श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - श्री कृष्ण जनन खंड

21- नन्दद्वारा इन्द्रयागकी तैयारी, श्रीकृष्णद्वारा इसके विषयमें जिज्ञासा, नन्दजीका उत्तर और श्रीकृष्णद्वारा प्रतिवाद, श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार इन्द्रका यजन न करके गोपोंद्वारा ब्राह्मणों और गिरिराजका पूजन, उत्सवकी समाप्तिपर इन्द्रका कोप, नन्दद्वारा इन्द्रकी स्तुति, श्रीकृष्णका नन्दको इन्द्रकी स्तुतिसे रोककर सब व्रजवासियोंको गौओंसहित गोवर्धनकी गुफामें स्थापित करके पर्वतको छातेके डंडेकी भाँति उठा लेना; इन्द्र, देवताओं तथा मेघोंका स्तम्भन कर देना, पराजित इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णका उन्हें विदा करके पर्वतको स्थापित कर देना तथा नन्दद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन

भगवान् नारायण कहते हैं-

मुने! एक दिन आनन्दयुक्त नन्दने व्रजमें इन्द्रयज्ञकी तैयारी करके सब ओर ढिंढोरा पिटवाया। उस समय सबको यह संदेश दिया गया कि जो जो इस नगरमें गोप, गोपी, बालक, बालिका, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र निवास करते हैं; वे सब लोग भक्तिपूर्वक दही, दूध, घी, तक्र, माखन, गुड़ और मधु आदि सामग्री लेकर इन्द्रकी पूजा करें। इस प्रकार घोषणा कराकर उन्होंने स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक सुविस्तृत रमणीय स्थानमें यष्टिका आरोपण किया (ध्वजाके लिये बाँस गड़वाया)। उसमें रेशमी वस्त्र और मनोहर मालाएँ लगवायीं चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुङ्कुमके द्रवसे उस यष्टिको चर्चित किया गया। नन्दजीने स्नान और नित्यकर्म करके भक्तिभावसे दो धुले हुए वस्त्र धारण किये तथा पैर धोकर वे सोनेके पीढ़ेपर बैठे। उस समय नाना प्रकारके पात्रोंके साथ ब्राह्मण पुरोहित, गोप, गोपी, बालिका तथा बालक उपस्थित हुए। इसी बीचमें वहाँ नगरनिवासी भी बहुत सामान एकत्र करके अनेक प्रकारकी भेंट-पूजा लिये आ पहुँचे तदनन्तर ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान, वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् एवं शान्त स्वभाव गर्ग, जैमिनि, कृष्णद्वैपायन आदि बहुत से मुनिगण शिष्योंसहित वहाँ पधारे। और भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, बन्दी, भिक्षुक आदि आये गोपराज नन्दने उठकर सभीका यथायोग्य प्रणामादिद्वारा स्वागत सत्कार किया। तत्पश्चात् यष्टिके समीप ही निपुण रसोइया ब्राह्मण पाक करने लगे। रत्नद्वीपोंकी तथा धूपकी जगमगाहट और सुगन्धि चारों ओर फैल गयी। पुष्पमालाओंसे स्थान सुसज्जित हो गये। भाँति भाँतिकी मिठाई, पक्वान्न, मीठे फल, हजारों लाखों घड़े दूध, दही, घृत, मधु, मक्खन आदि इकट्ठे हो गये। सुरीले बाजे बजने लगे। नाना प्रकारके सोने-चाँदीके पात्र, श्रेष्ठ वस्त्र, आभूषण, स्वर्णपीठ आदि लाये गये। सभी चीजें अगणित थीं। नृत्यगीत होने लगे।

