नारदजीने पूछा-
वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारायण ! किसकी प्रार्थनासे और किस कारण जगदीश्वर श्रीकृष्णने इस भूतलपर अवतार लिया था ?
श्रीनारायणने कहा-
प्राचीन कालकी बात है। वाराह कल्पमें पृथ्वी असुरोंके अधिक भारसे आक्रान्त हो गयी थी; अतः शोकसे अत्यन्त पीड़ित हो वह ब्रह्माजीकी शरणमें गयी। उसके साथ असुरोंद्वारा सताये गये देवता भी थे, जिनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो रहा था। पृथ्वी उन देवताओंके साथ ब्रह्माजीकी दुर्गम सभामें गयी। वहाँ उसने देखा, देवेश्वर ब्रह्मा ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान हो रहे हैं तथा बड़े-बड़े ऋषि, मुनीन्द्र तथा सिद्धेन्द्रगण सानन्द उनकी सेवामें उपस्थित हैं। ब्रह्माजी 'कृष्ण' इस दो अक्षरके परब्रह्मस्वरूप मन्त्रका जप कर रहे थे। उनके नेत्र भक्तिजनित आनन्दके आँसुओंसे भरे थे तथा सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था। मुने! देवताओंस पृथ्वीने भक्तिभावसे चतुराननको प्रणाम किया और दैत्योंके भार आदिका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। आँसूभरे नेत्रों और पुलकित शरीरसे वह ब्रह्माजीकी स्तुति तथा रोदन करने लगी। तब जगद्धाता ब्रह्माने उससे पूछा- भद्रे ! तुम क्यों स्तुति करती और रोती हो? बताओ, किस उद्देश्यसे तुम्हारा आगमन हुआ है ? विश्वास करो, तुम्हारा भला होगा। कल्याणि ! सुस्थिर हो जाओ, मेरे रहते तुम्हें क्या भय है ? इस प्रकार पृथ्वीको आश्वासन देकर ब्रह्माजीने देवताओंसे आदरपूर्वक पूछा- 'देवगण ! किसलिये तुम्हारा मेरे समीप आगमन हुआ है ?' ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर देवतालोग उन प्रजापतिसे बोले - प्रभो ! पृथ्वी दैत्योंके भारसे दबी हुई है तथा हम भी उनके कारण संकटमें पड़ गये हैं। दैत्योंने हमें ग्रस लिया। आप ही जगत्के स्रष्टा हैं, शीघ्र ही हमारा उद्धार कीजिये । ब्रह्मन् ! आप ही इस पृथ्वीकी गति हैं; इसे शान्ति प्रदान करें। पितामह ! यह पृथ्वी जिस भारसे पीड़ित है, उसीसे हम भी दुःखी हैं, अतः आप उस भारका हरण कीजिये ।'
देवताओंकी बात सुनकर जगत्स्स्रष्टा ब्रह्माने पृथ्वीसे पूछा – 'बेटी! तुम भय छोड़कर मेरे पास सुखपूर्वक रहो। पद्मलोचने! बताओ, किनका ऐसा भार आ गया है, जिसे सहन करनेमें तुम असमर्थ हो गयी हो। भद्रे ! मैं उस भारको दूर करूँगा। निश्चय ही तुम्हारा भला होगा। ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर पृथ्वीके मुखपर और नेत्रों में प्रसन्नता छा गयी। वह जिस-जिस कारणसे इस तरह पीड़ित थी, अपनी पीड़ाकी उस कथाको कहने लगी- 'तात! सुनिये, मैं अपने मनकी व्यथा बता रही हूँ। विश्वासी बन्धु बान्धवके सिवा दूसरे किसीको मैं यह बात नहीं बता सकती; क्योंकि स्त्री जाति अबला होती है। अपने सगे बन्धु, पिता, पति और पुत्र सदा उसकी रक्षा करते हैं; परंतु दूसरे लोग निश्चय ही उसकी निन्दा करने लगते हैं। जगत्पिता आपने मेरी सृष्टि की है; अतः आपसे अपने मनकी बात कहनेमें मुझे कोई संकोच नहीं है। मैं जिनके भारसे पीड़ित हूँ, उनका परिचय देती हूँ, सुनिये। 'जो श्रीकृष्णभक्तिसे हीन हैं और जो श्रीकृष्ण भक्तकी निन्दा करते हैं, उन महापातकी मनुष्योंका भार वहन करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। जो अपने धर्मके आचरणसे शून्य तथा नित्यकर्मसे रहित हैं, जिनकी वेदोंमें श्रद्धा नहीं है; उनके भारसे मैं पीड़ित हूँ। जो पिता, माता, गुरु, स्त्री, पुत्र तथा पोष्य-वर्गका पालन-पोषण नहीं करते हैं; उनका भार वहन करनेमें मैं असमर्थ हूँ। पिताजी! जो मिथ्यावादी हैं, जिनमें दया और सत्यका अभाव है तथा जो गुरुजनों और देवताओंकी निन्दा करते हैं; उनके भारसे मुझे बड़ी पीड़ा