श्रीनारायण कहते हैं-
नारद! कंसकी बात सुनकर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ शान्तस्वरूप अक्रूरके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे शान्तस्वभाव उद्धवसे बोले।
अक्रूरने कहा-
उद्धव! आजकी रातका बड़ा सुन्दर प्रभात हुआ। आज मेरे लिये शुभ दिन प्राप्त हुआ है। निश्चय ही देवता, ब्राह्मण और गुरु मुझपर संतुष्ट हैं। करोड़ों जन्मोंके पुण्य आज स्वयं मुझे फल देनेको उपस्थित हैं। मेरा जो जो शुभाशुभ कर्म था, वह सब मेरे लिये सुखद हो गया। कर्मसे बँधे हुए मुझ अक्रूरका बन्धन आज कर्मने ही काट दिया। मैं संसाररूपी कारागार से मुक्त होकर श्रीहरिके धामको जा रहा हूँ। विद्वान् कंसने आज रोषवश मुझे मित्रार्थी बना दिया। इस नरदेवका क्रोध मेरे लिये वरदान तुल्य हो गया। इस समय व्रजराजको लानेके लिये मैं व्रजमें जाऊँगा और वहाँ भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले परमपूज्य परमात्मा श्रीकृष्णके दर्शन करूँगा। नूतन जलधरके समान श्यामकान्ति, नीलकमलके सदृश नेत्र तथा कटिप्रदेशमें पीताम्बर धारण करनेवाले वे भगवान् या तो व्रजकी धूलिसे धूसरित होंगे या चन्दनसे चर्चित होंगे अथवा उनके अङ्गोंमें नवनीत लगा होगा और वे मुस्करा रहे होंगे। इस झाँकीमें मैं उनके दर्शन करूँगा। विनोदके लिये मुरली बजाते अथवा इधर-उधर झुंड-की-झुंड गौएँ चराते हुए या कहीं बैठे, चलते-फिरते अथवा सोते हुए उन मनोहर नन्दनन्दनको मैं देखूँगा; यह पूर्णतः निश्चित है। शुभ बेलामें आज भगवान्का भलीभाँति दर्शन करके जो सुख मिलेगा, उसके सामने राजाका आदेश क्या महत्त्व रखता है? ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि जिनके चरणकमलोंका निरन्तर ध्यान करते हैं तथा अनन्तविग्रह भगवान् अनन्त भी जिनका अन्त नहीं जानते हैं, देवता और संत भी जिनके प्रभावको सदा नहीं समझ पाते हैं, जिनकी स्तुति करनेमें देवी सरस्वती भी भयभीत एवं जडवत् हो जाती हैं, जिनकी सेवाके लिये महालक्ष्मी भी दासी नियुक्त की गयी हैं तथा जिनके चरणकमलोंसे उन सत्त्वरूपिणी गङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है, जो तीनों लोकोंसे उत्कृष्ट, जन्म-मृत्यु एवं जरारूप व्याधिको हर लेनेवाली और दर्शन एवं स्पर्शमात्रसे मनुष्योंके समस्त पातकोंको नष्ट कर देनेवाली हैं, त्रैलोक्यजननी, मूलप्रकृति ईश्वरी दुर्गतिनाशिनी देवी दुर्गा भी जिनके चरणकमलोंका ध्यान करती हैं, जिन स्थूलसे भी स्थूलतर महाविष्णुके रोमकूपोंमें असंख्य विचित्र ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं, वे भी जिन सर्वेश्वरके सोलहवें अंशरूप हैं, उन माया मानवरूपधारी श्रीकृष्णको देखनेके लिये मैं व्रजमें जाता हूँ। बन्धु उद्धव! वे नन्दनन्दन सर्वरूप, सबके अन्तरात्मा, सर्वज्ञ, प्रकृतिसे परे, ब्रह्मज्योतिः स्वरूप, भक्तजनोंपर अनुग्रहके लिये दिव्य विग्रह धारण करनेवाले, निर्गुण, निरीह, निरानन्द, सानन्द, निराश्रय एवं परम परमानन्दस्वरूप हैं। उन्हीं स्वेच्छामय, सबसे परे विराजमान, सबके सनातन बीजरूप बालमुकुन्दका योगीजन नित्य-निरन्तर अहर्निश ध्यान करते रहते हैं। पहले पाद्मकल्पमें कमलजन्मा ब्रह्माजीने कमलपर बैठकर एक सहस्र मन्वन्तरोंतक श्रीकृष्ण दर्शनके लिये तपस्या की थी। उन दिनों सर्वथा उपवासके कारण उनका पेट पीठमें सट गया था। सहस्र मन्वन्तर पूर्ण होनेपर उन्हें आदेश मिला कि 'फिर तपस्या करो, तब मुझे