श्रीनारायण कहते हैं-
नारद! शचीद्वारा किये गये स्तोत्रको सुनकर बृहस्पति बहुत संतुष्ट हुए और शान्तभावसे इन्द्रपत्नी शचीके प्रति मधुर वाणीमें बोले।
बृहस्पतिने कहा-
बेटी ! सारा भय छोड़ दो। मेरे रहते तुम्हें भय किस बातका है? शोभने ! मेरे लिये जैसे कचकी पत्नी (पुत्रवधू) रक्षणीय है, उसी प्रकार तुम भी हो जो स्थान पुत्रका है, वही शिष्यका भी है। तर्पण, पिण्डदान, पालन और परितोषण - इन सभी कर्मोंके लिये पुत्र और शिष्यमें कोई भेद नहीं है। जैसे पुत्र पिताके मरनेपर उसके लिये अग्निदाता होता है, अवश्य उसी तरह शिष्य गुरुके लिये अग्निप्रदाता कहा गया है। यह बात कण्वशाखामें ब्रह्माजीने कही है। पिता, माता, गुरु, पत्नी, छोटा बालक, अनाथ एवं कुटुम्बीजन- ये पुरुषमात्रसे नित्य पोषण पानेके योग्य हैं, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है (पिता माता गुरुर्भार्या शिशुखानाथबान्धवाः। एते पुंसां नित्यपोष्या इत्याह कमलोद्भवः ॥ (६०।५))। जो इनका पोषण नहीं करता उसके शरीरके भस्म होनेतक उसे सूतक (अशौच) का भागी होना पड़ता है। वह जीते-जी देवयज्ञ तथा पितृयज्ञमें कर्म करनेका अधिकारी नहीं रहता है-ऐसा महेश्वरका कथन है। जो माता, पिता और गुरुके प्रति मानव बुद्धि रखता है, उसको सर्वत्र अयश प्राप्त होता है और उसे पग-पगपर विघ्नका ही सामना करना पड़ता है। जो सम्पत्तिसे मतवाला होकर अपने गुरुका अपमान करता है, उसका शीघ्र ही सर्वनाश हो जाता है; यह सुनिश्चित बात है। अपनी सभामें मुझे देखकर इन्द्र आसनसे नहीं उठे थे, उसीका फल इस समय भोग रहे हैं। गुरुके अपमानका शीघ्र ही जो कटु फल प्राप्त हुआ, उसे तुम अपनी आँखों देख लो। अब मैं इन्द्रको शापसे छुड़ाऊँगा और निश्चय ही तुम्हारी रक्षा करूँगा जो शासन और संरक्षण दोनों ही कर सकता हो, वही गुरु कहलाता है। जो हृदयसे शुद्ध है अर्थात् जिसके हृदयमें कलुषित भाव नहीं पैदा हुआ है, उस नारीका सतीत्व नष्ट नहीं होता। परंतु जिसके मनमें विकल्प है, उसका धर्म नष्ट हो जाता है। पतिव्रते! तुम्हारा दुर्गाजीके समान प्रभाव बढ़ेगा। तुम्हारी प्रतिष्ठा और यश लक्ष्मीजीके समान होंगे। सौभाग्य और पतिविषयक प्रेम श्रीराधिका के समान होगा। स्वामीके प्रति गौरव, मान, प्रीति तथा प्रधानताका भाव भी तुममें श्रीराधाके ही सदृश होगा। रोहिणीके समान तुममें पतिकी अपेक्षा बुद्धि होगी। तुम भारतीके समान पूजनीया तथा सावित्रीके तुल्य सदा शुद्धा एवं उपमारहित होओगी। बृहस्पतिजी ऐसा कह ही रहे थे कि नहुषके दूतने वहाँ आकर शचीसे नन्दनवनमें चलनेके लिये कहा यह सुनते ही बृहस्पतिजीका सारा शरीर क्रोधसे काँपने लगा और उनकी आँखें लाल हो गयीं। वे उस दूतसे बोले।
गुरुने कहा-
दूत ! जाकर नहुषसे कह दे कि 'महाराज! यदि तुम शचीका उपभोग करना चाहते हो तो एक ऐसी सवारीपर चढ़कर रातमें आना, जिसका आजसे पहले किसीने उपयोग न किया हो। सप्तर्षियोंके कंधोंपर अपनी सुन्दर शिविका (पालकी) रख उत्तम वेश-भूषासे सज-धजकर उसीपर आरूढ़ हो तुम्हें यहाँतक यात्रा करनी चाहिये।' बृहस्पतिजीकी बात सुनकर दूतने नहुषके पास जा उनका संदेश कह सुनाया। सुनकर नहुष हँस पड़ा और अपने सेवकसे बोला- 'जाओ, जाओ, जल्दी जाओ और सप्तर्षियोंको यहाँ बुला लाओ। उन सबके साथ मिलकर कोई उपाय करूँगा तुम अभी जाओ।' राजाका आदेश पाकर दूत सप्तर्षियोंके समीप गया और नहुषने जो कुछ कहा था, वह सब उसने उन सबसे कह सुनाया। दूतकी बात सुनकर सप्तर्षि प्रसन्नतापूर्वक नहुषके पास गये। उन सबको आया देख राजाने प्रणाम किया और आदरपूर्वक कहा।
