नारदजीने पूछा-
ब्रह्मन्! दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामने किस युगमें और किस प्रकार गौतमपत्नी अहल्याको शापसे मुक्त किया ? महाभाग ! आप रामावतारकी मनोहर एवं सुखदायिनी कथा संक्षेपसे कहिये; मेरे मनमें उसे सुननेके लिये उत्कण्ठा हो रही है।
श्रीनारायणने कहा-
नारद! त्रेतायुगमें ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे साक्षात् भगवान् विष्णुने दशरथसे उनकी पत्नी कौसल्याके गर्भसे सानन्द जन्म ग्रहण किया। कैकेयीसे भरत हुए, जो रामके समान ही गुणवान् थे और सुमित्राके गर्भसे लक्ष्मण तथा शत्रुका जन्म हुआ। वे दोनों ही
गुणोंके सागर थे पिताद्वारा विश्वामित्र के साथ भेजे गये लक्ष्मणसहित श्रीराम सीताको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे रमणीया मिथिलापुरीमें गये उसी मार्गमें पाषाणमयी स्त्रीको देखकर जगदीश्वर श्रीरामने विश्वामित्रसे उसके शिला होनेका कारण पूछा। श्रीरामका प्रश्न सुनकर महातपस्वी धर्मात्मा मुनि विश्वामित्रने वहाँ सारा रहस्य उन्हें बताया। उनके मुँहसे अहल्याके शिला होनेका कारण सुनकर अखिल भुवन पावन श्रीरामने अपने चरणकी एक अंगुलिसे उस शिलाका स्पर्श किया। उनका स्पर्श पाते ही अहल्या पद्मगन्धा सुन्दरी नारीके रूपमें परिणत हो गयी और श्रीरामको आशीर्वाद देकर वह पतिके घरमें चली गयी। पत्नीको पाकर गौतमने श्रीरामचन्द्रजीको शुभाशीर्वाद प्रदान किया। तदनन्तर श्रीरामने मिथिलामें जाकर शिवका धनुष तोड़ा और सीताका पाणिग्रहण किया। सीतासे विवाह करके राजेन्द्र श्रीरामने परशुरामजीका दर्प चूर्ण किया और क्रीड़ा कौतुक एवं मङ्गलाचारपूर्वक रमणीय अयोध्यापुरीको प्रस्थान किया। राजा दशरथ आदरपूर्वक सात तीर्थोका जल मँगवाया और तत्काल ही मुनीश्वरोंको बुलाकर अपने पुत्र श्रीरामको राजा बनानेकी इच्छा की। श्रीराम सम्पूर्ण मङ्गलाचारसे सम्पन्न हो जब अधिवास कर्म पूर्ण कर चुके, तब भरतकी माता कैकेयी ईर्ष्याजनित शोकसे विह्वल हो गयी। उसने राजा दशरथसे दो वर माँगे, जिन्हें देनेके लिये वे पहले प्रतिज्ञा कर चुके थे। उसने एक वरसे रामका वनवास माँगा और दूसरेके द्वारा भरतका राज्याभिषेक महाराज दशरथ प्रेमसे मोहित होनेके कारण वर देना नहीं चाहते थे। यह देख श्रेष्ठ बुद्धिवाले श्रीराम धर्म और सत्यके भङ्ग होनेके भयसे महाराजसे बोले।
श्रीरामने कहा-
तात! सत्यसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है और झूठसे बड़ा कोई पातक नहीं है। गङ्गाके समान दूसरा तीर्थ नहीं है; श्रीकेशवसे बढ़कर कोई देवता नहीं है; धर्मसे श्रेष्ठ बन्धु नहीं है और धर्मसे बढ़कर धन नहीं है। धर्मसे अधिक प्रिय और उत्तम कौन है? अतः आप यत्नपूर्वक अपने धर्मकी रक्षा कीजिये। स्वधर्मकी रक्षा करनेपर सदा और सर्वत्र मङ्गल होता है।
यश, प्रतिष्ठा, प्रताप और परम आदरकी प्राप्ति होती है। मैं चौदह वर्षोंतक गृह-सुखका परित्याग करके धर्मपूर्वक विचरता हुआ आपके सत्यकी रक्षाके लिये वनमें वास करूँगा जो इच्छा या अनिच्छासे सत्य प्रतिज्ञा करके उसका पालन नहीं करता, वह अशौचका भागी होता है और वह अशौच उसके शरीरके भस्म होनेतक बना रहता है। जबतक चन्द्रमा और सूर्य रहते हैं, तबतक वह कुम्भीपाक नरकमें यातना भोगता है। तदनन्तर मानव-योनिमें उत्पन्न हो वह सात जन्मोंतक गूंगा और कोढ़ी होता है।
