श्रीभगवान् कहते हैं-
नन्दजी! गृहस्थ पुरुष सदा ब्राह्मणों और देवताओंका पूजन करता है तथा चारों वर्णोंके धर्मानुसार अपने वर्ण-धर्मके पालनमें तत्पर रहता है। इसीलिये देवता आदि सभी प्राणी गृहस्थोंकी आशा करते हैं। गृहस्थ अतिथिका आदर-सत्कार करके सदा पवित्र बना रहता है। (पिण्डदान आदि) कर्मके अवसरपर पितर और अतिथि-पूजनके समय सारे देवता उसी प्रकार गृहस्थके पास आते हैं, जैसे गौएँ पानीसे भरे हुए हौजके पास जाती हैं। भूखा अतिथि सायंकाल प्रयत्नपूर्वक गृहस्थके घर आता है और वहाँ आदर-सत्कार पाकर उसे आशीर्वाद देनेके पश्चात् उस गृहस्थके घरसे बिदा होता है। अतिथिका पूजन न करनेसे गृहस्थ पापका भागी होता है और उसे त्रिलोकीमें उत्पन्न सारे पाप भोगने पड़ते हैं; इसमें तनिक भी संशय नहीं है। अतिथि जिसके घरसे निराश होकर लौट जाता है, उसके घरका उसके पितर, देवता और अग्रियाँ भी परित्याग कर देती हैं तथा वह अतिथि उसे अपना पाप देकर और उसका पुण्य लेकर चला जाता है। इसलिये उत्तम विचारसम्पन्न धर्मज्ञ गृहस्थ पहले देवता आदि सबकी सेवा करके फिर आश्रितवर्गका भरण-पोषण करनेके पश्चात् स्वयं भोजन करता है। जिसके घरमें माता नहीं है और पत्नी पुंश्चली है, उसे वनवासी हो जाना चाहिये; क्योंकि उसके लिये वह गृह वनसे भी बढ़कर दुःखदायक है। वह दुष्टा सदा पतिसे द्वेष करती है और उसे विष तुल्य समझती है। वह उसे भोजन तो देती नहीं; उलटे सदा डाँट- फटकार सुनाती रहती है।
ब्रजेश ! अब गृहस्थ पत्नियोंका जो सदाचार श्रुतिमें वर्णित है, उसे श्रवण करो गृहिणी नारी पतिपरायणा तथा देव ब्राह्मणकी पूजा करनेवाली होती है। उस शुद्धाचारिणीको चाहिये कि प्रातः काल उठकर देवता और पतिको नमस्कार करके आँगनमें गोबर और जलसे लीपकर मङ्गल कार्य सम्पन्न करे। फिर गृहकार्य करके स्नान करे और घरमें आकर देवता, ब्राह्मण और पतिको नमस्कार करके गृहदेवताकी पूजा करे। इस प्रकार सती नारी घरके सारे कार्योंसे निवृत्त होकर पतिको भोजन कराती है और अतिथि सेवा करनेके पश्चात् स्वयं सुखपूर्वक भोजन करती है। पुत्रों को चाहिये कि वे पिताको स्नान कराकर उनकी पूजा करें। यों ही शिष्योंको गुरुका पूजन करना चाहिये। पुत्र और शिष्यको सेवककी भाँति उनके आज्ञानुसार सारा कार्य करना उचित है। पिता और गुरुमें कभी मनुष्य बुद्धि नहीं करनी चाहिये। पिता, माता, गुरु, भार्या शिष्य, स्वयं अपना निर्वाह करनेमें असमर्थ पुत्र, अनाथ बहिन, कन्या और गुरु-पत्नीका नित्य भरण- पोषण करना कर्तव्य है। तात! इस प्रकार मैंने सबके उत्तम धर्मका वर्णन कर दिया। व्रजेश ! स्त्री-जाति तो वस्तुतः शुद्ध है।
