श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - श्री कृष्ण जनन खंड

83- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, संन्यासी तथा विधवा और पतिव्रता नारियों के धर्मका वर्णन

नन्दजीने पूछा-

बेटा! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम वेदों तथा ब्रह्मा आदिकी उत्पत्तिका सारा कारण वर्णन करो; क्योंकि तुम्हारे सिवा मैं और किससे पूछूं? साथ ही ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रोंका कार्य करनेवालोंके जो धर्म हैं तथा संन्यासियों, यतियों, ब्रह्मचारियों, वैष्णव ब्राह्मणों, सत्पुरुषों, विधवाओं एवं पतिव्रता नारियों, गृहस्थों, गृहस्थपत्नियों, विशेषतया शिष्यों और माता पिताके प्रति पुत्रों एवं कन्याओंके जो धर्म हैं; उन सबको बतलानेकी कृपा करो। प्रभो ! स्त्रियोंकी कितनी जातियाँ होती हैं? भक्तोंके कितने भेद हैं? ब्रह्माण्ड कितने प्रकारका है ? वदन (बोली या मुख) किस प्रकारका होता है ? नित्य क्या है और कृत्रिम क्या है ? क्रमशः यह सब बतलाओ ।

श्रीभगवान्‌ने कहा –

नन्दजी ! ब्राह्मण सदा संध्यावन्दनसे पवित्र होकर मेरी सेवा करता है और नित्य मेरे प्रसादको खाता है। वह मुझे निवेदन किये बिना कभी भी नहीं खाता; क्योंकि जो विष्णुको अर्पित नहीं किया गया है, वह अन्न विष्ठा और जल मूत्रके समान माना जाता है। अतः विष्णु प्रसादको खानेवाला ब्राह्मण जीवन्मुक्त हो जाता है। नित्य तपस्यामें संलग्न रहनेवाला, पवित्र, शमपरायण, शास्त्रज्ञ, व्रतों और तीर्थोंका सेवी, नाना प्रकारके अध्यापन कार्यसे संयुक्त धर्मात्मा ब्राह्मण विष्णु मन्त्रसे दीक्षित होकर गुरुकी सेवा करता है; तत्पश्चात् उनकी आज्ञा लेकर संग्रहवान् (गृहस्थ) बनता है। उसे गुरुको नित्य पूजनकी दक्षिणा देनी चाहिये तथा निःसंदेह नित्य गुरुजनोंका पालन-पोषण करना चाहिये; क्योंकि समस्त वन्दनीयोंमें पिता ही महान् गुरु माना जाता है, परंतु पितासे सौगुनी माता, मातासे सौगुना अभीष्टदेव और अभीष्टदेवसे चारगुना मन्त्रतन्त्र प्रदान करनेवाला गुरु श्रेष्ठ है। गुरु प्रत्यक्षरूपमें ऐश्वर्यशाली भगवान् नारायण हैं। गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु और गुरु ही स्वयं शिव हैं। सभी देवता गुरुमें सदा हर्षपूर्वक निवास करते हैं। जिसके संतुष्ट होनेपर सभी देवता संतुष्ट हो जाते हैं, वे श्रीहरि भी गुरुके प्रसन्न होनेपर प्रसन्न हो जाते हैं। गुरु यदि शिष्योंपर पुत्रके समान स्नेह नहीं करते तो उन्हें ब्रह्महत्याका पाप लगता है और आशीर्वाद न देनेसे उन्हें भी वह फल भोगना पड़ता है। जो विप्र सदा अपने धर्ममें तत्पर, ब्रह्मज्ञ तथा सदा विष्णुकी सेवा करनेवाला है; वही पवित्र है। उसके अतिरिक्त अन्य विप्र सदा अपवित्र रहता है। जो ब्राह्मण होकर बैलोंको