भगवान् नारायण कहते हैं-
नारद! एक दिन बलदेवको साथ लिये बिना ही श्रीकृष्ण अन्यान्य ग्वालबालोंके साथ यमुनाके उस तटपर चले गये, जहाँ कालियनागका निवासस्थान था। स्वेच्छामय शरीर धारण करनेवाले भगवान् नन्दनन्दन यमुना तटवर्ती वनमें पके हुए फलोंको खाकर जब प्यास लगती, तब वहाँका निर्मल जल पी लेते थे। उन्होंने गोप-शिशुओंके साथ कुछ कालतक गौएँ चरायीं। तत्पश्चात् उन्हें तो एक जगह विश्रामके लिये खड़ी कर दिया और स्वयं साथियोंके साथ खेल-कूदमें लग गये; खेलमें इनका मन लग गया। ग्वालबाल भी बड़े हर्षके साथ उसमें भाग लेने लगे। उधर गौएँ नयी नयी घास चरती हुई आगे बढ़ गयीं और यमुनाका विषमिश्रित जल पीने लगीं। मुने! दारुण कालकी चेष्टासे वह विषाक्त जल पीकर कालकूटकी ज्वालाओंसे संतप्त हो उन गौओंने तत्काल प्राण त्याग दिये। झुंड-की-झुंड गौओंको मरी हुई देख गोपबालक चिन्तासे व्याकुल और भयभीत हो उठे। उनके मुखपर विषाद छा गया और उन सबने आकर मधुसूदन श्रीकृष्णसे यह बात कही। सारा रहस्य जानकर जगन्नाथ श्रीहरिने उन सब गौओंको जीवित कर दिया। वे गौएँ तत्काल उठकर खड़ी हो गयीं और श्रीहरिका मुँह देखने लगीं। इधर श्रीकृष्ण यमुनातटवर्ती जलके निकट
उत्पन्न हुए कदम्बपर चढ़कर उस सर्पके भवनमें बहुत-से नागोंके बीच कूद पड़े। उनके जलमें पड़ते ही उस कुण्डका पानी सौ हाथ ऊपर उठ गया। नारद! यह देख ग्वालबालोंको पहले तो हर्ष हुआ, फिर वे बड़े दुःखका अनुभव करने लगे। कालियसर्प मनुष्यकी आकृतिमें आये हुए श्रीहरिको देखकर क्रोधसे विह्वल हो उठा और तुरंत ही उन्हें निगल गया। जैसे किसी मनुष्यने जल्दबाजीमें तपे हुए लोहेको थाम लिया हो, वैसे ही ब्रह्मतेजसे उसका कण्ठ और पेट जलने लगा। वह नाग उद्विग्न हो गया और 'हाय! हाय ! मेरे प्राण निकले जा रहे हैं'– यों कहकर उसने पुनः उन्हें उगल दिया। श्रीकृष्णके वज्रोपम अङ्गोंको चबानेसे उसके सारे दाँत टूट गये और मुँह लहूलुहान हो गया। भगवान् उस समय रक्तरञ्जित मुखवाले कालिय नागके मस्तकपर चढ़ गये। विश्वम्भरके भारसे आक्रान्त हो कालिय नाग प्राण त्याग देनेको उद्यत हो गया। मुने! उसने रक्त वमन किया और मूर्च्छित होकर वह गिर पड़ा। उसे मूर्च्छित देख सब नाग प्रेमसे विह्वल हो रोने लगे। कोई भाग गये और कोई डरके मारे बिलमें घुस गये। अपने प्रियतमको मरणोन्मुख हुआ देख नागपत्नी सती सुरसा दूसरी नागिनियोंके साथ श्रीहरिके सामने आयी और पति प्रेमसे रोने लगी। उसने दोनों हाथ जोड़कर शीघ्र ही भय श्रीहरिको प्रणाम किया और उनके दोनों चरणारविन्द पकड़कर व्याकुल हो उनसे कहा।
सुरसा बोली-
हे जगदीश्वर! आप मुझे मेरे स्वामीको लौटा दीजिये। दूसरोंको मान देनेवाले प्रभो! मुझे भी मान दीजिये। स्त्रियोंको पति प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय होता है। उनके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई बन्धु नहीं है। नाथ! आप देवेश्वरोंके भी स्वामी, अनन्त प्रेमके सागर,
उत्तम बन्धु, सम्पूर्ण भुवनोंके बान्धव तथा श्रीराधिकाजीके लिये प्रेमके समुद्र हैं। अतः मेरे प्राणनाथका वध न कीजिये। आप विधाताके भी विधाता हैं। इसलिये यहाँ मुझे पतिदान दीजिये। त्रिनेत्रधारी महादेवके पाँच मुख हैं; ब्रह्माजी के चार और शेषनागके सहस्र मुख हैं; कार्तिकेयके भी छः मुख हैं; परंतु ये लोग भी अपने मुख समूहोंद्वारा आपकी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाते हैं। साक्षात् सरस्वती भी आपका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हैं। सम्पूर्ण वेद, अन्यान्य देवता तथा संत महात्मा भी आपकी स्तुतिके विषय में शक्तिहीनताका ही परिचय देते हैं। कहाँ तो मैं कुबुद्धि, अज्ञ एवं नारियोंमें अधम सर्पिणी और कहाँ सम्पूर्ण भुवनोंके परम आश्रय तथा किसीके भी दृष्टिपथमें न आनेवाले आप परमेश्वर! जिनकी स्तुति ब्रह्मा, विष्णु और शेषनाग करते हैं, उन मानव-वेषधारी आप नराकार परमेश्वरकी स्तुति मैं करना चाहती हूँ, यह कैसी विडम्बना है? पार्वती, लक्ष्मी तथा वेदजननी सावित्री जिनके स्तवनसे डरती हैं और स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हो पातीं; उन्हीं आप परमेश्वरका स्तवन कलिकलुषमें निमग्न तथा वेद वेदाङ्ग एवं शास्त्रोंके श्रवणमें मूढ़ स्त्री मैं क्यों करना चाहती