उसमें वे सारी पतिव्रताएँ और भी पावन मानी जाती हैं। सृष्टिके आदिमें ब्रह्माने एक ही प्रकार से सारी जातियोंकी रचना की थी। वे सभी उत्तम बुद्धिवाली पवित्र नारियाँ प्रकृतिके अंशसे उत्पन्न हुई थीं। जब केदार-कन्याके (केदार कन्याका उपाख्यान इसी खण्डमें अन्यत्र देखना चाहिये) शापसे वह धर्म नष्ट हो गया, तब ब्रह्माने कुपित होकर पुनः स्त्री जातिका निर्माण किया और उसे तीन भागों में विभक्त कर दिया। उनमें पहली उत्तमा, दूसरी मध्यमा और तीसरी अधमा कही जाती है। धर्मसम्पन्ना उत्तमा स्त्री पतिकी भक्त होती है। वह प्राणोंपर आ बीतनेपर भी अपकीर्ति पैदा करनेवाले जार पुरुषको नहीं स्वीकार करती। जो गुरुजनोंद्वारा यत्नपूर्वक रक्षित होनेके कारण भयवश जार पुरुषके पास नहीं जाती और अपने पतिको कुछ-कुछ मानती है, वह कृत्रिमा नारी मध्यमा कही जाती है। नन्दजी! ऐसी नारियोंका सतीत्व जहाँ स्थानाभाव है, समय नहीं मिलता है और प्रार्थना करनेवाला जार पुरुष नहीं है; वहीं स्थिर रह सकता है। अत्यन्त नीच कुलमें उत्पन्न हुई अधमा स्त्री परम दुष्टा, अधर्मपरायणा, दुष्ट स्वभाववाली, कटुवादिनी और झगड़ालू होती है। वह सदा उपपतिकी सेवा करती है और अपने पतिकी नित्य भर्त्सना करती रहती है, उसे दुःख देती है और विष तुल्य समझती है। उसका पति भले ही भूतलपर रूपवान्, धर्मात्मा, प्रशंसनीय और महापुरुष हो; परंतु वह उपाय करके उपपतिद्वारा उसे मरवा डालती है। उसकी प्रीति बिजलीकी चमक और जलपर खिंची हुई रेखाके समान क्षणभङ्गुर होती है। वह सदा अधर्ममें तत्पर रहकर निश्चित रूपसे कपटपूर्ण वचन ही बोलती है। उसका मन न तो व्रत, तपस्या, धर्म और गृहकार्यमें ही लगता है और न गुरु तथा देवताओंकी ओर ही झुकता है। नन्दजी ! इस प्रकार तीन भेदोंवाली स्त्रीजातिकी कथा मैंने कह दी, अब विभिन्न प्रकारके भक्तोंका लक्षण सुनिये । तृणकी शय्याका प्रेमी भक्त सांसारिक सुखोंके कारणोंका त्याग करके अपने मनको मेरे नाम और गुणके कीर्तनमें लगाता है। वह मेरे चरणकमलका ध्यान करता है और भक्तिभावसहित उसका पूजन करता है। देवगण उस निष्काम भक्ती अहैतुकी पूजाको ग्रहण करते हैं। ऐसे भक्त अणिमा आदि सारी अभीष्ट सिद्धियोंकी तथा सुखके कारणभूत ब्रह्मत्व, अमरत्व अथवा देवत्व कामना नहीं करते। उन्हें हरिकी दासताके बिना सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य आदि चारों मुक्तियोंकी अभिलाषा नहीं रहती और न वे निर्वाण-मुक्ति तथा अभीप्सित अमृत पानकी ही स्पृहा करते हैं। उन्हें मेरी अतुलनीय निश्चल भक्तिकी ही लालसा रहती है। व्रजेश्वर ! उन श्रेष्ठ सिद्धेश्वरोंमें स्त्री-पुरुषका भेद नहीं रहता और न समस्त जीवोंमें भिन्नता रहती है। वे दिगम्बर होकर भूख-प्यास आदि तथा निद्रा, लोभ, मोह आदि शत्रुओंका त्याग करके रात-दिन मेरे ध्यानमें निमग्न रहते हैं। नन्दजी ! यह मेरे सर्वश्रेष्ठ भक्तके लक्षण हैं। अब मध्यम आदि भक्तोंका लक्षण श्रवण करो। पूर्वजन्मोंके शुभ कर्मके प्रभावसे पवित्र हुआ गृहस्थ कर्मोंमें आसक्त न होकर सदा