भगवान् श्रीनारायण कहते हैं-
नारद ! सुनो। अब मैं पुनः श्रीकृष्ण लीलाका वर्णन करता हूँ। यह वह लीला है, जिसमें गोपियोंके चीरका अपहरण हुआ और उन्हें मनोवाञ्छित वरदान दिया गया। हेमन्तके प्रथम मास मार्गशीर्ष में गोपाङ्गनाएँ प्रेमके वशीभूत हो प्रतिदिन केवल एक बार हविष्यान्न ग्रहण करके पूर्णतः संयमशील हो पूरे महीनेभर भक्तिभावसे व्रत करती रहीं। वे नहाकर यमुनाके तटपर पार्वतीकी बालुकामयी मूर्ति बना उसमें देवीका आवाहन करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक नित्यप्रति पूजा किया करती थीं। मुने! गोपियाँ चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुंकुम, नाना प्रकारके मनोहर पुष्प, भाँति-भाँतिके पुष्पहार, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र, अनेकानेक फल, मणि, मोती और मूँगे चढ़ाकर तथा अनेक प्रकारके बाजे बजाकर प्रतिदिन देवीकी पूजा सम्पन्न करती थीं।
हे देवि जगतां मातः सृष्टिस्थित्यन्तकारिणि ।
नन्दगोपसुतं कान्तमस्मभ्यं देहि सुव्रते ॥
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली हे देवि! हे जगदम्ब! तुम्हीं जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली हो; तुम हमें नन्दगोप नन्दन श्यामसुन्दरको ही प्राणवल्लभ पतिके रूपमें प्रदान करो।' इस मन्त्रसे देवेश्वरी दुर्गाकी मूर्ति बनाकर संकल्प करके मूलमन्त्रसे उनका पूजन करे । सामवेदोक्त मूलमन्त्र बीजमन्त्रसहित इस प्रकार है―
ॐ श्रीदुर्गायै सर्वविघ्नविनाशिन्यै नमः ।
इसी मन्त्रसे सब गोपकुमारियाँ भक्तिभाव और प्रसन्नता के साथ देवीको फूल, माला, नैवेद्य, धूप, दीप और वस्त्र चढ़ाती थीं। मूँगेकी मालासे भक्तिपूर्वक इस मन्त्रका एक सहस्र जप और स्तुति करके वे धरतीपर माथा टेककर देवीको प्रणाम करती थीं। उस समय कहतीं कि 'समस्त मङ्गलोंका भी मङ्गल करनेवाली और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली शंकरप्रिये देवि शिवे ! तुम्हें नमस्कार है। तुम मुझे मनोवाञ्छित वस्तु दो।' यों कह नमस्कार करके दक्षिणा दे सारे नैवेद्य ब्राह्मणोंको अर्पित करके वे घरको चली जाती थीं।
भगवान् श्रीनारायण कहते हैं-
मुने ! अब तुम देवीका वह स्तवराज सुनो, जिससे सब गोपकिशोरियाँ भक्तिपूर्वक पार्वतीजीका स्तवन करती थीं, जो सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाली हैं। जब सारा जगत् घोर एकार्णवमें डूब गया था; चन्द्रमा और सूर्यकी भी सत्ता नहीं रह गयी थी; कज्जलके समान जलराशिने समस्त चराचर विश्वको आत्मसात् कर लिया था; उस पुरातन कालमें जलशायी श्रीहरिने ब्रह्माजीको इस स्तोत्रका उपदेश दिया। उपदेश देकर उन जगदीश्वरने योगनिद्राका आश्रय लिया। तदनन्तर उनके नाभिकमलमें विराजमान ब्रह्माजी जब मधु और कैटभसे पीड़ित हुए, तब उन्होंने इसी स्तोत्र मूलप्रकृति ईश्वरीका स्तवन किया।
'ॐ नमो जय दुर्गायै'
ब्रह्मा बोले-
दुर्गे! शिवे! अभये! माये ! नारायणि ! सनातनि ! जये! मुझे मङ्गल प्रदान करो। सर्वमङ्गले! तुम्हें मेरा नमस्कार है। दुर्गाका 'दकार' दैत्यनाशरूपी अर्थका वाचक कहा गया है। 'उकार' विघ्ननाशरूपी अर्थका बोधक है। उसका यह अर्थ वेदसम्मत है। 'रेफ' रोगनाशक अर्थको प्रकट करता है। 'गकार' पापनाशक अर्थका वाचक है। और 'आकार' भय तथा शत्रुओंके नाशका प्रतिपादक कहा गया है। जिनके चिन्तन, स्मरण और कीर्तनसे ये दैत्य आदि निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं; वे भगवती दुर्गा श्रीहरिकी शक्ति कही गयी हैं। यह बात किसी औरने नहीं, साक्षात् श्रीहरिने ही कही है। 'दुर्ग' शब्द विपत्तिका वाचक है और 'आकार' नाशका। जो दुर्ग अर्थात् विपत्तिका नाश करनेवाली हैं; वे देवी ही सदा 'दुर्गा' कही गयी हैं। 'दुर्ग' शब्द दैत्यराज दुर्गमासुरका वाचक है और 'आकार' नाश अर्थका बोधक है। पूर्वकालमें देवीने उस दुर्गमासुरका नाश किया था; इसलिये विद्वानोंने उनका नाम 'दुर्गा' रखा। शिवा शब्दका 'शकार' कल्याण अर्थका, 'इकार' उत्कृष्ट एवं समूह अर्थका तथा 'वाकार' दाता अर्थका वाचक है। वे देवी कल्याणसमूह तथा उत्कृष्ट वस्तुको देनेवाली हैं; इसलिये 'शिवा' कही गयी हैं। वे शिव अर्थात् कल्याणकी मूर्तिमती राशि हैं; इसलिये भी उन्हें 'शिवा' कहा गया है। 'शिव' शब्द मोक्षका बोधक है तथा 'आकार' दाताका। वे देवी स्वयं ही मोक्ष देनेवाली हैं; इसलिये 'शिवा' कही गयी हैं। 'अभय' अर्थ है भयनाश और 'आकार' का अर्थ है दाता। वे तत्काल अभय-दान करती हैं; इसलिये 'अभया' कहलाती हैं। 'मा' का अर्थ है राजलक्ष्मी और 'या' का अर्थ है प्राप्ति करानेवाला। जो शीघ्र ही राजलक्ष्मीकी प्राप्ति कराती हैं; उन्हें 'माया' कहा गया है। 'मा' मोक्ष अर्थका और 'या' प्राप्ति अर्थका वाचक है। जो सदा मोक्षकी प्राप्ति कराती हैं, उनका नाम 'माया' है। वे देवी भगवान् नारायणका आधा अङ्ग हैं। उन्हींके समान तेजस्विनी हैं और उनके शरीरके भीतर निवास करती हैं; इसलिये उन्हें 'नारायणी' कहते हैं। 'सनातन' शब्द नित्य और निर्गुणका वाचक है। जो देवी सदा निर्गुणा और नित्या हैं; उन्हें 'सनातनी' कहा गया है। 'जय' शब्द कल्याणका वाचक है और 'आकार' दाताका। जो देवी सदा जयदेती हैं, उनका नाम 'जया' है। 'सर्वमङ्गल' शब्द सम्पूर्ण ऐश्वर्यका बोधक है और 'आकार' का अर्थ है देनेवाला। ये देवी सम्पूर्ण ऐश्वर्यको देनेवाली हैं; इसलिये 'सर्वमङ्गला' कही गयी हैं। ये देवीके आठ नाम सारभूत हैं और यह स्तोत्र उन नामोंके अर्थसे युक्त है।
