का अर्थ है कर्मोंका निर्मूलन, 'ण' का अर्थ है दास्यभाव और 'अकार' प्राप्तिका बोधक है। वे कर्मोंका समूल नाश करके भक्तिकी प्राप्ति कराते हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। नन्द ! भगवान्के अन्य करोड़ों नामोंका स्मरण करनेपर जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह सब केवल 'कृष्ण' नामका स्मरण करनेसे मनुष्य अवश्य प्राप्त कर लेता है। 'कृष्ण' नामके स्मरणका जैसा पुण्य है, उसके कीर्तन और श्रवणसे भी वैसा ही पुण्य होता है। श्रीकृष्णके कीर्तन, श्रवण और स्मरण आदिसे मनुष्यके करोड़ों जन्मोंके पापका नाश हो जाता है। भगवान् विष्णुके सब नामों में 'कृष्ण' नाम ही सबकी अपेक्षा सारतम वस्तु और परात्पर तत्त्व है। 'कृष्ण' नाम अत्यन्त मङ्गलमय, सुन्दर तथा भक्तिदायक है ।

'ककार' के उच्चारणसे भक्त पुरुष जन्म मृत्युका नाश करनेवाले कैवल्य मोक्षको प्राप्त कर लेता है। 'ऋकार' के उच्चारणसे भगवान्का अनुपम दास्यभाव प्राप्त होता है। 'षकार' के उच्चारणसे उनकी मनोवाञ्छित भक्ति सुलभ होती है। 'णकार' के उच्चारणसे तत्काल ही उनके साथ निवासका सौभाग्य प्राप्त होता है और विसर्गके उच्चारणसे उनके सारूप्यकी उपलब्धि होती है, इसमें संशय नहीं है। 'ककार' का उच्चारण होते ही यमदूत काँपने लगते हैं। 'ऋकार' का उच्चारण होनेपर वे ठहर जाते हैं, आगे नहीं बढ़ते। 'षकार' के उच्चारणसे पातक, 'णकार' के उच्चारणसे रोग तथा 'अकार' के उच्चारणसे मृत्यु - ये सब निश्चय ही भाग खड़े होते हैं; क्योंकि वे नामोच्चारणसे डरते हैं। व्रजेश्वर! श्रीकृष्ण नामके स्मरण, कीर्तन और श्रवणके लिये उद्योग करते ही श्रीकृष्णके किंकर गोलोकसे विमान लेकर दौड़ पड़ते हैं। विद्वान् लोग शायद भूतलके धूलिकणोंकी गणना कर सकें; परंतु नामके प्रभावकी गणना करनेमें संतपुरुष भी समर्थ नहीं हैं। पूर्वकालमें भगवान् शंकरके मुखसे मैंने इस 'कृष्ण' नामकी महिमा सुनी थी। मेरे गुरु भगवान् शंकर ही श्रीकृष्ण गुणों और नामोंका प्रभाव कुछ-कुछ जानते हैं। ब्रह्मा, अनन्त, धर्म, देवता, ऋषि, मनु, मानव, वेद और संतपुरुष श्रीकृष्ण-नाम-महिमाकी सोलहवीं कलाको भी नहीं जानते हैं।

नन्द ! इस प्रकार मैंने तुम्हारे पुत्रकी महिमाका अपनी बुद्धि और ज्ञानके अनुसार वर्णन किया है। इसे मैंने गुरुजीके मुखसे सुना था। कृष्ण, पीताम्बर, कंसध्वंसी, विष्टरश्रवा देवकीनन्दन, श्रीश, यशोदानन्दन, हरि, सनातन, अच्युत, विष्णु, सर्वेश, सर्वरूपधृक् सर्वाधार, सर्वगति, सर्वकारणकारण, राधाबन्धु, राधिकात्मा, राधिकाजीवन, राधिकासहचारी, राधामानसपूरक, राधाधन, राधिकाङ्ग, राधिकासक्त ,मानस, राधाप्राण, राधिकेश, राधिकारमण, राधिकाचित्तचोर, राधाप्राणाधिक, प्रभु, परिपूर्णतम, ब्रह्म, गोविन्द और गरुडध्वज-नन्द ! ये श्रीकृष्णके नाम जो तुमने मेरे मुखसे सुने हैं, हृदयमें धारण करो। शुभेक्षण! ये नाम जन्म तथा मृत्युके कष्टको हर लेनेवाले हैं। तुम्हारे कनिष्ठ पुत्रके नामोंका महत्त्व जैसा मैंने सुना था, वैसा यहाँ बताया है। अब ज्येष्ठ पुत्र हलधरके नामका संकेत मेरे मुँहसे सुनो। ये जब गर्भमें थे, उस समय उस गर्भका संकर्षण किया गया था इसलिये इनका नाम 'संकर्षण' हुआ। वेदोंमें यह कहा गया है कि इनका कभी अन्त नहीं होता; इसलिये ये 'अनन्त' कहे गये हैं। इनमें बलकी अधिकता है; इसलिये इनको 'बलदेव' कहते हैं। हल धारण करनेसे इनका नाम 'हली' हुआ है। नील रंगका वस्त्र धारण करनेसे इन्हें 'शितिवासा' (नीलाम्बर) कहा गया है। ये मूसलको आयुध बनाकर रखते हैं; इसलिये 'मुसली' कहे गये हैं। रेवतीके साथ इनका विवाह होगा; इसलिये ये साक्षात् 'रेवतीरमण' हैं। रोहिणीके गर्भमें वास करनेसे इन महाबुद्धिमान् संकर्षणको 'रौहिणेय' कहा गया है। इस प्रकार ज्येष्ठ पुत्रका नाम जैसा मैंने सुना था, वैसा बताया है। नन्द ! अब मैं अपने घरको जाऊँगा। तुम अपने भवनमें सुखपूर्वक रहो।

