नारदजी बोले-
भगवन्! जन्माष्टमी व्रत समस्त व्रतोंमें उत्तम कहा गया है। अतः आप उसका वर्णन कीजिये जिस जन्माष्टमी व्रतमें जयन्ती नामक योग प्राप्त होता है, उसका फल क्या है? तथा सामान्यतः जन्माष्टमी व्रतका अनुष्ठान करनेसे किस फलकी प्राप्ति होती है? इस समय इन्हीं बातोंपर प्रकाश डालिये। महामुने! यदि व्रत न किया जाय अथवा व्रतके दिन भोजन कर लिया जाय तो क्या दोष होता है? जयन्ती अथवा सामान्य जन्माष्टमीमें उपवास करनेसे कौन-सा अभीष्ट फल प्राप्त होता है? प्रभो ! उक्त व्रतमें पूजनका विधान क्या है? कैसे संयम करना चाहिये ? उपवास अथवा पारणामें पूजन एवं संयमका नियम क्या है? इस विषयमें भलीभाँति विचार करके कहिये।
भगवान् नारायणने कहा-
मुने! सप्तमी तिथिको तथा पारणाके दिन व्रती पुरुषको हविष्यान्न भोजन करके संयमपूर्वक रहना चाहिये। सप्तमीकी रात्रि व्यतीत होनेपर अरुणोदयकी वेलामें उठकर व्रती पुरुष प्रातः कालिक कृत्य पूर्ण करनेके अनन्तर स्नानपूर्वक संकल्प करे ब्रह्मन्! उस संकल्पमें यह उद्देश्य रखना चाहिये कि आज मैं श्रीकृष्णप्रीतिके लिये व्रत एवं उपवास करूंगा। मन्वादि तिथि प्राप्त होनेपर स्नान और पूजन करनेसे जो फल मिलता है, भाद्रपदमासकी अष्टमी तिथिको स्नान और पूजन करनेसे वही फल कोटिगुना अधिक होता है। उस तिथिको जो पितरोंके लिये जलमात्र अर्पण करता है, वह मानो लगातार सौ वर्षोंतक पितरोंकी तृप्तिके लिये गयाश्राद्धका सम्पादन कर लेता है; इसमें संशय नहीं है।
स्नान और नित्यकर्म करके सूतिकागृहका निर्माण करे। वहाँ लोहेका खड्ग, प्रज्वलित अग्नि तथा रक्षकोंका समूह प्रस्तुत करे। अन्यान्य अनेक प्रकारकी आवश्यक सामग्री तथा नाल काटने के लिये कैंची लाकर रखे। विद्वान् पुरुष यत्नपूर्वक एक ऐसी स्त्रीको भी उपस्थित करे, जो धायका काम करे। सुन्दर षोडशोपचार पूजनकी सामग्री, आठ प्रकारके फल, मिठाइयाँ और द्रव्य - इन सबका संग्रह कर ले। नारदजी! जायफल, कङ्कोल, अनार, श्रीफल, नारियल, नीबू और मनोहर कूष्माण्ड आदि फल संग्रहणीय हैं। आसन, वसन, पाद्य, मधुपर्क, अर्घ्य, आचमनीय, स्त्रानीय, शय्या, गन्ध, पुष्प, नैवेद्य, ताम्बूल, अनुलेपन, धूप, दीप और आभूषण- ये सोलह उपचार हैं। पैर धोकर स्नानके पश्चात् दो धुले हुए वस्त्र धारण करके आसनपर बैठे और आचमन करके स्वस्तिवाचनपूर्वक कलश स्थापन करे। कलशके समीप पाँच देवताओंकी पूजा करे। कलशपर परमेश्वर श्रीकृष्णका आवाहन करके वसुदेव देवकी, नन्द-यशोदा, बलदेव रोहिणी, षष्ठीदेवी, पृथ्वी, ब्रह्मनक्षत्र– रोहिणी, अष्टमी तिथिकी अधिष्ठात्री देवी, स्थानदेवता, अश्वत्थामा, बलि, हनुमान्, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम, व्यासदेव तथा मार्कण्डेय मुनि - इन सबका आवाहन करके श्रीहरिका ध्यान करे। मस्तकपर फूल चढ़ाकर विद्वान् पुरुष फिर ध्यान करे नारद! मैं सामवेदोक्त ध्यान बता रहा हूँ, सुनो। इसे ब्रह्माजीने सबसे पहले महात्मा सनत्कुमारको बताया था।