होती है। जो मित्रद्रोही, कृतघ्र, झूठी गवाही देनेवाले, विश्वासघाती तथा धरोहर हड़प लेनेवाले हैं; उनके भारसे भी मैं पीड़ित रहती हूँ। जो कल्याणमय सूक्तों, साम मन्त्रों तथा एकमात्र मङ्गलकारी श्रीहरिके नामोंका विक्रय करते हैं; उनके भारसे मुझे बड़ा कष्ट होता है। जो जीवघाती, गुरुद्रोही, ग्रामपुरोहित, लोभी, मुर्दा जलानेवाले तथा ब्राह्मण होकर शूद्रान्न भोजन करनेवाले हैं; उनके भारसे मुझे बड़ा कष्ट होता है। जो मूढ़ पूजा, यज्ञ, उपवास व्रत और नियमको तोड़नेवाले हैं उनके भारसे भी मुझे बड़ी पीड़ा होती है। जो पापी सदा गौ, ब्राह्मण, देवता, वैष्णव, श्रीहरि, हरिकथा और हरिभक्तिसे द्वेष करते हैं; उनके भारसे मैं पीड़ित रहती हूँ। विधे! शङ्खचूड़के भारसे जिस तरह मैं पीड़ित थी, उससे भी अधिक दैत्योंके भारसे पीड़ित हूँ। प्रभो! यह सब कष्ट मैंने कह सुनाया। यही मुझ । अनाथाका निवेदन है। यदि आपसे मैं सनाथ हूँ तो आप मेरे कष्टके निवारणका उपाय कीजिये।' यों कहकर वसुधा बार-बार रोने लगी। उसका रोदन सुनकर कृपानिधान ब्रह्माने उससे कहा- 'वसुधे! तुम्हारे ऊपर जो दस्युभूत राजाओंका भार आ गया है, मैं किसी उपायसे अवश्य ही उसे हटाऊँगा।'
पृथ्वीको इस प्रकार आश्वासन देकर देवताओंसहित जगद्धाता ब्रह्मा भगवान् शंकरके निवासस्थान कैलास पर्वतपर गये। वहाँ पहुँचकर विधाताने कैलासके रमणीय आश्रम तथा भगवान् शंकरको देखा। वे गङ्गाजी के तटपर अक्षयवटके नीचे बैठे हुए थे। उन्होंने व्याघ्रचर्म पहन रखा था। दक्षकन्याकी हड्डियोंके आभूषणसे वे विभूषित थे। उन्होंने हाथों में त्रिशूल और पट्टिश धारण कर रखे थे। उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। अनेकानेक सिद्धोंने उन्हें घेर रखा था। वे योगीन्द्रगणसे सेवित थे और कौतूहलपूर्वक गन्धर्वोका संगीत सुन रहे थे। साथ ही अपनी ओर देखती हुई पार्वतीकी ओर प्रेमपूर्वक तिरछी नजरसे देख लेते थे। अपने पाँच मुखोंद्वारा श्रीहरिके एकमात्र मङ्गल नामका जप करते थे। गङ्गाजीमें उत्पन्न कमलोंके बीजोंकी मालासे जप करते समय उनके शरीर में रोमाञ्च हो आता था। इसी समय ब्रह्माजी पृथ्वी तथा नतमस्तक देवसमूहोंके साथ महादेवजीके सामने जा खड़े हुए। जगद्गुरुको आया देख भगवान् शंकर शीघ्र ही भक्तिभावसे उठकर खड़े हो गये। उन्होंने प्रेमपूर्वक मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। तत्पश्चात् सब देवताओंने तथा पृथ्वीने भी भक्तिभावसे चन्द्रशेखर शिवको प्रणाम किया और शिवने उन सबको आशीर्वाद दिया। प्रजापति ब्रह्माने पार्वतीनाथ शिवसे सारा वृत्तान्त कहा वह सब सुनकर भक्तवत्सल शंकरने तुरंत ही मुँह नीचा कर लिया। भक्तोंपर कष्ट आया सुनकर पार्वती और परमेश्वर शिवको बड़ा दुःख हुआ। तदनन्तर ब्रह्मा और शिवने देवसमूहों तथा वसुधाको यत्नपूर्वक सान्त्वना देकर घरको लौटा दिया। फिर वे दोनों देवेश्वर तुरंत धर्मके घर आये और उनके साथ विचार-विमर्श करकेवे तीनों श्रीहरिके धामको चल दिये। भगवान्के उस परम धामका नाम वैकुण्ठ है। वह जरा और मृत्युको दूर भगानेवाला है। ब्रह्माण्डसे ऊपर उसकी स्थिति है। वह उत्तम लोक मानो वायुके आधारपर स्थित है। (वास्तवमें वह चिन्मय लोक श्रीहरिसे भिन्न न होनेके कारण अपने आपमें ही स्थित है। उसका दूसरा कोई आधार नहीं है।) उस सनातन धामकी स्थिति ब्रह्मलोकसे एक करोड़ योजन ऊपर है। दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित विचित्र वैकुण्ठधामका वर्णन कर पाना कवियोंके लिये असम्भव है। पद्मराग और नीलमणिके बने हुए राजमार्ग उस धामकी शोभा बढ़ाते हैं। मनके समान तीव्र गतिसे जानेवाले वे ब्रह्मा, शिव और धर्म सब के-सब उस मनोहर वैकुण्ठधाममें जा पहुँचे। श्रीहरिके अन्तःपुरमें पहुँचकर उन सबने वहाँ उनके दर्शन किये। वे