जोतता है, शूद्रोंकी रसोई बनाता है, देवमूर्तियोंपर चढ़े हुए द्रव्यसे जीवन निर्वाह करता है, संध्या नहीं करता, उत्साहहीन है, दिनमें नींद लेता है, शूद्रके श्राद्धान्नको खाता है, शूद्रोंके मुर्दोंका दाह करता है; ऐसे सभी ब्राह्मण शूद्रके समान माने जाते हैं। जो विधिपूर्वक शालग्राम महायन्त्रकी पूजा करके उनके अर्पित किये हुए नैवेद्यको खाता है तथा उनके चरणोदकको पीता है; वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। उसे विष्णुलोककी प्राप्ति होती है; क्योंकि श्रीहरिका चरणोदक पीकर मनुष्य तीर्थस्नायी हो जाता है। जो शालग्राम शिलाके जलसे अपनेको अभिषिक्त करता है; उसने सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया और समस्त यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली। व्रजेश्वर! शालग्राम शिलाका जल गङ्गाजलसे दसगुना बढ़कर है। जो ब्राह्मण उसे नित्य पान करता है; वह जीवन्मुक्त एवं देवताओंके समान हो जाता है। जो ब्राह्मणोंका नित्यकर्म, विष्णुके निवेदित नैवेद्यका भोजन, उनकी यत्नपूर्वक पूजा, उनके चरणोदकका सेवन, नित्य त्रिकाल संध्या और भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करता है, मेरे जन्मके दिन तथा एकादशीको भोजन नहीं करता; हे तात! जो व्रतपरायण होकर शिवरात्रि तथा श्रीरामनवमीके दिन आहार नहीं करता; वह ब्राह्मण जीवन्मुक्त है। भूतलपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी उस विप्रके चरणोंमें नतमस्तक होते हैं; अतः उस ब्राह्मणका चरणोदक पीकर मनुष्य तीर्थस्नायी हो जाता है। जबतक उस ब्राह्मणके चरणोदकसे पृथ्वी भीगी रहती है, तबतक उसके पितर कमलपत्रके पात्र में जल पीते हैं। विष्णु प्रसादको खानेवाला ब्राह्मण पृथ्वीको, तीर्थोंको और मनुष्योंको पवित्र कर देता है तथा स्वयं जीवन्मुक्त हो जाता है। जो ब्राह्मण विष्णुमन्त्रका उपासक है; वही वैष्णव है । उस वैष्णव ब्राह्मणकी बुद्धि उत्कृष्ट होती है; अतः उससे बढ़कर पुरुष दूसरा नहीं है। जो किसी क्षेत्रमें जाकर पुरश्चरणपूर्वक नारायणका जप करता है; वह अनायास ही अपने-आपका तथा अपनी एक हजार पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। जिसके संकल्प तो बाहर होते हैं, परंतु क्रियाएँ विष्णुपदमें होती हैं; वह एकनिष्ठ वैष्णव अपने एक लाख पूर्वपुरुषोंका उद्धार कर देता है।

(भगवान् कहते हैं-)