ध्यान
मैं श्याम-मेघके समान अभिराम आभावाले साक्षिस्वरूप बालमुकुन्दका भजन करता हूँ, जो अत्यन्त सुन्दर हैं तथा जिनके मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही है। ब्रह्मा, शिव, शेषनाग और धर्म- ये कई-कई दिनोंतक उन परमेश्वरकी स्तुति करते रहते हैं। बड़े-बड़े मुनीश्वर भी ध्यानके द्वारा उन्हें अपने वशमें नहीं कर पाते हैं। मनु, मनुष्यगण तथा सिद्धोंके समुदाय भी उन्हें रिझा नहीं पाते हैं। योगीश्वरोंके चिन्तनमें भी उनका आना सम्भव नहीं हो पाता है। वे सभी बातों में सबसे बढ़कर हैं; उनकी कहीं तुलना नहीं है।
इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक पुष्प चढ़ावे और समस्त उपचारोंको क्रमशः अर्पित करके व्रती पुरुष व्रतका पालन करे। अब प्रत्येक उपचारका क्रमशः मन्त्र सुनो।
आसन
हरे! उत्तम रत्नों एवं मणियोंद्वारा निर्मित, सम्पूर्ण शोभासे सम्पन्न तथा विचित्र बेलबूटोंसे चित्रित यह सुन्दर आसन सेवामें अर्पित है। इसे ग्रहण कीजिये।
वसन
श्रीकृष्ण! यह विश्वकर्माद्वारा निर्मित वस्त्र अग्रिमें तपाकर शुद्ध किया गया है। इसमें तपे हुए सुवर्णके तार जड़े गये हैं। आप इसे स्वीकार करें।
पाद्य
गोविन्द ! आपके चरणोंको पखारनेके लिये सोनेके पात्रमें रखा हुआ यह जल परम पवित्र और निर्मल है। इसमें सुन्दर पुष्प डाले गये हैं। आप इस पाद्यको ग्रहण करें।
मधुपर्क या पञ्चामृत
भगवन्! मधु, घी, दही, दूध और शक्कर- इन सबको मिलाकर तैयार किया गया मधुपर्क या पञ्चामृत सुवर्णके पात्र में रखा गया है। इसे आपकी सेवामें निवेदन करना है। आप स्नानके लिये इसका उपयोग करें।
अर्घ्य
हरे! दूर्वा, अक्षत, श्वेत पुष्प और स्वच्छ जलसे युक्त यह अर्घ्य सेवामें समर्पित है। इसमें चन्दन, अगुरु और कस्तूरीका भी मेल है। आप इसे ग्रहण करें।
आचमनीय
परमेश्वर ! सुगन्धित वस्तुसे वासित यह शुद्ध, सुस्वादु एवं स्वच्छ जल आचमनके योग्य है। आप इसे ग्रहण करें।
स्त्रानीय
श्रीकृष्ण ! सुगन्धित द्रव्यसे युक्त एवं सुवासित विष्णुतैल तथा आँवलेका चूर्ण स्नानोपयोगी द्रव्यके रूपमें प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करें।
शय्य
श्रीहरे! उत्तम रत्न एवं मणियोंके सारभागसे रचित, अत्यन्त मनोहर तथा सूक्ष्म वस्त्रसे आच्छादित यह शय्या सेवामें समर्पित है। इसे ग्रहण कीजिये।
गन्ध
गोविन्द ! विभिन्न वृक्षोंके चूर्णसे युक्त, नाना प्रकारके वृक्षोंकी जड़ोंके द्रवसे पूर्ण तथा कस्तूरीरससे मिश्रित यह गन्ध सेवामें समर्पित है। इसे स्वीकार करें।
पुष्प
परमेश्वर ! वृक्षोंके सुगन्धित तथा सम्पूर्ण देवताओंको अत्यन्त प्रिय लगनेवाले पुष्प आपकी सेवामें अर्पित हैं। इन्हें ग्रहण कीजिये।
नैवेद्य