पूर्वकर्मका उच्छेदक कर्म ही करता है; वह यत्नपूर्वक कोई दूसरा कर्म नहीं करता; क्योंकि उसे किसी कर्मकी कामना ही नहीं रहती। वह मन, वाणी और कर्मसे सदा ऐसा चिन्तन करता रहता है कि जो कुछ कर्म है, वह सब श्रीकृष्णका है, मैं कर्मका कर्ता नहीं हूँ। ऐसा भक्त मध्यम श्रेणीका होता है। जो उससे भी नीची कोटिका है; वह श्रुतिमें प्राकृतिक अर्थात् अधम कहा गया है। उत्तम कोटिका भक्त अपने हजारों पूर्वपुरुषोंका उद्धार कर देता है। उसे स्वप्नमें भी यमराज अथवा यमदूतका दर्शन नहीं होता। मध्यम कोटिका भक्त अपनी सौ पीढ़ियोंका तथा प्राकृत भक्त पचीस पीढ़ियोंका उद्धारक होता है । तात! इस प्रकार मैंने आपके आज्ञानुसार तीन प्रकारके भक्तोंका वर्णन कर दिया। अब सावधानतया ब्रह्माण्डकी रचनाका आख्यान श्रवण कीजिये नन्दजी ! भक्तलोग यत्न करनेपर ब्रह्माण्ड रचनाका प्रयोजन जान लेते हैं। मुनियों, देवताओं और संतोंको बड़े दुःखसे कुछ-कुछ ज्ञात होता है। पूर्णरूपसे विश्वका ज्ञान तो अनन्तस्वरूप मुझको, ब्रह्मा और महेश्वरको है। हमारे अतिरिक्त धर्म, सनत्कुमार, नर-नारायण ऋषि, कपिल, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, वेद, वेदमाता सावित्री, स्वयं सर्वज्ञा राधिका - ये लोग भी विश्व-रचनाका अभिप्राय जानते हैं, इनके अतिरिक्त और किसीको पता नहीं है। उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न सभी विद्वान् इसके वैषम्यार्थको पूर्णरूपसे जानने में असमर्थ हैं। जैसे आकाश और आत्मा नित्य हैं; उसी प्रकार दसों दिशाएँ नित्य हैं। जैसे प्रकृति नित्य है, वैसे ही विश्वगोलक नित्य है। जैसे गोलोक नित्य है, उसी तरह वैकुण्ठ भी नित्य है । एक समयकी बात है। जब मैं गोलोकमें रास क्रीड़ा कर रहा था, उसी समय मेरे वामाङ्गसे एक षोडशवर्षीया नारी प्रकट हुई। वह अत्यन्त सुन्दरी बाला रमणियों में सर्वश्रेष्ठ थी। उसके शरीरका रंग श्वेत चम्पकके समान गौर था । उसकी कान्ति शरत्कालीन चन्द्रमाको लज्जित कर रही थी। वह रत्नाभरणोंसे भूषित थी और उसके अङ्गपर अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई साड़ी शोभा पा रही थी। उसके सभी अङ्ग मनोहर और कोमल थे तथा उसका प्रसन्नमुख मन्द मन्द मुस्कानसे सुशोभित था। उसके चरणोंका अधोभाग सुन्दर महावरसे उद्भासित हो रहा था। वह सुन्दर नेत्रोंवाली सौन्दर्यशालिनी बाला गजेन्द्रकी सी चाल चल रही थी। उस कामिनीने रासक्रीड़ाके अवसरपर प्रकट होकर मुझे आगेसे पकड़ लिया। इसी कारण पुरातत्त्ववेत्ताओंने उसका 'राधा' नाम रखा और उसकी पूजा की उसकी प्रकृति परम प्रसन्न थी; इसलिये वह ईश्वरी 'प्रकृति' कहलायी। समस्त कार्योंमें समर्थ होनेके कारण वह 'शक्ति' नामसे कही जाती है। वह सबकी आधारस्वरूपा, सर्वरूपा और सब तरहसे मङ्गलके योग्य है; सम्पूर्ण मङ्गलोंके दानमें दक्ष होने