नारदजीने पूछा-
महाभाग ! श्रीकृष्णका जन्म वृत्तान्त महान् पुण्यप्रद और उत्तम है। वह जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाला है। अतः आप इस प्रसङ्गको कुछ विस्तार के साथ बतलाइये। वसुदेव किसके पुत्र थे और देवकी किसकी कन्या थीं? देवकी और वसुदेव पूर्वजन्ममें कौन थे ? उनके विवाहका वृत्तान्त भी बताइये। अत्यन्त क्रूर स्वभाववाले कंसने देवकीके छः पुत्रोंका वध क्यों किया? तथा श्रीहरिका जन्म किस दिन हुआ? यह सब मैं सुनना चाहता हूँ। आप कृपापूर्वक कहिये ।
श्रीनारायणने कहा -
महर्षि कश्यप ही वसुदेव हुए थे और देवमाता अदिति देवकी रूपमें अवतीर्ण हुई थीं। पूर्वजन्मके पुण्यके
फलरूपसे ही उन्होंने श्रीहरिको पुत्ररूपसे प्राप्त किया था। देवमीढ़द्वारा मारिषाके गर्भसे महान् पुरुष वसुदेवका जन्म हुआ। उनके जन्मकाल में अत्यन्त हर्षसे भरे हुए देवसमुदायने आनक और दुन्दुभि नामक बाजे बजाये थे। इसलिये श्रीहरिके जनक वसुदेवको प्राचीन संत-महात्मा 'आनकदुन्दुभि कहते हैं। यदुकुलमें आहुकके पुत्र श्रीमान् देवक हुए थे, जो ज्ञानके समुद्र कहे जाते हैं। उन्हींकी पुत्री देवकी थीं। यदुकुलके आचार्य गर्गने वसुदेवके साथ देवकीका विधिपूर्वक यथोचित विवाहसम्बन्ध कराया था। देवकने विवाहके लिये बहुत सामान एकत्र किये थे। उन्होंने उत्तम लग्नमें अपनी पुत्री देवकीको वसुदेवके हाथमें समर्पण कर दिया। नारद! देवकने दहेजमें सहस्रों घोड़े, सहस्रों स्वर्णपात्र, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सैकड़ों सुन्दरी दासियाँ, नाना प्रकारके द्रव्य, भाँति भाँतिके रत्न, उत्तम मणि, हीरे तथा रत्नमय पात्र दिये थे। देवककी कन्या श्रेष्ठ रत्नमय आभूषणों से विभूषित, सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमती, त्रिभुवनमोहिनी, धन्य, मान्य तथा श्रेष्ठ युवती थी। रूप और गुणकी निधि थी। उसके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी रहती थी। उसे रथपर बिठाकर वसुदेव जब प्रस्थान करने लगे, तब बहिनके विवाहमें हर्षसे भरा हुआ कंस भी उसके साथ चला। वह तत्काल देवकीके रथ के निकट आ गया। इसी समय कंसको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई— 'राजेन्द्र ! क्यों हर्षसे फूल उठे हो ? यह सच्ची बात सुनो। देवकीका आठवाँ गर्भ तुम्हारी मृत्युका कारण होगा।'
यह सुनकर महाबली कंसने हाथमें तलवार ले ली। दैवी वाणीपर विश्वास करके भयभीत और कुपित हो वह महापापी नरेश देवकीका वध करनेके लिये उद्यत हो गया। वसुदेवजी बड़े भारी पण्डित, नीतिज्ञ तथा नीतिशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे। उन्होंने कंसको देवकीका वध करनेके लिये उद्यत देख उसे समझाना आरम्भ किया।
वसुदेवजी बोले-