देखोगे।' उन्हें एक बार यह शब्दमात्र सुनायी दिया। इतनी बड़ी तपस्या करनेपर भी वे भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन न पा सके। तब उन्होंने पुनः उतने ही समयतक तपस्या करके श्रीहरिका दर्शन और वरदान पाया। उद्धव! ऐसे परमेश्वरको मैं आज अपनी आँखोंसे देखूँगा। पूर्वकालमें भगवान् शंकरने ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त तप किया। तब ज्योतिर्मण्डलके बीच गोलोकमें परमात्मा श्रीकृष्णके उन्हें दर्शन हुए। वे श्रीकृष्ण सर्वतत्त्व स्वरूप और सम्पूर्ण सिद्धियोंसे सम्पन्न हैं। वे सबके अपने तथा सर्वश्रेष्ठ परमतत्त्व हैं। भगवान् शिवने उनके चरणारविन्दोंकी परम निर्मल भक्ति पायी उद्धव! जिन भक्तवत्सलने अपने भक्त शिवको अपने समान ही बना दिया, ऐसे प्रभावशाली उन परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा। जितने समयमें सहस्र इन्द्रोंका पतन हो जाता है, उतने कालतक निराहार रहकर कृशोदर हुए भगवान् अनन्तने उन परमात्माकी प्रसन्नता के लिये भक्तिभावसे तपस्या की। तब उन्होंने उन अनन्त देवको अपने समान ज्ञान प्रदान किया। उद्धव! उन्हीं परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा। उद्धवजी! अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माजीका एक दिन-रात होता है। इसी क्रमसे तीस दिनोंका मास और बारह मासोंका वर्ष मानकर सौ वर्ष पूर्ण होनेपर ब्रह्माजीकी आयु पूरी होती है। अहो! ऐसे ब्रह्माका पतन जिनके एक निमेषमें हो जाता है, उन परमात्माको आज मैं प्रत्यक्ष देखूँगा। भाई उद्धव! जैसे भूतलके धूलि कणोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी प्रकार ब्रह्माओं तथा ब्रह्माण्डोंकी गणना भी असम्भव है। उन अखिल ब्रह्माण्डोंके आधार हैं महाविराट्, जो श्रीकृष्णके षोडशांशमात्र हैं। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, मुनि, मनु, सिद्ध तथा मानव आदि चराचर प्राणी वास करते हैं। ब्रह्माण्डोंके आधारभूत वे महाविराट् भी, जिनका सोलहवाँ अंश हैं और जिनकी लीलामात्रसे आविर्भूत एवं तिरोभूत होते हैं; ऐसे सर्वशासक परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा।
ऐसा कहकर अक्रूरजी प्रेमावेशसे मूच्छित हो गये। उनका अङ्ग अङ्ग पुलकित हो उठा और वे नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए भगवच्चरणारविन्दोंका ध्यान करने लगे। उनका हृदय भक्तिसे भर गया। वे परमात्मा श्रीकृष्णके चरणकमलका स्मरण करते हुए भावनासे ही उनकी परिक्रमा करने लगे। उद्धवने अक्रूरको हृदयसे लगा लिया और बारंबार उनकी प्रशंसा की। तत्पश्चात् अक्रूरजी भी शीघ्र ही अपने घरको चले गये। (अध्याय ६५ )
Summary of chapter 72 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
Elevating the discourse beyond the material universes, Maharshi Nārada painted a breathtaking vision of the spiritual sky and the majestic realm of Vaikuṇṭha. There, seated upon a jeweled throne beside Goddess Lakshmī, reigns Lord Śrī Nārāyaṇa in His four-armed glory, served by liberated souls who possess four-armed forms of equal radiance. The text clarifies that while Vaikuṇṭha represents the realm of majestic awe and supreme opulence, Goloka Vṛndāvana lies even higher as the sweet, intimate realm of unexcelled divine love.