भगवान् नारायण कहते हैं-
नारद ! कंससे व्रजमें जानेकी आज्ञा पाकर अक्रूरजी अपने घर गये और उत्तम मिष्टान्न खाकर शव्यापर सोये उन्होंने सुवासित जल पीकर कपूर मिला हुआ पान खाया और सुखपूर्वक निद्रा ली। तदनन्तर रातके पिछले पहरमें जब कि बाजे आदिकी ध्वनि नहीं होती थी; उन्होंने एक सुन्दर सपना देखा ऐसा सपना, जिसकी पुराणों और श्रुतियोंमें प्रशंसा की गयी है। अक्रूरजी नीरोग थे उनकी शिखा बँधी हुई थी। उन्होंने दो वस्त्र धारण कर रखे थे। वे सुन्दर शय्यापर सोये थे। उनके मनमें उत्तम स्नेह उमड़ रहा था और वे चिन्ता तथा शोकसे रहित थे। मुने! उन्होंने स्वप्रमें पहले एक ब्राह्मण बालकको देखा, जिसकी किशोर अवस्था और अङ्गकान्ति श्याम थी। वह दो भुजाओंसे विभूषित था। उसके हाथों में मुरली थी। वह पीत वस्त्र धारण करके वनमालासे सुशोभित था। उसके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। मालतीकी माला उसकी शोभा बढ़ाती थी। वह भूषणके योग्य और उत्तम मणिरत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित था। उसके मस्तकपर मोरपंखका मुकुट शोभा दे रहा था। मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी और नेत्र कमलोंकी शोभाको लज्जित कर रहे थे। इसके बाद उन्होंने पति और पुत्रोंसे युक्त, पीताम्बरधारिणी तथा रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित एक सुन्दरी सतीको देखा, जिसके एक हाथमें जलता दीपक था और दूसरेमें श्वेत धान्य उसका मुख शरद् ऋतुके चन्द्रमाको तिरस्कृत कर रहा था। वह सुन्दरी सती मुस्कराती हुई वर देनेको उद्यत थी। इसके बाद उन्हें शुभाशीर्वाद देते हुए एक ब्राह्मण, श्वेत कमल, राजहंस, अश्व तथा सरोवरके दर्शन हुए। उन्होंने फल और फूलोंसे लदे हुए आम, नीम, नारियल, विशाल आक और केलेके वृक्षका सुन्दर एवं मनोहर चित्र भी देखा। उन्हें यह भी दिखायी दिया कि सफेद साँप मुझे काट रहा है और मैं पर्वतपर खड़ा हूँ। उन्होंने कभी अपनेको वृक्षपर, कभी हाथीपर, कभी नावपर और कभी घोड़ेकी पीठपर बैठे देखा। कभी देखा कि मैं वीणा बजा रहा हूँ और खीर खा रहा हूँ। कमलके पत्तेपर परोसा हुआ प्रिय अन्न दही, दूधके साथ ले रहा हूँ। कभी देखा कि मेरे अङ्गोंमें कीड़े और विष्ठा लग गये हैं और मैं रोता-रोता मोहित हो रहा हूँ। कभी' उन्हें अपने हाथोंमें श्वेत और श्वेत पुष्प दिखायी दिया तथा कभी उन्होंने अपने आपको चन्दनसे चर्चित देखा। कभी अपने आपको अट्टालिकापर और कभी समुद्रमें देखा। शरीरमें रक्त लगा है; अङ्ग अङ्ग छिन्न-भिन्न एवं क्षत विक्षत हो रहा है और उसमें मेद तथा पीब लिपटे हुए हैं-यह बात देखनेमें आयी। तदनन्तर चाँदी, सोना, उज्ज्वल मणिरत्र, मुक्ता, माणिक्य, भरे हुए कलशका जल, बछड़ासहित गौ, साँड़, मोर, तोता, सारस, हंस, चील, खंजरीट, ताम्बूल, पुष्पमाला, प्रज्वलित अग्नि, देवपूजा, पार्वतीकी प्रतिमा, श्रीकृष्णकी प्रतिमा, शिवलिङ्ग, ब्राह्मण-बालिका, सामान्य