हूँ, यह समझमें नहीं आता। आप रत्नमय पर्यङ्कपर रत्ननिर्मित भूषणोंसे भूषित हो शयन करते हैं। रत्नालंकारोंसे अलंकृत अङ्गवाली राधिकाके वक्षःस्थलपर विराजमान होते हैं। आपके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित रहते हैं, मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैली होती है। आप उमड़ते हुए प्रेमरसके महासागरमें सदा सुख निमग्न रहते हैं। आपका मस्तक मल्लिका और मालतीकी मालाओंसे सुशोभित होता है। आपका मानस नित्य निरन्तर पारिजात पुष्पोंकी सुगन्ध से आमोदित रहा करता है। कोकिलके कलरव तथा भ्रमरोंके गुञ्जारवसे उद्दीपित प्रेमके कारण आपके अङ्ग उठी हुई पुलकावलियोंसे अलंकृत रहते हैं। जो सदा प्रियतमाके दिये हुए ताम्बूलका सानन्द चर्वण करते हैं; वेद भी जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं तथा बड़े-बड़े विद्वान् भी जिनके स्तवनमें जडवत् हो जाते हैं; उन्हीं अनिर्वचनीय परमेश्वरका स्तवन मुझ जैसी नागिन क्या कर सकती है? मैं तो आपके उन चरणकमलोंकी वन्दना करती हूँ, जिनका सेवन ब्रह्मा, शिव और शेष करते हैं तथा जिनकी सेवा सदा लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, गङ्गा, वेदमाता सावित्री सिद्धोंके समुदाय, मुनीन्द्र और मनु करते हैं। आप स्वयं कारणरहित हैं, किंतु सबके कारण आप ही हैं। सर्वेश्वर होते हुए भी परात्पर हैं स्वयंप्रकाश, कार्य-कारणस्वरूप तथा उन कार्य कारणों के भी अधिपति हैं। आपको मेरा नमस्कार है। हे श्रीकृष्ण ! हे सच्चिदानन्दघन ! हे सुरासुरेश्वर ! आप ब्रह्मा, शिव, शेषनाग, प्रजापति, मुनि, मनु, चराचर प्राणी, अणिमा आदि सिद्धि सिद्ध तथा गुणोंके भी स्वामी हैं। मेरे पतिकी रक्षा कीजिये, आप धर्म और धर्मीके तथा शुभ और अशुभके भी स्वामी हैं। सम्पूर्ण वेदोंके स्वामी होते हुए भी उन वेदोंमें आपका अच्छी तरह निरूपण नहीं हो सका है। सर्वेश्वर! आप सर्वस्वरूप तथा सबके बन्धु हैं। जीवधारियों तथा जीवोंके भी स्वामी हैं। अतः मेरे पतिकी रक्षा कीजिये।
इस प्रकार स्तुति करके नागराजवल्लभा सुरसा भक्तिभावसे मस्तक झुका श्रीकृष्ण के चरणकमलोंको पकड़कर बैठ गयी। नागपत्नीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका जो त्रिकाल संध्याके समय पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो अन्ततोगत्वा श्रीहरिके धाममें चला जाता है। उसे इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति प्राप्त होती है और अन्तमें वह निश्चय ही श्रीकृष्णका दास्य सुख पा जाता है। वह श्रीहरिका पार्षद हो सालोक्य आदि चतुर्विध मुक्तियोंको करतलगत कर लेता है।
नारदजीने पूछा-
नागपत्नीकी बात सुनकर हर्षसे उत्फुल्ल नेत्रोंवाले सर्वनन्दन भगवान् गोविन्दने स्वयं उससे क्या कहा ? महाभाग! यह अत्यन्त अद्भुत रहस्य मुझसे बताइये।
भगवान् नारायणने कहा-
मुने! नागपत्नी भयसे व्याकुल हो हाथ जोड़कर भगवान् के चरणोंमें पड़ी थी। उसकी उपर्युक्त बातें सुनकर श्रीकृष्णने उससे इस प्रकार कहा ―
श्रीकृष्ण बोले-
नागेश्वरि उठो, उठो। भय छोड़ो और वर माँगो मातः ! मेरे वरके प्रभावसे अजर-अमर हुए अपने पतिको ग्रहण करो और यमुनाका ह्रद छोड़कर अपने घरको चली जाओ। वत्से! अपने पति और परिवारके साथ अभीष्ट स्थानको पधारो नागेशि! आजसे तुम मेरी कन्या हुई और तुम्हारे प्राणोंसे भी अधिक प्रियतम यह नागराज मेरे जामाता हुए; इसमें संशय नहीं है। शुभे! मेरे चरणकमलोंके चिह्नसे युक्त होनेके कारण तुम्हारे पतिको अब गरुड कष्ट नहीं देंगे, अपितु भक्तिभावसे स्तुति करके मेरे चरणचिह्नको प्रणाम करेंगे। अब तुम गरुडका भय छोड़ो और शीघ्र रमणक द्वीपको चली जाओ बेटी! इस हृदसे निकलो और इच्छानुसार वर माँगो ।
श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर सुरसाके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे। उसकी आँखोंमें आँसू भर आये तथा उसने भक्ति-भावसे मस्तक झुकाकर कहा।
सुरसा बोली-