श्रीहरि दिव्य रत्नमय अलङ्कारोंसे विभूषित हो रत्नसिंहासनपर बैठे थे। रत्नोंके बाजूबंद, कंगन नूपुर उनके हाथ- पैरोंकी शोभा बढ़ाते थे। दिव्य रत्नोंके बने हुए दो कुण्डल उनके दोनों गालोंपर झलमला रहे थे। उन्होंने पीताम्बर पहन रखा था तथा आजानुलम्बिनी वनमाला उनके अग्रभागको विभूषित कर रही थी। सरस्वतीके प्राणवल्लभ श्रीहरि शान्तभावसे बैठे थे। लक्ष्मीजी उनके चरणारविन्दोंकी सेवा कर रही थीं। करोड़ों कन्दर्पोकी लावण्यलीलासे वे प्रकाशित हो रहे थे। उनके चार भुजाएँ थीं और मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षद उनकी सेवामें जुटे थे। उनका सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित था तथा उनका मस्तक रत्नमय मुकुटसे जगमगा रहा था। वे परमानन्द स्वरूप भगवान् भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल दिखायी देते थे। मुने! ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंने भक्तिभावसे उनके चरणोंमें प्रणाम किया और श्रद्धापूर्वक मस्तक झुकाकर बड़ी भक्तिके साथ उनकी स्तुति की। उस समय वे परमानन्दके भारसे दबे हुए थे। उनके अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था।
ब्रह्माजी बोले-
मैं शान्त, सर्वेश्वर तथा अच्युत उन कमलाकान्तको प्रणाम करता हूँ, जिनकी हम तीनों विभिन्न कलाएँ हैं तथा समस्त देवता जिनकी कलाकी भी अंशकलासे उत्पन्न हुए हैं। निरञ्जन! मनु, मुनीन्द्र, मानव तथा चराचर प्राणी आपसे ही आपके कलाकी अंशकलाद्वारा प्रकट हुए हैं।
भगवान् शंकरने कहा-
आप अविनाशी तथा अविकारी हैं। योगीजन आपमें रमण करते हैं। आप अव्यक्त ईश्वर हैं। आपका आदि नहीं है; परंतु आप सबके आदि हैं। आपका स्वरूप आनन्दमय है। आप सर्वरूप हैं अणिमा आदि सिद्धियोंके कारण तथा सबके कारण हैं। सिद्धिके ज्ञाता, सिद्धिदाता और सिद्धिरूप हैं। आपकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है ?
धर्म बोले -
जिस वस्तुका वेदमें निरूपण किया गया है, उसीका विद्वान् लोग वर्णन कर सकते हैं। जिनको वेदमें ही अनिर्वचनीय कहा गया है, उनके स्वरूपका निरूपण कौन कर सकता है? जिसके लिये जिस वस्तुकी सम्भावना की जाती है, वह गुणरूप होती है। वही उसका स्तवन है। जो निरञ्जन (निर्मल) तथा गुणोंसे पृथक्-निर्गुण हैं; उन परमात्माकी मैं क्या स्तुति करूँ? महामुने! ब्रह्मा आदिका किया हुआ यह स्तोत्र जो छः श्लोकोंमें वर्णित है, पढ़कर मनुष्य दुर्गम संकटसे मुक्त होता और मनोवाञ्छित फलको पाता है।
देवताओंकी स्तुति सुनकर साक्षात् श्रीहरिने उनसे कहा- तुम सब लोग गोलोकको जाओ। पीछेसे मैं भी लक्ष्मीके साथ आऊँगा। श्वेतद्वीपनिवासी वे नर और नारायण मुनि तथा सरस्वतीदेवी- ये गोलोकमें जायँगे। अनन्तशेषनाग, मेरी माया, कार्तिकेय, गणेश तथा वेदमाता सावित्री- ये सब पीछेसे निश्चित ही वहाँ जायँगे। वहाँ मैं गोपियों तथा राधाके साथ द्विभुज श्रीकृष्णरूपसे निवास करता हूँ। यहाँ सुनन्द आदि पार्षदों तथा लक्ष्मीके साथ रहता हूँ। नारायण, श्रीकृष्ण तथा श्वेतद्वीपनिवासी विष्णु मैं ही हूँ। ब्रह्मा आदि अन्य सम्पूर्ण देवता मेरी ही कलाएँ हैं। देव, असुर और मनुष्य आदि प्राणी मेरी कलाकी अंशकलाकी कलासे उत्पन्न हुए हैं। तुमलोग गोलोकको जाओ। वहाँ तुम्हारे अभीष्ट कार्यकी सिद्धि होगी। फिर हमलोग भी सबकी इष्टसिद्धिके लिये वहाँ आ जायेंगे।