इसी बीच बलशाली बलराम तथा ग्वाल बालोंके साथ साक्षात् श्रीहरि शीघ्रतापूर्वक वहाँ आये। उन्हें देखकर सब लोग हर्षसे खिल उठे और उठकर खड़े हो गये। श्रीकृष्ण क्रीडास्थान लौटकर आ रहे थे। उनका शान्त सुन्दर विग्रह बड़ा मनोहर था। विनोदकी साधनभूत मुरली, वेणु और शृङ्ग नामक वाद्योंकी ध्वनि उनके साथ सुनायी देती थी। रत्नोंके सार तत्त्वसे निर्मित आभूषणों तथा कौस्तुभमणिसे वे विभूषित थे। उनका श्याम मनोहर शरीर अगुरु एवं चन्दनपङ्क से चर्चित था। वे रत्नमय दर्पणमें शरद् ऋतुके मध्याह्नकालमें प्रफुल्ल कमलके समान अपने मनोहर मुखको देख रहे थे। भालदेशमें कस्तूरीकी बेंदीके साथ पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर चन्दन लगा था। इससे उनका ललाट चन्द्रदेवसे अलंकृत आकाशकी भाँति शोभा पा रहा था। श्याम कण्ठ और वक्षःस्थल मालतीकी मालासे उज्ज्वल कान्ति धारण कर रहा था, मानो अत्यन्त निर्मल शरत्कालिक आकाश बगुलोंकी पंक्तिसे अलंकृत हुआ हो। मनोहर पीताम्बरसे उनके श्याम विग्रहकी अनुपम शोभा हो रही थी, मानो नवीन मेघ विद्युत्की कान्तिसे निरन्तर उद्भासित हो रहा हो। मस्तकपर एक ओर झुका हुआ टेढ़ा मोरमुकुट कुन्दके फूलों और गुञ्जाओंकी मालासे आबद्ध था, मानो आकाश नक्षत्रों तथा इन्द्र धनुषसे सुशोभित हो रहा हो उनका मुस्कराता हुआ मुख रत्नमय कुण्डलोंकी दीप्तिसे ऐसा दमक रहा था, मानो शरद् ऋतुका प्रफुल्ल कमल सूर्यदेवकी किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा हो। जगदीश्वर श्रीकृष्ण उनके बीचमें रत्नमय सिंहासनपर बैठे, मानो शरत्कालके चन्द्रमा तारामण्डलके बीचमें भासमान हो रहे हों। वह महोत्सव देखकर नीतिशास्त्रविशारद श्रीहरिने पितासे तत्काल ऐसी नीतिपूर्ण बात कही, जो अन्य सब लोगोंके लिये दुर्लभ थी।

श्रीकृष्ण बोले-

उत्तम व्रतका पालन करनेवाले गोपसम्राट् ! आप यहाँ क्या कर रहे हैं? आपके आराध्य देवता कौन हैं? इस पूजाका क्या स्वरूप है और इस प्रकार पूजन करनेपर कौन-सा फल