वरदाता परमेश्वर! पिताजी ! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो अपने चरणकमलोंकी सुदृढ़ एवं अविचल भक्ति प्रदान कीजिये। मेरा मन भ्रमरकी भाँति सदा आपके चरणारविन्दपर ही मँडराता रहे। मुझे आपके स्मरणकी कभी विस्मृति न हो, मेरा कान्तविषयक सौभाग्य सदा बना रहे और ये मेरे प्राणवल्लभ ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो जायँ प्रभो! यही मेरी प्रार्थना है; इसे पूर्ण कीजिये। ऐसा कहकर नागपत्नी श्रीहरिके सामने नत हुई खड़ी हो गयी। उसने शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित करनेवाले श्रीहरिके मुखचन्द्रका दर्शन किये। उस सतीने अपने दोनों नेत्रोंसे निमेषरहित होकर गोविन्दके मुखकी सौन्दर्यमाधुरीका पान किया। उसके सारे अङ्ग पुलकित हो उठे। वह आनन्दके आँसुओंमें डूब गयी। श्रीहरिको सुन्दर बालकके रूपमें देखकर वह उनके प्रति पुत्रोचित स्नेह करने लगी और भक्तिके उद्रेकसे आप्लावित हो पुनः इस प्रकार बोली-'गोविन्द ! मैं रमणक द्वीपमें नहीं जाऊँगी। वहाँ मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। यह सर्प वहाँ जाकर संसार चलावे, मुझे तो आप अपनी किङ्करी बना लीजिये! हे श्रीकृष्ण ! मेरे मनमें सालोक्य आदि चार प्रकार की मुक्तिके लिये भी इच्छा नहीं है; क्योंकि वह मुक्ति आपके चरणारविन्दोंकी सेवाकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। जो भारतवर्ष में दुर्लभ जन्म पाकर आपसे आपकी चरणसेवाके अतिरिक्त दूसरे वरकी इच्छा करता है, वह स्वयं ठगा गया।' (विना त्वत्पादसेवां च यो वाञ्छति वरान्तरम् । भारते दुर्लभं जन्म लब्ध्वासौ वञ्चितः स्वयम् ।। (१९।५२))
नागपत्नीकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दपर मुस्कराहट फैल गयी। उनका मन प्रसन्न हो गया और उन श्रीमान् माधवने 'एवमस्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। इसी बीचमें उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित दिव्य विमान वहाँ तत्काल उतर आया। मुने! वह अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहा था। उसपर अनेक श्रेष्ठ पार्षद बैठे थे तथा उसे दिव्य वस्त्रों एवं मालाओं से सजाया गया था। उसमें सौ पहिये लगे थे। वह वायुके समान वेगशाली तथा मनकी गतिसे चलनेवाला था। देखनेमें बड़ा ही मनोहर था। श्यामसुन्दरके श्याम कान्तिवाले सेवक तुरंत ही उस रथसे उतरे और श्रीकृष्णको प्रणाम करके सुरसाको साथ उत्तम गोलोकधामको चले गये। तत्पश्चात् श्रीहरिने अपने तेजसे छायारूपिणी सुरसाकी सृष्टि करके उसे सर्पको दे दिया। कालियनाग यह सब कुछ न जान सका; क्योंकि वह वैष्णवी मायासे विमोहित था। सर्पके मस्तकसे उतरकर करुणानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक शीघ्र ही कालियके सिरपर अपना हाथ रखा। हाथ रखते ही उसके शरीरमें चेतना लौट आयी और उसने श्रीहरिको अपने सामने देखा तथा इस बातकी ओर भी लक्ष्य किया कि सती सुरसा दोनों हाथ जोड़े खड़ी है और उसके नेत्रोंसे आँसू बह रहे हैं। यह देख उसने भी गोविन्दको प्रणाम किया और तत्काल प्रेमसे विह्वल होकर वह रोने लगा कृपानिधान भगवान्ने देखा नागराज रो रहा है और सुरसा भक्तिके उद्रेकसे पुलकित हो नेत्रोंसे आँसू बहा रही है; किंतु कुछ बोल नहीं रही है। तब वे दयानिधि स्वयं बोले; क्योंकि योग्य और अयोग्य प्राणीपर भी ईश्वरकी कृपा सदा समान रूपसे ही रहती है।
श्रीकृष्णने कहा -
कालिय! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो वत्स! तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हो। भय छोड़ो और सुखसे रहो। जो मेरा अत्यन्त भक्त हो और मेरे अंशसे उत्पन्न हुआ हो, उसपर मैं विशेष अनुग्रह करता हूँ। उसके अभिमानको मिटाने के लिये उसका किञ्चित् दमन करके मैं पुनः उसपर कृपा करता हूँ। जो लोग तुम्हारे वंशमें उत्पन्न हुए सपका विनाश करेंगे, उनको महान् पाप लगेगा और वे दुःखोंके भागी होंगे। परंतु जो लोग तुम्हारे कुलमें उत्पन्न हुए सर्पोंको देखकर उनके मस्तकपर उभरे हुए मेरे सुन्दर चरणचिह्नोंको भक्तिभावसे प्रणाम करेंगे, वे समस्त पातकों से मुक्त हो जायँगे। तुम शीघ्र रमणक द्वीपको जाओ और गरुड़का भय छोड़ दो। तुम्हारे मस्तकपर मेरे चरणचिह्नको देखकर गरुड़ भक्तिभावसे तुम्हें नमस्कार करेंगे। तुमको और तुम्हारे वंशजोंको गरुड़से कभी भय नहीं होगा। आजसे मेरा वर पाकर अपनी जातिके सर्पोंमें तुम सर्वश्रेष्ठ हो जाओ। वत्स! तुमको और कौन-सा उत्तम वर अभीष्ट है? उसे इस समय माँगो मैं तुम्हारा दुःख दूर करनेवाला हूँ; अतः भय छोड़कर मुझसे मनकी बात कहो। श्रीकृष्णकी बात सुनकर कालियनाग, जो भयसे काँप रहा था, दोनों हाथ जोड़कर उनसे बोला।