भगवान् नारायणने नाभिकमलपर बैठे हुए ब्रह्माको इसका उपदेश दिया था। उपदेश देकर वे जगदीश्वर योगनिद्राका आश्रय ले सो गये। तदनन्तर जब मधु और कैटभ नामक दैत्य ब्रह्माजीको मारनेके लिये उद्यत हुए तब ब्रह्माजीने इस स्तोत्रके द्वारा दुर्गाजीका स्तवन एवं नमन किया। उनके द्वारा स्तुति की जानेपर साक्षात् दुर्गाने उन्हें 'सर्वरक्षण' नामक दिव्य श्रीकृष्ण कवचका उपदेश दिया। कवच देकर महामाया अदृश्य हो गयीं। उस स्तोत्रके ही प्रभाव से विधाताको दिव्य कवचकी प्राप्ति हुई। उस श्रेष्ठ कवचको पाकर निश्चय ही वे निर्भय हो गये। फिर ब्रह्माने महेश्वरको उस समय स्तोत्र और कवचका उपदेश दिया, जब कि त्रिपुरासुरके साथ युद्ध करते समय रथसहित भगवान् शंकर नीचे गिर गये थे। उस कवचके द्वारा आत्मरक्षा करके उन्होंने निद्राकी स्तुति की। फिर योगनिद्राके अनुग्रह और स्तोत्रके प्रभावसे वहाँ शीघ्र ही वृषभरूपधारी भगवान् जनार्दन आये। उनके साथ शक्तिस्वरूपा दुर्गा भी थीं। वे भगवान् शंकरको विजय देनेके लिये आये थे। उन्होंने रथसहित शंकरको मस्तकपर बिठाकर अभय दान दिया और उन्हें आकाशमें बहुत ऊँचाईतक पहुँचा दिया। फिर जयाने शिवको विजय दी। उस समय ब्रह्मास्त्र हाथमें ले योगनिद्रासहित श्रीहरिका स्मरण करते हुए भगवान् शंकरने स्तोत्र और कवच पाकर त्रिपुरासुरका वध किया था।
इसी स्तोत्रसे दुर्गाका स्तवन करके गोपकुमारियोंने श्रीहरिको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त कर लिया। इस स्तोत्रका ऐसा ही प्रभाव है। गोपकन्याओंद्वारा किया गया 'सर्वमङ्गल' नामक स्तोत्र शीघ्र ही समस्त विघ्नोंका विनाश करनेवाला और मनोवाञ्छित वस्तुको देनेवाला है। शैव, वैष्णव अथवा शाक्त कोई भी क्यों न हो, जो मानव तीनों संध्याओंके समय प्रतिदिन भक्तिभावसे इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह संकटसे मुक्त हो जाता है। स्तोत्रके स्मरणमात्रसे मनुष्य तत्काल ही संकटमुक्त एवं निर्भय हो जाता है। साथ ही सम्पूर्ण उत्तम ऐश्वर्य एवं मनोवाञ्छित वस्तुको शीघ्र प्राप्त कर लेता है। पार्वतीकी कृपासे इहलोकमें श्रीहरिकी सुदृढ़ भक्ति और निरन्तर स्मृति पाता है एवं अन्तमें भगवान्के दास्यसुखको उपलब्ध करता है।
इस स्तवराजके द्वारा व्रजाङ्गनाओंने एक मासतक प्रतिदिन बड़ी भक्तिके साथ ईश्वरीका स्तवन एवं नमन किया। जब मास पूरा हुआ तो व्रतकी समाप्तिके दिन वे गोपियाँ अपने वस्त्रोंको तटपर रखकर यमुनाजीमें स्नानके लिये उतरीं। नारद! रत्नोंके मोलपर मिलनेवाले नाना प्रकारके द्रव्य, लाल, पीले, सफेद और मिश्रित रंगवाले मनोहर वस्त्र यमुनाजीके तटपर छा रहे थे। उनकी गणना नहीं की जा सकती थी। उन सबके द्वारा यमुनाजीके उस तटकी बड़ी शोभा हो रही थी। चन्दन, अगुरु और कस्तूरीकी वायुसे सारा तट प्रान्त सुरभित था। भाँति-भाँतिके नैवेद्य, देश-कालके अनुसार प्राप्त होनेवाले फल, धूप, दीप, सिन्दूर और कुंकुम यमुनाके उस तटको सुशोभित कर रहे थे। जलमें उतरनेपर गोपियाँ कौतूहलवश क्रीडाके लिये उन्मुख हुईं। उनका मन श्रीकृष्णको समर्पित था। वे अपने नग्न शरीरसे जल क्रीड़ामें आसक्त हो गयीं। श्रीकृष्णने तटपर रखे हुए भाँति-भाँतिके द्रव्यों और वस्त्रोंको देखा। देखकर वे ग्वाल बालोंके साथ वहाँ गये और सारे वस्त्र लेकर वहाँ रखी हुई खाद्य वस्तुओंको सखाओंके साथ खाने लगे। फिर कुछ वस्त्र लेकर बड़े हर्षके साथ उनका गट्ठर बाँधा और कदम्बकी ऊँची डालपर चढ़कर गोविन्दने गोपिकाओंसे इस प्रकार कहा।
श्रीकृष्ण बोले-
गोपियो! तुम सब-की- सब इस व्रतकर्ममें असफल हो गयीं। पहले मेरी बात सुनकर विधि-विधानका पालन करो। उसके बाद इच्छानुसार जलक्रीड़ा करना जो मास व्रत करनेके योग्य है; जिसमें मङ्गलकर्मके अनुष्ठानका संकल्प किया गया है; उसी मासमें तुमलोग जलके भीतर घुसकर नंगी नहा रही हो; ऐसा क्यों किया? इस कर्मके द्वारा तुम अपने व्रतको अङ्गहीन करके उसमें हानि पहुँचा रही हो तुम्हारे पहननेके वस्त्र, पुष्पहार तथा व्रतके योग्य वस्तुएँ, जो यहाँ रखी गयी थीं, किसने चुरा लीं? जो स्त्री व्रतकालमें नंगी स्नान करती है, उसके ऊपर स्वयं वरुणदेव रुष्ट हो जाते हैं। जान पड़ता है, वरुणके अनुचर तुम्हारे वस्त्र उठा ले गये। अब तुम नंगी होकर घरको कैसे जाओगी? तुम्हारे इस व्रतका क्या होगा? व्रतके द्वारा जिस देवीकी आराधना की जा रही थी, वह कैसी है? तुम्हारी वस्तुओंकी रक्षा क्यों नहीं कर रही है ?
श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर व्रजाङ्गनाओंको बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने देखा, यमुनाजीके तटपर) न तो हमारे वस्त्र हैं और न वस्तुएँ ही। वे जल में नंगी खड़ी हो विषाद करने लगीं। जोर-जोर से रोने लगीं और बोलीं-'यहाँ रखे हुए हमारे वस्त्र कहाँ गये और पूजाकी वस्तुएँ भी कहाँ हैं? इस प्रकार विषाद करके वे सब गोपकन्याएँ दोनों हाथ जोड़ भक्ति और विनयके साथ हाथ जोड़कर वहीं श्यामसुन्दरसे बोलीं।'
गोपिकाओंने कहा-
गोविन्द ! तुम्हीं हम दासियोंके श्रेष्ठ स्वामी हो; अतः हमारे पहनने योग्य वस्त्रोंको तुम अपनी ही वस्तु समझो उन्हें लेने या स्पर्श करनेका तुम्हें पूरा अधिकार है; परंतु व्रतके उपयोगमें आनेवाली जो दूसरी वस्तुएँ हैं, वे इस समय आराध्य देवताकी सम्पत्ति हैं; उन्हें दिये बिना उन वस्तुओंको ले लेना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है। हमारी साड़ियाँ दे दो; उन्हें पहनकर हम व्रतकी पूर्ति करेंगी। श्यामसुन्दर! इस समय उनके अतिरिक्त अन्य वस्तुओंको ही अपना आहार बनाओ।
[यह सुनकर] श्रीकृष्णने कहा-
तुमलोग आकर अपने-अपने वस्त्र ले जाओ। यह सुनकर श्रीराधाके अङ्गों में रोमाञ्च हो आया। वे श्रीहरिके निकट वस्त्र लेनेके लिये नहीं गयीं। उन्होंने जलमें योगासन लगाकर श्रीहरिके उन चरणकमलोंका चिन्तन किया, जो ब्रह्मा, शिव, अनन्त ( शेषनाग) तथा धर्मके भी वन्दनीय एवं मनोवाञ्छित वस्तु देनेवाले हैं। उन चरणकमलोंका चिन्तन करते-करते उनके नेत्रों में प्रेमके आँसू उमड़ आये और वे भावातिरेकसे उन गुणातीत प्राणेश्वरकी स्तुति करने लगीं।
राधिका बोलीं-
गोलोकनाथ ! गोपीश्वर ! मेरे स्वामिन् ! प्राणवल्लभ ! दीनबन्धो ! दीनेश्वर! सर्वेश्वर! आपको नमस्कार है। गोपेश्वर! गोसमुदायके ईश्वर! यशोदानन्दवर्धन ! नन्दात्मज ! सदानन्द ! नित्यानन्द ! आपको नमस्कार है। इन्द्रके क्रोधको भङ्ग (व्यर्थ ) करनेवाले गोविन्द ! आपने ब्रह्माजीके दर्पका भी दलन किया है। कालियदमन ! प्राणनाथ ! श्रीकृष्ण! आपको नमस्कार है। शिव और अनन्तके भी ईश्वर! ब्रह्मा और ब्राह्मणों के ईश्वर! परात्पर ! ब्रह्मस्वरूप ! ब्रह्मज्ञ ! ब्रह्मबीज ! आपको नमस्कार है। चराचर जगतरूपी वृक्षके बीज! गुणातीत! गुणस्वरूप! गुणबीज! गुणाधार ! गुणेश्वर! आपको नमस्कार है। प्रभो! आप अणिमा आदि सिद्धियोंके स्वामी हैं। सिद्धिकी भी सिद्धिरूप हैं। तपस्विन् ! आप ही तप हैं और आप ही तपस्याके बीज; आपको नमस्कार है। जो अनिर्वचनीय अथवा निर्वचनीय वस्तु है, वह सब आपका ही स्वरूप है। आप ही उन दोनोंके बीज हैं। सर्वबीजरूप प्रभो! आपको नमस्कार है। मैं सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, गङ्गा और वेदमाता सावित्री- ये सब देवियाँ जिनके चरणारविन्दोंकी अर्चनासे नित्य पूजनीया हुई हैं; उन आप परमेश्वरको बारंबार नमस्कार है। जिनके सेवकोंके स्पर्श और निरन्तर ध्यानसे तीर्थ पवित्र होते हैं; उन भगवान्को मेरा नमस्कार है। यों कहकर सती देवी राधिका अपने शरीरको जलमें और मन प्राणोंको श्रीकृष्ण में स्थापित करके ढूँठे काठके समान अविचल भावसे स्थित हो गयीं। श्रीराधाद्वारा किये गये श्रीहरिके इस स्तोत्रका जो मनुष्य तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह श्रीहरिकी भक्ति और दास्यभाव प्राप्त कर लेता है तथा उसे निश्चय ही श्रीराधाकी गति सुलभ होती है। जो विपत्तिमें भक्तिभावसे इसका पाठ करता है, उसे शीघ्र ही सम्पत्ति प्राप्त होती है और चिरकालका खोया हुआ नष्ट द्रव्य भी उपलब्ध हो जाता है। यदि कुमारी कन्या भक्तिभावसे एक वर्षतक प्रतिदिन इस स्तोत्रको सुने तो निश्चय ही उसे श्रीकृष्णके समान कमनीय कान्तिवाला गुणवान् पति प्राप्त होता है। जलमें स्थित हुई राधिकाने श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका ध्यान एवं स्तुति करनेके पश्चात् जब आँखें खोलकर देखा तो उन्हें सारा जगत् श्रीकृष्णमय दिखायी दिया। मुने! तदनन्तर उन्होंने यमुनातटको वस्त्रों और द्रव्योंसे सम्पन्न देखा। देखकर राधाने इसे तन्द्रा अथवा स्वप्रका विकार माना। जिस स्थानपर और जिस आधारमें जो द्रव्य पहले रखा गया था, वस्त्रोंसहित वह सब द्रव्य गोपकन्याओंको उसी रूपमें प्राप्त हुआ। फिर तो वे सब की सब देवियाँ जलसे निकलकर व्रत पूर्ण करके मनोवाञ्छित वर पाकर अपने अपने घरको चली गयीं।
नारदजीने पूछा-