ब्राह्मणकी यह बात सुनकर नन्दजी स्तब्ध रह गये। नन्दपत्नी भी निश्चेष्ट हो गयीं और वह बालक स्वयं हँसने लगा तब नन्दने गर्गजीको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ लिये और भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर विनयपूर्वक कहा।

नन्द बोले-

ब्रह्मन् ! यदि आप चले गये तो कौन महात्मा इस कर्मको करायेंगे; अतः आप स्वयं ही शुभ दृष्टि करके इन बालकोंका नामकरण एवं अन्नप्राशन संस्कार कराइये राधा बन्धुसे लेकर राधाप्राणाधिकतक जो नाम समूह बताये गये हैं, उनमें जो राधा नाम आया है, वह राधा कौन है और किसकी पुत्री है?

नन्दकी यह बात सुनकर मुनिवर गर्ग हँसने लगे और बोले-'यह परम निगूढ़ तत्त्व एवं रहस्यकी बात है, जिसे तुम्हें बताऊँगा।'

श्रीगर्गजी बोले-

नन्द ! सुनो। मैं पुरातन इतिहास बता रहा हूँ। यह वृत्तान्त पहले गोलोकमें घटित हुआ था। उसे मैंने भगवान् शंकरके मुख सुना है। किसी समय गोलोकमें श्रीदामाका राधाके साथ लीलाप्रेरित कलह हो गया। उस कलहके कारण श्रीदामाके शापसे लीलावश गोपी राधाको गोकुलमें आना पड़ा है। इस समय वे वृषभानु गोपकी बेटी हैं और कलावती उनकी माता हैं। राधा श्रीकृष्णके अर्धाङ्गसे प्रकट हुई हैं और वे अपने स्वामीके अनुरूप ही परम सुन्दरी सती हैं ये राधा गोलोकवासिनी हैं; परंतु इस समय श्रीकृष्णकी आज्ञासे यहाँ अयोनिसम्भवा होकर प्रकट हुई हैं। ये ही देवी मूल प्रकृति ईश्वरी हैं। इन सती साध्वी राधाने माया माताके गर्भको वायुपूर्ण करके वायुके निकलनेके समय स्वयं शिशु विग्रह धारण कर लिया ये साक्षात् कृष्ण माया हैं और श्रीकृष्णके आदेश से पृथ्वीपर प्रकट हुई हैं। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कला बढ़ती है, उसी प्रकार व्रजमें राधा बढ़ रही हैं। श्रीकृष्णके तेजके आधे भागसे वे मूर्तिमती हुई हैं। एक ही मूर्ति दो रूपोंमें विभक्त हो गयी है। इस भेदका निरूपण वेदमें किया गया है। ये स्त्री हैं, वे पुरुष हैं, किंवा वे ही स्त्री हैं और ये पुरुष हैं। इसका स्पष्टीकरण नहीं हो पाता। दो रूप हैं और दोनों ही स्वरूप, गुण एवं तेजकी दृष्टिसे समान हैं पराक्रम, बुद्धि, ज्ञान और सम्पत्तिकी दृष्टिसे भी उनमें न्यूनता अथवा अधिकता नहीं है। किंतु वे गोलोकसे यहाँ पहले आयी हैं; इसलिये अवस्थामें श्रीकृष्ण से कुछ अधिक हैं। श्रीकृष्ण सदा राधाका ध्यान करते हैं और राधा भी अपने प्रियतमका निरन्तर स्मरण करती हैं। राधा श्रीकृष्णके प्राणोंसे निर्मित हुई हैं और ये श्रीकृष्ण राधाके प्राणोंसे मूर्तिमान् हुए हैं। श्रीराधाका अनुसरण करनेके लिये ही इनका गोकुलमें आगमन हुआ है। पूर्वकालमें गोलोकमें श्रीहरिने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे सार्थक बनानेके लिये कंसके भयका बहाना लेकर इनका गोकुलमें आगमन हुआ है। केवल प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये ही ये व्रजमें आये हैं। भय तो छलनामात्र है। जो भयके भी स्वामी हैं, उन्हें किससे भय हो सकता है? सामवेदमें 'राधा' शब्दकी व्युत्पत्ति बतायी गयी है। पहले नारायणदेवने अपने नाभि-कमलपर बैठे हुए ब्रह्माजीको वह व्युत्पत्ति बतायी थी। फिर ब्रह्माजीने ब्रह्मलोकमें भगवान् शंकरको उसका उपदेश दिया। नन्द ! तत्पश्चात् पूर्वकालमें कैलास शिखरपर विराजमान महेश्वरने मुझको वह व्युत्पत्ति बतायी, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। मैं उसका वर्णन करता हूँ।

