भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-
प्रिये ! इस प्रकार स्तुति करके गिरिराज हिमवान् नगरसे दूर निवास करनेवाले भगवान् शंकरसे कुछ ही दूरीपर उनकी आज्ञा ले स्वयं भी ठहर गये। उन्होंने भक्तिपूर्वक भगवान्को मधुपर्क आदि दिया और मुनियों तथा शिवके पार्षदोंका पूजन किया। उस समय मेना स्त्रियोंके साथ वहाँ आयी। उसने वटके नीचे आसन लगाये चन्द्रशेखर शिवको देखा। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे व्याघ्रचर्म धारण किये मुनि-मण्डलीके मध्य भागमें ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे, मानो आकाश में तारिकाओंके बीच द्विजराज चन्द्रमा शोभा पा रहे हों। करोड़ों कन्दर्पोके समान उनका मनोहर रूप अत्यन्त आह्लाद प्रदान करनेवाला था। वे वृद्धावस्था छोड़कर नूतन यौवन धारण करते थे और अत्यन्त सुन्दर रमणीय रूप हो युवतियोंके चित्त चुरा रहे थे। वे कामातुरा कामिनियोंको कामदेव समान जान पड़ते थे। सतियोंको औरस पुत्रके समान प्रतीत होते थे। वैष्णवोंको महाविष्णु तथा शैवोंको सदाशिवके रूपमें दृष्टिगोचर होते थे। शक्तिके उपासकोंको शक्तिस्वरूप, सूर्यभक्तोंको सूर्यरूप, दुष्टोंको कालरूप तथा श्रेष्ठ पुरुषोंको परिपालकके रूपमें दिखायी देते थे। कालको कालके समान, मृत्युको मृत्यु एवं अत्यन्त भयानक जान पड़ते थे। स्त्रियोंके लिये उनका व्याघ्रचर्म मनोहर वस्त्र बन गया। भस्म चन्दन हो गया। सर्प सुन्दर मालाओंके रूपमें परिणत हो गये। कण्ठमें कालकूटकी प्रभा कस्तूरीके समान प्रतीत हुई। जटा सुन्दर सँवारी हुई चूड़ा जान पड़ी। चन्द्रमा भाल-देशमें चन्दन जान पड़े मस्तकपर गङ्गाकी मनोहारिणी धारा परम सुन्दर मालती मालाके रूपमें परिणत हो गयी। अस्थियोंकी माला रत्नमाला बन गयी। धतूर मनोहर चम्पाके रूपमें बदल गया। पाँच मुखके स्थानमें उन्हें एक ही मुख दिखायी देने लगा, जो दो नेत्र-कमलोंसे सुशोभित था। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी आभाको प्रतिहत करके अत्यन्त देदीप्यमान हो रहा था। बन्धुजीव (दुपहरिया) की लालीको तिरस्कृत करनेवाले उनके ओष्ठ और अधरसे मुखकी मनोहरता बढ़ गयी थी। श्वेत चन्द्रमा ही मानो वृषभराज नन्दी बन गये थे और भूत आदि नर्तकोंका काम करते थे। महेश्वरके स्वरूपमें तत्काल सब कुछ बदल गया। शिवका ऐसा रूप देख मेना बहुत संतुष्ट हुई कितनी रमणियाँ भगवान् शंकरके रूप-सौन्दर्यको देखकर अत्यन्त मुग्ध हो गयीं और नाना प्रकारकी अभिलाषाएँ करने लगीं अहो! पार्वती बड़ी पुण्यवती है। भारतवर्षमें इसीका जन्म स्पृहणीय है; क्योंकि ये शिव इसके स्वामी होनेवाले हैं। इस प्रकारकी बातें कितनी ही स्त्रियाँ कर रही थीं शिवका दर्शन करके मेना सानन्द अपने घरको लौट गयीं। शिवका पूजन करके उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर शैलराज भी अपने घरको गये। गिरिराजने मेनाके साथ एकान्तमें सलाह करके पार्वतीको उसकी मङ्गल कामनासे शिवके समीप भेजा। पार्वतीका हृदय भगवान् शंकरमें अनुरक्त था। सखियोंके साथ मनोहर वेष धारण करके हर्षपूर्वक वे शिवके निकट गर्यो। वहाँ प्रसन्नमुख और नेत्रवाले शान्तस्वरूप शिवका दर्शन करके शिवाने सात बार परिक्रमा की और मुस्कराकर उन्हें प्रणाम किया। उस समय भगवान् शिवने आशीर्वाद देते