प्राप्त होता है ? इस फलसे कौन-सा साधन सुलभ होता है और उस साधनसे भी कौन-सा मनोरथ सिद्ध होता है? यदि पूजामें भी विघ्न पड़ जाय और देवता रुष्ट हो जायँ तो क्या होता है ? अथवा यदि देवता संतुष्ट हों तो वे इहलोक और परलोकमें कौन सा फल देते हैं ? विप्ररूपधारी श्रीहरि नैवेद्यको साक्षात् ग्रहण करते हैं; अतः ब्राह्मणके संतुष्ट होनेपर सब देवता संतुष्ट हो जाते हैं। जो ब्राह्मणके पूजनमें लगा हुआ है, उसके लिये देवपूजाको क्या आवश्यकता है? जिसने ब्राह्मणों की पूजा की है, उसने सम्पूर्ण देवताओंकी पूजा सम्पन्न कर ली। देवताको नैवेद्य देकर जो ब्राह्मणको नहीं देता है, उसका वह नैवेद्य भस्मीभूत होता है और पूजन निष्फल हो जाता है। देवताका नैवेद्य यदि ब्राह्मणको दिया जाय तो उस दानसे वह निश्चय ही अक्षय जाता है और उस अवस्थामें देवता संतुष्ट होकर दाताको अभीष्ट वरदान दे अपने धामको जाते हैं। जो मूढ़ देवताको नैवेद्य अर्पित करके ब्राह्मणके दिये बिना स्वयं खा लेता है, वह दत्तापहारी (देकर छीन लेनेवाला) है और देवताकी वस्तु खाकर नरकमें पड़ता है। जो भगवान् विष्णुको अर्पित न किया गया हो, वह अन्न विष्ठा और जल मूत्रके समान है। यह क्रम सभीके लिये है; परंतु ब्राह्मणोंके लिये विशेषरूपसे इसपर ध्यान देना उचित है। यदि नैवेद्य अथवा भोज्य वस्तु देवताको न देकर ब्राह्मणको दे दी गयी तो देवता ब्राह्मणके मुखमें ही उसे खाकर संतुष्ट हो स्वर्गलोकको लौट जाते हैं; अतः पिताजी! आप सारी शक्ति लगाकर ब्राह्मणोंका पूजन कीजिये; क्योंकि वे इहलोक और परलोकमें भी उत्तम फलके दाता हैं। जो श्रीहरिकी आराधना करनेवाले ब्राह्मण हैं, वे उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। हरिभक्त ब्राह्मणोंका प्रभाव श्रुतिमें दुर्लभ है। उनके चरणकमलोंकी धूलिसे पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। उनका जो चरणचिह्न है, उसीको तीर्थ कहा गया है। उनके स्पर्शमात्र तीर्थोका पाप नष्ट हो जाता है। उनके आलिङ्गन, श्रेष्ठ वार्तालाप, दर्शन और स्पर्शसे भी मनुष्य समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है। सम्पूर्ण तीर्थों में भ्रमण और स्नान करनेसे

जो पुण्य प्राप्त होता है, वह हरिभक्त ब्राह्मणके दर्शनमात्रसे सुलभ हो जाता है। मनुष्यको चाहिये कि वह पुण्यके लिये समस्त जीवोंको अन्न दे; परंतु विशिष्ट जीवोंको अन्न-दान करनेसे विशिष्ट फलकी प्राप्ति होती है। भगवान् विष्णु ब्राह्मणोंके भक्त हैं। उन्हें उत्तम वस्तुका दान करनेसे दाताको जो फल मिलता है, वह निश्चय ही भक्त ब्राह्मणको भोजन करानेमात्रसे मिल जाता है। भक्तके संतुष्ट होनेपर श्रीहरि संतुष्ट होते हैं और श्रीहरिके संतुष्ट होनेपर सब देवता सिद्ध हो जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसकी शाखाएँ भी पुष्ट होती हैं। यदि ये सब संचित द्रव्य आप किसी एक देवताको देते हैं तो अन्य सब देवता रुष्ट हो जायँगे। उस दशामें एक देवता क्या करेगा? मेरी सम्मति तो यह है कि यहाँ जितनी वस्तुएँ प्रस्तुत हैं, उनका आधा भाग आप श्रीगोवर्धनदेवको दे दीजिये। वे गौओंकी सदा वृद्धि करते हैं; इसलिये उनका नाम 'गोवर्धन' हुआ है। पिताजी! इस भूतलपर गोवर्धनके समान पुण्यवान् दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि वे नित्यप्रति गौओंको नयी-नयी घास देते हैं। तीर्थस्थान जाकर स्नान-दानसे जो पुण्य प्राप्त होता है; ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, सम्पूर्ण व्रत-उपवास, सब तपस्या, महादान तथा श्रीहरिकी आराधना करनेपर जो पुण्य सुलभ होता है, सम्पूर्ण पृथ्वीको परिक्रमा, सम्पूर्ण वेदवाक्योंके स्वाध्याय तथा समस्त यज्ञोंकी दीक्षा ग्रहण करनेपर मनुष्य जिस पुण्यको पाता है; वही पुण्य बुद्धिमान् मानव गौओंको घास देकर पा लेता है। जो घास चरती हुई गायको स्वेच्छापूर्वक चरनेसे रोकता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है तथा वह प्रायश्चित्त करनेपर ही शुद्ध होता है। पिताजी ! सब देवता गौओंके अङ्गोंमें, सम्पूर्ण तीर्थ गौओंके पैरोंमें तथा स्वयं लक्ष्मी उनके गुह्य स्थानों (मल-मूत्रके स्थानों) में सदा वास करती हैं। जो मुनष्य गायके पद चिह्नसे युक्त मिट्टीद्वारा तिलक करता है, उसे तत्काल तीर्थस्नानका फल मिलता है और पग-पगपर उसकी विजय होती है। गौएँ जहाँ भी रहती हैं, उस स्थानको तीर्थ कहा गया है। वहाँ प्राणोंका त्याग करके मनुष्य तत्काल मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। जो नराधम ब्राह्मणों तथा गौओंके शरीरपर प्रहार करता है; नि:संदेह उसे ब्रह्महत्या के समान पाप लगता है। जो नारायणके अंशभूत ब्राह्मणों तथा गौओंका वध करते हैं, वे मनुष्य जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता है, तबतकके लिये कालसूत्र नामक नरकमें जाते हैं।