प्रभो ! उस व्रतका क्या विधान है? क्या नाम है और क्या फल है ? उसमें कौन-कौन सी वस्तुएँ और कितनी दक्षिणा देनी चाहिये। व्रतके अन्तमें कौन-सा मनोहर रहस्य प्रकट हुआ ? महाभाग ! इस नारायण कथाको विस्तारपूर्वक कहिये।
भगवान् नारायण बोले-
वत्स ! उस व्रतका सारा विधान मुझसे सुनो। उसका नाम गौरी-व्रत है। मार्गशीर्ष मासमें सबसे पहले स्त्रियोंने इसे किया था। यह पुरुषोंको भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाला तथा श्रीकृष्णकी भक्ति प्रदान करनेवाला है। भिन्न-भिन्न देशोंमें इसकी प्रसिद्धि है। यह व्रत पूर्वपरम्परासे पालित होनेवाला माना गया है। पतिकी कामना रखनेवाली स्त्रियों को उनकी इच्छाके अनुसार फल देनेवाला है। इससे प्रियतम पति- निमित्तक फलकी प्राप्ति होती है। कुमारी कन्याको चाहिये कि वह पहले दिन उपवास करके अपने वस्त्रको धो डाले और संयमपूर्वक रहे। फिर मार्गशीर्ष मासकी संक्रान्तिके दिन प्रातः काल श्रद्धापूर्वक नदीके तटपर जाकर स्नान करके वह दो धुले हुए वस्त्र (साड़ी और चोली) धारण करे। तत्पश्चात् कलशमें गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और दुर्गा (पार्वती) — इन छः देवताओंका आवाहन करके नाना द्रव्योंद्वारा उनका पूजन करे । इन सबका पञ्चोपचार पूजन करके वह व्रत आरम्भ करे। कलशके सामने नीचे भूमिपर एक सुविस्तृत वेदी बनावे। वह वेदी चौकोर होनी चाहिये। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे उस वेदीका संस्कार करे (इन द्रव्योंसे चौक पूरकर उसे सजा दे) इसके बाद बालूकी दशभुजा दुर्गामूर्ति बनावे। देवीके ललाटमें सिन्दूर लगावे और नीचेके अङ्गोंमें चन्दन एवं कपूर अर्पित करे। तदनन्तर ध्यानपूर्वक देवीका आवाहन करे। उस समय हाथ जोड़कर निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ करे। उसके बाद पूजा आरम्भ करनी चाहिये ।
हे गौरि शङ्करार्धाङ्गि यथा त्वं शङ्करप्रिया ।
तथा मां कुरु कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्।।
'भगवान् शंकरकी अर्धाङ्गिनी कल्याणमयी गौरीदेवि! जैसे तुम शंकरजीको बहुत ही प्रिय हो, उसी प्रकार मुझे भी अपने प्रियतम पतिकी परम दुर्लभा प्राणवल्लभा बना दो।'
इस मन्त्रको पढ़कर देवी जगदम्बाका ध्यान करे। उनका गूढ़ ध्यान सामवेदमें वर्णित है, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। नारद! वह ध्यान मुनीन्द्रोंके लिये भी दुर्लभ है, तथापि मैं तुम्हें बता रहा हूँ। इसके अनुसार सिद्ध पुरुष दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका ध्यान करते हैं।
दुर्गाका ध्यान
भगवती दुर्गा शिवा ( कल्याणस्वरूपा), शिवप्रिया, शैवी (शिवसे प्रगाढ सम्बन्ध रखनेवाली) तथा शिवके वक्षःस्थलपर विराजमान होनेवाली हैं। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैली रहती है। उनकी बड़ी प्रतिष्ठा है। उनके नेत्र मनोहर हैं। वे नित्य नूतन यौवनसे सम्पन्न हैं और रत्नमय आभूषण धारण करती हैं। उनकी भुजाएँ रत्नमय केयूर तथा कङ्कणोंसे और दोनों चरण रत्ननिर्मित नूपुरोंसे विभूषित हैं। रत्नोंके बने हुए दो कुण्डल उनके दोनों कपोलोंकी शोभा बढ़ाते हैं। उनकी वेणीमें मालतीकी माला लगी हुई है, जिसपर भ्रमर मँडराते रहते हैं। भालदेशमें कस्तूरीकी बेंदीके साथ सिन्दूरका सुन्दर तिलक शोभा पाता है। उनके दिव्य वस्त्र अग्निकी ज्वालासे शुद्ध किये गये हैं। वे मस्तकपर रत्नमय मुकुट धारण करती हैं। उनकी आकृति बड़ी मनोहर है। श्रेष्ठ मणियोंके सारतत्त्वसे जटित रत्नमयी माला उनके कण्ठ एवं वक्षःस्थलको उद्भासित किये रहती है। पारिजातके फूलोंकी मालाएँ गलेसे लेकर घुटनोंतक लटकी रहती हैं। उनकी कटिका निम्नभाग अत्यन्त स्थूल और कठोर है। वे स्तनों और नूतन यौवनके भार से कुछ-कुछ झुकी सी रहती हैं। उनकी झाँकी मनको मोह लेनेवाली है। ब्रह्मा आदि देवता निरन्तर उनकी स्तुति करते हैं। उनके श्रीअङ्गोंकी प्रभा करोड़ों सूर्योको लज्जित करती है। नीचे ऊपरके ओठ पके बिम्बफलके सदृश लाल हैं। अङ्गकान्ति सुन्दर चम्पाके समान है। मोतीक लड़ियोंको भी लजानेवाली दन्तावली उनके मुखकी शोभा बढ़ाती है। वे मोक्ष और मनोवाञ्छित कामनाओंको देनेवाली हैं। शरत्कालके पूर्ण चन्द्रको भी तिरस्कृत करनेवाली चन्द्रमुखी देवी पार्वतीका मैं भजन करता हूँ। इस प्रकार ध्यान करके मस्तकपर फूल रखकर व्रती पुरुष प्रसन्नतापूर्वक हाथमें पुष्प ले पुनः भक्तिभावसे ध्यान करके पूजन आरम्भ करे। पूर्वोक्त मन्त्रसे ही प्रतिदिन हर्षपूर्वक षोडशोपचार चढ़ावे। फिर व्रती भक्ति और प्रसन्नताके साथ पूर्वकथित स्तोत्रद्वारा ही देवीकी स्तुति करके उन्हें प्रणाम करे। प्रणामके पश्चात् भक्तिभाव मनको एकाग्र करके गौरी व्रतकी कथा सुने ।