ब्राह्मण और देवता मेरे प्राण हैं, परंतु भक्त प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है। समस्त लोकोंमें जितने प्रिय पात्र हैं, उनमें भक्तसे अधिक प्यारा मेरे लिये दूसरा कोई नहीं है। इसलिये विष्णु भक्तिसे रहित होकर विष्णु मन्त्रकी दीक्षा नहीं ग्रहण करनी चाहिये उत्तम बुद्धिसम्पन्न पुरुषको चाहिये कि वह उदासीन एवं दुराचारी गुरुसे मन्त्रकी दीक्षा न ग्रहण करे। यदि दैववश ग्रहण कर लेता है तो वह निश्चय ही धनहीन हो जाता है। ब्राह्मणोंका भोजन सदा मांसरहित हविष्यान्न है; क्योंकि मांसका परित्याग कर देनेसे ब्राह्मण तेजमें सूर्यके तुल्य हो जाता है। पूजक ब्राह्मण पहले स्थानको भलीभाँति संस्कृत करके तब भोजन तैयार करता है, फिर लिपे पुते स्वच्छ स्थानपर भक्तिपूर्वक मुझे निवेदित करके तत्पश्चात् आदरपूर्वक ब्राह्मणको देकर तब स्वयं भोजन करता है। जो ब्राह्मणको अर्पण न करके स्वयं खा जाता है; वह शराबीके समान माना जाता है। चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहण समय अथवा जननाशौच या मरणाशौचमें अपवित्र मनुष्यसे स्पर्श हो जानेपर भोजन-पात्र, भ्रष्ट-द्रव्य तथा अन्नका तुरंत परित्याग कर देना चाहिये। फिर धुली हुई धोती और गमछा धारण करके पैर धोकर शुद्ध स्थानपर भोजन करना चाहिये। द्विजातियोंको चाहिये कि सूर्यके रहते अर्थात् दिनमें दो बार भोजन न करें; क्योंकि वैसा करनेसे वह कर्म निष्फल हो जाता है और भोक्ता नरकगामी होता है। हविष्यान्नका भोजन करनेवाले संयमीको उचित है कि वह श्राद्धके दिन यात्रा, युद्ध, नदी-तट, दुबारा भोजन और मैथुनका परित्याग कर दे। जो विष्णुभक्त एवं बुद्धिमान् हो, उसी ब्राह्मणको पात्रका दान देना चाहिये; किंतु जो शूद्राका पति शूद्रका पुरोहित, संध्याहीन, दुष्ट, बैलोंको जोतनेवाला, शुक्र बेचनेवाला और देव प्रतिमापर चढ़े हुए द्रव्यसे जीविका चलानेवाला हो; उसे यत्न करके कभी भी नहीं देना चाहिये। इन लोगोंको पात्र प्रदान करनेसे ब्राह्मण नरकगामी होता है। उस दिन पात्रका उपभोग करके मैथुन करनेसे नरककी प्राप्ति होती है। तात! कन्या बेचनेवाला सबसे बढ़कर पापी होता है। जो मूल्य लेकर कन्यादान करता है, वह महारौरव नामक नरकमें जाता है, फिर कन्याके शरीर में जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक पितरोंसहित वह, उसका पुत्र और पुरोहित भी कुम्भीपाक नरकमें कष्ट भोगते हैं। इसलिये बुद्धिमान्को चाहिये कि योग्य वरको ही कन्या प्रदान करें। व्रजेश्वर ! जो पुराणों तथा चारों वेदोंद्वारा वर्णित है, वह ब्राह्मणों तथा वैष्णवोंका धर्म मैंने कह दिया। (अब क्षत्रियोंके धर्म बतलाता हूँ-) क्षत्रियोंको सदा यत्नपूर्वक ब्राह्मणोंका पूजन, नारायणकी अर्चा, राज्योंका पालन, युद्धमें निर्भीकता, ब्राह्मणोंको नित्य दान, शरणागतकी रक्षा, प्रजाओं और दुःखियोंका पुत्रवत् पालन, शस्त्रास्त्रकी निपुणता, रणमें पराक्रम, तपस्या और धर्मकार्य करना चाहिये। जो सदसद्विवेकवाली बुद्धिसे युक्त तथा नीति शास्त्रका ज्ञाता हो, उसका सदा पालन करना चाहिये और सत्पुरुषोंसे भरी हुई सभामें उसे नित्य नियुक्त करना चाहिये। प्रतापी एवं यशस्वी क्षत्रिय हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसे युक्त चतुरङ्गिणी सेनाका नित्य यत्नपूर्वक पालन करता है। युद्धके लिये बुलाये जानेपर वह युद्ध-दानसे विमुख नहीं होता; क्योंकि जो क्षत्रिय युद्धमें प्राण विसर्जन करता है, उसे यशस्कर स्वर्गकी प्राप्ति होती है। वैश्योंका धर्म व्यापार, खेती करना, ब्राह्मणों और देवताओंका पूजन, दान, तपस्या और व्रतका पालन है। नित्य ब्राह्मणोंकी पूजा करना शूद्रका धर्म कहा गया है। ब्राह्मणको कष्ट देनेवाला तथा उसके धनपर अधिकार कर लेनेवाला शूद्र चाण्डालताको प्राप्त हो जाता है। विप्रके धनका अपहरण करनेवाला शूद्र असंख्य जन्मोंतक गीध सौ जन्मोंतक सूअर और फिर सौ जन्मोंतक हिंसक पशुओंकी योनिमें जन्म लेता है। जो शूद्र ब्राह्मणी तथा अपनी माताके साथ व्यभिचार करता है; वह पापी जबतक सौ ब्रह्मा नहीं बीत जाते, तबतक कुम्भीपाकमें कष्ट भोगता है। वहाँ वह खौलते हुए तैलमें डुबाया जाता है, रात-दिन उसे साँप काटते रहते हैं; इस प्रकार यम यातनासे दुःखी होकर वह चीत्कार करता रहता है। तत्पश्चात् वह पापी सात जन्मोंतक चाण्डाल- योनिमें, सात जन्मोंतक सर्प-योनिमें और सात जन्मोंतक जल-जन्तुओंकी योनिमें उत्पन्न होता है। फिर वह असंख्य जन्मोंतक विष्ठाका कीड़ा तथा सात जन्मोंतक कुलटा स्त्रियोंकी योनिका कीट होता है। पुनः वह पापी सात जन्मोंतक गौओंके घावका कीड़ा होता है। इस प्रकार उसे अनेक योनिमें भ्रमण करते ही बीतता है; परंतु मनुष्यकी योनि नहीं मिलती। अब संन्यासियोंका जो धर्म है, वह मेरे मुखसे श्रवण करो। मनुष्य दण्ड ग्रहणमात्रसे नारायणस्वरूप हो जाता है। जो संन्यासी मेरा ध्यान करता है; वह अपने पूर्वकमको जलाकर वर्तमान जन्मके कर्मोंका उच्छेद कर डालता है और अन्तमें उसे मेरे लोककी प्राप्ति होती है। व्रजराज ! जैसे वैष्णवके चरणस्पर्शसे तीर्थ तत्काल पवित्र हो जाते हैं; वैसे ही संन्यासीके पादस्पर्शसे पृथ्वी तुरंत पावन हो जाती है। मनुष्य संन्यासीका स्पर्श करनेसे पापरहित हो जाता है। संन्यासीको भोजन कराकर अश्वमेधयज्ञका फल तथा अकस्मात् संन्यासीको देखकर उसे नमस्कार करके राजसूय यज्ञका फल पाता है। संन्यासी, यति और ब्रह्मचारी- इन सबके दर्शन-स्पर्शका फल एक सा होता है। संन्यासीको चाहिये कि वह भूखसे व्याकुल होनेपर सायंकाल गृहस्थोंके घर जाय और वहाँ गृहस्थ उसे सदन अथवा कदन जो कुछ भी दे; उसका परित्याग न करे न तो मिष्टानकी याचना करे, न क्रोध करे और न धन ग्रहण करे। एक वस्त्र धारण करे, इच्छारहित हो जाय, जाड़ा-गरमीमें एक-सा रहे और लोभ-मोहका परित्याग कर दे। इस प्रकार वहाँ एक रात ठहरकर प्रातःकाल दूसरे स्थानको चला जाय। जो संन्यासी सवारीपर चढ़ता है, गृहस्थका धन ग्रहण करता है और घर बनाकर स्वयं गृहस्थ हो जाता है; वह अपने रमणीय धर्मसे पतित हो जाता है। जो संन्यासी खेती और व्यापार करके कुकर्म करता है, उसका आचरण भ्रष्ट हो जाता है और वह अपने धर्मसे गिर जाता है। यदि वह स्वधर्मी अपना शुभ अथवा अशुभ कर्म करता है तो धर्म-बहिष्कृत अथवा उपहासका पात्र होता है।