नारद! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण चुप हो गये। तब आनन्दयुक्त नन्दने मुस्कराते हुए उनसे कहा।

नन्द बोले-

बेटा! यह महात्मा महेन्द्रकी पूजा है, जो पूर्वपरम्परासे चली आ रही है। यह सुवृष्टिका साधन है और इससे सब प्रकार के मनोहर शस्योंकी उत्पत्ति ही साध्य है। शस्य ही प्राणियोंके प्राण हैं। शस्यसे ही जीवधारी जीवन निर्वाह करते हैं। इसलिये व्रजवासी लोग पूर्व पीढ़ियोंके क्रमसे महेन्द्रकी पूजा करते चले आ रहे हैं। यह महान् उत्सव वर्षके अन्तमें होता है। विघ्न-बाधाओंकी निवृत्ति और कल्याणकी प्राप्ति ही इसका उद्देश्य है। नन्दजीकी यह बात सुनकर बलरामसहित श्रीकृष्ण जोर-जोरसे हँसने लगे और पुनः प्रसन्नतापूर्वक पितासे बोले ।

श्रीकृष्णने कहा-

तात! आज मैंने आपके मुखसे बड़ी विचित्र और अद्भुत बात सुनी है। इसका कहीं भी निरूपण नहीं किया गया है कि इन्द्रसे वृष्टि होती है। आज आपके मुख से अपूर्व नीतिवचन सुननेको मिला है। सूर्यसे जल उत्पन्न होता है और जलसे शस्य एवं वृक्ष उत्पन्न होते और बढ़ते हैं। उनसे अन्न और फल पैदा होते हैं तथा उन अन्नों और फलोंसे जीवधारी जीवननिर्वाह करते हैं। सूर्य अपनी किरणोंद्वारा जो धरतीका जल सोख लेते हैं, वर्षाकालमें उसी जलका उनसे प्रादुर्भाव होता है। सूर्य और मेघ आदि सबका विधाताद्वारा निरूपण होता है। पञ्चाङ्गोंके अनुसार जिस वर्षमें जो मेघ गज और समुद्र माने गये हैं, जो शस्याधिपति राजा और मन्त्री निश्चित किये गये हैं; उन सबका विधाताद्वारा ही निरूपण हुआ है। प्रत्येक वर्षमें जल, शस्य तथा तृणोंकी आढक संख्या निश्चित की जाती है, उस निश्चयके अनुसार वर्ष वर्षमें, युग-युगमें और कल्प-कल्पमें वे सारी बातें घटित होती हैं। ईश्वरकी इच्छासे ही जल आदिका आविर्भाव होता है। उसमें कोई बाधा नहीं पड़ती। तात! भूत, वर्तमान और भविष्य तथा महान् क्षुद्र और मध्यम- जिस कर्मका विधाताने निरूपण किया है, उसका कौन निवारण कर सकता है ? ईश्वरकी आज्ञासे ही ब्रह्माजीने सम्पूर्ण चराचर जगत्का निर्माण किया है। पहले भोजनकी व्यवस्था होती है, उसके बाद जीव प्रकट होता है। बारंबार ऐसा होनेसे ही इस नियत व्यवस्थाको स्वभाव कहते हैं। स्वभावसे कर्म होता है और कर्मके अनुसार जीवधारियोंको सुख दुःखका भोग प्राप्त होता है। यातना, जन्म-मरण, रोग शोक, भय, उत्पत्ति, विपत्ति, विद्या, कविता, यश, अपयश, पुण्य, स्वर्गवास, पाप, नरकनिवास, भोग, मोक्ष और श्रीहरिका दास्य- ये सब मनुष्योंको कर्मके अनुसार उपलब्ध होते हैं। ईश्वर सबके जनक हैं। शील और कर्मोंका