राजन् ! जान पड़ता है तुम राजनीति नहीं जानते हो। मेरी बात सुनो। यह तुम्हारे लिये हितकर और यशस्कर है। साथ ही कलङ्कको दूर करनेवाली, शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित तथा समयके अनुरूप भी है। भूपाल! यदि इसके आठवें गर्भसे ही तुम्हारी मृत्यु होनेवाली है तो इस बेचारीका वध करके क्यों अपयश लेते और अपने लिये नरकका मार्ग प्रशस्त करते हो ? जीवमात्रके वधसे ही न्यूनाधिक पाप होता है; परंतु ब्रह्महत्या बहुत बड़ा पातक है। स्त्रीका वध करनेसे मनुष्यको ब्रह्महत्या के समान पाप लगता है। विशेषतः यह तुम्हारी बहिन है। तुमसे पालित और पोषित होने योग्य है तथा तुम्हारी शरणमें आयी है। नरेश्वर! इसका वध करनेपर तुम्हें सौ स्त्रियोंकी हत्याका पाप लगेगा। मनुष्य जप, तप, दान, पूजा, तीर्थदर्शन, ब्राह्मणभोजन और होमयज्ञ आदिका अनुष्ठान स्वर्ग (दिव्य सुख) की प्राप्तिके लिये ही करता है। साधुपुरुष समस्त संसारको पानीके बुलबुले और स्वप्रकी भाँति निस्सार एवं मिथ्या मानते और भयदायक समझते हैं। इसीलिये वे सदैव यत्नपूर्वक धर्मका अनुष्ठान करते हैं। यदुकुल-कमल-दिवाकर धर्मिष्ठ नरेश्वर! अपनी इस बहिनको छोड़ दो; मारो मत। तुम्हारी राजसभामें कई प्रकारके विद्वान् हैं। तुम उन सबसे पूछो कि इसके विषय में क्या करना चाहिये ? भाई! इसके आठवें गर्भ में जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे हाथमें दे दूँगा। उससे मेरा क्या प्रयोजन है? अथवा ज्ञानिशिरोमणे! जितनी भी संतानें होंगी, उन सबको मैं तुम्हारे हवाले कर दूँगा; क्योंकि उनमें से एक भी मुझे तुमसे अधिक प्रिय नहीं है। राजेन्द्र ! बहिनको जीवित छोड़ दो। यह तुम्हें बेटीके समान प्यारी है। तुमने इस छोटी बहिनको सदा मीठे अन्न-पान देकर पाल पोसकर बड़ा किया है। वसुदेवजीकी यह बात सुनकर राजा कंसने बहिनको छोड़ दिया। वसुदेवजी प्यारी पत्नीको साथ लेकर अपने घर गये। नारद! देवकीके गर्भसे क्रमशः जो छः संतानें हुईं, उन्हें वसुदेवजीने कंसको दे दिया; क्योंकि वे सत्यसे बँधे हुए थे। कंसने क्रमशः उन सबको मार डाला। देवकीके सातवें गर्भके आनेपर कंसने भयके कारण उसकी रक्षाकी ओर विशेष ध्यान दिया। परंतु योगमायाने उस गर्भको खींचकर रोहिणीके पेटमें रख दिया। रक्षकोंने राजाको यह सूचना दी कि देवकीका सातवाँ गर्भ गिर गया। उसी गर्भसे भगवान् अनन्त प्रकट हुए, जो 'संकर्षण' नामसे प्रसिद्ध हुए।
तदनन्तर देवकीका आठवाँ गर्भ प्रकट हुआ जो वायुसे भरा हुआ था। नवाँ मास व्यतीत होनेके पश्चात् दसवाँ मास उपस्थित होनेपर सर्वदर्शी भगवान्ने उस गर्भपर दृष्टिपात किया। समस्त नारियोंमें श्रेष्ठ देवी देवकी स्वयं तो रूपवती थीं ही, भगवान्के दृष्टिपात करनेपर तत्काल ही उनका सौन्दर्य चौगुना बढ़ गया। कंसने देखा, देवकीके मुख और नेत्र खिल उठे हैं। वह तेजसे प्रज्वलित हो योगमायाके समान दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रही है; मूर्तिमान् ज्योतिः पुञ्ज-सी दिखायी देती है। उसे देख असुरराज कंसको बड़ा विस्मय हुआ। उसने मन-ही-मन कहा 'इस गर्भसे जो संतान होगी, वही मेरी मृत्युका कारण है'– ऐसा कहकर कंस यत्नपूर्वक देवकी और वसुदेवकी रखवाली