के कारण वह 'सर्वमङ्गला' है। वह वैकुण्ठमें 'महालक्ष्मी' और मूर्तिभेदसे 'सरस्वती' है। वेदोंको उत्पन्न करने के कारण वह 'वेदमाता' नामसे प्रसिद्ध है। वह 'सावित्री' और तीनों लोकोंका धारण-पोषण करनेवाली 'गायत्री' भी है। पूर्वकालमें उसने दुर्गका संहार किया था; इसी कारण वह 'दुर्गा' नामसे विख्यात है। यह सती प्राचीनकालमें समस्त देवताओंके तेजसे आविर्भूत हुई थी, इसीसे यह आद्याप्रकृति' कहलाती है। यह समस्त असुरोंका मर्दन करनेवाली, सम्पूर्ण आनन्दकी दाता, आनन्दस्वरूपा, दुःख और दरिद्रताका विनाश करनेवाली, शत्रुओंको भय प्रदान करनेवाली और भक्तोंके भयकी विनाशिका है। वही 'सती' रूपसे दक्षकी कन्या हुई और पुनः हिमालयसे उत्पन्न होकर 'पार्वती' कहलाती है। वह सबकी आधारस्वरूपा है। पृथ्वी उसकी एक कला है। तुलसी और गङ्गा उसीकी कलासे उत्पन्न हुई हैं। यहाँतक कि सम्पूर्ण स्त्रियोंका आविर्भाव उसकी कलासे ही हुआ है तात! जिस शक्तिसे सम्पन्न होकर मैं बारंबार सृष्टि रचना करता हूँ, उसे रासके मध्य स्थित देखकर मैंने उसके साथ क्रीड़ा की। उस समय रासमण्डलमें उन दोनोंके शरीरसे जो पसीनेकी बूँदें भूतलपर गिरीं, उनसे एक मनोहर सरोवर उत्पन्न हो गया, जो राधाके नामके सदृश था (अर्थात् उसका नाम राधासरोवर हुआ)। उस सरोवरसे जो पसीनेकी धारा वेगपूर्वक नीचे विश्व-गोलकमें गिरी, उससे सारा ब्रह्माण्डगोलक जलसे भर गया। ब्रजेश्वर! पहले पहल सब कुछ जलमग्र था उस समय सृष्टि नहीं हुई थी। तब शृङ्गारके समाप्त होनेपर मैंने राधामें वीर्यका आधान किया। तत्पश्चात् श्रीराधिकाने गर्भ धारण करके दीर्घकालके बाद एक परम अद्भुत डिम्ब प्रसव किया। उसे देखकर देवीको क्रोध आ गया; तब उन्होंने उसे पैरसे नीचे विश्व गोलकमें ढकेल दिया। तात! वह जलमें गिर पड़ा और सबका आधारस्वरूप 'महान् विराट्' हो गया। तब अपनी संतानको जलमें पड़ा हुआ देखकर मैंने राधाको शाप दे दिया। विभो ! मेरे शापके कारण राधा संतानहीन हो गयी। व्रजेश्वर ! इसलिये जिस डिम्बसे कलाका आश्रय लेकर वह महान् विराट् पैदा हुआ था, उसीसे दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती तथा अन्यान्य जो देवियाँ और स्त्रियाँ हैं; वे सभी क्रमशः कला, कलांश और कलांशके अंशसे उत्पन्न हुई हैं।
व्रजेश ! उस महान् विराट्ने मेरे द्वारा दिये गये अंगुष्ठामृतका पान किया और फिर स्वकर्मानुसार स्थावर रूप होकर वह जलमें शयन करने लगा। योगबलसे जल ही उसकी शय्या और उपाधान था तथा उसके रोमकूप सदा जलसे भरे रहते थे। पुनः उनमें क्षुद्र विराट्' शयन करने लगा। उस क्षुद्र विराट्की नाभिसे सहस्रदल कमल उत्पन्न हुआ उस कमलपर सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने जन्म लिया; इसी कारण वे कमलोद्भव कहे जाते हैं। वहाँ आविर्भूत होकर वे ब्रह्मा चिन्ताग्रस्त हो यों सोचने