इतना कहकर श्रीहरि उस सभामें चुप हो गये। तब उन सब देवताओंने उन्हें प्रणाम किया और वहाँसे अद्भुत गोलोककी यात्रा की। वह उत्कृष्ट एवं विचित्र परम धाम जरा एवं मृत्युको हर लेनेवाला है। वह अगम्य लोक वैकुण्ठसे पचास करोड़ योजन ऊपर है और भगवान् श्रीकृष्णकी इच्छासे निर्मित है। उसका कोई बाह्य आधार नहीं है। श्रीकृष्ण ही वायुरूपसे उसे धारण करते हैं। वे ब्रह्मा आदि देवता उस अनिर्वचनीय लोककी ओर जानेके लिये उन्मुख हो चल दिये। उन सबकी गति मनके समान तीव्र थी। अतः वे सब-के-सब विरजाके तटपर जा पहुँचे। सरिताके तटका दर्शन करके उन देवताओंको बड़ा आश्चर्य हुआ विरजा नदीका वह तटप्रान्त शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल, अत्यन्त विस्तृत और मनोहर था, मोती माणिक्य तथा उत्कृष्ट मणिरत्नोंकी खानोंसे सुशोभित था। काले, उज्ज्वल, हरे तथा लाल रत्नोंकी श्रेणियोंसे उद्भासित होता था। उस तटपर कहीं तो मूँगोंके अङ्कुर प्रकट हुए हैं, जो अत्यन्त मनोहर दिखायी देते हैं। कहीं बहुमूल्य उत्तम रत्नोंकी अनेक खानें उसकी शोभा बढ़ाती हैं। कहीं श्रेष्ठ निधियोंके आकर उपलब्ध होते हैं, जिनसे वहाँकी छटा आश्चर्यमें डाल देती है। वह दृश्य विधाताके भी दृष्टिपथमें आनेवाला नहीं है। मुने! विरजाके किनारे कहीं तो पद्मराग और इन्द्रनील मणियोंकी खानें हैं, कहीं मरकतमणिकी खानें श्रेणीबद्ध दिखायी देती हैं, कहीं स्यमन्तकमणिकी तथा कहीं स्वर्णमुद्राओंकी खानें शोभा पाती हैं। कहीं बहुमूल्य पीले रंगकी मणिश्रेणियोंके आकर विरजातटको अलंकृत करते हैं। कहीं रत्नोंके, कहीं कौस्तुभमणिके और कहीं अनिर्वचनीय मणियोंके उत्तम आकर हैं। विरजाके उस तट प्रान्तमें कहीं-कहीं उत्तम रमणीय विहारस्थल उपलब्ध होते हैं।
उस परम आश्चर्यजनक तटको देखकर वे देवेश्वर नदीके उस पार गये। वहाँ जानेपर उन्हें पर्वतों में श्रेष्ठ शतशृंग दिखायी दिया, जो अपनी शोभासे मनको मोहे लेता था। दिव्य पारिजात वृक्षोंकी वनमालाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। वह पर्वत कल्पवृक्षों तथा कामधेनुओंद्वारा सब ओरसे घिरा था। उसकी ऊँचाई एक करोड़ योजन थी और लंबाई दस करोड़ योजन। उसके ऊपरकी चौरस भूमि पचास करोड़ योजन विस्तृत थी। वह पर्वत चहारदीवारीकी भाँति गोलोकके चारों ओर फैला हुआ था। उसीके शिखरपर उत्तम गोलाकार रासमण्डल है, जिसका विस्तार दस योजन है। वह रासमण्डल सुगन्धित पुष्पोंसे भरे हुए सहस्रों उद्यानोंसे सुशोभित है और उन उद्यानों में भ्रमर-समूह छाये रहते हैं। सुन्दर रत्नों और द्रव्योंसे सम्पन्न अगणित क्रीडाभवन तथा कोटि सहस्र रत्नमण्डप उसकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्नमयी सीढ़ियों, श्रेष्ठ रत्ननिर्मित कलशों तथा इन्द्रनीलमणिके शोभाशाली खम्भोंसे उस मण्डलकी शोभा और बढ़ गयी है। उन खम्भोंमें सिन्दूरके समान रंगवाली मणियाँ सब ओर जड़ी गयी हैं तथा बीच बीचमें लगे हुए मनोहर इन्द्रनील नामक रनोंसे वे मण्डित हैं। रत्नमय परकोटोंमें जटित भाँति-भाँतिके मणिरत्न उस रासमण्डलकी श्रीवृद्धि करते हैं। उसमें चारों दिशाओंकी ओर चार दरवाजे हैं, जिनमें सुन्दर किंवाड़ लगे हुए हैं। उन दरवाजोंपर रस्सियोंमें गुँथे हुए आम्रपल्लव बन्दनवारके रूपमें शोभा दे रहे हैं। वहाँ दोनों ओर झुंड-के-झुंड केलेके खम्भे आरोपित हुए हैं। श्वेतधान्य, पल्लवसमूह, फल तथा दूर्वादल आदि मङ्गलद्रव्य उस मण्डलकी शोभा बढ़ाते हैं।
चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमयुक्त जलका वहाँ सब ओर छिड़काव हुआ है।
मुने! रत्नमय अलंकारों तथा रत्नोंकी मालाओंसे अलंकृत करोड़ों गोपकिशोरियों के समूहसे रासमण्डल घिरा हुआ है। वे गोपकुमारियाँ रत्नोंके बने हुए कंगन, बाजूबंद और नूपुरोंसे विभूषित हैं। रत्ननिर्मित युगल कुण्डल उनके गण्डस्थलकी शोभा बढ़ाते हैं। उनके हाथोंकी अंगुलियाँ रत्नोंकी बनी हुई अँगूठियोंसे विभूषित हो बड़ी सुन्दर दिखायी देती हैं। रत्नमय पाशकसमूहों (बिछुओं) से उनके पैरोंकी अंगुलियाँ उद्भासित होती हैं। वे गोपकिशोरियाँ रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके मस्तक उत्तम रत्नमय मुकुटोंसे जगमगा रहे हैं। नासिकाके