श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - श्री कृष्ण जनन खंड

40- पार्वतीकी तपस्या, उनके तपके प्रभावसे अग्निका शीतल होना, ब्राह्मण बालकका रूप धारण करके आये हुए शिवके साथ उनकी बातचीत, पार्वतीका घरको लौटना और माता-पिता आदिके द्वारा उनका सत्कार, भिक्षुवेषधारी शंकरका आगमन, शैलराजको उनके विविध रूपोंके दर्शन, उनकी शिव भक्तिसे देवताओंको चिन्ता, उनका बृहस्पतिजीको शिव-निन्दाके लिये उकसाना तथा बृहस्पतिका देवताओंको शिव-निन्दाके दोष बताकर तपस्याके लिये जाना

श्रीराधिका बोलीं-

प्रभो! यह बहुत ही विचित्र और अपूर्व चरित्र सुननेको मिला है, जो कानोंमें अमृतके समान मधुर, सुन्दर, निगूढ़ एवं ज्ञानका कारण है। भगवन्! यह न तो अधिक संक्षेपसे सुना गया है और न विस्तारसे ही परंतु अब विस्तारसे ही सुननेकी इच्छा है; अतः आप विस्तारपूर्वक इस विषयका वर्णन कीजिये। पार्वतीने स्वयं कौन-कौन सा कठोर तप किया था? और किस किस वरको पाकर किस तरह महेश्वरको प्राप्त किया तथा रतिने फिर किस प्रकार कामदेवको जिलाया? प्यारे कृष्ण! आप पार्वती और शिवके विवाहका वर्णन कीजिये।

श्रीकृष्णने कहा-

प्राणाधिके राधिके ! प्राणवल्लभे! सुनो। प्राणेश्वरि ! तुम प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हो। प्राणाधारे! मनोहरे! जब रुद्रदेव वटवृक्षके नीचेसे चले गये, तब पार्वती माता पिताके बार-बार रोकनेपर भी तपस्याके लिये चली गयी। गङ्गाके तटपर जा तीनों काल स्नान करके वह मेरे दिये हुए मन्त्रका प्रसन्नतापूर्वक जप करने लगी। उस जगदम्बाने पूरे एक वर्षतक निराहार रहकर भक्ति-भावसे तपस्या की। तदनन्तर और भी कठोर तप आरम्भ किया। ग्रीष्म ऋतुमें अपने चारों ओर आग प्रज्वलित करके वह दिन रात उसे जलाये रखती और उसके बीचमें बैठकर निरन्तर मन्त्र जपती रहती थी। वर्षा ऋतु आनेपर श्मशानभूमिमें शिवा सदा योगासन लगाकर बैठती और शिलाकी ओर देखती हुई जलकी धारासे भीगती रहती थी शीतकाल आनेपर वह सदा जलके भीतर प्रवेश कर जाती तथा शरत्की भयंकर बर्फवाली रातोंमें भी निराहार रहकर भक्तिपूर्वक तपस्या करती थी। इस प्रकार अनेक वर्षोंतक कठोर तप करके भी जब सती साध्वी पार्वती शंकरको न पा सकी, तब वह शोकसे संतप्त हो अग्निकुण्डका निर्माण करके उसमें प्रवेश करनेको उद्यत हो गयी। तपस्यासे अत्यन्त कृशकाय हुई सती शैल पुत्रीको अग्निकुण्डमें प्रवेश करनेको उद्यत देख कृपासिन्धु शिव कृपा करके स्वयं उसके पास गये। अत्यन्त नाटे कदके बालक ब्राह्मणका रूप धारण करके अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए भगवान् शिव मन-ही-मन बड़े हर्षका अनुभव कर रहे थे। उनके सिरपर जटा थी। उन्होंने दण्ड और छत्र भी ले रखे थे। श्वेत वस्त्र, श्वेत यज्ञोपवीत, श्वेत कमलके बीजोंकी माला एवं श्वेत तिलक धारण किये वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। निर्जन स्थानमें उस बालकको देखकर पार्वतीके हृदय में स्नेह उमड़ आया। उसके तेजसे अत्यन्त आच्छादित हो उन्होंने स्वयं तप छोड़ दिया और सामने खड़े हुए शिशुसे पूछा- 'तुम कौन हो?" शिवा बड़े आदरके साथ उसे हृदयसे लगा लेना चाहती थी। शैलकुमारीका प्रश्न सुनकर परमेश्वर शिव हँसे और ईश्वरीके कानों में अमृत उँड़ेलते हुए से मधुर वाणीमें बोले।

