श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - श्री कृष्ण जनन खंड

12- यशोदाके घर गोपियोंका आगमन और उनके द्वारा उन सबका सत्कार, शिशु श्रीकृष्णके पैरोंके आघातसे शकटका चूर-चूर होना तथा श्रीकृष्ण- कवचका प्रयोग एवं माहात्म्य

भगवान् नारायण कहते हैं-

नारद! एक दिन नन्दपत्नी यशोदा अपने घरमें भूखे बालक गोविन्दको गोदमें लेकर उन्हें प्रसन्नतापूर्वक स्तन पिला रही थीं। इसी समय नन्द मन्दिरमें बहुत सी गोपियाँ आयीं, जिनमें कुछ बड़ी-बूढ़ी थीं और कुछ यशोदाजीकी सखियाँ थीं। इनके साथ और भी बालक-बालिकाएँ थीं। उस दिन नन्दजीके यहाँ आभ्युदयिक कर्मका सम्पादन हुआ था। उस अवसरपर गोपियोंको आती देख सती यशोदाने अतृप्त बालक श्रीकृष्णको शीघ्र ही शय्यापर सुला दिया और स्वयं उठकर प्रसन्नतापूर्वक उनको प्रणाम किया। इतना ही नहीं आनन्दित हुई गोपी यशोदाने उन सबको तेल, सिन्दूर, पान, मिष्टान्न, वस्त्र और आभूषण भी दिये। इस बीचमें मायाके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण मायासे भूखे बनकर दोनों चरण ऊपर फेंक-फेंककर रोने लगे। मुने! उनके पास ही गोरसके मटकोंसे भरा हुआ छकड़ा खड़ा था। श्रीकृष्णका एक पैर उससे जा लगा। विश्वम्भरके पैरका आघात लगनेसे वह छकड़ा चूर-चूर हो गया। उस छकड़ेके टुकड़े- टुकड़े हो गये। उसके टूटे काठ वहीं बिखर गये। उसपर लदा हुआ दही, दूध, माखन, घी और मधु धरतीपर गिरकर वह चला। यह आश्चर्य देख भयसे व्याकुल हुई गोपियाँ बालकके पास दौड़ी हुई आयीं। उन्होंने देखा छकड़ा टूट चुका है और बालक उसकी बिखरी हुई लकड़ियोंके भीतर दबा है। टूटे-फूटे मटकोंका समूह तथा बहुत-सा गोरस भी वहाँ गिरा दिखायी दिया लकड़ियोंको दूर फेंककर भयसे व्याकुल हुई यशोदाने बालकको

गोदमें उठा लिया। योगमायाकी कृपासे उसके सारे अङ्ग सुरक्षित थे। वह भूखसे व्याकुल हो रो रहा था। यशोदाजीने उसके मुखमें स्तन दे दिया और स्वयं शोकसे व्याकुल हो फूट फूटकर रोती रहीं। गोपोंने वहाँ खेलते हुए बालकोंसे पूछा- 'छकड़ा कैसे टूटा है? इसके टूटनेका कोई कारण तो नहीं दिखायी देता है। सहसा यह अद्भुत काण्ड कैसे घटित हुआ ?' उनकी बात सुन सब बालक बोले 'गोपगण! सुनो अवश्य ही श्रीकृष्णके चरणोंका धक्का लगनेसे यह छकड़ा टूटा है।' बालकोंकी यह बात सुनकर गोप और गोपियाँ हँसने लगीं। उन्हें उनकी बातपर विश्वास नहीं हुआ। वे बोलीं- 'बच्चोंकी बातें सत्य नहीं हैं। तुरंत ही श्रेष्ठ ब्राह्मण आये और उन्होंने शिशुकी रक्षाके लिये स्वस्तिवाचन किया। एक ब्राह्मणने शिशुके शरीरपर हाथ रखकर कवच पढ़ा। विप्रवर! वह समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त कवच मैं तुम्हें बता रहा हूँ। यह वही कवच है, जिसे पूर्वकालमें श्रीविष्णुके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माजीको भगवती योगमायाने दिया था। उस समय जलमें शयन करनेवाले त्रिलोकीनाथ विष्णु जलके भीतर नींद ले रहे थे और ब्रह्माजी मधु कैटभके भयसे डरकर योगनिद्राकी स्तुति कर रहे थे। उसी अवसरपर योगनिद्राने उन्हें कवचका उपदेश दिया था।