नारदजीने पूछा-
भगवन् ! आपने व्रतके विधान, फल और गौरीके अद्भुत स्तोत्रका वर्णन कर दिया। अब मैं गौरी व्रतकी शुभ कथा सुनना चाहता हूँ। पहले किसने इस व्रतको किया था ? और किसने भूतलपर इसे प्रकाशित किया था ? इन सब बातोंको आप विस्तारपूर्वक बताइये; क्योंकि आप संदेहका निवारण करनेवाले हैं।
भगवान् श्रीनारायणने कहा-
नारद ! कुशध्वजकी पुत्री सती वेदवतीने महान् तीर्थ पुष्करमें पहले-पहल इस व्रतका अनुष्ठान किया था । व्रतकी समाप्ति के दिन कोटि सूर्योके समान प्रकाशमान भगवती जगदम्बाने उसे साक्षात् दर्शन दिया। देवीके साथ लाख योगिनियाँ भी थीं। वे परमेश्वरी सुवर्णनिर्मित रथपर बैठी थीं और उनके प्रसन्नमुखपर मुस्कराहट फैल रही थी। उन्होंने संयमशीला वेदवतीसे कहा।
पार्वती बोलीं-
वेदवती! तुम्हारा कल्याण हो। तुम इच्छानुसार वर माँगो । तुम्हारे इस व्रतसे मैं संतुष्ट हूँ; अतः तुम्हें मनोवाञ्छित वर दूँगी। नारद ! पार्वतीकी बात सुनकर साध्वी वेदवतीने उन प्रसन्नहृदया देवीकी ओर देखा और दोनों हाथ जोड़ उन्हें प्रणाम करके वह बोली । वेदवतीने कहा- देवि! मैंने नारायणको मनसे चाहा है; अतः वे ही मेरे प्राणवल्लभ पति हों – यह वर मुझे दीजिये। दूसरे किसी वरको लेनेकी मुझे इच्छा नहीं है। आप उनके चरणों में सुदृढ़ भक्ति प्रदान कीजिये।वेदवतीकी बात सुनकर जगदम्बा पार्वती हँस पड़ीं और तुरंत रथसे उतरकर उस हरिवल्लभासे बोलीं।
पार्वतीने कहा-
जगदम्ब! मैंने सब जान लिया। तुम साक्षात् सती लक्ष्मी हो और भारतवर्षको अपनी पदधूलिसे पवित्र करनेके लिये यहाँ आयी हो। साध्वि! परमेश्वरि ! तुम्हारी चरणरजसे यह पृथ्वी तथा यहाँके सम्पूर्ण तीर्थ तत्काल पवित्र हो गये हैं। तपस्विनि ! तुम्हारा यह व्रत लोकशिक्षा के लिये है। तुम तपस्या करो। देवि! तुम साक्षात् नारायणकी वल्लभा हो और जन्म-जन्ममें उनकी प्रिया रहोगी। भविष्यमें भूतलका भार उतारनेके लिये तथा यहाँके दस्युभूत राक्षसोंका नाश करनेके लिये पूर्ण परमात्मा विष्णु दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें वसुधापर पधारेंगे। उनके दो भक्त जय और विजय ब्राह्मणोंके शापके कारण वैकुण्ठधामसे नीचे गिर गये हैं। उनका उद्धार करनेके लिये त्रेतायुगमें अयोध्यापुरीके भीतर श्रीहरिका आविर्भाव होगा। तुम भी शिशुरूप धारण करके मिथिलाको जाओ। वहाँ राजा जनक अयोनिजा कन्याके रूपमें तुम्हें पाकर यत्नपूर्वक तुम्हारा लालन पालन करेंगे। वहाँ तुम्हारा नाम सीता होगा। श्रीराम भी मिथिलामें जाकर तुम्हारे साथ विवाह करेंगे। तुम प्रत्येक कल्पमें नारायणकी ही प्राणवल्लभा होओगी।
यों कह पार्वती वेदवतीको हृदयसे लगाकर अपने निवास स्थानको लौट गयीं। साध्वी वेदवती मिथिलामें जाकर मायासे हलद्वारा भूमिपर की गयी रेखा (हराई) में सुखपूर्वक स्थित हो गयीं। उस समय राजा जनकने देखा, एक नग्न बालिका आँख बंद किये भूमिपर पड़ी है। उसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान उद्दीत है तथा वह तेजस्विनी बालिका रो रही है। उसे देखते ही राजाने उठाकर गोदमें चिपका लिया। जब वे घरको लौटने लगे, उस समय वहीं उनके प्रति आकाशवाणी हुई— 'राजन् ! यह अयोनिजा कन्या साक्षात् लक्ष्मी है; इसे ग्रहण करो। स्वयं भगवान् नारायण तुम्हारे दामाद होंगे।' यह आकाशवाणी सुन कन्याको गोदमें लिये राजर्षि जनक घरको गये और प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने लालन-पालनके लिये उसे अपनी प्यारी रानीके हाथमें दे दिया। युवती होनेपर सती सीताने इस व्रतके प्रभावसे त्रिलोकीनाथ विष्णुके अवताररूप दशरथनन्दन श्रीरामको प्रियतम पतिके रूपमें प्राप्त कर लिया। महर्षि वसिष्ठने इस व्रतको पृथ्वीपर प्रकाशित किया तथा श्रीराधाने इस व्रतका अनुष्ठान करके श्रीकृष्णको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त किया। अन्यान्य गोपकुमारियोंने इस व्रतके प्रभावसे उनको पाया। नारद! इस प्रकार मैंने गौरी व्रतकी कथा कही। जो कुमारी भारतवर्ष में इस व्रतका पालन करती है, उसे श्रीकृष्ण तुल्य पतिकी प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं है।
भगवान् नारायण कहते हैं-