'राधा' शब्दकी व्युत्पत्ति देवताओं, असुरों और मुनीन्द्रोंको भी अभीष्ट है तथा वह सबसे उत्कृष्ट एवं मोक्षदायिनी है राधाका 'रेफ' करोड़ों जन्मोंके पाप तथा शुभाशुभ कर्मभोगसे छुटकारा दिलाता है। 'आकार' गर्भवास, मृत्यु तथा रोगको दूर करता है। 'धकार आयुकी हानिका और 'आकार' भवबन्धनका निवारण करता है। राधा नामके श्रवण, स्मरण और कीर्तनसे उक्त सारे दोषोंका नाश हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। राधा नामका 'रेफ' श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें निश्चल भक्ति तथा दास्य प्रदान करता है। 'आकार' सर्ववाञ्छित, सदानन्दस्वरूप, सम्पूर्ण सिद्धसमुदायरूप एवं ईश्वरकी प्राप्ति कराता है। 'धकार' श्रीहरिके साथ उन्हींकी भाँति अनन्त कालतक सहवासका सुख, समान ऐश्वर्य, सारूप्य तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करता है। 'आकार' श्रीहरिकी भाँति तेजोराशि, दानशक्ति, योगशक्ति, योगमति तथा सर्वदा श्रीहरिकी स्मृतिका अवसर देता है। श्रीराधा नामके श्रवण, स्मरण और कीर्तनका सुयोग मिलनेसे मोहजाल, पाप, रोग, शोक, मृत्यु और यमराज सभी काँप उठते हैं; इसमें संशय नहीं है।