शंकरने कहा-

मैं इच्छानुसार विचरनेवाला ब्रह्मचारी एवं तपस्वी ब्राह्मण बालक हूँ; परंतु सुन्दरि! तुम कौन हो, जो परम कान्तिमती होकर भी इस दुर्गम वनमें तप कर रही हो? बताओ, किसके कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ है? तुम किसकी कन्या हो और तुम्हारा नाम क्या है? तुम तो तपस्याका फल देनेवाली हो; फिर स्वयं किसलिये तपस्या करती हो ? कमललोचने! तुम तपस्याकी मूर्तिमती राशि हो अवश्य ही तुम्हारा यह तप लोकशिक्षा के लिये है। तुम मूलप्रकृति ईश्वरी, लक्ष्मी, सावित्री और सरस्वती - इन देवियों में से कौन हो? इसका अनुमान करनेमें मैं असमर्थ हूँ। कल्याणि! तुम जो भी हो, मुझपर प्रसन्न हो जाओ; क्योंकि तुम्हारे प्रसन्न होनेपर परमेश्वर प्रसन्न होंगे। पतिव्रता स्त्रीके संतुष्ट होनेपर स्वयं नारायण संतुष्ट होते हैं और नारायणदेवके संतुष्ट होनेपर सदा तीनों लोक संतोषका अनुभव करते हैं; ठीक उसी तरह जैसे वृक्षकी जड़ सींच देनेपर उसकी शाखाएँ स्वतः सिंच जाती हैं। शिशुकी यह बात सुनकर परमेश्वरी शिवा हँसने लगी और कानों में अमृतकी वर्षा करती हुई मनोहर वाणी बोली।

पार्वतीने कहा-

ब्रह्मन् न तो मैं वेदजननी सावित्री हूँ, न लक्ष्मी हूँ और न वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती ही हूँ। मेरा जन्म भारतवर्ष में हुआ है। मैं इस समय गिरिराज हिमवान्की पुत्री हूँ। इससे पहले मेरा जन्म

प्रजापति दक्षके घरमें हुआ था। उस समय मैं शंकर-पत्नी सतीके नामसे प्रसिद्ध थी। एक बार पिताने पतिकी निन्दा की। इसलिये मैंने योगके द्वारा अपने शरीरको त्याग दिया। इस जन्ममें भी पुण्यके प्रभावसे भगवान् शंकर मुझे मिल गये थे; परंतु दुर्भाग्यवश वे मुझे छोड़कर और कामदेवको भस्म करके चले गये। शंकरजीके चले जानेपर मैं मानसिक संताप और लज्जासे विवश हो पिताके घरसे तपस्याके लिये निकल पड़ी। अब मेरा मन इस गङ्गाजीके तटपर ही लगता है। दीर्घकालतक कठोर तप करके भी मैं अपने प्राणवल्लभको न पा सकी। इसलिये अग्रिमें प्रवेश करने जा रही थी। किंतु तुम्हें देखकर क्षणभरके लिये रुक गयी। अब तुम जाओ। मैं प्रलयाग्निकी शिखाके समान प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश करूँगी। ब्रह्मन्! महादेवजीकी प्राप्तिका संकल्प मनमें लेकर शरीरका त्याग करूँगी और जहाँ-जहाँ भी जन्म लूँगी, परमेश्वर शिवको ही पतिके रूपमें प्राप्त करूँगी। प्रत्येक जन्ममें भगवान् शिव ही मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतम पति होंगे सब स्त्रियाँ अपने प्रियतमको ही पानेके लिये मनोवाञ्छित जन्म ग्रहण करती हैं। उन सबका वह जन्म अपने अभीष्ट पतिकी उपलब्धिके लिये ही होता है, ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। पूर्वजन्मका जो पति है, वही स्त्रियोंके प्रत्येक जन्ममें पति होता है। जो स्त्री जिनकी पत्नी नियत है, वही उन्हें प्रत्येक जन्ममें प्राप्त होती है; अतः इस जन्ममें घोरतर तपके पश्चात् भी पतिको न पाकर मैं यहाँ इस शरीरको अग्निकुण्डमें होम दूँगी मेरा यह कार्य पतिकी कामनाको लेकर होगा; इसलिये परलोकमें मैं उन्हें अवश्य प्राप्त करूंगी। यों कहकर पार्वती वहाँ ब्राह्मणके बार-बार मना करनेपर भी उसके सामने ही अग्निकुण्डमें समा गयी परमेश्वरी राधे! पार्वतीके अग्रि प्रवेश करते ही उसकी तपस्या के प्रभावसे वह अग्नि तत्काल चन्दनके समान शीतल हो गयी। वृन्दावनविनोदिनि ! एक क्षणतक अग्निकुण्डमें रहकर जब शिवा ऊपर आने लगी, तब शिवने पुनः सहसा उससे पूछा।