जो ब्राह्मणी विधवा हो जाय उसे सदा कामनारहित, दिनके अन्तमें एक बार भोजन करनेवाली और सदा हविष्यान्नपरायण होना चाहिये। उसे दिव्य माङ्गलिक वस्त्र नहीं धारण करना चाहिये; बल्कि सुगन्धित द्रव्य, सुवासित तेल, माला, चन्दन और चूड़ी-सिन्दूर आभूषणका त्याग करके मलिन वस्त्र पहनना चाहिये। नित्य नारायणका स्मरण तथा नित्य नारायणकी सेवा करनी चाहिये। वह अनन्यभक्तिपूर्वक नारायणके नामोंका कीर्तन करती है और सदा धर्मानुसार पर पुरुषको पुत्रके समान देखती है। व्रजेश्वर! वह न तो मिष्टान्नका भोजन करती है और न भोग-विलासकी वस्तुओंका संग्रह करती है। उसे पवित्र रहकर एकादशी, कृष्ण जन्माष्टमी, श्रीरामनवमी, शिवरात्रि, भाद्रपदमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी, नरक चतुर्दशी तथा चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणके समय भोजन नहीं करना चाहिये। वह भ्रष्ट पदार्थोंका परित्याग करके उसके अतिरिक्त उत्तम पदार्थोंको खाती है। श्रुतियोंमें सुना गया है कि विधवा स्त्री, यति, ब्रह्मचारी और संन्यासियोंके लिये पान मदिराके समान है। इन सभी लोगोंको रक्तवर्णका शाक, मसूर, जंभीरी नीबू, पान और गोल लौकीका परित्याग कर देना चाहिये। विधवा नारी पलङ्गपर सोनेसे पतिको (स्वर्गसे) नीचे गिरा देती है और सवारीपर चढ़कर वह स्वयं नरकगामिनी होती है। उसे बाल और शरीरका शृङ्गार नहीं करना चाहिये। जटारूपमें परिवर्तित हुई केश-वेणीको तीर्थमें गये बिना कटाना नहीं चाहिये और न शरीरमें तेल लगाना चाहिये। वह दर्पण पर पुरुषका मुख, यात्रा, नृत्य, महोत्सव, नाच-गान और सुन्दर वेषधारी रूपवान् पुरुषको नहीं देखती। उसे सामवेदमें निरूपण किये गये सत्पुरुषोंका धर्म श्रवण करना चाहिये। अब मैं आपसे परमोत्कृष्ट परमार्थका वर्णन करता हूँ, सुनो सदा अध्यापन, अध्ययन, शिष्योंका परिपालन, गुरुजनोंकी सेवा, नित्य देवता और ब्राह्मणका पूजन, सिद्धान्तशास्त्रमें निपुणताका उत्पादन, अपने आपमें संतोष, सर्वथा शुद्ध व्याख्यान निरन्तर ग्रन्थका अभ्यास, व्यवस्थाके सुधारके लिये वेदसम्मत विचार, स्वयं शास्त्रानुसार आचरण, देवकार्य और नित्यकर्मों में निपुणता, वेदानुसार अभीष्ट आचार-व्यवहार, वेदोक्त पदार्थोंका भोजन और पवित्र आचरण करना चाहिये।