श्रीराधा माधवके नामकी यत्किञ्चित् व्याख्या जो गुरु मुखसे सुनी थी, वह मैंने यथाज्ञान यहाँ बतायी है। इन नामोंकी सम्पूर्णरूपसे व्याख्या करनेमें मैं असमर्थ हूँ। नन्द ! यहाँ पास ही वृन्दावनमें श्रीराधा और माधवका विवाह होगा। साक्षात् जगत्स्स्रष्टा ब्रह्मा पुरोहित हो अनिदेवको साक्षी बनाकर प्रसन्नतापूर्वक यह वैवाहिक कार्य सम्पन्न करेंगे। श्रीकृष्णके द्वारा जो बाललीलाएँ होनेवाली हैं, उसमेंसे मुख्यतः ये हैं- कुबेरपुत्रका उद्धार, गोपियोंके घरोंसे माखन चुराकर उसका भक्षण, तालवनमें तालफलका भोजन और धेनुकासुरका वध, बकासुर, केशी और प्रलम्बासुरका खेल-खेलमें ही विनाश, द्विजपत्नियोंका उद्धार, उनके दिये हुए मिष्टान्न और पानका भोजन, इन्द्रयागकी परम्पराका भंजन, इन्द्रके कोपसे गोकुलकी रक्षा, गोपियोंके वस्त्रोंका अपहरण उनके व्रतका सम्पादन, पुनः उन्हें वस्त्र अर्पण तथा मनोवाञ्छित वरदान देनेका कार्य करके ये श्यामसुन्दर अपनी लीलाओंसे उनके चित्तको चुरा लेंगे और उन्हें सर्वथा अपने अधीन कर लेंगे तदनन्तर इनके द्वारा अत्यन्त रमणीय रासोत्सवका आयोजन होगा, जो सबका आनन्दवर्धन करेगा। शरद् और वसन्त ऋतुमें रातके समय पूर्ण चन्द्रमाका उदय होनेपर रासमण्डलमें गोपियोंको नूतन प्रेम मिलनका सुख प्रदान करके ये श्यामसुन्दर उनका मनोरथ पूर्ण करेंगे। फिर कौतूहलवश उनके साथ जल-विहार भी करेंगे तत्पश्चात् श्रीदामाके शापके कारण इनका गोप-गोपियों तथा श्रीराधाके साथ (पार्थिव) सौ वर्षोंके लिये वियोग हो जायगा उस समय ये मथुरा चले जायँगे और वहाँ इनका जाना गोपियोंके लिये शोकवर्द्धक होगा। उस समय पुनः ये उनके पास आकर उन्हें समझा-बुझाकर धैर्य बँधायेंगे और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करेंगे उस प्रबोधन और आध्यात्मिक ज्ञानके द्वारा ये रथ तथा सारथि अक्रूरकी रक्षा करेंगे। फिर रथपर आरूढ़ हो पिता, भाई एवं व्रजवासियों के साथ यमुनाजीको लाँधकर व्रजसे मथुराको पधारेंगे मार्गमें यमुनाजीके जलके भीतर अक्रूरको अपने स्वरूपका दर्शन कराकर उन्हें ज्ञान देंगे। फिर सायंकाल मथुरामें पहुँचकर कौतूहलवश नगरमें घूम-घूमकर सबको दर्शन देंगे माली, दर्जी और कुब्जाको भवबन्धनसे मुक्त करेंगे। शंकरजीके धनुषको तोड़कर यज्ञभूमिका दर्शन करेंगे। फिर कुवलयापीड़ हाथी और मल्लोंका वध करनेके पश्चात् अपने सामने राजा कंसको देखेंगे और तत्काल उसका विध्वंस करके माता पिताको बन्धनसे छुड़ायेंगे। तदनन्तर तुम सब गोपोंको समझा-बुझाकर लौटायेंगे। कंसके राज्यपर उग्रसेनका अभिषेक करेंगे। कंसके बन्धु-बान्धवोंको ज्ञानोपदेश देकर उनका शोक दूर करेंगे। इसके बाद अपने भाईका और अपना उपनयन संस्कार कराकर गुरुके मुखसे विद्या ग्रहण करेंगे। गुरुजीको उनका मरा हुआ पुत्र लाकर देंगे और फिर घर लौट आयेंगे। इसके बाद राजा जरासंधके सैनिकोंको चकमा देकर दुरात्मा कालयवनका वध, द्वारकापुरीका निर्माण, मुचुकुन्दका उद्धार तथा यादवोंसहित द्वारकापुरीको प्रस्थान करेंगे। वहाँ कौतूहलवश स्त्रीसमूहोंके साथ विवाह करके उनके साथ क्रीडा-विहार करेंगे। उनका तथा उनके पुत्र-पौत्रादिका सौभाग्यवर्धन करेंगे। मणिसम्बन्धी मिथ्या कलङ्कका मार्जन, पाण्डवोंकी सहायता, भूभार हरण, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके राजसूययज्ञका लीलापूर्वक सम्पादन, पारिजातका अपहरण, इन्द्रके गर्वका गंजन, सत्यभामाके व्रतकी पूर्ति, बाणासुरकी भुजाओंका खण्डन, शिवके सैनिकोंका मर्दन, महादेवजीको जृम्भणास्त्रसे बाँधना, बाणपुत्री उषाका अपहरण, अनिरुद्धको बाणासुरके बन्धनसे छुटकारा दिलाना, वाराणसीपुरीका दहन, ब्राह्मणकी दरिद्रताका दूरीकरण, एक ब्राह्मणके मरे हुए पुत्रोंको लाकर उसे देना, दुष्टोंका दमन आदि करना तथा तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे तुम व्रजवासियोंके साथ पुनः मिलना इत्यादि कार्य करके ये श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ फिर व्रजमें आयेंगे। तदनन्तर अपने नारायण अंशको द्वारकापुरीमें भेजकर ये जगदीश्वर गोलोकनाथ यहाँ राधाके साथ समस्त आवश्यक कार्य पूर्ण करेंगे तथा व्रजवासियों एवं राधाको साथ लेकर शीघ्र ही गोलोकधाममें पधारेंगे। नारायणदेव तुम्हें साथ लेकर वैकुण्ठ पधारेंगे। नर-नारायण नामक जो दोनों ऋषि हैं, वे धर्मके घरको चले जायेंगे तथा श्वेतद्वीपनिवासी विष्णु क्षीरसागरको पधारेंगे। नन्द! इस प्रकार भविष्यमें होनेवाली लीलाओं का वर्णन मैंने किया है। यह वेदका निश्चित मत है। अब इस समय जिस उद्देश्यसे मेरा आना हुआ है, उसे बताता हूँ; सुनो। माघ शुक्ल चतुर्दशीकी शुभ बेलामें इन बालकोंका संस्कार करो। उस दिन गुरुवार है। रेवती नक्षत्र है। चन्द्र और तारा शुद्ध हैं। मीनके चन्द्रमा हैं उसपर लग्नेशकी पूर्ण दृष्टि है। उत्तम वणिज नामक करण है और मनोहर शुभ योग है। वह दिन परम दुर्लभ है। उसमें सभी उत्कृष्ट एवं उपयोगी योगोंका उदय हुआ है। अतः पण्डितोंके साथ विचार करके उसी दिन प्रसन्नतापूर्वक संस्कार कर्मका सम्पादन करो।

ऐसा कह मुनीश्वर गर्ग बाहर आकर बैठ गये। नन्द और यशोदाको बड़ा हर्ष हुआ और वे संस्कार कर्मके लिये तैयारी करने लगे। इसी समय गर्गजीको देखनेके लिये गोप-गोपियाँ और बालक बालिकाएँ नन्दभवनमें आयीं। उन्होंने देखा- मुनिश्रेष्ठ गर्ग मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं। शिष्यसमूहोंसे घिरकर ब्रह्मतेजसे उद्भासित हो रहे हैं और प्रश्न पूछनेवाले किसी सिद्धपुरुषको वे प्रसन्नतापूर्वक गूढ़योगका रहस्य समझा रहे हैं। नन्दभवनकी एक- एक सामग्रीको मुस्कराते हुए देख रहे हैँ और योगमुद्रा धारण किये स्वर्णसिंहासनपर बैठे हैं। ज्ञानमयी दृष्टिसे भूत, वर्तमान और भविष्यको भी देख रहे हैं। वे मन्त्रके प्रभावसे अपने हृदयमें परमात्माके जिस सिद्ध स्वरूपको देखते हैं, उसीको मुस्कराते हुए शिशुके रूपमें बाहर यशोदाकी गोदमें देख रहे हैं। महेश्वरके बताये हुए ध्यानके अनुसार जिस रूपका उन्हें साक्षात्कार हुआ था, उसी पूर्णकाम परमात्मस्वरूपका अत्यन्त प्रीतिपूर्वक दर्शन करके नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए वे पुलकित शरीरसे भक्तिके सागरमें निमग्न दिखायी देते थे। योगचर्याके अनुसार मन ही मन भगवान्की पूजा और प्रणाम करते थे। गोप-गोपियोंने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और गर्गजीने भी उन सबको आशीर्वाद