नहुष बोला-
आप लोग ब्रह्माजीके पुत्र हैं, ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होते हैं और सदा ब्रह्माजीके समान ही भक्तवत्सल हैं। निरन्तर भगवान् नारायणकी उपासनामें लगे रहते हैं। शुद्ध सत्त्व ही आपका स्वरूप है। आप मोह और मात्सर्यसे रहित हैं। दर्प और अहंकार आपको छू नहीं सके छू हैं। आप सब लोग सदा भगवान् नारायणके समान तेजस्वी और यशस्वी हैं। गुण, कृपा, प्रेम और वरदान सभी दृष्टियोंसे निश्चय ही आप श्रीहरिके तुल्य हैं । ऐसा कहकर राजा उनके चरणोंमें प्रणाम और स्तुति करने लगा। राजाको कातर हुआ देख वे परम हितैषी ऋषि उससे बोले ।
ऋषियोंने कहा-
बेटा! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो; हम सब कुछ देनेमें समर्थ हैं। हमारे लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। इन्द्रपद, मनुका पद, दीर्घायु, सातों द्वीपोंका प्रभुत्व, चिरकालतक बना रहनेवाला अतिशय सुख, सम्पूर्ण सिद्धियाँ, परम दुर्लभ समस्त ऐश्वर्य तथा जो तपस्यासे भी नहीं मिल सकती, वह हरिभक्ति अथवा मुक्ति भी हम तुम्हें दे सकते हैं। वत्स! बोलो, इस समय तुम्हें किस वस्तुकी इच्छा है? वह सब तुम्हें देकर ही हम तपस्याके लिये जायँगे जो क्षण श्रीकृष्णकी आराधनाके बिना व्यतीत होता है, वह लाख युगोंके समान है अर्थात् श्रीकृष्ण भजनके बिना यदि एक क्षण भी व्यर्थ बीता तो समझना चाहिये कि हमारे एक लाख युग व्यर्थ बीत गये। जो दिन श्रीहरिके ध्यान और सेवनसे शून्य रह गया, वही सबसे बड़ा दुर्दिन है। जो मनुष्य श्रीहरिकी सेवा छोड़कर किसी दूसरे विषयको पानेकी इच्छा रखता है, वह मनोवाञ्छित अमृतको त्यागकर अपने ही विनाशके लिये मानो विष खाता है। ब्रह्मा, शिव, धर्म, विष्णु, महाविष्णु (महानारायण), गणेश, सूर्य, शेष और सनकादि मुनि-ये दिन-रात प्रसन्नतापूर्वक जिनके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं, उन जन्म, मृत्यु और जरारूप व्याधिको हर लेनेवाले श्रीकृष्णमें हमलोग सदा अनुरक्त रहते हैं। सप्तर्षियोंकी यह बात सुनकर राजेश्वर नहुष लज्जित हो गया। उसका सिर झुक गया, तथापि मायासे मोहितचित्त होनेके कारण वह बोला।
नहुने कहा-
महर्षियो! आपलोग भक्तवत्सल हैं और सब कुछ देनेकी शक्ति रखते हैं। इस समय मैं शचीको पाना चाहता हूँ; अतः शीघ्र ही मुझे शचीका दान दीजिये। महासती शची ऐसे पतिको पाना चाहती है, जिसके वाहन सप्तर्षि हों। यही मेरा वर है। आपलोग शीघ्र ही मेरे अभीष्ट कार्यको सम्पन्न करें।नारद! नहुषकी बात सुनकर सब मुनि कौतूहलवश एक-दूसरेको देखते हुए जोर-जोरसे हँसने लगे। राजाको भगवान् विष्णुकी मायासे वेष्टित एवं मोहित मानकर उन दीनवत्सल सप्तर्षियोंने कृपापूर्वक राजाका वाहन बननेकी प्रतिज्ञा कर ली। उसकी शिविका मुक्ता और माणिक्यसे सुशोभित थी। ऋषियोंने उसे कंधेपर उठा लिया और राजा नहुष सुन्दर वेष एवं रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो उस शिविकासे चला। उस वाहनद्वारा अभीष्ट स्थानपर पहुँचनेमें अधिक विलम्ब होता देख राजा सप्तर्षियोंको डाँटने फटकारने लगा। शिविकाके उस मार्गपर सबसे आगे चलते थे दुर्वासा उन्हें राजाकी फटकारपर क्रोध आ गया और वे शाप देते हुए बोले-