अभ्यास विधाताके लिये भी फलदाता होता है। सब कुछ ईश्वरकी इच्छासे ही सम्भव होता है। विराट् पुरुषसे प्रकृति, पञ्चतत्त्व, जगत्, कूर्म, शेष, धरणी तथा ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण चराचर पदार्थोंका निर्माण हुआ है। जिनकी आज्ञासे वायु कूर्मको, कूर्म शेषको, शेष अपने मस्तकपर वसुधाको और वसुधा सम्पूर्ण चराचर जगत्को धारण करती है; जिनके आदेशसे जगत्के प्राणस्वरूप समीर सदा तीनों लोकों में बहते रहते हैं, उत्तम प्रभाके धाम सूर्य समस्त भूगोलका भ्रमण करते हुए तपा करते हैं, अग्नि जलाती है, मृत्यु समस्त जन्तुओंमें संचरित होती है और वृक्ष समयानुसार फूल एवं फल धारण करते हैं; जिनकी आज्ञासे समुद्र अपने स्थानपर विद्यमान रहते और तत्काल ही नीचे-नीचे निमग्न हो जाते हैं; उन परमेश्वरका ही आप भक्तिभाव से भजन कीजिये इन्द्र क्या कर सकता है? जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे आजतक कितने ही ब्रह्माण्ड पैदा हुए और कालके गालमें चले गये तथा कितने ही विधाता उत्पन्न होकर नष्ट हो गये। वे परमेश्वर ही मृत्युकी भी मृत्यु कालके भी का तथा विधाताके भी विधाता हैं। तात! आप उन्हींकी शरण लीजिये। वे ही आपकी रक्षा करेंगे। अहो! जिनके एक दिन रातमें अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन होता है, ऐसे एक सौ आठ ब्रह्माओंका उन निर्गुण परमात्मा श्रीहरिके एक निमेषमें ही पतन हो जाता है; ऐसे परमात्माके रहते हुए इन्द्रकी पूजा विडम्बनामात्र है। नारद! यों कहकर श्रीकृष्ण चुप हो गये। उस समय सभामें बैठे हुए महर्षियोंने भगवान्की भूरि-भूरि प्रशंसा की। नन्दके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे हर्षसे उत्फुल्ल हो सभामें बैठे-बैठे नेत्रोंसे अश्रु बहाने लगे। मनुष्य यदि अपने पुत्रों से पराजित हों तो वे आनन्दित ही होते हैं। श्रीकृष्णकी आज्ञा मान नन्दजीने स्वस्तिवाचन किया और क्रमशः सब ब्राह्मणों एवं मुनियोंका वरण किया। उन्होंने आदरपूर्वक गिरिराज गोवर्धनकी, समागत मुनीश्वरोंकी, विद्वान् ब्राह्मणोंकी तथा गौओं और अग्निकी सानन्द पूजा की पूजाकी समाप्ति होनेपर उस यज्ञ महोत्सवमें नाना प्रकार के वाद्योंका तुमुल नाद होने लगा। जय-जयकारके शब्द, शङ्खध्वनि तथा हरिनामकीर्तन होने लगे। मुनिवर गर्गने वेदोंके मङ्गलकाण्डका पाठ किया। बन्दीजनोंमें श्रेष्ठ डिंडी जो कंसका प्रिय सचिव था, सामने खड़े हो उच्चस्वरसे मङ्गलाष्टकका पाठ करने लगा। श्रीकृष्ण गिरिराजके निकट जा दूसरी मूर्ति धारण करके बोले- 'मैं साक्षात् गोवर्धन