बालिका, फली और पकी हुई खेती, देवस्थान, सिंह, बाघ, गुरु और देवताके दर्शन हुए। ऐसा स्वप्र देख प्रातः काल उठकर उन्होंने इच्छानुसार आह्निक कृत्योंका सम्पादन किया। इसके बाद उद्धवसे स्वप्रका सारा वृत्तान्त कहा और उनकी आज्ञा ले गुरु एवं देवताकी पूजा करके मन ही मन श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए वहाँसे यात्रा की। नारद! रास्तेमें भी उन्हें ऐसे ही मङ्गलयोग्य, शुभदायक, मनोवाञ्छित फल देनेवाले, रमणीय तथा मङ्गलसूचक शकुन अपने सामने दृष्टिगोचर हुए बायीं तरफ उन्हें मुर्दा, सियारिन, भरा घड़ा, नेवला, नीलकण्ठ, दिव्याभूषणोंसे विभूषित पति पुत्रवती साध्वी स्त्री, श्वेत पुष्प, श्वेत माला, श्वेत धान्य तथा खञ्जरीटके शुभ दर्शन हुए दाहिनी ओर उन्होंने जलती आग, ब्राह्मण, वृषभ, हाथी, बछड़ेसहित गाय, श्वेत अश्व, राजहंस, वेश्या, पुष्पमाला, पताका, दही, खीर, मणि, सुवर्ण, चाँदी, मुक्ता, माणिक्य, तुरंतका कटा हुआ मांस, चन्दन, मधु, घी, कृष्णसार मृग, फल, लावा, सरसों, दर्पण, विचित्र विमान, सुन्दर दीप्तिमती प्रतिमा, श्वेत कमल, कमलवन, शङ्ख, चील, चकोर, बिलाव, पर्वत, बादल, मोर, तोता और सारसके दर्शन किये तथा शङ्ख, कोयल एवं वाद्योंकी मङ्गलमयी ध्वनि सुनी। श्रीकृष्ण-महिमाके विचित्र गान, हरिकीर्तन और जय-जयकारके शब्द भी उनके कानों में पड़े। ऐसे शुभ शकुन देख-सुनकर अक्रूरका हृदय हर्षसे खिल उठा। उन्होंने श्रीहरिका स्मरण करके पुण्यमय वृन्दावनमें प्रवेश किया सामने देखा - रमणीय रासमण्डल शोभा पाता है, जो मनको अभीष्ट है। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, पुष्प तथा चन्दनका स्पर्श करके बहनेवाली वायु उस स्थानको सुवासित कर रही है। केलेके खम्भे तथा मङ्गल कलश रासमण्डलकी शोभा बढ़ा रहे हैं। रेशमी सूतमें गुथे हुए आम्रपल्लवोंकी सुन्दर बन्दनवारें भी इस रम्य प्रदेशकी श्रीवृद्धि कर रही हैं। सारा शोभनीय रासमण्डल सब ओरसे पद्मरागमणिद्वारा निर्मित है तथा तीन करोड़ रत्नमय मन्दिर एवं लाखों रमणीय कुञ्ज कुटीर उसकी शोभा बढ़ाते हैं। रासमण्डल तथा वृन्दावनकी शोभा देखकर जब अक्रूर कुछ दूर आगे गये तो उन्हें अपने समक्ष नन्दरायजीका परम उत्तम सुरम्य व्रज दिखायी दिया, जो विष्णुके निवास स्थान - वैकुण्ठधामके समान सुशोभित था। उसमें रत्नोंकी सीढ़ियाँ लगी थीं। रत्नोंके बने हुए खम्भोंसे वह बड़ा दीप्तिमान् दिखायी देता था। भाँति-भाँतिके विचित्र चित्र उसका सौन्दर्य बढ़ा रहे थे। श्रेष्ठ रत्नोंके मण्डलाकार घेरेसे वह घिरा हुआ था। विश्वकर्माद्वारा रचित वह नन्दभवन मणियोंके सारभागसे खचित (जड़ा हुआ) था। दरवाजेपर जो मार्ग दिखायी दिया, उसके द्वारा अक्रूरने राजद्वारके भीतर प्रवेश किया। वह द्वार पताकाओं तथा रत्नोंकी झालरोंसे सजा था मुक्ता और माणिक्यसे विभूषित था। रत्नोंके दर्पण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा रत्नोंसे जटित