श्रीमहादेवजी बोले-

भद्रे! तुम्हारी तपस्या क्या है? (सफल है या असफल ?) यह कुछ भी मेरी समझमें नहीं आया। जिस तपके प्रभावसे अग्रिने तुम्हारा शरीर नहीं जलाया, उसीसे तुम्हारी मनोवाञ्छित कामना पूर्ण नहीं हुई; यह आश्चर्यकी बात है। तुम कल्याणस्वरूप शिवको पति बनाना चाहती हो; परंतु वे तो निराकार हैं। निराकारको पति बनाकर तुम्हारा कौन-सा मनोरथ सिद्ध होगा? शुचिस्मिते! यदि संहारकर्ता हरको स्वामी बनानेकी इच्छा है तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि कौन ऐसी स्त्री है जो सर्वसंहारकारीको अपना कान्त (प्राणवल्लभ) बनानेकी इच्छा करेगी?

देवि! यदि उन्हें अपना स्वामी बनाकर तुम मोक्ष लेना चाहती हो तो इसके लिये तुम्हारी तपस्या व्यर्थ है; क्योंकि सबको मुक्ति प्रदान करनेवाली तो तुम स्वयं ही हो! 'शिव' का अर्थ है- मङ्गल (कल्याण), मोक्ष और संहारकर्ता इसके अतिरिक्त अन्य अर्थमें इस शब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता। शिव शब्दका दूसरा कोई अर्थ वेदमें नहीं निरूपित हुआ है। सुन्दरि! यदि तुम संहारकर्ता शिवको चाहती हो, तब तो सर्वलोकभयंकर रुद्रको अपने प्रति अनुरक्त पाओगी न तो तुम्हारा मोक्ष होगा और न अपने अभीष्ट देवताकी सेवा ही उपलब्ध होगी। भगवान् श्रीहरिका स्मरण अमोघ है, वह सदा सब प्रकारसे सम्पूर्ण मङ्गलोंका दाता है। अब तुम शीघ्र ही अपने पिताके घर जाओ। वहाँ मेरे आशीर्वादसे और अपने तपके फलसे तुम्हें परम दुर्लभ शिवके दर्शन प्राप्त होंगे।