करने लगा। उसने सात द्वारवाले भवनमें उन दोनोंको रख छोड़ा था। दसवें मासके पूर्ण होनेपर जब वह गर्भ वायुसे पूर्ण हो गया। तब सबसे निर्लिप्त रहनेवाले साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने देवकीके हृदय-कमलमें निवास किया। उस समय महामनस्वी वसुदेव देवकीपर दृष्टिपात करके समझ लिया कि प्रसवकाल संनिकट आ गया है। फिर तो वे भगवान् श्रीहरिका स्मरण करने लगे। रत्नमय प्रदीपसे युक्त उस परम मनोहर भवनमें उन्होंने तलवार, लोहा, जल और अग्निको लाकर रखा मन्त्रज्ञ मनुष्य तथा भाई बन्धुओंकी स्त्रियोंको भी बुला लिया। भयसे व्याकुल वसुदेवने विद्वान् ब्राह्मण तथा बन्धुओंको भी सादर बुला भेजा। इसी समय जब रातके दो पहर बीत गये, आकाशमें बादल घिर आये, बिजलियाँ चमकने लगीं, अनुकूल वायु चलने लगी तथा रक्षक निद्रित हो शय्यापर इस तरह निश्चेष्ट सो गये, मानो मरकर अचेत हो गये हों; तब धर्म, ब्रह्मा तथा शिव आदि देवेश्वरगण वहाँ
आये तथा गर्भस्थ परमेश्वरकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले-
भगवन्! आप समस्त संसारकी उत्पत्तिके स्थान हैं, किंतु आपकी उत्पत्तिका स्थान कोई नहीं है। आप अनन्त, अविनाशी, निष्पाप, सगुण, निर्गुण तथा महान् ज्योतिः स्वरूप हैं। आप निराकार होते हुए भी भक्तोंके अनुरोधसे साकार बन जाते हैं। आपपर किसीका अंकुश या नियन्त्रण नहीं है। आप सर्वथा स्वच्छन्द, सर्वेश्वर, सर्वरूप तथा समस्त गुणोंके आश्रय हैं। आप संतोंको सुख देनेवाले, दुष्टोंको दुःख प्रदान करनेवाले, दुर्गमस्वरूप एवं दुर्जनोंके नाशक हैं। आपतक तर्ककी पहुँच नहीं होती है। आप सबके आधार हैं। शङ्का और उपद्रवसे शून्य हैं। उपाधिशून्य, निर्लिप्त और निरीह हैं। मृत्युकी भी मृत्यु हैं। अपनी आत्मामें रमण करनेवाले पूर्णकाम, निर्दोष और नित्य हैं। आप सौभाग्यशाली और दुर्भाग्यरहित हैं तथा प्रवचनकुशल हैं। आपको रिझाना या लाँघना कठिन ही नहीं, असम्भव है। आपके निःश्वाससे वेदोंका प्राकट्य हुआ है; इसलिये आप उनके प्रादुर्भावमें हेतु हैं। सम्पूर्ण वेद आप स्वरूप हैं। छन्द आदि वेदाङ्ग भी आपसे भिन्न नहीं हैं। आप वेदवेत्ता और सर्वव्यापी हैं।
ऐसा कहकर देवताओंने बारंबार उनको प्रणाम किया। उन सबके नेत्रोंमें हर्षके आँसू छलक रहे थे। उन सबने फूलोंकी वर्षा की। जो पुरुष प्रातःकाल उठकर (मूल श्लोकमें कहे गये) बयालीस नामोंका पाठ करता है, वह श्रीहरिकी दृढ़भक्ति, दास्यभाव तथा मनोवाञ्छित फल पाता है।
भगवान् नारायण कहते हैं-
इस प्रकार स्तुति सुनाकर देवतालोग अपने-अपने धामको चले गये। फिर जलकी वृष्टि होने लगी। सारी मथुरा नगरी निश्चेष्ट होकर सो रही थी। मुने! वह रात्रि घोर अन्धकारसे व्याप्त थी। जब रातके सात मुहूर्त निकल गये और आठवाँ उपस्थित हुआ, तब आधी रातके समय सर्वोत्कृष्ट शुभ लग्न आया। वह वेदोंसे अतिरिक्त तथा दूसरोंके लिये दुर्जेय लग्न था। उस लग्रपर केवल शुभ ग्रहोंकी दृष्टि थी। अशुभ ग्रहोंकी नहीं