दिया। तदनन्तर मुनि अपने आसनपर विराजमान हुए और वे समागत स्त्री पुरुष अपने अपने घरको गये।

नन्दने आनन्दित होकर निकटवर्ती तथा दूरवर्ती बन्धुजनोंके पास शीघ्र ही मङ्गलपत्रिका पठायी। इसके बाद उन्होंने दूध, दही, घी, गुड़, तेल, मधु, माखन, तक्र और चीनीके शर्बतसे भरी हुई बहुत-सी नहरें लीलापूर्वक तैयार करायीं। इसके बाद उन्होंने अगहनीके चावलोंके सौ ऊँचे-ऊँचे पर्वताकार ढेर लगवाये। चिउरोंके सौ पर्वत, नमकके सात, शर्कराके भी सात, लड्डुओंके सात तथा पके फलोंके सोलह पर्वत खड़े कराये जौ, गेहूँके आटेके पके हुए लड्डुक, पिण्ड, मोदक तथा स्वस्तिक (मिष्टान्न विशेष) के अनेक पर्वत खड़े किये गये थे। कपर्दकोंके बहुत ही ऊँचे-ऊँचे सात पर्वत खड़े दिखायी देते थे। कर्पूर आदिसे युक्त ताम्बूलके बीड़ोंसे घर भरा हुआ था। सुवासित जलके चौड़े-चौड़े कुण्ड भरे गये थे, जिनमें चन्दन, अगुरु और केसर मिलाये गये थे। नन्दजीने कौतूहलवश नाना प्रकारके रत्न, भाँति-भाँतिके सुवर्ण, रमणीय मोती-मूँगे, अनेक प्रकारके मनोहर वस्त्र और आभूषण भी पुत्रके अन्न प्राशन संस्कारके लिये संचित किये थे। आँगनको झाड़-बुहारकर सुन्दर बनाया गया। उसमें चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया। केलेके खंभों, आमके नये पल्लवोंकी बन्दनवारों और महीन वस्त्रोंसे उस आँगनको कौतुकपूर्वक सब ओरसे घेर दिया गया। यथास्थान मङ्गल कलश स्थापित किये गये। उन्हें फलों और पल्लवोंसे सजाया गया तथा चन्दन, अगुरु, कस्तूरी एवं फूलोंके गजरोंसे सुशोभित किया गया। सुन्दर पुष्पहारों और मनोहर वस्त्रोंकी राशियोंसे नन्द भवनके आँगनको सजाया गया था। उसमें गौओं, मधुपर्कों, आसनों, फलों और सजल कलशोंके समूह यथास्थान रखे गये थे। वहाँ नाना प्रकारके अत्यन्त दुर्लभ और मनोहर वाद्य बज रहे थे। ढक्का, दुन्दुभि, पटह, मृदङ्ग, मुरज, आनकसमूह, वंशी, ढोल और झाँझ आदिके शब्द हो रहे थे। विद्याधरियोंके नृत्य, भाव भंगी तथा भ्रमणसे नन्दप्राङ्गणकी अपूर्व शोभा रही थी। उसके साथ ही गन्धर्वराजोंके मूर्छनायुक्त संगीत तथा स्वर्ण सिंहासनों एवं रथोंके सम्मिलित शब्द वहाँ गूँज रहे थे।

इसी समय संदेशवाहकने प्रसन्नतापूर्वक आकर नन्दरायजीसे कहा- 'प्रभो! आपके भाई बन्धु गोपराज एवं गोपगण पधारे हैं। उनमेंसे कुछ लोग घोड़ोंपर चढ़कर आये हैं, कुछ हाथियोंपर सवार हैं और कितने ही रथोंपर आरूढ़ हो शीघ्रतापूर्वक पधारे हैं। रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित कितने ही राजपुत्रोंका भी यहाँ शुभागमन हुआ है। पत्नी और सेवकोंसहित गिरिभानुजी पधारे हैं। उनके साथ चार-चार लाख रथ और हाथी हैं। घोड़े और शिविकाओंकी संख्या एक-एक करोड़ है ऋषीन्द्र, मुनीन्द्र, विद्वान् ब्राह्मण, बन्दीजन और भिक्षुकोंके समूह भी निकट आ गये हैं। गोप और गोपियोंकी गणना करनेमें कौन समर्थ हो सकता है? आप स्वयं बाहर चलकर देखें।'