व्रजेश्वर! अब पतिव्रताओंका जो धर्म है, उसे श्रवण करो पतिव्रताको चाहिये कि नित्य पतिके प्रति उत्सुकता रखकर उनका चरणोदक पान करे; सदा भक्तिभावपूर्वक उनकी आज्ञा लेकर भोजन करे प्रयत्नपूर्वक व्रत, तपस्या और देवार्चनका परित्याग करके चरण-सेवा, स्तुति और सब प्रकारसे पतिकी संतुष्टि करे। सतीको पतिकी आज्ञाके बिना वैरभावसे कोई कर्म नहीं करना चाहिये। सती अपने पतिको सदा नारायणसे बढ़कर समझती है। ब्रजनाथ! उत्तम व्रतपरायणा सती पर पुरुषके मुख, सुन्दर वेषधारी सौन्दर्यशाली पुरुष, यात्रा, महोत्सव, नाच, नाचनेवाले, गवैया और पर पुरुषकी क्रीड़ाकी ओर कभी दृष्टि नहीं डालती। जो आहार पतियोंको प्रिय होता है, वही सदा पतिव्रताओंको भी मान्य होता है। पतिव्रता क्षणभर भी पतिसे वियुक्त नहीं होती। वह पतिसे उत्तर प्रत्युत्तर नहीं करती। ताड़ना मिलनेपर भी उसका स्वभाव शुद्ध ही बना रहता है; वह क्रोधके वशीभूत नहीं होती। पतिव्रताको चाहिये कि पतिके भूखे होनेपर उसे भोजन कराये; भोजनके लिये उत्तम उत्तम पदार्थ और पीनेके लिये शुद्ध जल दे; नींदसे माते हुए पतिको न जगावे और उसे काम करनेके लिये आज्ञा न दे। सतीको पतिके साथ पुत्रोंसे भी सौगुना अधिक प्रेम करना चाहिये; क्योंकि कुलाङ्गनाके लिये पति ही बन्धु, आश्रय भरण-पोषण करनेवाला और देवता है। वह सुन्दरी अमृतके समान शुभकारक अपने पतिको देखकर बड़े यत्नसे भक्तिभावपूर्वक मुस्कराते हुए उसकी ओर निहारती है। सती नारी अपनी एक हजार पीढ़ियोंका उद्धार कर देती है। पतिव्रताओंके पति समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं; क्योंकि सतियोंके पातिव्रत्यके तेजसे उनका कर्मभोग समाप्त हो जाता है। इस प्रकार वे कर्मरहित होकर अपनी पतिव्रता पत्नीके साथ श्रीहरिके भवनमें आनन्द प्राप्त करते हैं।

व्रजेश ! पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी सतीके चरणों में निवास करते हैं। सम्पूर्ण देवताओं और मुनियोंका तेज सतियोंमें वर्तमान रहता है। तपस्वियोंकी सारी तपस्या तथा व्रतोपवाससे व्रतियोंको एवं दान देनेसे दाताओंको जो फल प्राप्त होता है; वह सारा-का-सारा सदा पतिव्रताओंमें विद्यमान रहता है। स्वयं नारायण, शम्भु, लोकोंके विधाता ब्रह्मा, सारे देवता और मुनि भी सदा पतिव्रताओंसे डरते रहते हैं। सतियोंकी चरण धूलिके स्पर्शसे पृथ्वी तत्काल ही पावन हो जाती है। पतिव्रताको नमस्कार करके मनुष्य पापसे छूट जाता है। पतिव्रता अपने तेजसे क्षणभरमें ही त्रिलोकीको भस्मसात् कर डालनेमें समर्थ है; क्योंकि वह सदा महान् पुण्यसे सम्पन्न रहती है। सतियोंके पति और पुत्र साधु एवं निःशङ्क हो जाते हैं; क्योंकि उन्हें देवताओं तथा यमराजसे भी कुछ भय नहीं रह जाता। सौ जन्मोंतक पुण्य संग्रह करनेवाले पुण्यवानोंके घरमें पतिव्रता जन्म लेती है। पतिव्रताके पैदा होनेसे उसकी माता पावन हो जाती है तथा पिता जीवन्मुक्त हो जाते हैं। सती स्त्री प्रातः काल उठकर रात्रिमें पहने हुए वस्त्रको छोड़कर पतिको नमस्कार करके हर्षपूर्वक स्तवन करती है। तत्पश्चात् गृहकार्य सम्पन्न करके