ऐसा कहकर श्रीराम वल्कल और जटा धारण करके सीता और लक्ष्मणके साथ विशाल वनमें चले गये। मुने! इधर महाराज दशरथने पुत्रशोकसे अपने शरीरको त्याग दिया श्रीरामचन्द्रजी पिताके सत्यकी रक्षाके लिये वन-वनमें भ्रमण करने लगे। कालान्तरमें उस विशाल एवं घोर वनमें घूमती हुई रावणकी बहिन शूर्पणखा उधर आ निकली। उसने बड़े कौतूहलसे श्रीरामको देखा। उन्हें देखते ही वह कुलटा राक्षसी काम वेदनासे पीड़ित हो गयी। उसके सारे अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया और वह मूच्छित हो गयी। फिर वह श्रीरामके पास गयी। शूर्पणखा सदा बने रहनेवाले यौवनसे युक्त अत्यन्त प्रौढ़ और कामोन्मत्त थी। वह मनमें कामभाव ले श्रीरामसे मुस्कराती हुई बोली।
शूर्पणखाने कहा-
हे राम! हे घनश्याम ! हे रूपधाम! हे गुणसागर! मेरा हृदय आपमें अनुरक्त हो गया है। आप एकान्त स्थानमें मुझे स्वीकार कीजिये। तदनन्तर श्रीराम तथा लक्ष्मणसे शूर्पणखाकी बातचीत हुई। अन्तमें लक्ष्मणने तीक्ष्ण धारवाले अर्धचन्द्राकार बाणसे उसकी नाक काट ली। उसका भाई खर-दूषण बड़ा बलवान् था। उसने आकर युद्ध किया और लक्ष्मणके अस्त्रसे सेनासहित मारा जाकर यमलोकको चला गया। चौदह हजार राक्षसों तथा खर-दूषणको मारा गया देख शूर्पणखाने रावणको फटकारा और सारा समाचार बताकर वह तत्काल पुष्करतीर्थमें चली गयी। वहाँ दुष्कर तपस्या करके उसने ब्रह्माजीसे वर प्राप्त किया। उस निराहार तपस्विनी राक्षसीको दर्शन देकर सर्वज्ञ कृपासिन्धु ब्रह्माजीने उसके मनकी बात जान ली और इस प्रकार कहा।
ब्रह्माजी बोले-
वरानने श्रीराम दुर्लभ हैं। उन्हें तुम प्राप्त नहीं कर सकी हो। इसीलिये यह दुष्कर तपस्या कर रही हो। इसी तरह जितेन्द्रियों में श्रेष्ठ धर्मात्मा लक्ष्मणको भी प्राप्त करनेमें तुम्हें सफलता नहीं मिली है; अतः उधरसे निराश होकर तुम तपस्यामें लगी हो तुम्हारी इस तपस्याका फल तुम्हें दूसरे जन्ममें मिलेगा जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके भी ईश्वर तथा प्रकृतिसे भी परे हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको तुम पतिरूपमें प्राप्त करोगी। ऐसा कहकर ब्रह्माजी सानन्द अपने धामको चले गये और शूर्पणखाने अपने शरीरको अग्निमें विसर्जित कर दिया। वही दूसरे जन्ममें कुब्जा हुई। शूर्पणखाके उकसानेसे मायावी राक्षसराज रावण क्रोधसे काँपने लगा। उसने मायाद्वारा सीताको हर लिया। सीताको आश्रममें न देख श्रीराम मूच्छित हो गये। तब उनके भाई लक्ष्मणने आध्यात्मिक ज्ञानकी चर्चा करके उन्हें सचेत किया। मुने! तत्पश्चात् वे जानकीकी खोजके लिये दिन-रात शोकार्त हो गहन वन, पर्वत, कन्दरा, नद, नदी और मुनियोंके आश्रमों में घूमने लगे। सुदीर्घ कालतक अन्वेषण करनेपर भी जब उन्हें जानकीका पता न चला, तब भगवान् श्रीरामने स्वयं ही जाकर वानरराज सुग्रीवके साथ मित्रता की और वालीको बाणोंसे मारकर उनका राज्य सुग्रीवको दे दिया। यह सब उन्होंने अपने मित्रके प्रति की गयी प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये किया था। वानरराजने सीताका पता लगानेके लिये समस्त दिशाओंमें दूत भेजे और लक्ष्मणसहित श्रीराम सुग्रीवके यहाँ रहने लगे। श्रीरामने हनुमान्जीको प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर उन्हें अपनी परम दुर्लभ पदधूलि प्रदान की और सीताके लिये पहचानके रूपमें श्रेष्ठ एवं सुन्दर रत्नमयी मुद्रिका उनके हाथमें देकर अपना शुभ संदेश भी प्रदान किया जो सीताकी जीवन