गोविन्द ! शर्करा, स्वस्तिक नामवाली मिठाई तथा अन्य मीठे पदार्थोंसे युक्त यह नैवेद्य सेवामें समर्पित है। यह सुन्दर पके फलोंसे संयुक्त है। आप इसे स्वीकार करें। हरे! शक्कर मिलाया हुआ ठंढा और स्वादिष्ट दूध, सुन्दर पकवान, लड्डू, मोदक, घी मिलायी हुई खीर, गुड़, मधु, ताजा दही और तक्र—यह सब सामग्री नैवेद्यके रूपमें आपके सामने प्रस्तुत है। आप इसे आरोगें।
ताम्बूल
परमेश्वर! यह भोगोंका सारभूत ताम्बूल कर्पूर आदिसे युक्त है। मैंने भक्तिभावसे मुखशुद्धिके लिये निवेदन किया है। आप कृपापूर्वक इसे ग्रहण करें।
अनुलेपन
परमेश्वर ! चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे संयुक्त सुन्दर अबीर-चूर्ण अनुलेपनके रूपमें प्रस्तुत है। कृपया ग्रहण कीजिये।
धूप
हरे! विभिन्न वृक्षोंके उत्कृष्ट गोंद तथा अन्य सुगन्धित पदार्थोंके संयोगसे बना हुआ यह धूप अग्रिका साहचर्य पाकर सम्पूर्ण देवताओंके लिये अत्यन्त प्रिय हो जाता है। आप इसे स्वीकार करें।
दीप
गोविन्द ! अत्यन्त प्रकाशमान एवं उत्तम प्रभाका प्रसार करनेवाला यह सुन्दर दीप घोर अन्धकारके नाशका एकमात्र हेतु है। आप इसे ग्रहण करें।
जलपान
हरे! कर्पूर आदिसे सुवासित यह पवित्र और निर्मल जल सम्पूर्ण जीवोंका जीवन है। आप पीनेके लिये इसे ग्रहण करें।
आभूषण
गोविन्द ! नाना प्रकारके फूलोंसे युक्त तथा महीन डोरेमें गुँथा हुआ यह हार शरीरके लिये श्रेष्ठ आभूषण है। इसे स्वीकार कीजिये। पूजोपयोगी दातव्य द्रव्योंका दान करके व्रतके स्थानमें रखा हुआ द्रव्य श्रीहरिको ही समर्पित कर देना चाहिये। उस समय इस प्रकार कहे– 'परमेश्वर! वृक्षोंके बीजस्वरूप ये स्वादिष्ट और सुन्दर फल वंशकी वृद्धि करनेवाले हैं। आप इन्हें ग्रहण कीजिये।' आवाहित देवताओंमेंसे प्रत्येकका व्रती पुरुष पूजन करे। पूजनके पश्चात् भक्तिभावसे उन सबको तीन-तीन बार पुष्पाञ्जलि दे। सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि गोप, गोपी, राधिका, गणेश, कार्तिकेय, ब्रह्मा, शिव, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, दिक्पाल, ग्रह, शेषनाग, सुदर्शनचक्र तथा श्रेष्ठ पार्षदगण - इन सबका पूजन करके समस्त देवताओंको पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको नैवेद्य देकर दक्षिणा दे तथा जन्माध्यायमें बतायी गयी कथाका भक्तिभावसे श्रवण करे। उस समय व्रती पुरुष रातमें कुशासनपर बैठकर जागता रहे। प्रातःकाल नित्यकर्म सम्पन्न करके श्रीहरिका सानन्द पूजन करे तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराकर भगवन्नामोंका कीर्तन करे ।
नारदजीने पूछा-
वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ नारायण देव! व्रतकालकी सर्वसम्मत वेदोक्त व्यवस्था क्या है? यह बताइये। साथ ही वेदार्थ तथा प्राचीन संहिताका विचार करके यह भी बतानेकी कृपा कीजिये कि व्रतमें उपवास एवं जागरण करनेसे क्या फल मिलता है अथवा उसमें भोजन कर लिया जाय तो कौन सा पाप लगता है ?