ऐसा कहकर ब्राह्मण वहीं अन्तर्धान हो गया। दुर्गा 'महादेव! महादेव!' का उच्चारण करती हुई पिताके घरकी ओर चल दी। पार्वतीका आगमन सुनकर मेना और हिमालय दिव्य यानको आगे करके हर्षविह्वल हो अगवानीके लिये चले। सारा नगर सजाया गया। मार्गोंपर चन्दन, कस्तूरी आदिका छिड़काव हुआ। बाजे बजने लगे। शङ्खध्वनि गूँज उठी। सड़कोंपर सिन्दूर तथा चन्दनके जलसे कीच मच गयी। नगरमें प्रवेश करके दुर्गाने माता-पिताके दर्शन किये। वे दोनों अत्यन्त प्रसन्न हो दौड़ते हुए सामने आये। उनके नेत्रों में हर्षके आँसू भरे थे और अङ्ग अङ्ग पुलकित हो रहा था। देवी शिवाके मुखपर भी प्रसन्नता थी। उसने सखियोंसहित निकट जा माता-पिताको प्रणाम किया तब उन दोनोंने आशीर्वाद देकर पुत्रीको हृदयसे लगा लिया और 'ओ मेरी बच्ची!' कहकर प्रेमसे विह्वल हो रोने लगे। उस समय दुर्गाको रथपर बिठाकर वे दोनों अपने घर गये। स्त्रियोंने निर्मञ्छन किया और ब्राह्मणोंने आशीर्वाद दिया। पर्वतराजने ब्राह्मणों और बन्दीजनोंको धन दिया। उनसे वेद-पाठ और मङ्गल पाठ करवाये। इस प्रकार वे दोनों अपनी पुत्रीके साथ सुखसे घरमें रहने लगे। शिवाके आ जानेसे उनके मनमें बड़ा हर्ष था। एक दिन हिमवान् तप करनेके लिये गङ्गाजीके तटपर गये। मेना अपनी पुत्रीके साथ प्रसन्नतापूर्वक घरके आँगनमें बैठी थीं। इसी समय एक नाचने-गानेवाला भिक्षुक सहसा मेनाके पास आया। उसके बायें हाथमें सींगका बाजा और दायें हाथमें डमरू था। बहुत ही वृद्ध और जरासे अत्यन्त जर्जर हो चुका था। उसने सारे शरीरमें विभूति लगा रखी थी। पीठपर गुदड़ी लिये और लाल वस्त्र पहने वह भिक्षुक बड़ा मनोहर जान पड़ता था। उसका कण्ठ बड़ा ही मधुर था वह मनोहर नृत्य करते हुए मेरे गुणोंका गान करने लगा। कभी शृङ्ग बजाता और कभी डमरू उसके बाजेकी आवाज सुनकर बहुत से नागरिक हर्षविह्वल हो वहाँ आ गये। दर्शकोंमें बालक, बालिका, वृद्ध, युवक, युवतियाँ तथा वृद्धाएँ भी थीं। मधुर तान और स्वरसे युक्त उस सुन्दर गीतको सुनकर सहसा सब लोग मोहित एवं मूच्छित हो गये। दुर्गाको भी मूर्च्छा आ गयी। उसने अपने हृदयमें भगवान् शंकरको देखा। वे त्रिशूल, पट्टिश और व्याघ्रचर्म धारण किये सम्पूर्ण अङ्गों में विभूतिसे विभूषित थे। बड़ा ही रम्य रूप था। गलेमें अत्यन्त निर्मल अस्थियोंकी माला शोभा देती थी। प्रसन्नमुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। उनकी आकृतिसे आन्तरिक उल्लास सूचित होता था। पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पाते थे। हाथमें माला, कंधेपर नागोंका यज्ञोपवीत और मस्तकपर चन्द्राकार मुकुट- बड़ी सुन्दर झाँकी थी। वे पार्वतीसे कह रहे थे कि वर माँगो। हृदयस्थित हरको देखकर पार्वतीने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया और वर माँगा, आप हमारे पति हो जाइये।' 'एवमस्तु' कहकर शिव अन्तर्धान हो गये हृदयमें शिवको न देखकर दुर्गाकी मूर्च्छा भङ्ग हुई। उसने आँख खोलकर देखा, सामने वही भिक्षुक गा रहा है।