नहाकर धुली हुई साड़ी और कंचुकी धारण करती है। फिर श्वेत पुष्प लेकर भक्तिपूर्वक पतिका पूजन करती है। पवित्र निर्मल जलसे स्नान कराकर उसे धौत-वस्त्र देकर वह हर्षपूर्वक पतिका पादप्रक्षालन करती है। फिर आसनपर बिठाकर, ललाटमें चन्दनका तिलक लगाकर, सर्वाङ्गमें (इत्र आदिका) अनुलेप करके गलेमें माला पहनाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक अमृतोपम भोग-पदार्थोंद्वारा भक्तिभावसहित भलीभाँति पूजन और स्तवन करके हर्षके साथ पतिके चरणोंमें नमस्कार करती है। 'ॐ नमः कान्ताय शान्ताय सर्वदेवाश्रयाय स्वाहा' इसी मन्त्र से पुष्प, चन्दन, पाद्य, अर्घ्य, धूप, दीप, वस्त्र, उत्तम नैवेद्य, शुद्ध सुगन्धित जल और सुवासित ताम्बूल समर्पित करके स्तोत्र पाठ करना चाहिये। जो जो कर्म किया जाय, सभीमें इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये।

ॐ चन्द्रशेखरस्वरूप प्रियतम पतिको नमस्कार है। आप शान्त, उदार और सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय हैं; आपको प्रणाम है। सतीके प्राणाधार एवं ब्रह्मस्वरूप आपको अभिवादन है। आप नमस्कारके योग्य, पूजनीय, हृदयके आधार, पञ्च प्राणोंके अधिदेवता, आँखकी पुतली, ज्ञानाधार और पत्नियोंके लिये परमानन्दस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। पति ही ब्रह्मा, पति ही विष्णु, पति ही महेश्वर और पति ही निर्गुणाधार ब्रह्मरूप हैं; आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो। भगवन्! मुझसे जानमें अथवा अनजानमें जो कुछ दोष घटित हुआ है; उसे क्षमा कर दीजिये। पत्नीबन्धो! आप तो दयाके सागर हैं; अतः मुझ दासीका अपराध क्षमा कर दें। व्रजेश्वर! पूर्वकालमें सृष्टिके प्रारम्भमें लक्ष्मी, सरस्वती, पृथ्वी और गङ्गाने इस महान् पुण्यमय स्तोत्रका पाठ किया था पूर्वकालमें सावित्रीने भी नित्यशः इस स्तोत्रद्वारा ब्रह्माका स्तवन किया था। कैलासपर पार्वतीने भक्तिपूर्वक शंकरके लिये इस स्तोत्रका पाठ किया था। प्राचीनकालमें मुनिपत्नियों तथा देवाङ्गनाओंने भी इसके द्वारा स्तुति की थी। अतः सभी पतिव्रताओंके लिये यह स्तोत्र शुभदायक है। जो पतिव्रता अथवा अन्य पुरुष या नारी इस महान् पुण्यदायक स्तोत्रको सुनती है; उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। पुत्रहीनको पुत्र प्राप्त हो जाता है, निर्धनको धन मिल जाता है, रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है और बँधा हुआ बन्धनसे छूट जाता है। व्रजेश्वर पतिव्रता इसके द्वारा स्तवन करके तीर्थस्नानका फल तथा सम्पूर्ण तपस्याओं और व्रतोंका फल पाती है। इस प्रकार स्तुति नमस्कार करके पतिकी आज्ञासे वह भोजन करती है। ब्रजराज! इस प्रकार मैंने पतिव्रताके धर्मका वर्णन कर दिया, अब गृहस्थोंका धर्म सुनिये। (अध्याय ८३)