भगवान् नारायणने कहा-
यदि आधी रातके समय अष्टमी तिथिका एक चौथाई अंश भी दृष्टिगोचर होता हो तो वही व्रतका मुख्य काल है। उसीमें साक्षात् श्रीहरिने अवतार ग्रहण किया है। वह जय और पुण्य प्रदान करती है; इसलिये 'जयन्ती' कही गयी है। उसमें उपवास व्रत करके विद्वान् पुरुष जागरण करे यह समय सबका अपवाद, मुख्य एवं सर्वसम्मत है, ऐसा वेदवेत्ताओंका कथन है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने भी ऐसा ही कहा था जो अष्टमीको उपवास एवं जागरणपूर्वक व्रत करता है, वह करोड़ों जन्मोंमें उपार्जित पापोंसे छुटकारा पा जाता है; इसमें संशय नहीं है। सप्तमीविद्धा अष्टमीका यत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। रोहिणी नक्षत्रका योग मिलनेपर भी सप्तमीविद्धा अष्टमीको व्रत नहीं करना चाहिये; क्योंकि भगवान् देवकीनन्दन अविद्ध-तिथि एवं नक्षत्रमें अवतीर्ण हुए थे। यह विशिष्ट मङ्गलमय क्षण वेदों और वेदाङ्गोंके लिये भी गुप्त है। रोहिणी नक्षत्र बीत जानेपर ही व्रती पुरुषको पारणा करनी चाहिये। तिथिके अन्त में श्रीहरिका स्मरण तथा देवताओंका पूजन करके की हुई पारणा पवित्र मानी गयी है। वह मनुष्योंके समस्त पापोंका नाश करनेवाली होती है। सम्पूर्ण उपवास व्रतोंमें दिनको ही पारणा करनेका विधान है। वह उपवास व्रतका अङ्गभूत अभीष्ट फलदायक तथा शुद्धिका कारण है। पारणा न करनेपर फलमें कमी आती है। रोहिणीव्रतके सिवा दूसरे किसी व्रतमें रातको पारणा नहीं करनी चाहिये। महारात्रिको छोड़कर दूसरी रात्रिमें पारणा की जा सकती है। ब्राह्मणों और देवताओंकी पूजा करके पूर्वाह्नकालमें पारणा उत्तम मानी गयी है।
रोहिणी-व्रत सबको सम्मत है। उसका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये। यदि बुध अथवा सोमवारसे युक्त जयन्ती मिल जाय तो उसमें व्रत करके व्रती पुरुष गर्भमें वास नहीं करता है। यदि उदयकालमें किञ्चिन्मात्र कुछ अष्टमी हो और सम्पूर्ण दिन-रातमें नवमी हो तथा बुध, सोम एवं रोहिणी नक्षत्रका योग प्राप्त हो तो वह सबसे उत्तम व्रतका समय है। सैकड़ों वर्षोंमें भी ऐसा योग मिले या न मिले, कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसे उत्तम व्रतका अनुष्ठान करके व्रती पुरुष अपनी करोड़ों पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। जो सम्पत्तिसे रहित भक्त मनुष्य हैं, वे व्रतसम्बन्धी उत्सवके बिना भी यदि केवल उपवासमात्र कर लें तो भगवान् माधव उनपर उतनेसे ही प्रसन्न हो जाते हैं। भक्तिभावसे भाँति-भाँतिके उपचार चढ़ाने तथा रातमें जागरण करनेसे दैत्यशत्रु श्रीहरि जयन्ती व्रतका फल प्रदान करते हैं। जो अष्टमी व्रतके