भिक्षुके नृत्य और संगीतसे संतुष्ट हो मेना सोनेके पात्रमें बहुत से रन ले उसे देनेके लिये गर्यो; परंतु भिक्षुने भिक्षामें दुर्गाको ही माँगा; दूसरी कोई वस्तु नहीं ली। वह कौतुकवश पुनः नृत्य करनेको उद्यत हुआ; परंतु मेना उसकी बात सुनकर कुपित हो उठी थीं। उन्हें आश्चर्य भी हुआ था। उन्होंने भिक्षुकको बहुत डाँटा तथा उसे घरसे बाहर निकाल देनेकी आज्ञा दी। इसी बीचमें अपना तप पूरा करके हिमवान् घरपर आये। वहाँ उन्हें आँगनमें खड़ा हुआ एक भिक्षु दिखायी दिया, जो बड़ा मनोहर था। उसके विषयमें मेनाके मुखसे सब बातें सुनकर हिमवान् हँसे और रुष्ट भी हुए। उन्होंने अपने सेवकको आज्ञा दी- इस भिक्षुकको बाहर निकाल दो।' परंतु वह कोई साधारण भिक्षुक नहीं था। आकाशकी भाँति उसका स्पर्श करना भी कठिन था वह अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था। उसे कोई बाहर न कर सका। उसके निकट जानेकी भी किसीमें क्षमता नहीं थी। हिमवान्ने एक ही क्षणमें देखाउस भिक्षुकके सुन्दर चार भुजाएँ हैं; मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल तथा शरीरपर पीताम्बर शोभा पाता है; श्याम सुन्दर रुचिर वेष मनको मोहे लेता है; मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही है। सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं तथा वे श्रीहरि (रूपधारी शिव) भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते हैं। हिमवान् श्रीहरिके उपासक थे। उन्होंने पूजाकालमें भगवान् गदाधरको जो-जो फूल चढ़ाये थे, वे सब भिक्षुकके अङ्गमें और मस्तकपर देखे। उनके द्वारा जो धूप-दीप दिये गये थे अथवा जो मनोरम नैवेद्य निवेदित हुआ था, वह भी भिक्षुकके सामने प्रस्तुत दिखायी दिया। दूसरे ही क्षणमें वह भिक्षुक द्विभुज रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। अब उसके हाथमें विनोदकी साधनभूता मुरली थी। गोपवेष, किशोर अवस्था, श्यामसुन्दर वर्ण, मुस्कराता हुआ मुख, मस्तकपर मोरपंखका मुकुट, श्रीअङ्गों में रत्नमय आभूषण, चन्दनके अङ्गराग तथा गलेमें वनमाला मानो साक्षात् श्रीकृष्ण दर्शन दे रहे हों फिर क्षणभरमें वह उज्ज्वल कान्ति चन्द्रशेखर शिवके रूपमें दिखायी दिया। उसके हाथों में त्रिशूल और पट्टिश शोभा पा रहे थे। वस्त्रकी जगह सुन्दर बाघम्बर था। सम्पूर्ण अङ्गों में विभूति लगी थी। धवल वर्ण था। गलेमें अस्थियों की माला थी, जो आभूषणका काम देती थी। कंधेपर सर्पमय यज्ञोपवीत तथा सिरपर तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली जटा थी। हाथोंमें शृङ्ग और डमरू थे। सुप्रशस्त एवं मनोहर रूप चित्तको आकृष्ट कर लेता था। भगवान् शिव श्वेत कमलोंके बीजकी मालासे हरिनामका जप करते थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्दहासकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर दिखायी देते थे। अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। फिर दूसरे ही क्षणमें वह भिक्षुक 'जगत्स्स्रष्टा' चतुर्मुख ब्रह्माके रूपमें दृष्टिगोचर हुआ ब्रह्माजी स्फटिककी माला लेकर हरिनामका जप कर रहे थे। हिमवान्ने देखा क्षणभरमें वह त्रिगुणात्मक सूर्यस्वरूप हो गया। अत्यन्त दुःसह प्रकाशसे युक्त सूर्यदेव ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान थे। फिर एक क्षणतक वह अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित अनिके रूपमें विद्यमान रहा। तत्पश्चात् क्षणभर आह्लादजनक चन्द्रमाके रूपमें शोभा पाता रहा। तदनन्तर एक ही क्षणमें तेजः स्वरूप निराकार, निरञ्जन, निर्लिप्त, निरीह परमात्मस्वरूपमें स्थित हो गया। इस प्रकार स्वेच्छामय नाना रूप धारण करनेवाले परमेश्वरका दर्शनकर शैलराजके नेत्रों में आनन्दके आँसू छलक आये। उनका अङ्ग अङ्ग पुलकित हो गया। उन्होंने साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम किया और भक्तिभावसे परिक्रमा करके बारंबार मस्तक झुकाया फिर हर्षसे उछलकर हिमवान्ने जब पुनः देखा तो वही भिक्षुक सामने था। वास्तवमें वह भिक्षुक ही है- ऐसा उन्हें दिखायी दिया। भगवान् विष्णुकी मायासे शैलराज उसके नाना रूप-धारण सम्बन्धी सब बातोंको भूल गये। भिक्षुक उनसे भीख माँगने लगा। उसके पास भिक्षाका पात्र था। उसने रक्त वस्त्र धारण किया था। हाथोंमें भृङ्ग और विचित्र डमरूके बाजे थे। वह भिक्षामें केवल दुर्गाको ग्रहण करनेके लिये उत्सुक था, दूसरी किसी वस्तुको नहीं, परंतु विष्णु मायासे मोहित हुए शैलराजने उसकी याचना स्वीकार नहीं की भिक्षुने भी और कुछ नहीं लिया। वह वहीं अन्तर्धान हो गया। प्रिये ! उस । समय मेना और गिरिराजको ज्ञान हुआ। वे बोले 'अहो! हमने विश्वनाथको दिनमें स्वप्रकी भाँति देखा है। भगवान् शिव हम दोनोंको वञ्चित करके अपने स्थानको चले गये।