आँगनमें खड़े हुए दूतने जब ऐसी बात कही, तब उसे सुनकर व्रजराज नन्दजी स्वयं उन समागत अतिथियोंके पास आये। उन सबको साथ ले आकर उन्होंने आँगनमें बिठाया और तत्काल ही उनका पूजन किया। ऋषि आदिके समुदायको उन्होंने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया और एकाग्रचित्त हो उन सबके लिये पाद्य आदि समर्पित किये। उस समय नन्दगोकुल विभिन्न प्रकारकी वस्तुओं तथा गोपबन्धुओंसे परिपूर्ण हो रहा था। वहाँ कोई किसीके शब्दको नहीं सुन सकता था। साक्षात् कुबेरने श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये वहाँ तीन मुहूर्ततक सुवर्णकी वर्षा करके गोकुलको सोनेसे भर दिया। नन्दकी यह सम्पत्ति देखकर उनके सभी भाई-बन्धु लज्जासे नतमस्तक हो गये। उन्होंने अपने कौतूहलको छिपा लिया। नन्दजीने नित्यकर्म करके पवित्र हो दो धुले वस्त्र धारण किये। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरसे अपने ललाट आदि अङ्गोंमें तिलक किया। इसके बाद गर्गजी तथा मुनीश्वरोंकी आज्ञा ले व्रजेश्वर नन्द दोनों पैर धोकर सोनेके मनोहर पीढ़ेपर बैठे। उन्होंने श्रीविष्णुका स्मरण करके आचमन किया। फिर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर वेदोक्त कर्मका सम्पादन करनेके अनन्तर बालकको भोजन कराया। आनन्दमन हुए नन्दजीने मुनिवर गर्गके कथनानुसार शुभ बेलामें बालकका मङ्गलमय नाम रखा–'कृष्ण'। इस प्रकार जगदीश्वरको सघृत भोजन कराकर उनका नामकरण करनेके अनन्तर नन्दरायने बाजे बजवाये और मङ्गल कृत्य करवाये। उन्होंने ब्राह्मणोंको प्रसन्नतापूर्वक नाना प्रकारके सुवर्ण, भाँति-भाँतिके धन, भक्ष्य पदार्थ और वस्त्र दिये। बन्दीजनों और भिक्षुकों को इतनी अधिक मात्रामें उन्होंने सुवर्ण बाँटा कि सुवर्णके भारी भारसे आक्रान्त होनेके कारण वे सब के सब चल नहीं पाते थे। ब्राह्मणों, बन्धुजनों और विशेषतः भिक्षुकोंको भी उन्होंने पूर्णतया मनोहर मिष्ठान्नका भोजन कराया। उस समय नन्दगोकुलमें बड़े जोर-जोरसे निरन्तर यही शब्द सुनायी देता था कि 'दो और दो।' 'खाओ खाओ' परिपूर्ण रत्न, वस्त्र, आभूषण, मूँगे, सुवर्ण, मणिसार तथा विश्वकर्माके बनाये हुए मनोहर सुवर्णपात्र वहाँ ब्राह्मणोंको बाँटे गये। ब्रजराज नन्दने गर्गजीके पास जाकर विनयपूर्वक अपनी इच्छा प्रकट की और नम्रतापूर्वक उनके शिष्योंको तथा शेष द्विजोंको सुवर्णके अनेक भार पूर्ण मात्रामें प्रदान किये।

श्रीनारायण कहते हैं-

नारद! श्रीहरिको गोदमें लेकर गर्गजी एकान्त स्थानमें गये और बड़ी भक्ति एवं प्रसन्नतासे उन परमेश्वरको प्रणाम करके उनका स्तवन करने लगे। उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू बह रहे थे। शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। मस्तक भक्तिभावसे झुक गया था और श्रीकृष्णचरणारविन्दोंमें दोनों हाथ जोड़कर वे इस प्रकार बोल रहे थे।