होनेके कारण उस द्वारकी विचित्र शोभा होती थी। वहाँ रत्नमयी वीथियोंकी रचना की गयी थी तथा मङ्गल कलशोंसे सुसज्जित वह द्वार मङ्गलमय दिखायी देता था। अक्रूरका आगमन सुनकर नन्दजी बड़े प्रसन्न हुए और बलराम तथा श्रीकृष्णको साथ ले उनकी अगवानीके लिये गये नन्दजीके साथ वृषभानु आदि गोप भी थे। नर्तकी, भरा हुआ घड़ा, गजराज तथा श्वेत धान्यको आगे करके काली गौ, मधुपर्क, पाद्य तथा रत्नमय आसन आदि साथ ले नन्दजी विनीत एवं शान्तभावसे मुस्कराते हुए आगे बढ़े। वे गोपगणों तथा बालकसहित आनन्दमन हो रहे थे। महाभाग अक्रूरको देख नन्दजीने तत्काल ही उन्हें हृदयसे लगा लिया। सब गोपोंने मस्तक झुकाकर अक्रूरको प्रणाम किया और आशीर्वाद लिये मुने! उन सबका परस्पर संयोग बड़ा ही गुणवान् हुआ। अक्रूर बारी-बारीसे श्रीकृष्ण और बलरामको गोदमें उठा लिया तथा उनके गाल चूमे। उस समय उनका सारा अङ्ग पुलकित था। नेत्रोंसे अश्रुधारा झर रही थी। हृदयमें आह्लाद उमड़ा आ रहा था। अक्रूर कृतार्थ हो गये। उनका मनोरथ सिद्ध हो गया। उन्होंने दो भुजाओंसे सुशोभित श्यामसुन्दर श्रीकृष्णकी ओर एक क्षणतक देखा, जो पीताम्बर धारण किये मालतीकी मालासे विभूषित थे। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। उन्होंने हाथमें वंशी ले रखी थी। ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवता तथा सनकादि मुनीन्द्र जिनकी स्तुति करते हैं और गोप कन्याएँ जिनकी ओर सदा निहारती रहती हैं; उन परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णको अक्रूरने एक क्षणतक अपनी गोदमें देखा। वे मुस्करा रहे थे। तत्पश्चात् उन्होंने चतुर्भुज विष्णुके रूपमें उनको सामने खड़े देखा। लक्ष्मी और सरस्वती- ये दो देवियाँ उनके अगल बगलमें खड़ी थीं। वे वनमालासे विभूषित थे। सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षद उनकी सेवामें उपस्थित थे। सिद्धोंके समुदाय भक्तिभाव सेनम्र हो उन परात्पर प्रभुकी सेवा कर रहे थे। फिर दूसरे ही क्षण अक्रूरने श्रीकृष्णको महादेवजीके रूपमें देखा। उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिक मणिके समान उज्ज्वल थी। नागराजके आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते थे। दिशाएँ ही उनके लिये वस्त्रका काम देती थीं। योगियों में श्रेष्ठ वे परब्रह्म शिव अपने अङ्गोंमें भस्म रमाये, सिरपर जटा धारण किये और हाथमें जप माला लिये ध्यानमें स्थित थे। तदनन्तर एक ही क्षणमें श्रीकृष्ण उन्हें ध्यानपरायण एवं मनीषियोंमें श्रेष्ठ चतुर्भुज ब्रह्मा रूपमें दृष्टिगोचर हुए। फिर कभी धर्म, कभी शेष, कभी सूर्य, कभी सनातन ज्योति स्वरूप और कभी कोटि-कोटि कन्दर्पनिन्दक, परम शोभासम्पन्न एवं कामिनियोंके लिये कमनीय प्रेमास्पदके रूपमें दिखायी दिये। इस रूपमें नन्दनन्दनका दर्शन करके अक्रूरने उन्हें छातीसे लगा लिया। नारद ! नन्दजीके दिये हुए रमणीय रत्नसिंहासनपर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको बिठाकर भक्तिभावसे उनकी परिक्रमा करके पुलकित शरीर हो अक्रूरने पृथ्वीपर माथा टेक उन्हें प्रणाम किया और स्तुति प्रारम्भ की।