उन दोनों पति-पत्नीकी भगवान् शिवमें भक्ति बढ़ रही है यह देख सब देवताओंको चिन्ता हो गयी। इन्द्र आदि देवता भारसे सुमेरुकी रक्षाके लिये युक्ति करने लगे। वे आपसमें कहने लगे– 'यदि हिमवान् अनन्य भक्तिसे भारतमें भगवान् शिवको कन्यादान करेंगे तो निश्चय ही निर्वाण- मोक्षको प्राप्त होंगे। अनन्त रत्नोंका आधार हिमालय यदि पृथ्वीको छोड़कर चला जायगा तो इसका 'रत्नगर्भा' नाम अवश्य ही मिथ्या हो जायगा शूलपाणि शिवको अपनी कन्या दे स्थावरत्वका परित्याग और दिव्य रूप धारण करके वे विष्णुलोकको चले जायँगे। फिर तो अनायास ही उन्हें नारायणका सारूप्य प्राप्त हो जायगा। वे भगवान्‌के पार्षदभावको पाकर हरिदास हो जायँगे।' यह सब सोचकर देवताओंने आपसमें सलाह की और वे गुरु बृहस्पतिको हिमालयके घर भेजनेके लिये गये। उन सबने गुरुको प्रणाम करके निवेदन किया- 'गुरुदेव! आप हिमालयके यहाँ जाकर उनके समक्ष भगवान् शिवकी निन्दा कीजिये। यह तो निश्चय है कि दुर्गा शिवके सिवा दूसरे किसी वरका वरण नहीं करेगी। उस दशामें हिमवान् अनिच्छासे ही अपनी पुत्री शिवको देंगे ऐसा करनेसे कन्यादानका फल कम हो जायगा। कालान्तरमें गिरिराज भले ही मुक्त हो जायँ; परंतु इस समय तो इन्हें पृथ्वीपर रहना ही चाहिये। भगवन् ! आप ही अनन्त रत्नोंके आधारभूत हिमालयको भारतवर्षमें रखिये। (इन्हें यहाँसे जाने न दीजिये।)

देवताओंका वचन सुनकर गुरु बृहस्पतिजीने दोनों हाथ कानों में लगा लिये और 'नारायण' 'नारायण!' का स्मरण करते हुए उनकी प्रार्थना अस्वीकार कर दी। वेद-वेदान्तके विद्वान् बृहस्पति हरि और हरके महान् भक्त थे। उन्होंने देवताओंको बारंबार फटकारकर कहा।