थी। रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथिके संयोगसे जयन्ती नामक योग सम्पन्न हो गया था। मुने! जब अर्धचन्द्रमाका उदय हुआ, उस समय लग्नकी ओर देख-देखकर भयभीत हुए सूर्य आदि सभी ग्रह आकाशमें अपनी गतिके क्रमको लाँघकर मीन लग्नमें जा पहुँचे। शुभ और अशुभ सभी वहाँ एकत्र हो गये। विधाताकी आज्ञासे एक मुहूर्तके लिये वे सभी ग्रह प्रसन्नतापूर्वक ग्यारहवें स्थानमें जाकर वहाँ सानन्द स्थित हो गये। मेघ वर्षा करने लगे। ठंढी-ठंढी हवा चलने लगी। पृथ्वी अत्यन्त प्रसन्न थी। दसों दिशाएँ स्वच्छ हो गयी थीं। ऋषि, मनु, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, देवता और देवियाँ सभी प्रसन्न थे। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गन्धर्वराज और विद्याधरियाँ गीत गाने लगीं। नदियाँ सुखपूर्वक बहने लगीं। अग्निहोत्रकी अग्नियाँ प्रसन्नतापूर्वक प्रज्वलित हो उठीं। स्वर्गमें दुन्दुभियों और आनकोंकी मनोहर ध्वनि होने लगी। खिले हुए पारिजातके पुष्पोंकी झड़ी लग गयी। पृथ्वी नारीका रूप धारण करके स्वयं सूतिकागारमें गयी। वहाँ जय जयकार, शङ्खनाद तथा हरिकीर्तनका शब्द गूँज रहा था। इसी समय सती देवकी वहाँ गिर पड़ीं। उनके पेटसे वायु निकल गयी और वहीं भगवान् श्रीकृष्ण दिव्यरूप धारण करके देवकीके हृदयकमलके कोशसे प्रकट हो गये। उनका शरीर अत्यन्त कमनीय और परम मनोहर था। दो भुजाएँ थीं। हाथमें मुरली शोभा पा रही थी। कानोंमें मकराकृति कुण्डल झलमला रहे थे। मुख मन्द
हास्यकी छटासे प्रसन्न जान पड़ता था। वे भक्तोंपर कृपा करनेके लिये कातर से दिखायी पड़ते थे। श्रेष्ठ मणि रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित आभूषण उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे। पीताम्बरसे सुशोभित श्रीविग्रहकी कान्ति नूतन जलधर समान श्याम थी। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे निर्मित अङ्गराग सब अङ्गोंमें लगा हुआ था। उनका मुखचन्द्र शरत्पूर्णिमाके शशधरकी शुभ्र ज्योत्स्नाको तिरस्कृत कर रहा था। बिम्बफलके सदृश लाल अधरके कारण उसकी मनोहरता और बढ़ गयी थी। माथेपर मोरपंखके मुकुट तथा उत्तम रत्नमय किरीटसे श्रीहरिकी दिव्य ज्योति और भी जाज्वल्यमान हो उठी थी। टेढ़ी कमर, त्रिभङ्गी झाँकी, वनमालाका शृङ्गार, वक्षमें श्रीवत्सकी स्वर्णमयी रेखा और उसपर मनोहर कौस्तुभमणिकी भव्य प्रभा अद्भुत शोभा दे रही थी। उनकी किशोर अवस्था थी। वे शान्तस्वरूप भगवान् श्रीहरि ब्रह्मा और महादेवजीके भी परम कान्त (प्राणवल्लभ) हैं। मुने! वसुदेव और देवकीने उन्हें अपने समक्ष देखा। उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। वसुदेवजीने अपनी पत्नी देवकीके साथ अश्रुपूर्णनयन, पुलकितशरीर तथा नतमस्तक हो
हाथ जोड़ भक्तिभावसे उनकी स्तुति की।
वसुदेवजी बोले-