पर्वत हूँ और तुमलोगोंकी दी हुई भोज्य वस्तुएँ खा रहा हूँ। तुम मुझसे वर माँगो । 

उस समय श्रीकृष्णने नन्दसे कहा- 'पिताजी ! सामने देखिये, गिरिराज प्रकट हुए हैं। इनसे वर माँगिये। आपका कल्याण होगा। तब गोपराजने हरिदास्य और हरिभक्तिका वर माँगा। परोसी हुई सामग्री खाकर और वर देकर गिरिराज अदृश्य हो गये। मुनीन्द्रों और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर गोपराजने बन्दीजनों, ब्राह्मणों और मुनियोंको धन दिया। तत्पश्चात् आनन्दयुक्त नन्द बलराम और श्रीकृष्णको आगे करके सपरिवार अपने घरको गये। उन्होंने बन्दी डिंडीको वस्त्र, चाँदी, सोना, श्रेष्ठ घोड़ा, मणि तथा नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ दिये। मुनि और ब्राह्मण बलराम तथा श्रीकृष्णकी स्तुति एवं नमस्कार करके चले गये। समस् अप्सराएँ, गन्धर्व और किन्नर भी अपने-अपने स्थानको पधारे। उस महोत्सवमें आये हुए राजा और सम्पूर्ण गोप भी श्रीकृष्णको सादर नमस्कार करके वहाँसे बिदा हो गये।

इसी समय यज्ञभङ्ग हो जानेसे अपनी अनेक प्रकारकी निन्दा सुनकर इन्द्र कुपित हो उठे। उनके ओठ फड़कने लगे। उन्होंने मरुद्गणों और मेघोंके साथ तत्काल रथपर आरूढ़ हो मनोहर नन्दनगर वृन्दावनपर आक्रमण किया। फिर युद्ध शास्त्रमें निपुण समस्त देवता भी हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिये रोषपूर्वक रथपर आरूढ़ हो उनके पीछे-पीछे गये। वायुकी सनसनाहट, मेघोंकी गड़गड़ाहट और सेनाकी भयानक गर्जनासे सारा नगर काँप उठा। नन्दको भी बड़ा भय हुआ; परंतु वे नीतिमें निपुण थे। अतः अपनी पत्नी तथा सेवकगणोंको पुकारकर निर्जन स्थानमें ले जाकर शोकसे कातर हो बोले।

नन्दजीने कहा-

हे यशोदे! हे रोहिणि ! इधर आओ और मेरी बात सुनो तुमलोग राम और कृष्णको व्रजसे दूर ले जाओ। भयसे व्याकुल बालक बालिकाएँ और स्त्रियाँ भी दूर चली जायँ। केवल बलवान् गोप मेरे पास ठहरें। फिर हमलोग इस प्राण संकटसे निकलनेका प्रयास करेंगे। यों कहकर गोपप्रवर नन्दने भयभीत हुए श्रीहरिका स्मरण किया। उनके दोनों हाथ जुड़ गये। भक्तिसे मस्तक झुक गया और वे काण्वशाखामें कहे गये स्तोत्रद्वारा श्रीशचीपतिकी स्तुति करने लगे।