बृहस्पति बोले-

स्वार्थ साधनमें तत्पर रहनेवाले देवताओ! मेरी सच्ची बात सुनो। मेरा यह वचन नीतिका सारतत्त्व, वेदोंद्वारा प्रतिपादित तथा परिणाममें सुख देनेवाला है। जो पापी शिव और विष्णुके भक्तकी, भूदेवता ब्राह्मणोंकी, गुरु और पतिव्रताकी, पति, भिक्षु ब्रह्मचारी तथा सृष्टिके बीजभूत देवताओंकी निन्दा करते हैं; वे चन्द्रमा और सूर्यके रहनेतक कालसूत्र नामक नरकमें पकाये जाते हैं। उन्हें कफ तथा मल मूत्रमें दिन-रात सोना पड़ता है। उन्हें कीड़े खाते हैं और वे कातर वाणीमें आर्तनाद करते हैं। जो सृष्टिकर्ता जगद्गुरु ब्रह्माकी निन्दा करते हैं; जो सुरश्रेष्ठ शिव, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, गीता, तुलसी, गङ्गा, वेद, वेदमाता सावित्री, व्रत, तपस्या, पूजा, मन्त्र तथा मन्त्रदाता गुरुमें दोष बताते हैं; वे अन्धकूप नामक नरकमें यातना भोगते हैं और वहाँ उन्हें ब्रह्माकी आधी आयुतक रहना पड़ता है तथा वे सर्प-समूहोंसे भक्षित हो सदा चीखते-चिल्लाते रहते हैं। जो दूसरे देवताओंके साथ तुलना करके भगवान् हृषीकेशकी निन्दा करते हैं; विष्णुभक्ति प्रदान करनेवाले पुराणमें, जो श्रुतिसे भी उत्कृष्ट है, दोष निकालते हैं; राधा तथा उनकी कायव्यूहरूपा गोपियोंकी और सदा पूजित होनेवाले ब्राह्मणोंकी भी निन्दा करते हैं; वे देवता ही क्यों न हों, ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त नरकके गड्ढेमें पकाये जाते हैं। उनके मुँह नीचे लटकाये जाते हैं और उनकी जाँघें ऊपरकी ओर होती हैं। विकृताकार सर्पसमूह तथा सर्पकी-सी आकृतिवाले कीट उनके सारे अङ्गोंमें लिपटकर काटते रहते हैं और वे अत्यन्त कातर तथा भयभीत हो सदा आर्तनाद किया करते हैं। निश्चय ही वहाँ उन्हें क्षोभपूर्वक कफ एवं मल मूत्र खाने पड़ते हैं। रोषसे भरे हुए यमराजके किङ्कर उनके मुँहमें जलती हुई लुआठी डाल देते हैं। तीनों संध्याओंके समय उन्हें डाँट बताते हुए डंडोंसे पीटते हैं। डंडोंके प्रहारसे जब उन्हें प्यास लगती है, तब वे उन यमदूतोंके भयसे मूत्र पान करते हैं। जब दूसरा कल्प आरम्भ होता है और पहले-पहल सृष्टिका आयोजन किया जाता है, उस समय उन पापियोंके पापोंका निवारण होता है ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। निश्चय ही शिवकी निन्दा करनेवाले देवता नरकमें पड़ेंगे। मेरे बच्चो ! क्या तुमलोग मेरा यही उपकार करना चाहते हो ? ब्रह्माजीकी आज्ञासे दक्ष प्रजापतिने शूलपाणि शंकरको अपनी पुत्री दी। उसीके पुण्यसे शिवकी निन्दा करनेपर भी उन्हें पाप नहीं लगा; अपितु परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई। उन्होंने अनिच्छासे ही भगवान् शंकरको कन्यादान किया था। इसलिये उन्हें चौथाई पुण्यकी ही प्राप्ति हुई। अतएव वे सारूप्य मोक्षको न पाकर तुच्छ सृष्टिका ही अधिकार प्राप्त कर सके। देवताओ! तुम्हीं लोगोंमेंसे कोई हिमवान्के घर जाकर अपने मतके अनुसार कार्य करे और प्रयत्नपूर्वक शैलराज के मनमें अश्रद्धा उत्पन्न करे। अनिच्छासे कन्यादान करके गिरिराज हिमवान् सुखपूर्वक भारतवर्ष में स्थित रहें। भक्तिपूर्वक शिवको पुत्री देकर तो वे निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेंगे। अश्रद्धा उत्पन्न होनेके बाद अरुन्धतीको साथ ले सब सप्तर्षि अवश्य ही गिरिराजके घर जाकर उन्हें समझायेंगे। दुर्गा शिवके सिवा दूसरे किसी वरका वरण नहीं करेगी। उस दशामें पुत्रीके आग्रहसे वे अनिच्छापूर्वक शिवको अपनी कन्या देंगे। इस प्रकार मैंने अपना सारा विचार व्यक्त कर दिया। अब देवतालोग अपने-अपने घरको पधारें। यों कहकर बृहस्पतिजी शीघ्र ही तपस्याके लिये आकाशगङ्गाके तटपर चले गये। (अध्याय ४०)