अक्रूर बोले-
जो सबके कारण, परमात्मस्वरूप तथा सम्पूर्ण विश्वके ईश्वर हैं, उन श्रीकृष्णको बारंबार नमस्कार है। सर्वेश्वर! आप प्रकृतिसे परे, परात्पर, निर्गुण, निरीह, निराकार, साकार, सर्वदेवस्वरूप, सर्वदेवेश्वर, सम्पूर्ण देवताओंके भी अधिदेवता तथा विश्वके आदिकारण हैं; आपको नमस्कार है। असंख्य ब्रह्माण्डोंमें आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूपमें निवास करते हैं। आप ही सबके आदिकारण हैं। विश्वेश्वर और विश्व दोनों आपके ही स्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। गोपाङ्गनाओंके प्राणवल्लभ ! आपको नमस्कार है। गणेश और ईश्वर आपके ही रूप हैं। आपको नमस्कार है। आप देवगणोंके स्वामी तथा श्रीराधाके प्राणवल्लभ हैं; आपको बारंबार नमस्कार है। आप ही राधारमण तथा राधाका रूप धारण करते हैं। राधाके आराध्य देवता तथा राधिकाके प्राणाधिक प्रियतम भी आप ही हैं; आपको नमस्कार है। राधाके वशमें रहनेवाले, राधाके अधिदेवता और राधाके प्रियतम ! आपको नमस्कार है। आप राधाके प्राणोंके अधिष्ठाता देवता हैं तथा सम्पूर्ण विश्व आपका ही रूप है; आपको नमस्कार है। वेदोंने जिनकी स्तुति की है, वे परमात्मा तथा वेदज्ञ विद्वान् भी आप ही हैं। वेदोंके ज्ञानसे सम्पन्न होनेके कारण आप वेदी कहे गये हैं; आपको नमस्कार है। वेदोंके अधिष्ठाता देवता और बीज भी आप ही हैं; आपको नमस्कार है। जिनके रोमकूपोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड नित्य निवास करते हैं, उन महाविष्णुके ईश्वर आप विश्वेश्वरको बारंबार नमस्कार है। आप स्वयं ही प्रकृतिरूप और प्राकृत पदार्थ हैं। प्रकृतिके ईश्वर तथा प्रधान पुरुष भी आप ही हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। इस प्रकार स्तुति करके अक्रूरजी नन्दरायजीके सभाभवनमें मूच्छित हो गये और सहसा भूमिपर गिर पड़े। उसी अवस्थामें पुनः उन्होंने अपने हृदयमें और बाहर भी सब ओर उन श्यामसुन्दर सर्वेश्वर परमात्माको देखा। वे ही विश्वमें व्याप्त थे और वे ही विश्वरूपमें प्रकट हुए थे। नारद! अक्रूरजीको मूच्छित हुआ देख नन्दजीने आदरपूर्वक उठाया और रमणीय रत्नसिंहासनपर बिठा दिया। तत्पश्चात् उन्होंने अक्रूरसे सारा वृत्तान्त पूछा और बारंबार कुशलप्रश्न करते हुए उन्हें मिष्टान्न भोजन कराया। अक्रूरने कंसका सारा वृत्तान्त कह सुनाया और यह भी कहा कि अपने माता- पिताको बन्धनसे छुड़ाने के लिये बलराम और श्रीकृष्णको वहाँ अवश्य चलना चाहिये। जो अक्रूरद्वारा किये गये इस स्तोत्रका एकाग्रचित्त होकर पाठ करता है, वह पुत्रहीन हो तो पुत्र पाता है और भार्याहीन हो तो उसे प्रिय भार्याकी उपलब्धि होती है। निर्धनको धन, भूमिहीनको उर्वरा भूमि, संतानहीनको