भगवान् नारायण कहते हैं-
नारद! एक दिन नन्दरानी यशोदा स्नान करनेके लिये यमुनाटपर गयीं। इधर मधुसूदन श्रीकृष्ण दही-माखन आदिसे भरे-पूरे घरको देखकर बड़े प्रसन्न हुए। घरमें जो दही, दूध, घी, तक्र और मनोहर मक्खन रखा हुआ था, वह सब आप भोग लगा गये। छकड़ेपर जो मधु, मक्खन और स्वस्तिक ( मिष्टान्नविशेष) लदा था, उसे भी खा पीकर आप कपड़ोंसे मुँह पोंछनेकी तैयारी कर रहे थे। इतनेमें ही गोपी यशोदा नहाकर अपने घर लौट आयीं। उन्होंने बालकृष्णको देखा। घरमें दही, दूध आदिके जितने मटके थे, वे सब फूटे और खाली दिखायी दिये। मधु आदिके जो बर्तन थे, वे भी एकदम खाली हो गये थे। यह सब देखकर यशोदामैयाने बालकोंसे पूछा- 'अरे! यह तो बड़ा अद्भुत कर्म है। बच्चो! तुम सच-सच बताओ, किसने यह अत्यन्त दारुण कर्म किया है ?' यशोदाकी बात सुनकर सब बालक एक साथ बोल उठे–'मैया! हम सच कहते हैं, तुम्हारा लाला ही सब खा गया, हमलोगोंको तनिक भी नहीं दिया है।' बालकोंका यह वचन सुनकर नन्दरानी कुपित हो उठीं और लाल-लाल आँखें किये बेंत लेकर दौड़ीं। इधर गोविन्द भाग निकले। मैया उन्हें पकड़ न सक। भला, जो शिव आदिके ध्यानमें भी नहीं आते, योगियोंके लिये भी जिन्हें पकड़ पाना अत्यन्त कठिन है; उन्हें यशोदाजी कैसे पकड़ पातीं? यशोदाजी पीछा करके थक गयीं। शरीर पसीनेसे लथपथ हो गया। वे मनमें ही क्रोध भरकर खड़ी हो गयीं। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। माताको यों थकी हुई देख कृपालु पुरुषोत्तम जगदीश्वर श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए उनके सामने खड़े हो गये। नन्दरानी उनका हाथ पकड़कर अपने घर ले आयीं। उन्होंने मधुसूदनको वस्त्रसे वृक्षमें बाँध दिया। श्रीकृष्णको बाँधकर यशोदा अपने घरमें चली गयीं तथा जगत्पति परमेश्वर श्रीहरि वृक्षकी जड़के पास खड़े रहे। नारद ! श्रीकृष्णके स्पर्शमात्रसे वह पर्वताकार वृक्ष सहसा भयानक शब्द करके वहाँ गिर पड़ा। उस वृक्षसे सुन्दर वेषधारी एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। वह रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित, गौरवर्ण तथा किशोर अवस्थाका था सुवर्णमय शृङ्गारसे विभूषित जगदीश्वर श्रीकृष्णको प्रणाम करके वह दिव्य पुरुष मुस्कराता हुआ दिव्य रथपर आरूढ़ हुआ और अपने घरको चला गया। वृक्षको गिरते देख व्रजेश्वरी यशोदा भयसे त्रस्त हो उठीं। उन्होंने रोते हुए बालक श्यामसुन्दरको उठाकर छाती लगा लिया। इतनेमें ही गोकुलके गोप और गोपियाँ उनके घरमें आ पहुँचीं। वे सब की सब यशोदाको फटकारने लगीं। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक शिशुकी रक्षाके लिये शान्तिकर्म किया। सब गोपियाँ यशोदासे कहने लगीं- नन्दरानी! अत्यन्त वृद्धावस्थामें तुम्हें यह पुत्र प्राप्त हुआ है। संसारमें जो भी धन, धान्य तथा रत्न है, वह सब पुत्रके लिये ही है। आज हमने सचमुच यह जान लिया कि तुम्हारे भीतर सुबुद्धि नहीं है। जो खाद्यपदार्थ पुत्रने नहीं खाया, वह सब इस भूतलपर निष्फल ही है। ओ निष्ठुरे! तुमने दही दूधके लिये अपने लालाको वृक्षकी जड़में बाँध दिया और स्वयं घरके काम-काजमें लग गर्यो। दैववश वृक्ष गिर पड़ा; किंतु हम गोपियोंके सौभाग्यसे वृक्षके गिरनेपर भी बालक जीवित बच गया। अरी मूढ़े ! यदि बालक नष्ट हो जाता तो इन वस्तुओंका क्या प्रयोजन था ?