इस प्रकार उन गोपकुमारियोंने एक मासतक व्रत किया। वे पूर्वोक्त स्तोत्रसे प्रतिदिन देवीकी स्तुति करती थीं। समाप्तिके दिन व्रत पूर्ण करके गोपियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने काण्व शाखामें वर्णित उस स्तोत्रद्वारा परमेश्वरी पार्वतीका स्तवन किया, जिसके द्वारा स्तुति करके सत्यपरायणा सीताने शीघ्र ही कमल नयन श्रीरामको प्रियतम पतिके रूपमें प्राप्त किया था। वह स्तोत्र यह है।
जानकी बोलीं-
सबकी शक्तिस्वरूपे! शिवे ! आप सम्पूर्ण जगत्की आधारभूता हैं। समस्त सद्गुणोंकी निधि हैं तथा सदा भगवान् शंकरके संयोग सुखका अनुभव करनेवाली हैं; आपको नमस्कार है। आप मुझे सर्वश्रेष्ठ पति दीजिये। सृष्टि, पालन और संहार आपका रूप है। आप सृष्टि, पालन और संहाररूपिणी हैं। सृष्टि, पालन और संहारके जो बीज हैं, उनकी भी बीजरूपिणी हैं; आपको नमस्कार है। पतिके मर्मको जाननेवाली पतिव्रतपरायणे गौरि ! पतिव्रते! पत्यनुरागिणि! मुझे पति दीजिये; आपको नमस्कार है। आप समस्त मङ्गलोंके लिये भी मङ्गलकारिणी हैं। सम्पूर्ण मङ्गलोंसे सम्पन्न हैं, सब प्रकारके मङ्गलों की बीजरूपा हैं; सर्वमङ्गले! आपको नमस्कार है। आप सबको प्रिय हैं, सबकी बीजरूपिणी हैं, समस्त अशुभोंका विनाश करनेवाली हैं, सबकी ईश्वरी तथा सर्वजननी हैं; शंकरप्रिये! आपको नमस्कार है। परमात्मस्वरूपे ! नित्यरूपिणि ! सनातनि! आप साकार और निराकार भी हैं; सर्वरूपे आपको नमस्कार है। क्षुधा, तृष्णा, इच्छा, दया, श्रद्धा, निद्रा, तन्द्रा, स्मृति और क्षमा- ये सब आपकी कलाएँ हैं; नारायणि! आपको नमस्कार है। लज्जा, मेधा, तुष्टि, पुष्टि, शान्ति, सम्पत्ति और वृद्धि– ये सब भी आपकी ही कलाएँ हैं; सर्वरूपिणि! आपको नमस्कार है। दृष्ट और अदृष्ट दोनों आपके ही स्वरूप हैं, आप उन्हें बीज और फल दोनों प्रदान करती। हैं, कोई भी आपका निर्वचन (निरूपण) नहीं कर सकता है, महामाये! आपको नमस्कार है। शिवे! आप शंकरसम्बन्धी सौभाग्यसे सम्पन्न हैं तथा सबको सौभाग्य देनेवाली हैं। देवि! श्रीहरि ही मेरे प्राणवल्लभ और सौभाग्य हैं; उन्हें मुझे दीजिये आपको नमस्कार है। जो स्त्रियाँ व्रतकी समाप्तिके दिन इस स्तोत्रसे शिवादेवीकी स्तुति करके बड़ी भक्तिसे उन्हें मस्तक झुकाती हैं; वे साक्षात् श्रीहरिको पतिरूपमें प्राप्त करती हैं। इस लोकमें परात्पर परमेश्वरको पतिरूपमें पाकर कान्त-सुखका उपभोग करके अन्तमें दिव्य विमानपर आरूढ़ हो भगवान् श्रीकृष्णके समीप चली जाती हैं।
समाप्तिके दिन गोपियोंसहित श्रीराधाने देवीकी वन्दना और स्तुति करके गौरी व्रतको पूर्ण किया। एक ब्राह्मणको प्रसन्नतापूर्वक एक सहस्र गौएँ तथा सौ सुवर्णमुद्राएँ दक्षिणाके रूपमें देकर वे घर जानेको उद्यत हुईं। उन्होंने आदरपूर्वक एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराया, बाजे बजवाये और भिखमंगोंको धन बाँटा। इसी समय दुर्गतिनाशिनी दुर्गा वहाँ आकाशसे प्रकट हुई, जो ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रही थीं। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी प्रभा फैल रही थी। वे सौ योगिनियों के साथ थीं। सिंहसे जुते हुए रथपर बैठी तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थीं। उनके दस भुजाएँ थीं। उन्होंने रत्नसारमय उपकरणोंसे युक्त सुवर्णनिर्मित दिव्य रथसे उतरकर तुरंत ही श्रीराधाको हृदयसे लगा लिया। देवी दुर्गाको देखकर अन्य गोपकुमारियोंने भी प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम किया। दुर्गाने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा- 'तुम सबका मनोरथ सिद्ध होगा। इस प्रकार गोपिकाओंको वर दे उनसे सादर सम्भाषण कर देवीने मुस्कराते
हुए मुखारविन्दसे राधिकाको सम्बोधित करके कहा।
पार्वती बोलीं-
राधे! तुम सर्वेश्वर श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो जगदम्बिके! तुम्हारा यह व्रत लोकशिक्षा के लिये है। तुम मायासे मानवरूपमें प्रकट हुई हो। सुन्दरि! क्या तुम गोलोकनाथ, गोलोक, श्रीशैल, विरजाके तटप्रान्त, श्रीरासमण्डल तथा दिव्य मनोहर वृन्दावनको कुछ याद करती हो? क्या तुम्हें प्रेमशास्त्रके विद्वान् तथा रतिचोर श्यामसुन्दरके उस चरित्रका किञ्चित् भी स्मरण होता है, जो नारियोंके चित्तको बरबस अपनी ओर खींच लेता है? तुम श्रीकृष्णके अर्धाङ्गसे प्रकट हुई हो; अतः उन्हींके समान तेजस्विनी हो। समस्त देवाङ्गनाएँ तुम्हारी अंशकलासे प्रकट हुई हैं; फिर तुम मानवी कैसे हो? तुम श्रीहरिके लिये प्राणस्वरूपा