कालियने कहा-
वरदायक प्रभो ! दूसरे किसी वरके लिये मेरी इच्छा नहीं है। प्रत्येक जन्ममें मेरी आपके चरणकमलोंमें भक्ति बनी रहे। और मैं सदा आपके उन चरणारविन्दोंका चिन्तन करता रहूँ; यही वर मुझे दीजिये। जन्म ब्राह्मण कुलमें हो या पशु-पक्षियोंकी योनियोंमें, सब समान है। वही जन्म सफल है, जिसमें आपके चरणकमलोंकी स्मृति बनी रहे। यदि आपके चरणोंका स्मरण न हो तो देवता होकर स्वर्गमें रहना भी निष्फल है जो आपके चरणों चिन्तनमें तत्पर है, उसे जो भी स्थान प्राप्त हो, वही सबसे उत्तम है। उस पुरुषकी आयु एक क्षणकी हो या करोड़ों कल्पोंकी अथवा उसकी आयु तत्काल ही क्षीण होनेवाली क्यों न हो; यदि वह आपकी आराधनामें बीत रही है तो सफल है, अन्यथा उसका कोई फल नहीं है- वह व्यर्थ है। जो आपके चरणारविन्दोंके सेवक हैं, उनकी आयु व्यर्थ नहीं जाती, सार्थक होती है। उन्हें जन्म-मरण, रोग-शोक और पीड़ाका कुछ भी भय नहीं रहता — वे इनकी कुछ भी परवाह नहीं करते। भक्तोंके मनमें आपके चरणोंकी सेवाको छोड़कर इन्द्रपद, अमरत्व अथवा परम दुर्लभ ब्रह्मपदको भी पानेकी इच्छा नहीं होती। आपके भक्तजन सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तियोंको अत्यन्त फटे पुराने वस्त्रके चिथड़ेके समान तुच्छ देखते हैं। ब्रह्मन् ! मैंने भगवान् अनन्तके मुखसे ज्यों ही आपके मन्त्रका उपदेश प्राप्त किया, त्यों ही आपकी भावना करते-करते आपके अनुग्रहसे मैं आपके समान वर्णवाला हो गया। मैं अपक्व भक्त था अर्थात् मेरी भक्ति परिपक्व नहीं हुई थी। यह जानकर ही स्वयं सुदृढ़ भक्ति धारण करनेवाले गरुड़ने मुझे देशसे दूर कर दिया और धिक्कारा था। परंतु वरदेश्वर! अब आपने मुझे अविचल भक्ति दे दी है। गरुड़ भी भक्त हैं, मैं भी भक्त हो गया हूँ; अतः अब वे मेरा त्याग नहीं कर सकते हैं। आपके चरणारविन्दोंके चिह्नसे अलंकृत मेरे श्रीयुत मस्तकको देखकर गरुड़ मुझे सदोष होनेपर भी गुणवान् मानेंगे; अतः इस समय मेरा त्याग नहीं कर सकेंगे। अब तो वे यह मानकर कि नागेन्द्रगण हमारे आराध्य हैं, मुझे कष्ट नहीं देंगे। परमेश्वर ! अब मैं उनका वध्य नहीं रहा। उन गुरुदेव अनन्तके सिवा मुझे कहीं किसीसे भी भय नहीं है। देवेन्द्रगण, देवता, मुनि, मनु और मानव-जिन्हें स्वप्रमें तथा ध्यानमें भी नहीं देख पाते हैं - वे ही परमात्मा इस समय मेरे नेत्रों के विषय हो रहे हैं। प्रभो! आप तो भक्तोंके अनुरोधसे साकार रूपमें प्रकट हुए हैं; अन्यथा आपको शरीरकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? सगुण साकार तथा निर्गुण-निराकार भी आप ही हैं। आप स्वेच्छामय, सबके आवासस्थान तथा समस्त चराचर जगत्के सनातन बीज हैं। सबके ईश्वर, साक्षी, आत्मा और सर्वरूपधारी हैं। ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म और इन्द्र आदि देवता तथा वेदों और वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् भी जिन परमेश्वरकी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापी प्रभुका स्तवन क्या एक सर्प कर सकेगा ? हे नाथ! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! आप मुझ अधमको क्षमा कीजिये श्रीकृष्ण ! मैंने अपने खल स्वभाव और अज्ञानके कारण आपको चबा डालनेका प्रयत्न किया; परंतु आप तो आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक तथा अमूर्त हैं; अतः किसी भी अस्त्रके लक्ष्य नहीं हैं। न तो आपका अन्त देखा जा सकता है और न लाँधा ही जा सकता है। न तो कोई आपका स्पर्श कर सकता है और न आपपर आवरण ही डाल सकता है। आप स्वयं प्रकाशरूप हैं।
ऐसा कहकर नागराज कालिय भगवान्के चरणकमलों में गिर पड़ा भगवान् उसपर संतुष्ट हो गये। उन्होंने 'एवमस्तु' कहकर उसे सम्पूर्ण अभीष्ट वर दिया। जो नागराजद्वारा किये गए स्तोत्रका प्रातः काल उठकर पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशजोंको कभी नागोंसे भय नहीं होता वह भूतलपर नागोंकी शय्या बनाकर सदा उसपर शयन कर सकता है। उसके भोजनमें विष और अमृतका भेद नहीं रह जाता। जिसको नागने ग्रस लिया हो, काट खाया हो अथवा विषैला भोजन करनेसे जिसके प्राणान्तकी सम्भावना हो गयी हो, वह मनुष्य भी इस स्तोत्रको सुननेमात्रसे स्वस्थ हो जाता है। जो इस स्तोत्रको भोजपत्रपर लिखकर भक्तिभावसे युक्त हो कण्ठमें या दाहिने हाथमें धारण करता है, उसे भी नागोंसे भय नहीं होता। जिस घरमें यह स्तोत्र पढ़ा जाता है, वहाँ कोई नाग नहीं ठहरता निश्चय ही उस घरमें विष, अग्नि तथा वज्रका भय नहीं प्राप्त होता। इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति और स्मृति उसे सदा सुलभ होती है तथा अन्तमें अपने कुलको पवित्र करके निश्चय ही वह श्रीकृष्णका दास्यभाव प्राप्त कर लेता है।