गर्गजीने कहा-

हे श्रीकृष्ण! हे जगन्नाथ ! हे भक्तभयभञ्जन! आप मुझपर प्रसन्न होइये। परमेश्वर मुझे अपने चरणकमलोंकी दास्य-भक्ति दीजिये। भक्तोंको अभय देनेवाले गोविन्द आपके पिताजीने मुझे बहुत धन दिया है किंतु उस धनसे मेरा क्या प्रयोजन है? आप मुझे अपनी अविचल भक्ति प्रदान कीजिये प्रभो! अणिमादि सिद्धियोंमें, योगसाधनोंमें, अनेक प्रकारकी मुक्तियोंमें, ज्ञानतत्त्वमें अथवा अमरत्वमें मेरी तनिक भी रुचि नहीं है। इन्द्रपद मनुपद तथा चिरकालतक स्वर्गलोकरूपी फलके लिये भी मेरे मनमें कोई इच्छा नहीं है। मैं आपके चरणोंकी सेवा छोड़कर कुछ नहीं चाहता। सालोक्य, सार्टि, सारूप्य, सामीप्य और एकत्व- ये पाँच प्रकारकी मुक्तियाँ सभीको अभीष्ट हैं। परंतु परमात्मन् । मैं आपके चरणोंकी सेवा छोड़कर इनमें से किसीको भी ग्रहण करना नहीं चाहता। मैं गोलोकमें अथवा पातालमें निवास करूँ, ऐसा भी मेरा मनोरथ नहीं है; परंतु मुझे आपके चरणारविन्दोंका निरन्तर चिन्तन होता रहे, यही मेरी अभिलाषा है। कितने ही जन्मोंके पुण्यके फलका उदय हुआ, जिससे भगवान् शंकरके मुखसे मुझे आपके मन्त्रका उपदेश प्राप्त हुआ। उस मन्त्रको पाकर मैं सर्वज्ञ और समदर्शी हो गया हूँ सर्वत्र मेरी अबाध गति है। कृपासिन्धो ! दीनबन्धो! मुझपर कृपा कीजिये मुझे अभय देकर अपने चरणकमलोंमें रख लीजिये। फिर मृत्यु मेरा क्या करेगी? आपके चरणारविन्दोंकी सेवासे ही भगवान् शंकर सबके ईश्वर, मृत्युञ्जय, जगत्का अन्त करनेवाले तथा योगियोंके गुरु हुए हैं। ब्रह्मन्! जिनके एक दिनमें चौदह इन्द्रोंका पतन होता है, वे जगत्-विधाता ब्रह्मा आपके चरणकमलोंकी सेवासे ही उस पदपर प्रतिष्ठित हुए हैं। आपके चरणोंकी सेवा करके ही धर्मदेव समस्त कर्मोंके साक्षी हुए हैं; सुदुर्जय कालको जीतकर सबके पालक और फलदाता हुए हैं। आपके चरणारविन्दोंकी सेवाके प्रभावसे ही सहस्र मुखोंवाले शेषनाग सम्पूर्ण विश्वको सरसोंके एक दानेकी भाँति सिरपर धारण करते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे भगवान् शिव कण्ठमें विष धारण करते हैं। जो सम्पूर्ण सम्पदाओंकी सृष्टि करनेवाली तथा देवियों में परात्परा हैं, वे लक्ष्मीदेवी अपने कैश-कलापोंसे आपके चरणोंका मार्जन करती हैं। जो सबकी बीजरूपा हैं, वे शक्तिरूपिणी प्रकृति आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते-करते उन्हीं में तत्पर हो जाती हैं। सबकी बुद्धिरूपिणी एवं सर्वरूपा पार्वतीने आपके चरणोंकी सेवासे ही महेश्वर शिवको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त किया है। विद्याकी अधिष्ठात्री देवी जो ज्ञानमाता सरस्वती हैं, वे आपके चरणारविन्दोंकी आराधना करके ही सबकी पूजनीया हुई हैं जो ब्रह्माजी तथा ब्राह्मणोंकी गति हैं, वे वेदजननी सावित्री आपकी चरणसेवासे ही तीनों लोकोंको पवित्र करती हैं। पृथ्वी आपके चरणकमलोंकी सेवाके प्रभावसे ही जगत्को धारण करने में समर्थ, रत्नगर्भा तथा सम्पूर्ण शस्योंको उत्पन्न करनेवाली हुई है। आपकी अंशभूता तथा आपके ही तुल्य तेजस्विनी राधा आपके वक्षःस्थलमें स्थान पाकर भी आपके चरणोंकी सेवा करती हैं; फिर दूसरेकी क्या बात है? ईश! जैसे शिव आदि देवता और लक्ष्मी आदि देवियाँ आपसे सनाथ हैं, उसी तरह मुझे भी सनाथ कीजिये; क्योंकि ईश्वरकी सबपर समान कृपा होती है। नाथ! मैं घरको नहीं जाऊँगा। आपका दिया हुआ यह धन भी नहीं लूँगा। मुझ अनुरागी सेवकको अपने चरणकमलोंकी सेवामें रख लीजिये।

इस प्रकार स्तुति करके गर्गजी नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए श्रीहरिके चरणों में गिर पड़े और जोर जोरसे रोने लगे। उस समय भक्तिके उद्रेकसे उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। गर्गजीकी बात सुनकर भक्तवत्सल श्रीकृष्ण हँस पड़े और बोले- 'मुझमें तुम्हारी अविचल भक्ति हो।'

जो मनुष्य गर्गजीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह श्रीहरिकी सृदृढ़ भक्ति, दास्यभाव और उनकी स्मृतिका सौभाग्य अवश्य प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं, वह श्रीकृष्णभक्तोंकी सेवामें तत्पर हो जन्म, मृत्यु, जरा, रोग, शोक और मोह आदिके संकटसे पार हो जाता है। श्रीकृष्णके साथ रहकर सदा आनन्द भोगता है और श्रीहरिसे कभी उसका वियोग नहीं होता।