संतान और प्रतिष्ठारहितको प्रतिष्ठाको प्राप्ति होती है और जो यशस्वी नहीं है, वह भी अनायास ही महान् यश प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर अक्रूरजी रातके समय अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो रमणीय चम्पाकी शय्यापर श्रीकृष्णको छातीसे लगाकर सोये प्रातः काल सहसा उठकर परम उत्तम आह्निक कृत्यका सम्पादन करके उन्होंने जगदीश्वर श्रीकृष्ण तथा बलरामको अपने रथपर बिठाया पाँच प्रकारके गव्य (दूध, दही, माखन, घी और छाँछ) तथा नाना प्रकारके परम दुर्लभ द्रव्य रखवाये। वृषभानु, नन्द, सुनन्द तथा चन्द्रभानु गोपको भी साथ ले लिया। उस समय ब्रजराज नन्द गोपने आनन्दमग्न हो नाना प्रकार के वाद्य - मृदङ्ग, मुरज (ढोल), पटह, पणव, ढक्का, दुन्दुभि, आनक, सज्जा, संनहनी, कांस्य पट्ट (झाँझ) मर्दल और मण्डवी आदि बजवाये। बाजोंकी ध्वनि और बलराम तथा श्रीकृष्णके जानेका समाचार सुन श्रीकृष्णको रथपर बैठे देख गोपियाँ प्रणय-कोपसे पीड़ित हो उनके पास आ पहुँचीं। ब्रह्मन् ! श्रीकृष्णके मना करनेपर भी श्रीराधाकी प्रेरणासे उन गोपकिशोरियोंने पैरोंके आघातसे राजा कंसके उस रथको अनायास ही तोड़ डाला। उसपर बैठे हुए सब गोप हाहाकार करने लगे और बलवती गोपियाँ श्रीकृष्णको गोदमें लेकर चली गयीं। किसी गोपीने क्रोधपूर्वक क्रूर अक्रूरको बहुत फटकारा। कुछ गोपियाँ अक्रूरको वस्त्रसे बाँधकर वहाँसे चल दीं। बेचारे अक्रूरको बड़ा कष्ट प्राप्त हुआ। यह देख माधव राधाके निकट गये और पुनः उन्हें समझाने लगे। उन्होंने आध्याति 'योगद्वारा विनय और आदरके साथ अक्रूरको भी समझाया और श्रीराधाको आश्वासन दिया। इसी समय आकाशसे एक दिव्य रथ भूतलपर आया, जो मन्त्रसे प्रेरित होकर चलता था। वह विचित्र वस्त्रोंसे सुशोभित था। श्रीहरिने अपने सामने खड़े हुए उस रथको देखा। उसमें श्रेष्ठ मणिरत्न जड़े हुए थे। वह रथ विश्वकर्माद्वारा बनाया गया था। उसे देखकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण माताके घरमें आये। वहाँ भाईसहित भगवान् माधव, जिनके चरणोंकी वन्दना, मुनीन्द्र, देवेन्द्र, ब्रह्मा, शिव और शेष आदि करते हैं, खा-पीकर सुखसे सोये (अध्याय ७० )
Summary of chapter 75 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
This chapter details the secret seed-mantra, meditation procedure, and formal initiation rites required to worship Goddess Śrī Rādhā in accordance with Vaishṇava Agamas. Maharshi Nārada outlined the necessity of receiving this sacred Mantra from a self-realized spiritual master who is purely dedicated to Śrī Kṛshṇa. Practicing this Mantra with daily mental absorption purifies the subtle body, removes all karmic obstructions, and grants the practitioner direct qualification to participate in the eternal, transcendent pastimes of Goloka.