लगे – 'यह देह किससे उत्पन्न हुई है तथा मेरे माता-पिता और भाई-बन्धु कहाँ हैं?' इसी चिन्तामें वे तीन लाख दिव्य वर्षोंतक उस कमलके भीतर चक्कर काटते रहे। तत्पश्चात् पाँच लाख दिव्य वर्षोंतक उन्होंने तपस्याद्वारा मेरा स्मरण किया, तब मैंने उन्हें मन्त्र प्रदान किया, जिसका वे पवित्रतापूर्वक इन्द्रियोंको काबू में करके नियतरूपसे सात लाख दिव्य वर्षोंतक उस कमलके अंदर जप करते रहे। इसके बाद मुझसे वर पाकर उन सृष्टिकर्ताने सृष्टिकी रचना की। मेरी मायाके बलसे ब्रह्माने प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, नौ ग्रह, आठ वसु, तीन करोड़ देवता, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, भूत-प्रेत आदि राक्षस एवं चराचर जगत्की रचना की। उन्होंने प्रत्येक विश्वमें क्रमशः सात स्वर्ग, सात सागरोंसे संयुक्त स्वर्णभूमिवाली सप्तद्वीपवती पृथ्वी, अन्धकारमय स्थान, सात पाताल तथा इनसे युक्त ब्रह्माण्डका निर्माण किया। प्रत्येक विश्वमें चन्द्रमा, सूर्य, पुण्यक्षेत्र भारत और इन गङ्गा आदि तीर्थोकी सृष्टि की। व्रजेश्वर! महाविष्णुके शरीर में जितने रोमकूप हैं, क्रमशः उतने ही असंख्य विश्व हैं। उन विश्वोंके ऊर्ध्वभागमें वैकुण्ठ है, जो निराश्रय है तथा मेरी इच्छासे जिसका निर्माण हुआ है। वेद भी उसका वर्णन करके पार नहीं पा सकते। निश्चय ही कुयोगियों तथा भक्तिहीनोंके लिये उसका दर्शन दुर्लभ है। इससे ऊपर गोलोक है। वह परम विचित्र आश्रयस्थान वायुके आधारपर टिका हुआ है। मेरी इच्छासे उस अत्यन्त रमणीय अविनाशी लोकका निर्माण हुआ है। वह शतशृङ्ग पर्वत, पुण्यमय वृन्दावन, रमणीय रासमण्डल तथा विरजा नदीसे युक्त है। विरजा अमूल्य रत्नसमूहों, हीरा, माणिक्य तथा कौस्तुभ आदि असंख्यों मणियोंसे युक्त होनेके कारण बड़ी मनोहर है। उस गोलोकमें प्रत्येक महल अमूल्य रत्नोंके बने हुए हैं। उसमें ऐसा मनोहर परकोटा है, जिसे विश्वकर्माने भी नहीं देखा है। वे महल गोपियों, गोपगणों तथा कामधेनुओंसे परिवेष्टित हैं। वहाँ रास-मण्डल असंख्यों कल्पवृक्षों, पारिजातके तरुओं, सरोवरों तथा पुष्पोद्यानोंसे समावृत है। वह गोपों, मन्दिरों, रत्नप्रदीपों, पुष्प शय्याओं, कस्तूरी- कुङ्कुमयुक्त सुगन्धित चन्दनके गन्धों, क्रीडोपयुक्त भोगपदार्थों, सुवासित जल और पान बीड़ाओं, रमणीय सुगन्धियुक्त धूपों, पुष्पमालाओं और रत्नजटित दर्पणोंसे भरा-पूरा है। अमूल्य रत्नाभरणों तथा अग्नि शुद्ध वस्त्रोंसे अलंकृत राधाकी दासियाँ सदा उसकी रक्षा करती रहती हैं। नवयौवनसम्पन्न तथा अनुपम सौन्दर्यशाली गजेन्द्रोंकी सेना क्रमशः उसे घेरे हुए है। ब्रजराज ! वह रमणीय तथा चन्द्रमण्डल के समान गोल है। उस विस्तृत मण्डलकी रचना बहुमूल्य रत्नोंद्वारा हुई है। वह कस्तूरी कुङ्कुमयुक्त सुन्दर एवं सुगन्धित चन्दनसे समर्चित है। वह