रक्षाका कारण बना यह सब करनेके पश्चात् उन्होंने हनुमान्जीको उत्तम दक्षिण दिशामें भेजा हनुमान्जी रुद्रकी कलासे प्रकट हुए थे। वे श्रीरामका संदेश ले सीताकी खोजके लिये लंकाको गये। वहाँ उन्होंने अशोकवाटिकामें सीताजीको देखा, जो शोकसे अत्यन्त कृश दिखायी देती थीं। अमावास्याको अत्यन्त क्षीण हुई चन्द्रकलाके समान वे उपवासके कारण बहुत ही दुबली- पतली हो गयी थीं और निरन्तर भक्तिपूर्वक 'राम राम' का जप कर रही थीं। उनके सिरके बाल जटाओंका बोझ बन गये थे। अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति दमक रही थी। वे दिन-रात श्रीरामके चरणकमलोंका ध्यान किया करती थीं। शुद्ध भूमिपर सोती थीं। शुद्ध आचार विचार तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पतिव्रता थीं। उनमें महालक्ष्मीके चिह्न विद्यमान थे। वे अपने तेजसे प्रकाशमान थीं। सम्पूर्ण तीर्थोंको पुण्य प्रदान करनेवाली थीं। उनमें दृष्टिमात्रसे समस्त भुवनोंको पवित्र करनेकी क्षमता थी। उस समय रोती हुई माता जानकीको देखकर पवननन्दन हनुमान्ने प्रसन्नतापूर्वक उनके हाथमें वह रत्नमयी मुद्रिका दे दी धर्मात्मा वायुपुत्र सीताकी दशा देखकर उनके चरणकमलोंको पकड़कर रोने लगे। उन्होंने श्रीरामका वह संदेश सुनाया, जो सीताजीके जीवनकी रक्षा करनेवाला था।
हनुमान्जी बोले –
मातः ! समुद्रके उस पार श्रीराम और लक्ष्मण इस राक्षसपुरीपर चढ़ाई करनेके लिये तैयार खड़े हैं। बलवान् वानरराज सुग्रीव श्रीरामके मित्र हो गये हैं। श्रीरामने वालीका वध करके अपने मित्र सुग्रीवको निष्कण्टक राज्य दिया है। साथ ही उन्हें उनकी पत्नी भी प्राप्त करा दी है, जिसे पहले वालीने हर लिया था। सुग्रीवने भी धर्मतः तुम्हारे उद्धारकी प्रतिज्ञा की है। उनके समस्त वानर तुम्हें खोजनेके लिये सब ओर गये हैं। मुझसे तुम्हारा मङ्गलमय समाचार पा कमलनयन श्रीराम गहरे सागरपर सेतु बाँधकर शीघ्र यहाँ आ पहुँचेंगे और पापी रावणको उसके पुत्र तथा बान्धवोंसहित मारकर अविलम्ब तुम्हारा उद्धार करेंगे। आज तुम्हारे प्रसादसे इस रत्नमयी लंकाको मैं बेखटके जलाकर भस्म कर दूँगा तुम मुस्कराती हुई मेरे इस पराक्रमको देखो। सुव्रते! मैं लंकाको वानरीके बच्चेकी भाँति समझता हूँ। समुद्रको मूत्रके समान और भूतलको परईकी भाँति देखता हूँ। सेनासहित रावण मेरी दृष्टिमें चींटियोंके समूह जैसा है। मैं आधे मुहूर्तमें अनायास ही उसका संहार कर सकता हूँ; परंतु इस समय श्रीरामकी प्रतिज्ञाकी रक्षा के लिये उसे नहीं मारूँगा महाभागे! तुम स्वस्थ एवं निश्चिन्त हो जाओ मेरी स्वामिनि भयको त्याग दो। वानरकी बात सुनकर सीता बारंबार फूट फूटकर रोने लगीं। रामकी उन पतिव्रता पत्नीने भयभीत-सी होकर पूछा।
सीता बोलीं-
वत्स क्या मेरे दारुण शोकसागरसे पीड़ित श्रीराम अभी जीवित हैं? मेरे प्राणनाथ कौसल्यानन्दन सकुशल हैं? जानकीके जीवनबन्धु इस समय शोकसे कृशकाय होकर कैसे हो गये हैं ? मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतम कैसे आहार करते हैं? वे क्या खाते हैं? क्या सचमुच समुद्रके उस पार स्वयं सीतापति विद्यमान हैं? मेरे प्रभु शोकसे नष्ट न होकर क्या सचमुच लंकापर चढ़ाई के लिये तैयार खड़े हैं? जो स्वामी के लिये सदा दुःखरूप ही रही है, उसी मुझ पापिनी सीताको क्या वे स्मरण करते हैं? मेरे स्वामीने मेरे लिये कितना दुःख सहन किया है? जो पहले मिलनमें व्यवधान मानकर अपने