मध्यभागमें गजमुक्ताकी बुलाकें बड़ी शोभा दे रही हैं। उनके भालदेशमें सिन्दूरकी बेंदी लगी हुई है। साथ ही आभूषण पहननेके स्थानों में दिव्य आभूषण धारण करनेके कारण उनकी दिव्य प्रभा और भी उद्दीप्त हो उठी है। उनकी अङ्गकान्ति मनोहर चम्पाके समान जान पड़ती है। वे सब की सब चन्दन-द्रवसे चर्चित हैं। उनके अङ्गोंपर पीले रंगकी रेशमी साड़ी शोभा देती है। बिम्बफलके समान अरुण अधर उनकी मनोहरता बढ़ा रहे हैं। शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाओंकी चटकीली चाँदनी जैसी प्रभासे सेवित मुख उनके उद्दीप्त सौन्दर्यको और भी उज्ज्वल बना रहे हैं। उनके नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनमें कस्तूरी पत्रिकासे युक्त काजलकी रेखा शोभा वृद्धि कर रही है। उनके केशपाश प्रफुल्ल मालती पुष्पकी मालाओंसे सुशोभित हैं, जिनपर मधुलोलुप भ्रमरोंके समूह मँडरा रहे हैं। उनकी मनोहर मन्दगति गजराजके गर्वका गंजन करनेवाली है। बाँकी भाँहोंके साथ मन्द मुस्कानकी शोभासे वे मनको मोह लेती हैं। पके हुए अनारके दानोंकी भाँति चमकीली दन्तपंक्ति उनके मुखकी शोभाको बढ़ा देती है। पक्षिराज गरुड़की चोंचकी शोभासे सम्पन्न उन्नत नासिकासे वे सब की सब विभूषित हैं। गजराजके युगल गण्डस्थलकी भाँति उन्नत उरोजोंके भारसे वे झुकी सी जान पड़ती हैं। उनका हृदय श्रीकृष्णविषयक अनुरागके देवता कन्दर्पके बाण प्रहारसे जर्जर हुआ रहता है। वे दर्पणों में पूर्ण चन्द्रमाके समान अपने मनोहर मुखके सौन्दर्यको देखनेके लिये उत्सुक रहती हैं। श्रीराधिकाके चरणारविन्दोंकी सेवामें निरन्तर संलग्न रहनेका सौभाग्य सुलभ हो, यही उनका मनोरथ है। ऐसी गोपकिशोरियों से भरा पूरा वह रासमण्डल श्रीराधिकाकी आज्ञासे सुन्दरियोंके समुदायद्वारा रक्षित है— असंख्य सुन्दरियाँ उसकी रक्षामें नियुक्त रहती हैं।
श्वेत, रक्त एवं लोहित वर्णवाले कमलोंसे व्याप्त एवं सुशोभित लाखों क्रीड़ा-सरोवर रासमण्डलको सब ओरसे घेरे हुए हैं, जिनमें असंख्य भ्रमरोंके समुदाय गूँजते रहते हैं। सहस्रों पुष्पित उद्यान तथा फूलोंकी शय्याओंसे संयुक्त असंख्य कुञ्ज कुटीर रासमण्डलकी सीमामें यत्र तत्र शोभा पा रहे हैं। उन कुटीरोंमें भोगोपयोगी द्रव्य, कर्पूर, ताम्बूल, वस्त्र, रत्नमय प्रदीप, श्वेत चँवर, दर्पण तथा विचित्र पुष्पमालाएँ सब ओर सजाकर रखी गयी हैं। इन समस्त उपकरणों से रासमण्डलकी शोभा बहुत बढ़ गयी है। उस रासमण्डलको देखकर जब वे पर्वतकी सीमासे बाहर हुए तो उन्हें विलक्षण, रमणीय और सुन्दर वृन्दावनके दर्शन हुए। वृन्दावन राधा माधवको बहुत प्रिय है। वह उन्हीं दोनोंका क्रीडास्थल है। उसमें कल्पवृक्षोंके समूह शोभा पाते हैं। विरजा तीरके नीरसे भीगे हुए मन्द समीर उस वनके वृक्षोंको शनैः शनैः आन्दोलित करते रहते हैं। कस्तूरीयुक्त पल्लवोंका स्पर्श करके चलनेवाली मन्द वायुका सम्पर्क पाकर वह सारा वन सुगन्धित बना रहता है। वहाँके वृक्षोंमें नये-नये पल्लव निकले रहते हैं। वहाँ सर्वत्र कोकिलोंकी काकली सुनायी देती है। वह वनप्रान्त कहीं तो केलिकदम्बोंके समूहसे कमनीय और कहीं मन्दार, चन्दन, चम्पा तथा अन्यान्य सुगन्धित पुष्पोंकी सुगन्धसे सुवासित देखा जाता है। आम, नारंगी, कटहल, ताड़, नारियल, जामुन, बेर, खजूर, सुपारी, आमड़ा, नीबू, केला, बेल और अनार आदि मनोहर वृक्ष-समूहों तथा सुपक्व फलोंसे लदे हुए दूसरे दूसरे वृक्षोंद्वारा उस वृन्दावनकी अपूर्व शोभा हो रही है। प्रियाल, शाल, पीपल, नीम, सेमल, इमली तथा अन्य वृक्षोंके शोभाशाली समुदाय उस वनमें सब ओर सदा भरे रहते हैं। कल्पवृक्षोंके समूह उस वनकी शोभा बढ़ाते हैं। मल्लिका (मोतिया या बेला), मालती, कुन्द, केतकी, माधवी लता और जूही इत्यादि लताओंके समूह वहाँ सब ओर फैले हैं। मुने! वहाँ रत्नमय दीपोंसे प्रकाशित तथा धूपकी गन्धसे सुवासित असंख्य कुञ्ज कुटीर उस वनमें शोभा पाते हैं। उनके भीतर शृङ्गारोपयोगी द्रव्य संगृहीत हैं। सुगन्धित वायु उन्हें सुवासित करती रहती है। वहाँ चन्दनका छिड़काव हुआ है। उन कुटीरोंके भीतर फूलोंकी शय्याएँ बिछी हैं, जो पुष्पमालाओंकी जालीसे सुशोभित हैं। मधु लोलुप मधुपोंके मधुर गुञ्जारवसे वृन्दावन मुखरित रहता है। रत्नमय अलंकारोंकी शोभासे सम्पन्न गोपाङ्गनाओंके समूहसे वह वन आवेष्टित है। करोड़ों गोपियाँ श्रीराधाकी आज्ञासे उसकी रक्षा करती हैं। उस वनके भीतर सुन्दर सुन्दर और मनोहर बत्तीस कानन हैं। वे सभी उत्तम एवं निर्जन स्थान हैं। मुने! वृन्दावन सुपक्व, मधुर एवं स्वादिष्ट फलोंसे सम्पन्न तथा गोष्ठों और गौओंके समूहोंसे परिपूर्ण है। वहाँ सहस्रों पुष्पोद्यान सदा खिले और सुगन्धसे भरे रहते हैं, उनमें मधुलोभी भ्रमरोंके समुदाय मधुर गुञ्जन करते फिरते हैं। श्रीकृष्णके तुल्य रूपवाले तथा उत्तम रत्न- हारसे विभूषित पचास करोड़ गोपोंके विविध विलासोंसे विलसित रमणीय वृन्दावनको देखते हुए वे देवेश्वरगण गोलोकधाममें जा पहुँचे, जो चारों ओरसे गोलाकार तथा कोटि योजन विस्तृत है। वह सब ओरसे रत्नमय परकोटोंद्वारा घिरा हुआ है। मुने! उसमें चार दरवाजे हैं। उन दरवाजोंपर द्वारपालोंके रूपमें विराजमान गोप- समूह उनकी रक्षा करते हैं। श्रीकृष्णकी सेवामें लगे रहनेवाले गोपोंके आश्रम भी रत्नोंसे जटित तथा नाना प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न हैं। उन आश्रमोंकी संख्या भी पचास करोड़ है। इनके सिवा भक्त गोप-समूहोंके सौ करोड़ आश्रम हैं, जिनका निर्माण पूर्वोक्त आश्रमोंसे भी अधिक सुन्दर है। वे सब के सब उत्तम रत्नोंसे गठित हैं। उनसे भी अधिक विलक्षण तथा बहुमूल्य रत्नोंद्वारा रचित आश्रम पार्षदोंके हैं, जिनकी संख्या दस करोड़ है। पार्षदोंमें भी जो प्रमुख लोग हैं, वे श्रीकृष्णके समान रूप धारण करके रहते हैं। उनके लिये उत्तम रत्नोंसे निर्मित एक करोड़ आश्रम हैं। राधिकाजीमें विशुद्ध भक्ति रखनेवाली गोपाङ्गनाओंके बत्तीस करोड़ दिव्य एवं श्रेष्ठ आश्रम हैं, जिनकी रचना उत्तम श्रेणीके रत्नोंद्वारा हुई है। उनकी जो किंकरियाँ हैं, उनके लिये भी मणिरल आदिके द्वारा बड़े सुन्दर और मनोहर भवन बनाये गये हैं, जिनकी संख्या दस करोड़ है। ये सभी दिव्य आश्रम और भवन वृन्दावनकी शोभाका विस्तार करते हैं।
सैकड़ों जन्मोंकी तपस्याओंसे पवित्र हुए जो भक्तजन भारतवर्षकी भूमिपर श्रीहरिकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं, वे कर्मोंके शान्त कर देनेवाले हैं उनके कर्मबन्धन नष्ट हो जाते हैं। मुने! जो सोते, जागते हर समय अपने मनको श्रीहरिके ही ध्यानमें लगाये रहते हैं तथा दिन-रात 'राधाकृष्ण', 'श्रीकृष्ण' इत्यादि नामोंका जप किया करते हैं; उन श्रीकृष्ण भक्तोंके लिये भी
वहाँ गोलोकमें बड़े मनोहर निवासस्थान बने हुए हैं। उत्तम मणिरत्नों द्वारा निर्मित वे भव्य भवन भाँति-भाँतिके भोगोंसे सम्पन्न हैं। पुष्प-शय्या, पुष्पमाला तथा श्वेत चामरसे सुशोभित हैं। रत्नमय दर्पणोंकी शोभासे पूर्ण हैं। उनमें इन्द्रनील मणियाँ जड़ी गयी हैं। उन भवनोंके शिखरोंपर बहुमूल्य रत्नमय कलशसमूह शोभा देते हैं। उनकी दीवारोंपर महीन वस्त्रोंके आवरण पड़े हुए हैं। ऐसे भवनोंकी संख्या भी सौ करोड़ है।
उस अद्भुत धामका दर्शन करके वे देवता बड़ी प्रसन्नता के साथ जब कुछ दूर और आगे गये, तब वहाँ उन्हें रमणीय अक्षयवट दिखायी दिया। मुने! उस वृक्षका विस्तार पाँच योजन और ऊँचाई दस योजन है। उसमें सहस्रों तनें और असंख्य शाखाएँ शोभा पाती हैं। वह वृक्ष लाल लाल पके फलोंसे व्याप्त है। रत्नमयी वेदिकाएँ। उसकी शोभा बढ़ाती हैं। उस वृक्षके नीचे बहुत से गोप-शिशु दृष्टिगोचर हुए, जिनका रूप श्रीकृष्णके ही समान था। वे सब के सब पीतवस्त्रधारी और मनोहर थे तथा खेल-कूदमें लगे हुए थे। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे और वे सभी रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे। देवेश्वरोंने वहाँ उन सबके दर्शन किये। वे सभी श्रीहरिके श्रेष्ठ पार्षद थे।