योगनिद्रा बोली-

ब्रह्मन्! तुम अपना भय दूर करो जगत्पते! जहाँ श्रीहरि विराजमान हैं। और मैं मौजूद हूँ, वहाँ तुम्हें भय किस बातका है? तुम यहाँ सुखपूर्वक रहो। श्रीहरि तुम्हारे मुखकी रक्षा करें मधुसूदन मस्तककी, श्रीकृष्ण दोनों नेत्रोंकी तथा राधिकापति नासिकाकी रक्षा करें। माधव दोनों कानोंकी, कण्ठकी और कपालकी रक्षा करें। कपोलकी गोविन्द और केशोंकी स्वयं केशव रक्षा करें। हृषीकेश अधरोष्ठकी, गदाग्रज दन्तपंक्तिकी, रासेश्वर रसनाकी और भगवान् वामन तालुकी रक्षा करें। मुकुन्द तुम्हारे वक्षःस्थलकी रक्षा करें। दैत्यसूदन उदरका पालन करें। जनार्दन नाभिकी और विष्णु तुम्हारी ठोढ़ीकी रक्षा करें पुरुषोत्तम तुम्हारे दोनों नितम्बों और गुह्य भागकी रक्षा करें। भगवान् जानकीश्वर तुम्हारे युगल जानुओं (घुटनों) की सर्वदा रक्षा करें। नृसिंह सर्वत्र संकटमें दोनों हाथोंकी और कमलोद्भव वराह तुम्हारे दोनों चरणोंकी रक्षा करें। ऊपर नारायण और नीचे कमलापति तुम्हारी रक्षा करें। पूर्व दिशामें गोपाल तुम्हारा पालन करें। अग्निकोणमें दशमुखहन्ता श्रीराम तुम्हारी रक्षा करें दक्षिण दिशामें वनमाली, नैर्ऋत्यकोणमें वैकुण्ठ तथा पश्चिम दिशामें सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेवाले स्वयं वासुदेव तुम्हारा पालन करें। वायव्यकोणमें अजन्मा विष्टरश्रवा श्रीहरि सदा तुम्हारी रक्षा करें। उत्तर दिशामें कमलासन ब्रह्मा अपने तेजसे सदा तुम्हारी रक्षा करें। ईशानकोणमें ईश्वर रक्षा करें। शत्रुजित् सर्वत्र पालन करें। जल, थल और आकाशमें तथा निद्रावस्था में श्रीरघुनाथजी रक्षा करें। ब्रह्मन्! इस प्रकार परम अद्भुत कवचका वर्णन किया गया। पूर्वकालमें मेरे स्मरण करनेपर भगवान् श्रीकृष्णने कृपापूर्वक मुझे इसका उपदेश दिया था। शुम्भके साथ जब निर्लक्ष्य, घोर एवं दारुण संग्राम चल रहा था, उस समय आकाश में खड़ी हो मैंने इस कवचकी प्राप्तिमात्रसे तत्काल उसे पराजित कर दिया था। इस कवचके प्रभाव से शुम्भ धरतीपर गिरा और मर गया। पहले सैकड़ों वर्षोंतक भयंकर युद्ध करके जब शुम्भ मर गया, तब कृपालु गोविन्द आकाशमें स्थित हो कवच और माल्य देकर गोलोकको चले गये।

मुने! इस प्रकार कल्पान्तरका वृत्तान्त कहा गया है। इस कवचके प्रभावसे कभी मनमें भय नहीं होता है। मैंने प्रत्येक कल्पमें श्रीहरिके साथ रहकर करोड़ों ब्रह्माओंको नष्ट होते देखा है। ऐसा कह कवच देकर देवी योगनिद्रा अन्तर्धान हो गयी और कमलोद्भव ब्रह्मा भगवान् विष्णुके नाभिकमलमें निःशंकभावसे बैठे रहे। जो इस उत्तम कवचको सोनेके यन्त्रमें मढ़ाकर कण्ठ या दाहिनी बाँहमें बाँधता है, उसकी बुद्धि सदा शुद्ध रहती है तथा उसे विष, अग्नि, सर्प और शत्रुओंसे कभी भय नहीं होता। जल, थल और अन्तरिक्षमें तथा निद्रावस्थामें भगवान् सदा उसकी रक्षा करते हैं।

ब्राह्मणने नन्दशिशुके कण्ठमें वह कवच बाँध दिया। इस प्रकार साक्षात् श्रीहरिने अपना ही कवच अपने कण्ठमें धारण किया। मुने! श्रीहरिके इस कवचका सम्पूर्ण प्रभाव बताया गया। भगवान् अनन्त हैं। वे अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते। उनके प्रभावकी कहीं तुलना नहीं है। (अध्याय १२)