भगवान् नारायण कहते हैं-
नारद! नागराजको अभीष्ट वर देकर जगदीश्वर श्रीहरिने पुनः उससे मधुर वचन कहे, जो परिणाममें सुख देनेवाले थे।
श्रीकृष्ण बोले-
नागराज ! तुम यमुना जलके मार्गसे ही परिवारसहित रमणकद्वीपमें चले जाओ। वह स्थान इन्द्रनगरके समान श्रेष्ठ एवं सुन्दर है।
श्रीहरिकी यह आज्ञा सुनकर नाग प्रेमविह्वल होकर रोने लगा और बोला-'नाथ! मैं आपके चरणकमलोंका कब दर्शन करूँगा ?" वह महेश्वर श्रीकृष्णको सैकड़ों बार प्रणाम करके स्त्री और परिवारके साथ जलके ही मार्गसे चला गया। जाते समय नागराज भगवद्-विरहसे व्याकुल हो रहा था। उसके चले जानेके बाद यमुनाके उस कुण्डका जल अमृतके समान हो गया। इससे समस्त जन्तुओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। नारद! रमणकमें पहुँचकर कालियने इन्द्रनगरके समान सुन्दर भवन देखा कृपासिन्धु श्रीकृष्णकी आज्ञासे साक्षात् विश्वकर्माने उसका निर्माण किया था। वहाँ नागराज कालिय अपनी पत्नी और पुत्रोंके साथ श्रीहरिके चिन्तनमें तत्पर हो भय छोड़कर बड़े हर्षके साथ रहने लगा। इस प्रकार श्रीहरिका सारा अद्भुत सुखदायक, मोक्षप्रद तथा सारभूत चरित्र मैंने कह सुनाया अब और क्या सुनना चाहते हो ?
सूतजी कहते हैं-
महर्षि नारायणका उपर्युक्त वचन सुनकर नारदजी हर्षविभोर हो गये। उन्होंने समस्त संदेहोंका निवारण करनेवाले उन महर्षिसे अपना संदेह इस प्रकार पूछा।
नारदजी बोले-
जगद्गुरो ! अपने पहलेके उत्तम भवनको छोड़कर कालिय यमुनातटको क्यों चला गया था? इसका रहस्य मुझे बताइये
भगवान् श्रीनारायणने कहा-
नारद! सुनो। मैं उस प्राचीन इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ, जिसे मैंने सूर्यग्रहणके समय मलयाचलपर सुप्रभा नदीके पश्चिम किनारे श्रीकृष्ण कथाके प्रसङ्गमें पिता धर्मके मुखसे सुना था पुलहने धर्मसे अपना संदेह पूछा था, तब कृपानिधान धर्मने मुनियोंकी सभामें इस आश्चर्यमय आख्यानको सुनाया था। नारद! वहीं मैंने इसे सुना था, अतः कहता हूँ, सुनो।
भगवान् शेषकी आज्ञासे नागगण प्रतिवर्ष कार्तिककी पूर्णिमाको भयके कारण गरुड़देवकी पूजा करते हैं। पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और विविध उपहार सामग्री अर्पित करके प्रसन्नतापूर्वक उनकी आराधना करते हैं। महातीर्थ पुष्करमें भक्तिपूर्वक भलीभाँति स्रान करके कालियने अहंकारवश उक्त तिथिको गरुड़की पूजा नहीं की नागोंद्वारा जो पूजाकी सामग्री एकत्र की गयी थी, उसे कालियनाग बलपूर्वक खानेको उद्यत हो गया। तब सभी नाग उस मदमत्त कालियको रोकने तथा उसे नीतिकी बात बताने लगे। जब किसी तरह भी वे कालियको रोकनेमें समर्थ न हो सके, तब सहसा वहाँ पक्षिराज गरुड़ प्रकट हो गये। मुने! गरुड़को आया देख नागगण कालियके प्राणोंकी रक्षा करनेके लिये जबतक सूर्योदय नहीं हुआ, तबतक पूरी शक्ति लगाकर उनके साथ युद्ध करते रहे। अन्तमें पक्षिराजके तेजसे उद्विग्न हो वे सब के सब भाग खड़े हुए और सबके अभयदाता भगवान् अनन्तकी शरणमें गये। नागोंको भागते देख करुणानिधान कालिय
वहाँ निःशङ्कभावसे खड़ा रहा। उसने गरुड़की ओर देखा और श्रीहरिके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके गरुड़के साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। एक मुहूर्ततक उन दोनों में अत्यन्त भयानक युद्ध हुआ। अन्तमें गरुड़के तेजसे नागराज कालियको पराजित होना पड़ा फिर तो वह भागा और यमुनाजीके उसी कुण्डमें चला गया, जहाँ सौभरिके शापसे पक्षिराज गरुड़ नहीं जा सकते थे। गरुड़के भयसे नाग वहीं रहने लगा। पीछेसे उसके परिवार के लोग भी वहीं चले गये।
नारदजीने पूछा-
भगवन्! गरुड़को सौभरिका शाप कैसे प्राप्त हुआ? परमेश्वरके वाहन होकर भी गरुड़ उस हृदमें क्यों नहीं जा सकते थे ?