'मूढ़चित्त महाराज! तुम महान् अजगर होकर नीचे गिर पड़ो। धर्मपुत्र युधिष्ठिरके दर्शन होनेसे तुम अजगरकी योनिसे छूट जाओगे तत्पश्चात् रत्नमय विमानसे वैकुण्ठमें जाकर भगवान् विष्णुका सेवन करोगे किया हुआ कर्म कभी निष्फल नहीं होता। तुमने श्रीहरिकी आराधना की है; अतः शाप से छूटनेपर तुम्हें उसका फल अवश्य मिलेगा।'
महामुने! यों कहकर वे सब श्रेष्ठ मुनि हँसते हुए चले गये और राजा उनके शापसे सर्प होकर गिर पड़ा। वह समाचार सुनकर शची गुरुदेवको नमस्कार करके अमरावतीमें चली गयी और बृहस्पतिजी शीघ्र उस स्थानपर गये, जहाँ इन्द्र कमल-नालमें निवास करते थे। सरोवरके निकट जाकर कृपानिधान गुरुने अत्यन्त प्रसन्नवदन हो कृपापूर्वक देवराजको पुकारा।
बृहस्पति बोले-
वत्स! आओ मेरे रहते तुम्हें क्या भय हो सकता है? भय छोड़ो और यहाँ आओ। मैं तुम्हारा गुरु बृहस्पति हूँ। अपने गुरुका स्वर सुनकर महेन्द्रका मन प्रसन्नतासे खिल उठा। वे सूक्ष्मरूपको छोड़कर अपने ही रूपसे उनके निकट आये। उन्होंने भक्तिभावसे गुरुके चरणोंमें दण्डकी भाँति पड़कर सिरसे उन्हें प्रणाम किया और रोने लगे। उस समय महाभयभीत एवं रोते हुए इन्द्रको गुरुने सानन्द हृदयसे लगा लिया। फिर उनसे प्रायश्चित्तके लिये सोमयाग करवाकर उन्हें रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बिठाया और पहलेसे चौगुना उत्तम ऐश्वर्य प्रदान किया। तदनन्तर सब देवता आकर उनकी सेवा करने लगे। शचीने पुनः अपने पति देवराज इन्द्रको प्राप्त कर लिया और निवासमन्दिरमें फूलोंकी सेजपर वह उनके साथ आनन्दपूर्वक सुखका अनुभव करने लगी। वत्स! इस प्रकार मैंने इन्द्रके दर्पके भञ्जन तथा शचीके सतीत्वकी रक्षाका प्रसङ्ग कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते हो?
तदनन्तर नारदके पूछनेपर श्रीनारायणने इन्द्रदर्प भङ्ग ही प्रसङ्गमें गौतमके द्वारा इन्द्रको शाप प्राप्त होनेकी बात बतायी। साथ ही यह भी कहा कि अहल्या पतिके शापसे पाषाण शिला हो गयी। गौतमने शाप देकर अहल्यासे कहा जाओ, जाओ तुम विशाल वनमें पाषाणरूपिणी हो जाओ श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी अंगुलिका स्पर्श पाकर तत्काल पवित्र हो जाओगी। उसी पुण्यसे फिर मुझे पाओगी और मेरे पास चली आओगी प्रिये! इस समय तो विशाल वनमें ही जाओ।' ऐसा कहकर वे मुनि तपस्याके लिये चले गये। (अध्याय ६०-६१)
Summary of chapter 69 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
The divine sage Maharshi Nārada, playing his celestial vīṇā Mahatī and chanting the holy names of Lord Śrī Kṛshṇa, arrived at the sacred assembly of sages gathered on the banks of the Gaṅgā. Overjoyed by his presence, the ascetics offered prostrate obeisances and requested the divine sage to illuminate the secret philosophical truths regarding the worship of Śrī Kṛshṇa and Goddess Śrī Rādhā. Maharshi Nārada, overflowing with spiritual ecstasy, prepared to impart the confidential teachings he had received directly from Lord Śiva and Lord Brahmā.