नन्द बोले –

इन्द्र, सुरपति, शक्र, अदितिज, पवनाग्रज, सहस्राक्ष, भगाङ्ग, कश्यपात्मज, विडौजा, शुनासीर, मरुत्वान्, पाकशासन, जयन्तजनक, श्रीमान्, शचीश, दैत्यसूदन, वज्रहस्त, कामसखा, गौतमीव्रतनाशन, वृत्रहा, वासव, दधीचि देह भिक्षुक, जिष्णु, वामनभ्राता, पुरुहूत, पुरन्दर, दिवस्पति, शतमख, सुत्रामा, गोत्रभिद्, विभु, लेखर्षभ, बलाराति, जम्भभेदी, सुराश्रय, संक्रन्दन, दुश्च्यवन, तुराषाट्, मेघवाहन, आखण्डल, हरि, हय, नमुचिप्राणनाशन, वृद्धश्रवा वृष तथा दैत्यदर्पनिषूदन — ये छियालीस नाम निश्चय ही समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं। जो मनुष्य कौथुमीशाखामें कहे गये इस स्तोत्रका प्रतिदिन पाठ करता है, उसकी बड़ी से बड़ी विपत्ति में इन्द्र वज्र हाथमें लिये रक्षा करते हैं। उसे अतिवृष्टि, शिलावृष्टि तथा भयंकर वज्रपातसे भी कभी भय नहीं होता; क्योंकि स्वयं इन्द्र उसकी रक्षा करते हैं। नारद ! जिस घरमें यह स्तोत्र पढ़ा जाता है और जो पुण्यवान् पुरुष इसे जानता है; उसके उस घरपर न कभी वज्रपात होता है और न ओले या पत्थर ही बरसते हैं।

भगवान् श्रीनारायण कहते हैं –

नन्दके मुखसे इस स्तोत्रको सुनकर मधुसूदन श्रीकृष्ण कुपित हो गये। वे ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्होंने पितासे यह नीतिकी बात कही। तात! आप बड़े डरपोक हैं। किसकी स्तुति करते हैं? कौन हैं इन्द्र ? मेरे निकट रहकर आप इन्द्रका भय छोड़ दीजिये, मैं आधे ही क्षणमें लीलापूर्वक उसे भस्म कर डालनेमें समर्थ हूँ। आप गौओं, बछड़ों, बालकों और भयातुर स्त्रियोंको गोवर्धनकी कन्दरामें रखकर निर्भय हो जाइये। अपने बच्चेकी यह बात सुनकर नन्दने प्रसन्नतापूर्वक वैसा ही किया। तब श्रीहरिने उस पर्वतको बायें हाथमें छातेके डंडेकी