भगवन्! आप श्रीमान् (सहज शोभासे सम्पन्न), इन्द्रियातीत, अविनाशी, निर्गुण, सर्वव्यापी, ध्यानसे भी किसीके व न होनेवाले, सबके ईश्वर और परमात्मा हैं। स्वेच्छामय, सर्वस्वरूप, स्वच्छन्द रूपधारी, अत्यन्त निर्लिप्त, परब्रह्म तथा सनातन बीजरूप हैं। आप स्थूलसे भी अत्यन्त स्थूल, सर्वत्र व्याप्त, अतिशय सूक्ष्म दृष्टिपथमें न आनेवाले, समस्त शरीरों में साक्षीरूपसे स्थित तथा अदृश्य हैं। साकार, निराकार; सगुण, गुणोंके समूह; प्रकृति, प्रकृतिके शासक तथा प्राकृत पदार्थोंमें व्याप्त होते हुए भी प्रकृतिसे परे विद्यमान हैं। विभो! आप सर्वेश्वर, सर्वरूप, सर्वान्तक, अविनाशी, सर्वाधार, निराधार और निर्व्यूह (तर्कके अविषय) हैं; मैं आपकी क्या स्तुति करूँ? भगवान् अनन्त (सहस्त्रों जिह्वावाले शेषनाग) भी आपका स्तवन करनेमें असमर्थ हैं। सरस्वतीदेवीमें भी वह शक्ति नहीं कि आपकी स्तुति कर सकें। पञ्चमुख महादेव और छः मुखवाले स्कन्द भी जिनकी स्तुति नहीं कर सकते, वेदोंको प्रकट करनेवाले चतुर्मुख ब्रह्मा भी जिनके स्तवनमें सर्वदा अक्षम हैं तथा योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु गणेश भी जिनकी स्तुतिमें असमर्थ हैं; उन आपका स्तवन ऋषि, देवता, मुनीन्द्र, मनु और मानव कैसे कर सकते हैं? उनकी दृष्टिमें तो आप कभी आये ही नहीं हैं। जब श्रुतियाँ आपकी स्तुति नहीं कर सकतीं तो विद्वान् लोग क्या कर सकते हैं ? मेरी आपसे इतनी ही प्रार्थना है कि आप ऐसे दिव्य शरीरको त्यागकर बालकका रूप धारण कर लें।
जो मनुष्य वसुदेवजीके द्वारा किये गये इस स्तोत्रका तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह श्रीकृष्णचरणारविन्दोंकी दास्य भक्ति प्राप्त कर लेता है। उसे विशिष्ट एवं हरिभक्त पुत्रकी प्राप्ति होती है। वह सारे संकटोंसे शीघ्र पार हो जाता और शत्रुके भयसे छूट जाता है।
भगवान् नारायण कहते हैं-
वसुदेवजीकी बात सुनकर भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर रहनेवाले प्रसन्नवदन श्रीहरिने स्वयं इस प्रकार कहा।
श्रीकृष्ण बोले-
मैं तपस्याओंके फलसे ही इस समय तुम्हारा पुत्र हुआ हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो तुम्हारा कल्याण होगा, इसमें संशय नहीं पूर्वकालमें तुम तपस्वीजनों में श्रेष्ठ प्रजापति कश्यप थे और ये सुतपा माता अदिति तुम्हारे साथ थीं। तुमने अपनी इन तपस्विनी पत्नी अदितिके साथ तपस्याद्वारा मेरी आराधना की थी। वहाँ मुझे देखकर तुमने मे समान पुत्र होनेका वर माँगा और मैंने भी तुम्हें यह वर दिया कि मेरे समान पुत्रकी प्राप्ति होगी। तात! तुम्हें वर देकर मैंने मन-ही मन विचार किया। फिर यह बात ध्यानमें आयी कि मेरे समान तो कोई त्रिभुवनमें है ही नहीं। इसलिये मैं स्वयं ही तुम्हारे पुत्रभावको प्राप्त हुआ। आप स्वयं कश्यपजी हैं और तपस्याके प्रभावसे इस समय मेरे पिता वसुदेव हुए हैं। ये उत्तम तपस्यावाली पतिव्रता देवमाता अदिति ही इस समय अपने अंशसे मेरी माता देवकीके रूपमें प्रकट हुई हैं। आप और माता अदितिसे ही मैं अंशतः वामनरूपमें अवतीर्ण हुआ था; किंतु इस समय आपके तपके फलसे मैं परिपूर्णतम परमात्मा ही पुत्ररूपमें प्रकट हुआ हूँ। महामते! तुम पुत्रभावसे या ब्रह्मभावसे जब मुझे पा गये हो तो अब निश्चय ही जीवन्मुक्त हो जाओगे। तात! अब तुम मुझे लेकर शीघ्र ही व्रजमें चलो और यशोदाकै घरमें मुझे रखकर वहाँ उत्पन्न हुई मायाको ले आओ तथा यहाँ अपने पास उसे रख लो। ऐसा कहकर श्रीहरि वहाँ तुरंत शिशुरूप हो गये।