मुने! वहाँसे थोड़ी ही दूरपर उन्हें एक मनोहर राजमार्ग दिखायी दिया, जिसके दोनों पार्श्वमें लाल मणियोंसे अद्भुत रचना की गयी थी। इन्द्रनील, पद्मराग, हीरे और सुवर्णकी बनी हुई वेदियाँ उस राजमार्गके उभय पार्श्वको सुशोभित कर रही थीं। दोनों ओर रत्नमय विश्राम मण्डप शोभा पाते थे। उस मार्गपर चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे मिश्रित जलका छिड़काव किया गया था। पल्लव, लाजा, फल, पुष्प, दूर्वा तथा सूक्ष्म सूत्रमें गुँथे हुए चन्दन-पल्लवोंकी बन्दनवारसे युक्त सहस्रों कदली- स्तम्भोंके समूह उस राजमार्गके तटप्रान्तकी शोभा बढ़ाते थे। उन सबपर कुंकुम केसर छिड़के गये थे। जगह जगह उत्तम रत्नोंके बने हुए मङ्गलघट स्थापित थे, उनमें फल और शाखाओंसहित पल्लव शोभा पाते थे। सिन्दूर, कुंकुम, गन्ध और चन्दनसे उनकी अर्चना की गयी थी। पुष्पमालाओंसे विभूषित हुए वे मङ्गलकलश उभयपार्श्वमें उस राजमार्गकी शोभावृद्धि करते थे। क्रीडामें तत्पर हुई झुंड- की-झुंड गोपिकाएँ उस मार्गको घेरे खड़ी थीं। उपर्युक्त मनोरम प्रदेश चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे चर्चित थे। बहुमूल्य रत्नोंसे वहाँ मणिमय सोपानोंका निर्माण किया गया था। कुल मिलाकर सोलह द्वार थे, जो अग्निशुद्ध रमणीय चिन्मय वस्त्रों, श्वेत चामरों, दर्पणों, रत्नमयी शय्याओं तथा विचित्र पुष्पमालाओंसे शोभायमान थे। बहुत से द्वारपाल उन प्रदेशोंकी रक्षा करते थे। उनके चारों ओर खाइयाँ थीं और लाल रंगके परकोटोंसे वे घिरे हुए थे। इन मनोरम प्रदेशोंका दर्शन करके देवता वहाँसे आगे बढ़नेको उद्यत हुए। वे जल्दी-जल्दी कुछ दूरतक गये। तब वहाँ उन्हें रासेश्वरी श्रीराधाका आश्रम दिखायी दिया। नारद! देवताओंकी आदिदेवी गोपीशिरोमणि श्रीकृष्णप्राणाधिका राधिकाका वह निवासस्थान बड़ा ही सुन्दर बनाया गया था। रमणीय द्रव्योंके कारण उसकी मनोहरता बहुत बढ़ गयी थी। वहाँका सब कुछ सबके लिये अनिर्वचनीय था। बड़े से बड़े विद्वान् भी उस स्थानका सम्यक् वर्णन नहीं कर सके हैं। वह मनोहर आश्रम गोलाकार बना है तथा उसका विस्तार बारह कोसका है। उसमें सौ मन्दिर बने हुए हैं। वह अद्भुत आश्रम दिव्य रत्नोंके तेजसे जगमगाता रहता है। बहुमूल्य रत्नोंके सार समूहसे उसकी रचना हुई है। वह दुर्लङ्घय एवं गहरी खाइयोंसे सुशोभित है। कल्पवृक्ष उस आश्रमको सब ओरसे घेरे हुए हैं। उसके भीतर सैकड़ों पुष्पोद्यान शोभा पाते हैं। बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित परकोटोंसे वह आश्रममण्डल घिरा हुआ है। उसमें सात दरवाजे हैं, जो सभी उत्तम रत्नोंकी बनी हुई वेदिकाओंसे युक्त हैं। उन दरवाजों में विचित्र रत्न जड़े गये हैं और नाना प्रकारके चित्र बने हैं। क्रमशः बने हुए इन सातों द्वारोंको पार करनेपर वह आश्रम सोलह द्वारोंसे युक्त है। देवताओंने देखा उसकी चहारदीवारी सहस्र धनुष ऊँची है। उत्तम रत्नोंके बने हुए अत्यन्त मनोहर छोटे-छोटे कलशोंके समुदाय अपने तेजसे उस परकोटेको उद्भासित कर रहे हैं। उसे देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। वे उसकी परिक्रमा करते हुए बड़ी प्रसन्नता के साथ कुछ दूर और आगे गये सामने चलते हुए वे इतने आगे बढ़ गये कि वह आश्रम उनसे पीछे हो गया। मुने! तदनन्तर उन्होंने गोपों और गोपिकाओंके उत्तम आश्रम देखे, जिनमें बहुमूल्य रत्न जड़े हुए हैं। उनकी संख्या सौ करोड़ है। इस प्रकार सब ओर गोपों और गोपिकाओंके सम्पूर्ण आश्रमको तथा अन्य नये-नये रमणीय स्थलोंको देखते-देखते उन देवेश्वरोंने समस्त गोलोकका निरीक्षण किया। वह सब देखकर उनके शरीर में रोमाञ्च हो आया। तदनन्तर फिर वही गोलाकार रम्य वृन्दावन, शतश्रृंग पर्वत तथा उसके बाहर विरजा नदी दिखायी दी। विरजा नदीके बाद देवताओंने सब कुछ सूना ही देखा वह अद्भुत गोलोक उत्तम रत्नोंसे निर्मित तथा वायुके आधारपर स्थित था श्रीराधिकाकी आज्ञाका अनुसरण करते हुए परमेश्वर श्रीकृष्णकी इच्छासे उसका निर्माण हुआ है। वह केवल मङ्गलका धाम है और सहस्त्रों सरोवरोंसे सुशोभित है। मुने! देवताओंने वहाँ अत्यन्त मनोहर नृत्य तथा सुन्दर तालसे युक्त रमणीय संगीत देखा, जहाँ श्रीराधा कृष्णके गुणोंका अनुवाद हो रहा था। उस अमृतोपम गीतको सुनते ही वे देवता मूच्छित हो गये। फिर क्षणभरमें सचेत हो मन- ही-मन श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए उन्होंने स्थान-स्थानपर परम आश्चर्यमय मनोहर दृश्य देखे। नाना प्रकारके वेश धारण किये समस्त गोपिकाएँ उनके दृष्टिपथमें आयीं। कोई अपने हाथोंसे मृदंग बजा रही थीं तो किन्हींके हाथोंसे वीणा वादन हो रहा था। किन्हींके हाथमें चँवर थे तो किन्हींके करताल किन्हींके हाथों में मन्त्रवाद्य शोभा रहे थे। कितनी ही रत्नमय नूपुरोंकी झनकार फैला रही थीं। बहुतोंकी रत्नमयी काञ्ची बज रही थी, जिसमें क्षुद्रघंटिकाओंके शब्द गूँज रहे थे। किन्हींके माथेपर जलसे भरे घड़े थे, जो भाँति-भाँतिके नृत्यके प्रदर्शनका मनोरथ लिये खड़ी थीं। नारद! कुछ दूर और आगे जानेपर उन्होंने बहुत से आश्रम देखे, जो राधाकी प्रधान सखियोंके आवासस्थान थे। वे रूप, गुण, वेश, यौवन, सौभाग्य और अवस्थामें एक-दूसरीके समान थीं। श्रीराधाकी समवयस्का सखियाँ तैंतीस गोपियाँ हैं, जिनकी वेश-भूषा अनिर्वचनीय है। उनके नाम सुनो - सुशीला, शशिकला, यमुना, माधवी, रति, कदम्बमाला, कुन्ती, जाह्नवी, स्वयंप्रभा, चन्द्रमुखी, पद्ममुखी, सावित्री, सुधामुखी, शुभा, पद्मा पारिजाता, गौरी, सर्वमङ्गला, कालिका, कमला, दुर्गा, भारती, सरस्वती, गङ्गा, अम्बिका, मधुमती, चम्पा, अपर्णा, सुन्दरी, कृष्णप्रिया, सती, नन्दिनी और नन्दना ये सब की सब समान रूपवाली हैं। इनके शुभ्र आश्रम रत्नों और धातुओंसे चित्रित हैं। नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित होनेके कारण वे अत्यन्त मनोहर प्रतीत होते हैं। उनके शिखर बहुमूल्य रत्नमय कलश समूहोंसे जाज्वल्यमान हैं। उत्तम रत्नोंद्वारा उनकी रचना हुई है। गोलोक ब्रह्माण्डसे बाहर और ऊपर है उससे ऊपर दूसरा कोई लोक नहीं है। ऊपर सब कुछ शून्य ही है। वहींतक सृष्टिकी अन्तिम सीमा है। सात रसातलोंसे भी नीचे सृष्टि नहीं है, रसातलोंसे नीचे जल और अन्धकार है, जो अगम्य और अदृश्य है। (अध्याय ४)
Summary of chapter 2 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
Distressed by the tyranny of wicked Asura kings such as Kaṃsa, Jarasandha, and Shishupāla who had plunged the world into adharma and suffering, the personified Earth goddess assumed the form of a weeping cow and approached Lord Brahmā for shelter. Lord Brahmā, along with Lord Śiva and all the principal Devas, traveled to the shores of the cosmic ocean to offer heart-wrenching prayers of refuge to the Supreme Lord Śrī Vishṇu. Listening to their appeals, an ethereal divine voice resonated from the heavens, assuring the assembled deities that the Supreme Lord Śrī Kṛshṇa would soon descend into the prison of Mathura to relieve the earth of her burden and establish eternal righteousness.