हुए कहा- 'सुन्दरि! तुम्हें अनन्य प्रेमी, गुणवान्, अमर, ज्ञानिशिरोमणि और सुन्दर पति प्राप्त हो शुभे! तुम्हारा पतिविषयक सौभाग्य सतत बना रहे। साध्वि! तुम्हारा पुत्र नारायणके समान गुणवान् होगा। जगदम्बिके तीनों लोकों में तुम्हारी उत्कृष्ट पूजा होगी। तुम समस्त ब्रह्माण्डोंमें सबसे श्रेष्ठ होओ। सुन्दरि! तुमने सात बार परिक्रमा करके भक्तिभावसे मुझे नमस्कार किया है। अतः मैं सात जन्मोंके लिये संतुष्ट हो गया तुम उसका फल पाओ तीर्थ, प्रियतम पति, इष्टदेवता, गुरुमन्त्र तथा औषधमें जिनकी जैसी आस्था होती है, उन्हें वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है।' ऐसा कहकर योगीश्वर शंकरने व्याघ्रचर्मपर योगासन लगाया और मुझ परब्रह्मरूप ज्योतिका तत्काल ध्यान आरम्भ कर दिया। तब देवी पार्वतीने उनके दोनों चरण पखारकर चरणामृत-पान किया और अग्निशुद्ध वस्त्रसे भक्तिपूर्वक उन चरणोंका मार्जन किया विश्वकर्माद्वारा निर्मित रमणीय रत्नसिंहासन उनकी सेवामें अर्पित किया। फिर कांस्यपात्र में रखे हुए अपूर्व नैवेद्यका भोग लगाया। तत्पश्चात् उनके चरणोंमें गङ्गाजलसे युक्त अर्घ्य दिया। इसके बाद मनोहर सुगन्धयुक्त चन्दन तथा कस्तूरी और कुंकुम भी सेवामें प्रस्तुत किये। तदनन्तर हालाहल विषके चिह्नसे सुन्दर प्रतीत होनेवाले कण्ठमें मालतीकी माला पहनायी। भक्ति भावसे पूजा की। शिवकी प्रसन्नता के लिये उनपर पुष्पोंकी वृष्टि की सुवर्णपात्रमें अमृत और मधुर मधु दिया। सैकड़ों रत्नमय दीप जलाये। सब ओर उत्तम धूपकी सुगन्ध फैलायी। त्रिभुवन दुर्लभ वस्त्र, सोनेके तारोंका यज्ञोपवीत तथा पीनेके लिये सुगन्धित एवं शीतल जल पार्वतीने अपने प्रियतमकी सेवामें प्रस्तुत किये। फिर रत्नसारेन्द्रनिर्मित अतिशय सुन्दर रमणीय भूषण, सुवर्णमढ़ी सींगवाली दुर्लभ कामधेनु, स्नानोपयोगी द्रव्य, तीर्थजल तथा मनोहर ताम्बूल भी क्रमशः अर्पित किये। इस प्रकार षोडशोपचार चढ़ाकर पार्वतीने बारंबार प्रणाम किया। यह उनका नित्यका नियम बन गया। वे प्रतिदिन भक्तिभावसे शिवकी पूजा करके पिताके घर लौट जाया करती थीं। अप्सराओंके मुखसे इन्द्रने यह सुना कि भगवान् महेश्वर पार्वतीदेवीके प्रति अनुरक्त हैं । यह समाचार सुनकर इन्द्र हर्षसे नाचने लगे। उन्होंने बड़ी उतावलीके साथ दूत भेजकर कामदेवको बुलवाया। इन्द्रकी आज्ञासे कामदेव अमरावतीपुरीमें गये। तब इन्द्रने उन्हें शीघ्र ही उस स्थानपर भेजा, जहाँ शिवा और शिव विद्यमान थे। पञ्चबाण कामने अपने पाँचों बाणोंको साथ ले उस स्थानको प्रस्थान किया, जहाँ शक्तिसहित शिव विराजमान थे। वहाँ पहुँचकर मदनने देखा, भगवान् शिव शिवाके साथ विद्यमान हैं। उनके मुख और नेत्र प्रसन्न दिखायी देते हैं। वे त्रिभुवनकान्त एवं शान्त हैं। उन्हें देखकर कामदेव बाणसहित धनुष हाथमें लिये आकाशमें खड़ा हो गया। उसने बड़े हर्षके साथ अपने अमोघ एवं अनिवार्य अस्त्रका शंकरपर प्रयोग किया; परंतु वह अमोघ अस्त्र भी परमात्मा शंकरपर व्यर्थ हो गया। जैसे आकाश निर्लेप होता है, उसी तरह निर्लिप्त परमात्मा शिवपर जब वह शस्त्र विफल हो गया, तब कामदेवको बड़ा भय हुआ। वह सामने खड़ा हो भगवान् मृत्युञ्जयकी ओर देखता हुआ काँपने लगा। भयसे विह्वल हुए कामने इन्द्र आदि देवताओंका स्मरण किया। तब सब देवता वहाँ आये और शंकरके कोपसे डरकर काँपने लगे। उन्होंने स्तोत्र पढ़कर देवाधिदेव शंकरका स्तवन किया। इतनेमें ही शिवके ललाटवर्ती नेत्रसे कोपाग्नि प्रकट हुई। देवतालोग स्तुति कर ही रहे थे कि शम्भुसे उत्पन्न हुई वह आग ऊँची-ऊँची लपटें उठाती हुई प्रज्वलित हो उठी। वह प्रलयकालिक अग्निकी ज्वालाके समान जान पड़ती थी। आकाशमें ऊपर उठकर चक्कर काटती हुई वह आग पृथ्वीपर उतर आयी और चारों ओर चक्कर देकर कामदेवपर टूट पड़ी। भगवान् शंकरके कोपसे कामदेव एक ही क्षणमें भस्म हो गये। यह देख सब देवता विषादमें डूब गये और पार्वतीने भी सिर नीचा कर लिया। तदनन्तर रति भगवान् शिवके सामने बहुत विलाप करने लगी। भयसे काँपते हुए समस्त देवताओंने शिवका स्तवन किया। इसके बाद वे बार-बार रोते हुए रतिसे बोले– 'माँ! पतिके शरीरका थोड़ा-सा भस्म लेकर उसकी रक्षा करो और भय छोड़ो। हमलोग उन्हें जीवित करायेंगे। तुम पुनः अपने प्रियतमको प्राप्त करोगी; परंतु जब भगवान् शंकरका क्रोध दूर हो जायगा और उनकी प्रसन्नताका समय होगा, तभी यह कार्य सम्भव हो सकेगा। रतिका विलाप देखकर पार्वती मूच्छित हो गयीं और उन अतीन्द्रिय गुणातीत चन्द्रशेखरकी स्तुति करने लगीं। तब भगवान् शिव रोती हुई पार्वतीको वहीं छोड़कर अपने स्थानको चले गये। फिर तो उसी क्षण पार्वतीका सारा अभिमान चूर हो गया। गिरिराजनन्दिनीने अपने रूप और यौवनका गर्व त्याग दिया। अब उन्हें सखियोंको अपना मुँह दिखानेमें भी लज्जाका अनुभव होने लगा। सब देवता रतिको आश्वासन दे रुद्रदेवको दण्डवत् प्रणाम करनेके पश्चात् अपने स्थानको चले गये। उस समय उनका मन शोकसे उद्विग्न हो रहा था। राधिके! कामपत्नी रति रोषसे लाल आँखोंवाले रुद्रदेवका भयसे स्तवन करके शोकसे रोती हुई अपने घरको चली गयी। परंतु पार्वती लज्जावश पिताके घर नहीं गयी। वह सखियोंके मना करनेपर भी तपस्याके लिये वनमें चली गयी। तब शोकसे विह्वल हुई सखियोंने भी उन्हींका अनुगमन किया। माताओंके रोकनेपर भी वे सब की सब गङ्गातटवर्ती वनकी ओर चली गयीं। आगे चलकर पार्वतीने दीर्घकालतक तपस्या करके भगवान् त्रिलोचनको पतिरूपमें प्राप्त किया। रतिने भी शंकरके वरसे यथासमय कामदेवको प्राप्त किया। राधे! इस प्रकार पार्वतीके दर्पमोचनसे सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातें कही गयीं। पार्वतीका यह चरित्र गूढ़ है। बताओ, तुम और क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ३९)
Summary of chapter 33 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
Noticing that some of the Gopīs felt a subtle pride in believing that Kṛshṇa was bound exclusively to their individual company, the Lord suddenly vanished from the midst of the dancing circle to shatter their ego and deepen their longing. Struck by sudden grief, the Gopīs stopped dancing and wandered through the dark bowers of Vṛndāvana, asking the trees, creepers, and deer if they had seen their beloved Kṛshṇa. Their separation transformed into intense spiritual yearning, purifying their hearts of any trace of material pride and elevating their devotion to the highest pinnacle of unalloyed love.