भगवान् श्रीनारायण बोले-
उस कुण्डमें सौभरि मुनि एक सहस्र दिव्य वर्षोतक तपस्या करके महासिद्ध हो श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करते थे। उन ध्यानपरायण मुनिके समीप पक्षिराज गरुड़ यमुनाजीके जलमें तथा किनारे भी अपने गणोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक निःशङ्क विचरा करते थे। वे अपनी उत्कृष्ट इच्छासे प्रेरित हो बहुधा पूँछ (अथवा पंख) ऊपरको उठाकर मुनिके अगल-बगलमें उनकी सानन्द परिक्रमा करते हुए जाते-आते थे। एक दिन उन्होंने परिवारसहित विशालकाय मीनको देखा। देखते ही देखते गरुड़ने मुनीन्द्र निकटसे ही उस मीनको चोंचसे पकड़ लिया। मछलीको मुँहमें दबाये जाते हुए गरुड़को मुनिने रोषभरी दृष्टिसे देखा मुनिकी उस दृष्टिसे गरुड़ काँप उठे और वह महामत्स्य उनकी चोंचसे छूटकर पानीमें गिर पड़ा। गरुड़के डरसे वह मीन मुनिके पास ठहर गया- उनके शरणागत हो गया। जब गरुड़ पुनः उसे लेनेको उद्यत हुए, तब मुनीन्द्रने उनसे कहा सौभरि बोले-पक्षिराज! मेरे पाससे दूर हटो, दूर हटो मेरे सामनेसे इस विशाल जीवको पकड़ लेनेकी तुममें क्या योग्यता है? तुम अपनेको श्रीकृष्णका वाहन समझकर बहुत बड़ा मानते हो। श्रीकृष्ण तुम्हारे जैसे करोड़ों वाहन रच लेनेकी शक्ति रखते हैं। मैं अपनी भौंहें टेढ़ी करनेमात्रसे तुम्हें शीघ्र और अनायास ही भस्म कर सकता हूँ। तुम परमेश्वरके वाहन हो तो क्या हुआ ? हमलोग तुम्हारे दास नहीं हैं। पक्षिराज! यदि आजसे कभी भी मेरे इस कुण्डमें आओगे तो मेरे शापसे तत्काल भस्म हो जाओगे। यह ध्रुव सत्य है।
मुनीन्द्रकी बात सुनकर पक्षिराज विचलित हो गये। वे श्रीकृष्णके चरणोंका स्मरण करते करते उन्हें प्रणाम करके चल दिये। विप्रवर नारद! तबसे अबतक सदा ही उस कुण्डका नाम सुननेमात्रसे पक्षिराजको कँपकँपी आ जाती है। यह इतिहास, जो धर्मके मुखसे सुना गया था, तुमसे कहा गया। अब जिसका प्रकरण चल रहा है, श्रीहरिके उस श्रवणसुखद, रहस्ययुक्त तथा मङ्गलमय लीलाचरित्रको सुनो।
श्रीकृष्ण बहुत देरतक यमुना जलसे ऊपर नहीं उठे। यह जानकर ग्वालबाल दुःखी हो गये। वे मोहवश यमुनाके तटपर रोने लगे। कुछ बालक शोकसे व्याकुल हो अपनी छाती पीटने लगे। कोई श्रीहरिके बिना पृथ्वीपर पछाड़ खाकर गिरे और मूच्छित हो गये कितने ही बालक श्रीकृष्णविरहसे व्यथित हो कालियदहमें प्रवेश करनेको उद्यत हो गये और कुछ ग्वालबाल उनको उसमें जानेसे रोकने लगे। कोई-कोई विलाप करके प्राण त्याग देनेको उद्यत हो गये और उनमें जो समझदार थे, ऐसे कुछ बालक उन मरणोन्मुख बालकोंकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने लगे। कोई 'हाय हाय' कहकर रोने-बिलखने लगे। कोई 'कृष्ण-कृष्ण' की रट लगाने लगे और कोई इस समाचारको बतानेके लिये नन्दरायजीके समीप दौड़े गये। कुछ बालक वहाँ शोक, भय और मोहसे आतुर हो परस्पर मिलकर यों कहने लगे- 'हम क्या करें? हमारे श्रीहरि कहाँ चले गये? हे नन्दनन्दन! हे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतम श्रीकृष्ण! हे बन्धो! हमें दर्शन दो हमारे प्राण निकले जा रहे हैं।'
इसी बीचमें कुछ बालक नन्दरायजीके निकट जा पहुँचे। वे अत्यन्त चञ्चल थे और शोकसे व्याकुल होकर रो रहे थे। उन्होंने शीघ्र ही यशोदाको, उनके पास बैठे हुए बलरामको तथा अन्यान्य गोपों और लाल कमलके समान नेत्रोंवाली गोपाङ्गनाओंको यह समाचार बताया। यह समाचार सुनकर वे सब के सब शोकसे व्याकुल हो दौड़ते हुए यमुनातटपर जा पहुँचे और बालकोंके साथ रोने लगे। सारे व्रजवासी एकत्र हो रोते-रोते शोकसे मूच्छित हो गये। माता यशोदा कालियदहमें प्रवेश करने लगीं। यह देख कुछ लोगोंने उन्हें रोका। गोप और गोपियाँ शोकसे अपने ही अङ्गोंको पीटने लगीं। कुछ लोग विलाप करने लगे और कितने ही व्रजवासी अपनी सुध-बुध खो बैठे। राधा भी यमुनाजी उस कुण्डमें घुसने लगीं। यह देख कुछ स्त्रियोंने दौड़कर उन्हें रोका। वे शोकसे मूच्छित हो गयीं