उत्सवमें धनका उपयोग करनेमें कंजूसी नहीं करता, उसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। जो कंजूसी करता है, वह उसके अनुरूप ही फल पाता है। विद्वान् पुरुष अष्टमी और रोहिणीमें पारणा न करे; अन्यथा वह पारणा पूर्वकृत पुण्योंको तथा उपवाससे प्राप्त होनेवाले फलको भी नष्ट कर देती है, तिथि आठ गुने फलका नाश करती है और नक्षत्र चौगुने फलका। अतः प्रयत्नपूर्वक तिथि और नक्षत्रके अन्तमें पारणा करे। यदि महानिशा प्राप्त होनेपर तिथि और नक्षत्रका अन्त होता हो तो व्रती पुरुषको तीसरे दिन पारणा करनी चाहिये। आदि और अन्तके चार-चार दण्डको छोड़कर बीचकी तीन पहरवाली रात्रिको त्रियामा रजनी कहते हैं। उस रजनीके आदि और अन्तमें दो संध्याएँ होती हैं। जिनमें से एकको दिनादि या प्रातः संध्या कहते हैं और दूसरीको दिनान्त या सायंसंध्या शुद्धा जन्माष्टमी तिथिको जागरणपूर्वक व्रतका अनुष्ठान करके मनुष्य सौ जन्मोंके किये हुए पापोंसे छुटकारा पा जाता है। इसमें संशय नहीं है। जो मनुष्य शुद्धा जन्माष्टमीमें केवल उपवासमात्र करके रह जाता है, व्रतोत्सव या जागरण नहीं करता, वह अश्वमेध यज्ञके फलका भागी होता है। श्रीकृष्णजन्माष्टमी के दिन भोजन करनेवाले नराधम घोर पापों और उनके भयानक फलोंके भागी होते हैं। जो उपवास करनेमें असमर्थ हो, वह एक ब्राह्मणको भोजन करावे अथवा उतना धन दे दे, जितनेसे वह दो बार भोजन कर ले अथवा प्राणायाम मन्त्रपूर्वक एक सहस्र गायत्रीका जप करे। मनुष्य उस व्रतमें बारह हजार मन्त्रोंका यथार्थरूपसे जप करे तो और उत्तम है। वत्स नारद! मैंने धर्मदेवके मुखसे जो कुछ सुना था, वह सब तुम्हें कह सुनाया। व्रत, उपवास और पूजाका जो कुछ विधान है और उसके न करनेपर जो कुछ दोष होता है; वह सब यहाँ बता दिया गया। (अध्याय ८)
Summary of chapter 6 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
When Devakī conceived her seventh child, who was an expansion of Lord Śrī Saṅkarshaṇa, the Supreme Lord Śrī Kṛshṇa dispatched His supreme divine potency Yogamāyā to transfer the divine embryo from the womb of Devakī in Mathura prison to the womb of Rohiṇī residing safely in Gokula under the care of Nanda Bābā. Yogamāyā executed this miraculous cosmic transfer seamlessly, causing the people of Mathura to believe that Devakī had suffered a tragic miscarriage. In Gokula, Rohiṇī gave birth to the mighty, radiant child Balarāma, who grew with divine strength and joy among the cowherds, shielded by the mystical power of Yogamāyā.