हो और स्वयं श्रीहरि तुम्हारे प्राण हैं। वेदमें तुम दोनोंका भेद नहीं बताया गया है; फिर तुम मानवी कैसे हो ? पूर्वकालमें ब्रह्माजी साठ हजार वर्षोतक तप करके भी तुम्हारे चरणकमलोंका दर्शन न पा सके; फिर तुम मानुषी कैसे हो? तुम तो साक्षात् देवी हो। श्रीकृष्णकी आज्ञासे गोपीका रूप धारण करके पृथ्वीपर पधारी हो; शान्ते! तुम मानवी स्त्री कैसे हो? मनुवंशमें उत्पन्न नृपश्रेष्ठ सुयज्ञ तुम्हारी ही कृपासे गोलोकमें गये थे; फिर तुम मानुषी कैसे हो? तुम्हारे मन्त्र और कवचके प्रभावसे ही भृगुवंशी परशुरामजीने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रिय नरेशोंसे शून्य कर दिया था ऐसी दशामें तुम्हें मानवी स्त्री कैसे कहा जा सकता है? परशुरामजीने भगवान् शंकरसे तुम्हारे मन्त्रको प्राप्त कर पुष्करतीर्थमें उसे सिद्ध किया और उसीके प्रभावसे वे कार्तवीर्य अर्जुनका संहार कर सके; फिर तुम मानुषी कैसे हो ? उन्होंने अभिमानपूर्वक महात्मा गणेशका एक दाँत तोड़ दिया। वे केवल तुमसे ही भय मानते थे; फिर तुम मानवी स्त्री कैसे हो ? जब मैं क्रोधसे उन्हें भस्म करनेको उद्यत हुई, तब हे ईश्वरि ! मेरी प्रसन्नताके लिये तुमने स्वयं आकर उनकी रक्षा की; फिर तुम मानुषी कैसे हो? श्रीकृष्ण प्रत्येक कल्पमें तथा जन्म-जन्ममें तुम्हारे पति हैं जगन्मातः ! तुमने लोकहितके लिये ही यह व्रत किया है। अहो! श्रीदामके शापसे और भूमिका भार उतारनेके लिये पृथ्वीपर तुम्हारा निवास हुआ है; फिर तुम मानवी स्त्री कैसे हो? तुम जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाली देवी हो। कलावतीकी अयोनिजा पुत्री एवं पुण्यमयी हो; फिर तुम्हें साधारण मानुषी कैसे माना जा सकता है ? तीन मास व्यतीत होनेपर जब मनोहर मधुमास (चैत्र) उपस्थित होगा, तब रात्रिके समय निर्जन, निर्मल एवं सुन्दर रासमण्डलमें वृन्दावनके भीतर श्रीहरिके साथ समस्त गोपिकाओंसहित तुम्हारी रासक्रीड़ा सानन्द सम्पन्न होगी। सती राधे प्रत्येक कल्पमें भूतलपर श्रीहरिके साथ तुम्हारी रसमयी लीला होगी, यह विधाताने ही लिख दिया है। इसे कौन रोक सकता है? सुन्दरी ! श्रीहरिप्रिये ! जैसे मैं महादेवजीकी सौभाग्यवती पत्नी हूँ, उसी प्रकार तुम श्रीकृष्णकी सौभाग्यशालिनी वल्लभा हो जैसे दूधमें धवलता, अग्निमें दाहिका शक्ति, भूमिमें गन्ध और जलमें शीतलता है; उसी प्रकार श्रीकृष्णमें तुम्हारी स्थिति है। देवाङ्गना, मानवकन्या, गन्धर्वजातिकी स्त्री तथा राक्षसी- इनमें से कोई भी तुमसे बढ़कर सौभाग्यशालिनी न तो हुई है और न होगी ही। मेरे वरसे ब्रह्मा आदिके भी वन्दनीय, परात्पर एवं गुणातीत भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं तुम्हारे अधीन होंगे। पतिव्रते! ब्रह्मा, शेषनाग तथा शिव भी जिनकी आराधना करते हैं, जो ध्यानसे भी वशमें होनेवाले नहीं हैं तथा जिन्हें आराधनाद्वारा रिझा लेना समस्त योगियों के लिये भी अत्यन्त कठिन है; वे ही भगवान् तुम्हारे अधीन रहेंगे। राधे! स्त्रीजातिमें तुम विशेष सौभाग्यशालिनी हो तुमसे बढ़कर दूसरी कोई स्त्री नहीं है। तुम दीर्घकालतक यहाँ रहने के पश्चात् श्रीकृष्णके साथ ही गोलोकमें चली जाओगी। मुने! ऐसा कहकर पार्वतीदेवी तत्काल वहीं अन्तर्हित हो गयीं। फिर गोपकुमारियोंके साथ श्रीराधिका भी घर जानेको उद्यत हुईं। इतनेमें ही श्रीकृष्ण राधिकाके सामने उपस्थित हो गये। राधाने किशोर अवस्थावाले श्यामसुन्दर श्रीकृष्णको देखा। उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वे नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे। घुटनोंतक लटकती हुई मालती माला एवं वनमाला उनकी शोभा बढ़ा रही थी। उनका प्रसन्न मुख मन्द हास्यसे शोभायमान था। वे भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। उनके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। नेत्र शरद् ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंको लज्जित कर रहे थे। मुख शरद् ऋतुकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर था, मस्तकपर श्रेष्ठ रत्नमय मुकुट अपनी उज्वल आभा बिखेर रहा था। दाँत पके हुए अनारके दाने-जैसे स्वच्छ दिखायी देते थे। आकृति बड़ी मनोहर थी। उन्होंने विनोदके लिये एक हाथमें मुरली और दूसरे हाथमें लीलाकमल ले रखा था। वे करोड़ों कन्दर्पोकी लावण्य-लीलाके मनोहर धाम थे। उन गुणातीत परमेश्वरकी ब्रह्मा, शेषनाग और शिव आदि निरन्तर स्तुति करते हैं। वे ब्रह्मस्वरूप तथा ब्राह्मणहितैषी हैं। श्रुतियोंने उनके ब्रह्मरूपका निरूपण किया है। वे अव्यक्त और व्यक्त हैं। अविनाशी एवं सनातन ज्योतिः स्वरूप हैं। मङ्गलकारी, मङ्गलके आधार, मङ्गलमय तथा मङ्गलदाता हैं।