श्यामल पुत्रको पृथ्वीपर नग्रभावसे सोया देख विष्णुकी मायासे मोहित हो वसुदेवजी सूतिकागारमें अपनी स्त्रीसे तन्द्रामें बोले- 'प्रिये ! यह कैसा तेजः पुञ्ज है?' ऐसा कह वसुदेवने पत्नीके साथ कुछ विचार करके बालकको गोदमें उठा लिया और उसे लेकर वे नन्द गोकुल में जा पहुँचे। वहाँ नन्दगाँवमें यशोदा नींदसे अचेत हो रही थीं। उन्होंने शय्यापर उन्हें निद्रित अवस्थामें देखा। साथ ही नन्दजी भी वहाँ नींदमें बेसुध हो रहे थे। वहाँ घरमें जो कोई भी प्राणी थे, सब सो गये थे। वसुदेवजीने देखा, तपाये हुए सुवर्णके समान गौर कान्तिवाली एक नग्न बालिका पड़ी पड़ी घरकी छतकी ओर दृष्टिपात कर रही है। उसके प्रसन्न मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। उसे देखकर वसुदेवजीको बड़ा विस्मय हुआ। वे तुरंत ही पुत्रको वहाँ सुलाकर कन्याको गोदमें ले डरते-डरते मथुराकी ओर गये
और अपनी पत्नीके सूतिकागारमें जा पहुँचे। वहीं उन्होंने उस महामायास्वरूपिणी बालिकाको सुला दिया। बालिका जोर-जोरसे रोने लगी। उसे देखकर देवकी थर्रा उठी। उस बालिकाने अपने रोनेकी आवाजसे ही रक्षकोंको जगा दिया। रक्षक शीघ्र उठकर खड़े हो गये और उस बालिकाको छीनकर कंसके निकट जा पहुँचे। देवकी और वसुदेव भी शोकसे विह्वल हो पीछे-पीछे गये। महामुने! बालिकाको देखकर कंसको अधिक प्रसन्नता नहीं हुई। उस रोती हुई बच्चीपर भी उसे दया नहीं आयी। वह क्रूरकर्मा असुर उस बालिकाको लेकर पत्थरपर दे मारनेके लिये आगे बढ़ा। उस समय वसुदेव और देवकीने बड़े आदरके साथ उससे कहा- 'नृपश्रेष्ठ कंस ! तुम नीतिशास्त्रमें निपुण विद्वान् हो; अतः हमारी सच्ची, नीतियुक्त तथा मनोहर बात सुनो भैया! तुमने हमारे भाई बन्धु होकर भी हम दोनोंके छः पुत्रोंका वध कर डाला, फिर भी तुम्हें दया नहीं आती! अब इस आठवें गर्भमें यह अबला बालिका प्राप्त हुई है। हमारी इस बच्चीको मारकर तुम्हें भूतलपर कौन-सा महान् ऐश्वर्य प्राप्त हो जायगा? क्या एक अबला युद्धके मुहानेपर तुम्हारी राज्यलक्ष्मीका हनन करनेमें समर्थ हो सकती है?" ऐसा कहकर वसुदेव और देवकी दोनों दुरात्मा कंसके सामने वहाँ फूट-फूटकर रोने लगे। कंस बड़ा ही निर्दय था। उसने उन दोनोंकी बातें सुनकर इस प्रकार उत्तर दिया।
कंस बोला-