और उस नदीके तटपर मरी हुईके समान पड़ गयीं। नन्दरायजी अत्यन्त विलाप करके बार बार मूच्छित होने लगे। वे चेत होनेपर पुनः रोते तथा रो-रोकर फिर मूच्छित हो जाते थे। उस समय ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीने अत्यन्त विलाप करते हुए नन्दको, शोकसे कातर हुई यशोदाको, गोपों और गोपाङ्गनाओंको, अत्यन्त मूर्च्छित राधिकाको, रोते हुए समस्त बालकोंको तथा शोकग्रस्त हुई सम्पूर्ण गोप-बालिकाओंको धीरज बँधाते हुए समझाना आरम्भ किया।
श्रीबलदेव बोले-
हे गोपो ! गोपियो! और बालको! सब लोग मेरी बात सुनो। हे नन्दबाबा ! ज्ञानिशिरोमणि गर्गजीकी बातोंको याद करो जो जगत्का भार उठानेवाले शेषके भी आधारभूत हैं, संहारकारी शंकरके भी संहारक हैं तथा विधाताके भी विधाता हैं; उनकी इस भूतलपर किससे पराजय हो सकती है? श्रीकृष्ण अणुसे भी अणु तथा परम महान् हैं। वे स्थूलसे भी स्थूल तथा परात्पर हैं। उनकी सत्ता सदा और सर्वत्र विद्यमान है; तथापि वे किसीके दृष्टिपथमें नहीं आते। वे ही योगियोंके भी सम्यक् योग हैं। श्रुतियोंने स्पष्ट कहा है कि सम्पूर्ण दिशाएँ कभी एकत्र नहीं हो सकतीं, आकाशको कोई छू नहीं सकता तथा सर्वेश्वरको कोई बाधा नहीं पहुँचा सकता। श्रीकृष्ण सबके आत्मा हैं। आत्मा किसीकी दृष्टिमें नहीं आता। उसे अस्त्रोंका निशाना नहीं बनाया जा सकता। वह न तो वधके योग्य है और न दृश्य ही है। उसे आग नहीं जला सकती और न उसकी हिंसा ही की जा सकती है। अध्यात्मतत्त्वके विज्ञाता विद्वानों ने आत्माको ऐसा ही जाना और माना है। इन श्रीकृष्णका विग्रह भक्तोंके ध्यानके लिये ही है। ये ज्योतिः स्वरूप और सर्वव्यापी हैं। इन परमात्माका आदि, मध्य और अन्त नहीं है। जब सारा ब्रह्माण्ड एकार्णवके जलमें मग्न हो जाता है तब ये श्रीकृष्ण जलमें शयन करते हैं। उस समय
इनकी नाभिसे जो कमल पैदा होता है, उसीसे ब्रह्माजीका प्राकट्य होता है। जिन्हें एकार्णवके जलमें भी भय नहीं है, उन्हीं परमेश्वरके लिये इस कालियदहमें विपत्तिकी सम्भावना कितना महान् अज्ञान है? पिताजी! यदि एक मच्छर सारे ब्रह्माण्डको निगल जानेमें समर्थ हो जाय तो भी उन ब्रह्माण्डनायकको वह सर्प अपना ग्रास नहीं बना सकता। यह मैंने परम उत्तम सम्पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञानकी बात कही है। यह गूढ़ ज्ञान योगियोंके लिये सार वस्तु है। इससे समस्त संशयोंका उच्छेद हो जाता है। बलदेवजीकी बात सुनकर और गर्गजीके वचनोंको याद करके नन्दजीने शोक त्याग दिया। व्रजवासियों और व्रजाङ्गनाओंका भी शोक जाता रहा। सबने बलदेवजीके इस प्रबोधनको मान लिया; परंतु यशोदा और राधिकाको इससे संतोष न हुआ। प्रियजनके विरहके विषय में मन किसी प्रकारके प्रबोधको नहीं ग्रहण करता जबतक प्रियजनका मिलन न हो जाय, तबतक केवल समझाने-बुझानेसे मनको शान्ति नहीं मिल सकती।
मुने! इसी समय व्रजवासियों और व्रजाङ्गलाओंने
श्रीकृष्णको जलसे ऊपरको उछलते देखा। इससे उनके हर्षकी सीमा न रही। उनका शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति परम मनोहर मुख और उनकी मन्द-मन्द मुस्कराहट मनको बरबस अपनी ओर खींचे लेती थी। पानीसे निकलनेपर भी वस्त्र भीगे नहीं थे। शरीर भी आर्द्र नहीं था। भाल देशमें चन्दन और नेत्रों में अञ्जनका शृङ्गार भी लुप्त नहीं हुआ था। समस्त आभूषणोंसे अलंकृत, सिरपर मोरपंखका मुकुट धारण किये और अधरोंसे मुरली लगाये अच्युत श्रीकृष्ण ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे। यशोदा अपने लालाको देखते ही छातीसे लगाकर मुस्करा उठीं और उनके मुखारविन्दको चूमने लगीं। उस समय उनके नेत्र और मुख प्रसन्नतासे खिल उठे थे। नन्द, बलराम तथा रोहिणीजीने बारी-बारीसे श्यामसुन्दरको हर्षपूर्वक हृदयसे लगाया सब लोग एकटक हो गोविन्दके श्रीमुखका दर्शन करने लगे। प्रेमसे अंधे हुए सम्पूर्ण ग्वालबालोंने श्रीहरिका आलिङ्गन किया। गोपाङ्गनाएँ नेत्र- चकोरोंद्वारा उनके मुखचन्द्रकी मधुर सुधाका पान करने लगीं।