श्यामसुन्दरके उस अद्भुत रूपको देखकर राधाने वेगपूर्वक आगे बढ़कर उन्हें प्रणाम किया। उन्हें अच्छी तरह देखकर प्रेमके वशीभूत हो वे सुध-बुध खो बैठीं। प्रियतमके मुखारविन्दकी बाँकी चितवनसे देखते-देखते उनके अधरोंपर मुस्कराहट दौड़ गयी और उन्होंने लज्जावश अञ्चलसे अपना मुख ढँक लिया। उनकी बारंबार ऐसी अवस्था हुई। श्रीराधाको देखकर श्यामसुन्दरके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। समस्त गोपिकाओंके सामने खड़े हुए वे भगवान् श्रीराधासे बोले।
श्रीकृष्णने कहा-
प्राणाधिके राधिके! तुम मनोवाञ्छित वर माँगो हे गोपकिशोरियो ! तुम सब लोग भी अपनी इच्छाके अनुसार वर माँगो। श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर श्रीराधिका तथा अन्य सब गोपकन्याओंने बड़े हर्षके साथ उन भक्तवाञ्छाकल्पतरु प्रभुसे वर माँगा।
राधिका बोलीं-
प्रभो! मेरा चित्तरूपी चञ्चरीक आपके चरणकमलोंमें सदा रमता रहे। जैसे मधुप कमलमें स्थित हो उसके मकरन्दका पान करता है; उसी प्रकार मेरा मनरूपी भ्रमर भी आपके चरणारविन्दोंमें स्थित हो भक्तिरसका निरन्तर आस्वादन करता रहे। आप जन्म-जन्ममें मेरे प्राणनाथ हों और अपने चरणकमलोंकी परम दुर्लभ भक्ति मुझे दें। मेरा चित्त सोते-जागते, दिन-रात आपके स्वरूप तथा गुणोंके चिन्तनमें सतत निमग्न रहे। यही मेरी मनोवाञ्छा है।
गोपियाँ बोलीं-
प्राणबन्धो! आप जन्म जन्ममें हमारे प्राणनाथ हों और श्रीराधाकी ही भाँति हम सबको भी सदा अपने साथ रखें। गोपियोंका यह वचन सुनकर प्रसन्नमुखवाले श्रीमान् यशोदानन्दनने कहा- 'तथास्तु' (ऐसा ही हो)। तत्पश्चात् उन जगदीश्वरने श्रीराधिकाको प्रेमपूर्वक सहस्रदलोंसे युक्त क्रीडाकमल तथा मालतीकी मनोहर माला दी। साथ ही अन्य गोपियोंको भी उन गोपीवल्लभने हँसकर प्रसादस्वरूप पुष्प तथा मालाएँ भेंट कीं। तदनन्तर वे बड़े प्रेमसे बोले।
श्रीकृष्णने कहा-
व्रजदेवियो! तीन मास व्यतीत होनेपर वृन्दावनके सुरम्य रासमण्डलमें तुम सब लोग मेरे साथ रासक्रीड़ा करोगी। जैसा मैं हूँ, वैसी ही तुम हो। हममें तुममें भेद नहीं है। मैं तुम्हारे प्राण हूँ और तुम भी मेरे लिये प्राणस्वरूपा हो प्यारी गोपियो! तुमलोगोंका यह व्रत लोकरक्षाके लिये है, स्वार्थसिद्धिके लिये नहीं; क्योंकि तुमलोग गोलोकसे मेरे साथ आयी हो और फिर मेरे साथ ही तुम्हें वहाँ चलना है। (तुम मेरी नित्यसिद्धा प्रेयसी हो तुमने साधन करके मुझे पाया है, ऐसी बात नहीं है।) अब शीघ्र अपने घर जाओ। मैं जन्म-जन्ममें तुम्हारा ही हूँ। तुम मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर हो; इसमें संशय नहीं है। ऐसा कहकर श्रीहरि वहीं यमुनाजीके किनारे बैठ गये। फिर सारी गोपियाँ भी बारंबार उन्हें निहारती हुई बैठ गयीं। उन सबके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी; मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी। वे प्रेमपूर्वक बाँकी चितवनसे देखती हुई अपने नेत्र चकोरोंद्वारा श्रीहरिके मुखचन्द्रकी सुधाका पान कर रही थीं। तत्पश्चात् वे बारंबार जय बोलकर शीघ्र ही अपने-अपने घर गयीं और श्रीकृष्ण भी ग्वाल बालोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको लौटे। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका यह सारा मङ्गलमय चरित्र कह सुनाया, गोपीचीर हरणकी यह लीला सब लोगोंके लिये सुखदायिनी है।(अध्याय २७)
Summary of chapter 25 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
During a hot summer afternoon, while the cowherd boys and cows were resting deep in the forest, a massive, roaring forest fire erupted from dried bamboos, threatening to consume all the residents of Vraja. Hearing the panicked cries of His devotees, Lord Kṛshṇa calmly instructed everyone to close their eyes, and with a single breath, He swallowed the blazing ocean of fire directly into His stomach, neutralizing the disaster completely. The cowherd boys opened their eyes in sheer amazement to find themselves safe and cool, praising Kṛshṇa as the supreme master of all mystic potencies.