बहिन ! मेरी बात सुनो मैं तुम्हें समझाता हूँ। विधाता दैववश एक तिनकेके द्वारा पर्वतको धराशायी करनेमें समर्थ हैं। एक कीड़ेके द्वारा सिंह और व्याघ्रको तथा एक मच्छरके द्वारा विशालकाय हाथीको नष्ट कर सकते हैं। शिशुके द्वारा महान् वीरका, क्षुद्र जन्तुओं द्वारा विशालकाय प्राणीका, चूहेके द्वारा बिल्लीका और मेढकके द्वारा सर्पका वध करा सकते हैं। इस प्रकार विधाता जन्यके द्वारा जनकका, भक्ष्यके द्वारा भक्षकका, अग्निके द्वारा जलका और सूखे तिनकेके द्वारा अग्निका नाश करनेमें समर्थ हैं। एकमात्र द्विज जहुने सात समुद्रोंको पी लिया था; अतः तीनों लोकोंमें विधाताकी विचित्र गतिको समझ पाना अत्यन्त कठिन है। दैवयोगसे यह बालिका ही मेरा नाश करने में समर्थ हो जायगी, अतः मैं बालिकाका भी वध कर डालूँगा। इस विषयमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।
ऐसा कहकर कंस उस बालिकाको मारना ही चाहता था कि वसुदेवजीने पुनः उससे कहा-'राजन्! तुमने अबतक व्यर्थ ही हिंसा की है। कृपानिधे! अब इस बालिकाको मुझे दे दो।' महामुने! उनकी बात सुनकर विचारज्ञ कंस संतुष्ट हो गया। इसी समय उसे बोध कराती हुई आकाशवाणी प्रकट हुई 'ओ मूढ़ कंस! तू विधाताकी गतिको न जानकर किसे मारने जा रहा है? तेरा वध करनेवाला बालक कहीं उत्पन्न हो गया है। समय आनेपर प्रकट होगा।' यह दैववाणी सुनकर राजा कंसने बालिकाको त्याग दिया वसुदेव और देवकी उसे पाकर बड़े प्रसन्न हुए। वे उस बालिकाको छातीसे लगाये घरको लौट आये। मरी हुई कन्या मानो पुनः जी गयी हो, इस प्रकार उसे पाकर वसुदेवजीने ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया। विप्रवर! वह कन्या परमात्मा श्रीकृष्णकी बड़ी बहिन हुई। पार्वतीके अंशसे उसका आविर्भाव हुआ था। लोकमें वह 'एकानंशा' नामसे विख्यात हुई। द्वारकामें रुक्मिणीके विवाह के अवसरपर वसुदेवजीने उस कन्याको भगवान् शंकरके अंशावतार महर्षि दुर्वासाके हाथमें भक्तिपूर्वक दे दिया था। मुने। इस प्रकार श्रीकृष्ण जन्मके विषयमें सारी बातें बतायी गयीं इसका बारंबार कीर्तन जन्म, मृत्यु और जराके कष्टको नष्ट करनेवाला, सुखदायक और पुण्यदायक है। (श्रीमद्भागवतके वर्णनके साथ इसका मेल नहीं खाता। उसमें चतुर्भुजरूपसे भगवान् प्रकट होते हैं। कन्याको कंस पृथ्वीपर पटक देता है और वह आकाशमें जाकर कंसको सावधान करती है। कल्पभेदसे दोनों ही वर्णन सत्य हो सकते हैं।) (अध्याय ७)
Summary of chapter 5 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
As the years passed within the prison cell, Devakī gave birth to six consecutive sons, each of whom Vasudeva faithfully delivered to King Kaṃsa in accordance with his solemn pledge. Although Kaṃsa's minister Yoginī and counselors advised the king that the prophecy referred specifically to the eighth child, the cruel monarch mercilessly slaughtered all six infants upon a stone slab, plunging Devakī and Vasudeva into agonizing maternal grief. These tragic events unfolded in strict accordance with the cosmic plan, clearing the path for the divine incarnations and setting the stage for the wondrous advent of the Supreme Lord.