श्रीनन्दजीने भी यशोदाको उलाहना दिया। ब्राह्मणों और बन्दीजनोंने बालकको शुभ आशीर्वाद दिये। सबने मिलकर ब्राह्मणोंसे श्रीहरिका नाम कीर्तन करवाया।
नारदजीने पूछा –
भगवन्! वह सुन्दर वेषधारी पुरुष कौन था, जो गोकुलमें वृक्ष होकर रहता था ? किस कारणसे उसे वृक्ष होना पड़ा था ?
भगवान् नारायण बोले-
एक बार कुबेरपुत्र नलकूबर अप्सरा रम्भाके साथ नन्दनवनमें चला गया। वहाँ उसने भाँति-भाँतिसे विहार किये। इसी समय महर्षि देवल उधरसे निकले। उनकी दृष्टि नलकूबर और रम्भापर पड़ गयी। इधर मुनिको देखकर भी नलकूबर रम्भाने उठकर उनका सम्मान नहीं किया। मुनिवर देवल उन दोनोंकी ऐसी दुर्वृत्ति देखकर कुपित हो गये और उन्हें शाप देते हुए बोले— 'नलकूबर! तुम गोकुलमें जाकर वृक्षरूप धारण करो। फिर श्रीकृष्णका स्पर्श पानेपर अपने भवनमें लौट आओगे और रम्भा ! तुम भी मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर राजा जनमेजयकी सौभाग्यशालिनी पत्नी बनो। अश्वमेधयज्ञमें इन्द्रका स्पर्श पाकर तुम पुनः स्वर्गमें चली जाओगी।'
वह नलकूबर ही यह वृक्ष बना और रम्भाने भारतमें राजा सुचन्द्रकी कन्यारूपसे जन्म लेकर जनमेजयकी महारानी बननेका सौभाग्य प्राप्त किया। जनमेजयके अश्वमेधयज्ञमें इन्द्रने महारानीको स्पर्श कर लिया। इससे उसने योगावलम्बन करके देहको त्याग दिया और वह स्वर्गधामको चली गयी। महामुने! इस प्रकार मैंने अर्जुन वृक्षके भङ्ग होने तथा नलकूबर एवं रम्भाके शापमुक्त होनेका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। श्रीकृष्णका पुण्यदायक चरित्र जन्म, मृत्यु एवं जराका नाश करनेवाला है। उसका इस रूपमें वर्णन किया गया। अब उनकी दूसरी लीलाओंका वर्णन करता हूँ। (अध्याय १४)
Summary of chapter 12 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
Seeking astrological guidance for the divine child, Nanda Bābā invited the exalted sage Garga Muni to his home in Gokula. Conducting a private naming ceremony, Garga Muni whispered the secret truths of the child's divine identity to Nanda Bābā, revealing that this boy possessed the power of previous incarnations and would protect the universe from evil. Garga Muni formally named the elder boy Rāma due to his supreme strength and the younger dark-skinned child Kṛshṇa, warning Nanda Bābā to protect Him carefully as He would face many trials from wicked demons sent by Kaṃsa.