कण्ठमें हार नहीं धारण करते थे, वे ही श्रीराम आज इतने दूर हैं। इस समय हम दोनोंके बीचमें सौ योजन विशाल समुद्र व्यवधान बनकर खड़ा है। क्या मैं कभी धर्म-कर्ममें संलग्न, धर्मिष्ठ, नितान्त शान्त करुणासागर प्रियतम भगवान् श्रीरामको देखूँगी? क्या पुनः प्रभुके चरणकमलोंकी सेवा कर सकूँगी ? जो मूढ़ नारी पति सेवासे वञ्चित है, उसका जीवन व्यर्थ है जो मेरे धर्मपुत्र हैं और मेरे बिना शोकसागरमें मग्न हैं, मेरा अपहरण होनेसे जिनके अभिमानको गहरा आघात पहुँचा है, जो वीरोंमें श्रेष्ठ, धर्मात्मा और देवताके समान हैं; वे मेरे स्वामीके छोटे भाई देवर लक्ष्मण क्या सचमुच जीवित हैं? क्या यह सच है कि वे सदा मेरे उद्धारके लिये संनद्ध रहते हैं? क्या सचमुच प्राणोंसे भी अधिक प्रिय, धर्मात्मा, पुण्यात्मा तथा धन्यातिधन्य वत्स लक्ष्मणको मैं पुनः देखूँगी? मुने! सीताका यह वचन सुन उन्हें शुभ प्रत्युत्तर दे हनुमान्ने खेल-खेलमें ही लंकाको जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर वायुपुत्र कपिवर हनुमान् पुनः जनकनन्दिनीको धीरज दे वेगपूर्वक बिना किसी परिश्रमके उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी विराजमान थे। वहाँ उन्होंने माता मिथिलेशकुमारीका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। सीताका मङ्गलमय समाचार सुनकर श्रीरामचन्द्रजी रो पड़े लक्ष्मण और सुग्रीव भी फूट-फूटकर रोने लगे। नारद! उस समय महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न समस्त वानर भी रोदन करने लगे। देवर्षे तदनन्तर समुद्र में सेतु बाँधकर छोटे भाई और वानर सेनासहित रघुकुलनन्दन श्रीरामने शीघ्र ही युद्धके लिये तैयार हो लंकापर चढ़ाई कर दी। ब्रह्मन् वहाँ युद्ध करके श्रीरामने बन्धुबान्धवोंसहित रावणको मार डाला और शुभ वेलामें सीताका वहाँसे उद्धार किया। फिर सत्यपरायणा सीताको पुष्पक विमानपर बिठाकर वे क्रीड़ाकौतुक एवं मङ्गलाचारके साथ शीघ्रतापूर्वक अयोध्याकी ओर प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर भगवान् रामने सीताको हृदयसे लगा क्रीड़ा की फिर सीता और रामने तत्काल विरह-ज्वालाको त्याग दिया। भूमण्डलपर श्रीराम सातों द्वीपोंके स्वामी हुए। उनके शासनकालमें सारी पृथ्वी आधि-व्याधिसे रहित हो गयी। श्रीरामके दो धर्मात्मा पुत्र हुए कुश और लव उन दोनोंके पुत्रों और पौत्रोंसे सूर्यवंशी क्षत्रियोंका विस्तार हुआ। वत्स नारद! इस प्रकार मैंने तुमसे मङ्गलमय श्रीरामचरित्रका वर्णन किया है। यह सुख देनेवाला, मोक्ष प्रदान करनेवाला सारतत्त्व तथा भवसागरसे पार होनेके लिये जहाज है। (अध्याय ६२)
Summary of chapter 70 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
Initiating his spiritual discourse, Maharshi Nārada detailed the cosmic structure of Time, outlining the four Yugas—Satya, Tretā, Dvāpara, and Kali—and their respective spiritual measures and moral decline. He explained how human longevity, physical strength, and adherence to Truth diminish as time progresses toward Kali Yuga, where hypocrisy and ignorance prevail. However, Maharshi Nārada declared that despite the spiritual darkness of Kali Yuga, the simple chanting of Lord Śrī Kṛshṇa's holy names bestows the highest perfection attainable in previous ages.