इतनेमें ही वहाँ सहसा वनके भीतरी भागको दावानलने आवेष्टित कर लिया। उन सबके साथ गौओंका समुदाय भी उस दावाग्निसे घिर गया। वनके भीतर चारों ओर पर्वतोंके समान आगकी ऊँची-ऊँची लपटें उठने लगीं। यह देख सबने अपना नाश निकट ही समझा। उस संकटसे सब भयभीत हो उठे। उस समय सारे व्रजवासी, गोपीजन और ग्वालबाल संत्रस्त हो भक्तिसे सिर झुका दोनों हाथ जोड़कर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे।
ग्वालबाल बोले-
ब्रह्मन् ! मधुसूदन! आपने सब आपत्तियोंमें जैसे हमारे कुलकी रक्षा की है, उसी प्रकार फिर इस दावानलसे हमें बचाइये। जगत्पते! आप ही हमारे इष्टदेवता हैं और आप ही कुलदेवता । संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले आप ही हैं। अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, सूर्य, यम, कुबेर, वायु, ईशानादि देवता, ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म, इन्द्र, मुनीन्द्र, मनु, मानव, दैत्य, यक्ष, राक्षस, किन्नर तथा अन्य जो-जो चराचर प्राणी हैं, वे सब के सब आपकी ही विभूतियाँ हैं। उन सबके आविर्भाव और लय आपकी इच्छासे ही होते हैं। गोविन्द ! हमें अभय दीजिये और इस अग्रिका संहार कीजिये। हम आपकी शरणमें आये हैं। आप हम शरणागतोंको बचाइये। यों कहकर वे सब लोग श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिन्तन करते हुए खड़े हो गये। श्रीकृष्णकी अमृतमयी दृष्टि पड़ते ही दावानल दूर हो गया। फिर तो वे ग्वालबाल मोदमग्न होकर नाचने लगे। क्यों न हो, श्रीहरिके स्मरणमात्र से सब विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। जो प्रातः काल उठकर इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, उसे जन्म-जन्ममें कभी अग्निसे भय नहीं होता। शत्रुओंसे घिर जानेपर, दावानलमें आ जानेपर, भारी विपत्तिमें पड़नेपर तथा प्राणसंकटके समय इस स्तोत्रका पाठ करके मनुष्य सब दुःखोंसे छुटकारा पा जाता है। इसमें संशय नहीं है। शत्रुओंकी सेना क्षीण हो जाती है और वह मनुष्य युद्धमें सर्वत्र विजयी होता है। वह इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति और अन्तमें उनके दास्य-सुखको अवश्य पा लेता है।
भगवान् श्रीनारायण कहते हैं-
नारद ! सुनो दावानलसे उनका उद्धार करके श्रीहरि उन सबके साथ अपने कुबेरभवनोपम गृहमें गये। वहाँ नन्दने आनन्दपूर्वक ब्राह्मणोंको प्रचुर धनका दान किया और ज्ञातिवर्गके लोगों तथा भाई-बन्धुओंको भोजन कराया नाना प्रकारका मङ्गलकृत्य तथा श्रीहरिनाम-कीर्तन कराया। ब्राह्मणोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक वेदपाठ करवाया। इस प्रकार वृन्दावनके घर घरमें वे सब गोप श्रीकृष्णचरणारविन्दोंके चिन्तनमें चित्तको एकाग्र करके आनन्दपूर्वक रहने लगे। श्रीहरिका यह सारा मङ्गलमय चरित्र कहा गया, जो कलिकल्मषरूपी काष्ठको दग्ध करनेके लिये अग्निके समान है (अध्याय १९)
Summary of chapter 17 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
One morning, mother Yashodā, exasperated by little Kṛshṇa's butter-stealing pranks, attempted to bind Him with a hemp rope to a heavy wooden mortar in the courtyard. Finding the rope perpetually two fingers too short no matter how many pieces she tied together, Yashodā stood exhausted in wonder, whereupon Kṛshṇa allowed Himself to be bound out of pure love for her devotion. Crawling across the courtyard with the heavy mortar trailing behind Him, Kṛshṇa wedged the mortar between two towering Yamalārjuna trees, which were actually the cursed sons of Kuvera. As Kṛshṇa pulled gently, the trees crashed down, releasing two celestial beings who offered sublime prayers before returning to heaven.