भगवान् नारायण कहते हैं-

नारद! श्रीहरिक इस प्रकार स्तुति करके गर्गमुनिने उन्हें नन्दजीको दे दिया और प्रशंसापूर्वक कहा- 'गोपराज ! अब मैं घर जाता हूँ, आज्ञा दो अहो! कैसी विचित्र बात है कि संसार मोहजालसे जकड़ा हुआ है। जैसे समुद्रमें फेन उठता और मिटता रहता है, उसी प्रकार इस भवसागरमें मनुष्योंको संयोग और वियोगका अनुभव होता रहता है।' गर्गकी यह बात सुनकर नन्दजी उदास हो गये; क्योंकि साधु पुरुषोंके लिये सत्पुरुषोंका वियोग मरणसे भी अधिक कष्टदायक होता है। सम्पूर्ण शिष्योंसे घिरे हुए मुनिवर गर्ग जब जानेको उद्यत हुए, तब रोते हुए नन्द आदि सब गोप गोपियोंने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक विनीतभावसे उन्हें प्रणाम किया। उन सबको आशीर्वाद देकर मुनिश्रेष्ठ गर्ग सानन्द मथुराको पधारे। ऋषि-मुनि तथा प्रिय बन्धुवर्ग सभी धनसे सम्पन्न हो प्रसन्न- मनसे अपने-अपने घरोंको गये। समस्त बन्दीजन भी पूर्णमनोरथ होकर अपने घरको लौट गये। उन सबको मीठे पदार्थ, वस्त्र, उत्तम श्रेणीके अश्व तथा सोनेके आभूषण प्राप्त हुए थे। आकण्ठ भोजन करके तृप्त हुए भिक्षुकगण बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने घरको लौटे। वे सुवर्ण और वस्त्रों के भारी भारसे थककर चलनेमें असमर्थ हो गये थे। कोई धीरे-धीरे चलते कोई विश्रामके लिये धरतीपर सो जाते और कुछ लोग मार्गमें उठते बैठते जाते थे। कोई वहाँ सानन्द हँसते हुए टिक जाते थे। कपर्दकों तथा अन्य वस्तुओंके जो बहुत-से शेष भाग बच गये थे, उन्हें कुछ लोग ले लेते थे। कुछ लोग खड़े हो दूसरोंको वे वस्तुएँ दिखाते थे। कुछ लोग नृत्य करते थे और कितने ही लोग वहाँ गीत गाते थे। कोई नाना प्रकारकी प्राचीन गाथाएँ कहते थे राजा मरुत्त, श्वेत, सगर, मान्धाता, उत्तानपाद, नहुष और नल आदिकी जो कथाएँ हैं, उन्हें सुनाते थे। श्रीरामके अश्वमेधयज्ञकी तथा राजा रन्तिदेवके दान-कर्मकी भी गाथाएँ गाते थे। कोई ठहर-ठहरकर और कोई सो सोकर यात्रा करते थे। इस प्रकार सब लोग प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरोंको गये हर्षसे भरे हुए नन्द और यशोदा दोनों दम्पति बालकृष्णको गोदमें लेकर कुबेरभवनके समान रमणीय अपने भव्य भवनमें रहने लगे। इस प्रकार वे दोनों बालक शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी कलाकी भाँति बढ़ने लगे। अब वे गौओंकी पूँछ और दीवाल पकड़कर खड़े होने लगे। प्रतिदिन आधा शब्द या चौथाई शब्द बोल पाते थे। मुने! आँगनमें चलते हुए वे दोनों भाई माता पिताका हर्ष बढ़ाने लगे। अब बालक श्रीहरि दो-एक पग चलनेमें समर्थ हो गये। घरमें और आँगनमें वे घुटनोंके बलसे चलने-फिरने लगे। संकर्षणकी अवस्था बालक श्रीकृष्णसे एक साल अधिक थी। वे दोनों भाई माता-पिताका आनन्दवर्धन करते हुए दिन-दिन बड़े होने लगे। मायासे शिशुरूपधारी वे दोनों बालक गोकुलमें विचरते हुए अच्छी तरह चलनेमें समर्थ हो गये। अब वे स्फुट वाक्य बोल लेते थे। मुने! गर्गजी मथुरामें वसुदेवजीके घर गये। उन्होंने पुरोहितजीको प्रणाम किया और अपने दोनों पुत्रोंका कुशल समाचार पूछा गर्गजीने उनका कुशल मङ्गल सुनाया और नामकरण संस्कारके महान् उत्सवकी चर्चा की। वह सब सुननेमात्रसे वसुदेवजी आनन्दके आँसुओंमें निमग्न हो गये। देवकीजी बड़े प्रेमसे बारंबार बच्चोंका समाचार पूछने लगीं। वे आनन्दके आँसू बहाती हुई बार बार रोने लगती थीं। गर्गजी उन दोनों दम्पतिको आशीर्वाद दे सानन्द अपने घरको गये तथा वे दोनों पति-पत्नी अपने कुबेरभवनोपम गृहमें निवास करने लगे। नारद! जिस कल्पमें यह कथा घटित हुई थी, उस समय तुम पचास कामिनियोंके पति गन्धर्वराज उपबर्हणके नामसे प्रसिद्ध थे। वे सब सुन्दरियाँ तुम्हें प्राणोंसे बढ़कर प्रिय मानती थीं और तुम शृङ्गारमें निपुण नवयुवक थे। तदनन्तर ब्रह्माजीके शापसे एक द्विजकी दासीके पुत्र हुए। उसके बाद वैष्णवोंकी जूठन खानेसे अब तुम ब्रह्माजीके पुत्र हुए हो। श्रीहरिकी सेवासे सर्वदर्शी और सर्वज्ञ हो गये हो तथा पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेमें समर्थ हो श्रीकृष्णका यह चरित्र- उनके नामकरण और अन्नप्राशन आदिका वृत्तान्त कहा गया। यह जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाला है। अब उनकी अन्य लीलाएँ बता रहा हूँ, सुनो। (अध्याय १३)