फल-पल्लवयुक्त मङ्गल-कलशों, दही और खीलों, पत्तों, कोमल दूर्वाङ्कुरों, फलों, असंख्यों केलेके मनोहर खम्भों तथा रेशमी सूत्र में बँधे हुए कोमल चन्दन पल्लवोंकी वन्दनवा आच्छादित है और चन्दनयुक्त पुष्पमालाओं एवं आभूषणोंसे विभूषित है। वहाँ बहुमूल्य रत्नोंका बना हुआ शतशृङ्ग पर्वत मनको खींचे लेता है। वह अत्यन्त सुन्दर है। वेद भी उसका वर्णन नहीं कर सकते। वह हीरेके हारसे युक्त होनेके कारण रमणीय है तथा मनोहर परकोटेकी तरह उस गोलोकको चारों ओरसे घेरे हुए है। वहाँ चन्दनके वृक्षों से युक्त रमणीय वृन्दावन है, जो कल्पवृक्षों, सुन्दर मन्दार पुष्पों, कामधेनुओं, शोभाशाली मनोहर पुष्पवाटिकाओं, रमणीय क्रीड़ा-सरोवरों और परम सुन्दर क्रीड़ाभवनोंसे सुशोभित है। उसके एकान्तमें रास-क्रीड़ाके योग्य अत्यन्त सुन्दर स्थान है, जो चारों ओर से गोलाकार है। रक्षकरूपमें नियुक्त हुई असंख्यों सुन्दरी गोपिकाएँ उसकी रक्षा करती हैं। वहाँ कोकिल कूजते रहते हैं तथा भौरोंका गुंजार होता रहता है। उसीके एकान्त स्थलमें एक रमणीय अक्षयवट है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई विशाल है। सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला वह अक्षयवट गोपियोंके लिये कल्पवृक्ष है। वहाँ राधाकी दासियाँ क्रीड़ा करती रहती हैं। विरजाके तटप्रान्तके जलका स्पर्श करके बहती हुई शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु उसे पवित्र करती रहती है। उस अक्षयवटके नीचे वृन्दावनमें विनोद करनेवाली मेरे प्राणोंकी अधिदेवता वह राधा असंख्यों दासीगणोंके साथ क्रीड़ा करती है। वही राधा इस समय वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई है। व्रजेश ब्रह्मादि देवता, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र और सिद्धगण गुण, बल, बुद्धि, ज्ञानयोग और विद्याद्वारा उसकी पूजा करते हैं। तात! यह मेरी प्रिया मेरे ही समान है; अतः सब तरहसे वन्दनीया है। नन्दजी! इस प्रकार मैंने यथोचित एवं परिमित रूपसे ब्रह्माण्डौंका वर्णन कर दिया। अब पुनः आपकी और क्या सुननेकी इच्छा है? (अध्याय ८४)
Summary of chapter 84 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
Celebrating sacred botanical manifestations of divine energy, this chapter details the spiritual merits of planting, watering, worshipping, and circumambulating the holy Tulasī plant, the Dhātrī tree, and the Bilva tree. The text declares that Lord Śrī Kṛshṇa resides eternally near a Tulasī garden, and offering a single Tulasī leaf with love satisfies the Lord more than mountains of gold. Similarly, honoring the Dhātrī and Bilva trees bestows health, long life, and spiritual purity upon the household.