भाँति धारण कर लिया। इसी समय उस नगरमें रत्नमय तेजसे प्रकाश होनेपर भी सहसा अन्धकार छा गया। सारा नगर धूलसे ढक गया। मुने! हवाके साथ बादलों के समूहने आकर आकाशको घेर लिया और वृन्दावनमें निरन्तर अतिवृष्टि होने लगी शिलावृष्टि, वज्रकी वृष्टि और अत्यन्त भयानक उल्कापात – ये सब के सब गोवर्धन पर्वतका स्पर्श होते ही दूर जा पड़ते थे। मुने! असमर्थ पुरुषके उद्यमकी भाँति इन्द्रका वह सारा उद्योग विफल हो गया। वह सब कुछ व्यर्थ होता देख इन्द्र उसी क्षण रोषसे भर गये और उन्होंने दधीचिकी हड्डियोंसे बने हुए अपने अमोघ वज्रास्त्रको हाथमें ले लिया। इन्द्रको वज्र हाथमें लिये देख मधुसूदन हँसने लगे। उन्होंने इन्द्रके हाथसहित अत्यन्त दारुण वज्रको ही स्तम्भित कर दिया। इतना ही नहीं, उन सर्वव्यापी परमात्माने देवगणोंसहित मेघको भी स्तब्ध कर दिया। वे सब-के-सब दीवारमें चित्रित पुतलियोंकी भाँति निश्चलभावसे खड़े हो गये। तदनन्तर श्रीहरिने इन्द्रको जृम्भा (जँभाई) के वशीभूत कर दिया। फिर तो उन्हें तत्काल तन्द्रा आ गयी। उस तन्द्रामें ही उन्होंने देखा, वहाँका सारा जगत् श्रीकृष्णमय है। सभी द्विभुज हैं। सबके हाथों में मुरली है और सभी रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित हैं। सबके अङ्गोंपर पीताम्बरका परिधान है। सभी रत्नमय सिंहासनपर आसीन हैं। सबके प्रसन्नमुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही है और सभी भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर दिखायी देते हैं। उन सबके सभी अङ्ग चन्दन चर्चित हैं। समस्त चराचर जगत्को इस परम अद्भुत रूपमें देखकर वहाँ इन्द्र तत्काल मूर्च्छित हो गये। पूर्वकालमें गुरुने उन्हें जिस मन्त्रका उपदेश दिया था, उसका वे वहीं जप करने लगे। उस समय उन्होंने हृदयमें सहस्रदल कमलपर विराजमान उग्र ज्योतिः पुञ्ज देखा। उस तेजोराशिके भीतर दिव्य रूपधारी, अत्यन्त मनोहर तथा नूतन जलधरके समान उत्कृष्ट श्यामसुन्दर विग्रहवाले श्रीकृष्ण दिखायी दिये। वे उत्तम रत्नोंके सारतत्त्व से निर्मित एवं प्रकाशमान मकराकृत कुण्डलोंसे अलंकृत थे, अत्यन्त उद्दीत एवं श्रेष्ठ मणियोंके बने हुए मुकुटसे उनका मस्तक उद्भासित हो रहा था प्रकाशमान उत्तम कौस्तुभरत्नसे कण्ठ और वक्षःस्थल जगमगा रहे थे। मणिनिर्मित केयूर, कंगन और मञ्जीरसे उनके हाथ-पैरोंकी बड़ी शोभा हो रही थी। भीतर और बाहर समान रूपमें ही देखकर परमेश्वर श्रीकृष्णका उन्होंने स्तवन किया।

इन्द्र बोले-

जो अविनाशी, परब्रह्म, ज्योतिः स्वरूप, सनातन, गुणातीत, निराकार, स्वेच्छामय और अनन्त हैं; जो भक्तोंके ध्यान तथा आराधनाके लिये नाना रूप धारण करते हैं; युगके अनुसार जिनके श्वेत, रक्त, पीत और श्याम वर्ण हैं; सत्ययुगमें जिनका स्वरूप शुक्ल तेजोमय है तथा उस युगमें जो सत्यस्वरूप हैं; त्रेतायुगमें जिनकी अङ्गकान्ति कुंकुमके समान लाल है और जो ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान रहते

हैं, द्वापरयुगमें जो पीत कान्ति धारण करके पीताम्ब सुशोभित होते हैं; कलियुगमें कृष्णवर्ण होकर 'कृष्ण' नाम धारण करते हैं; इन सब रूपोंमें जो एक ही परिपूर्णतम परमात्मा हैं; जिनका श्रीविग्रह नूतन जलधरके समान अत्यन्त श्याम एवं सुन्दर है; उन नन्दनन्दन यशोदाकुमार भगवान् गोविन्दकी मैं वन्दना करता हूँ। जो गोपियोंका चित्त चुराते हैं तथा राधाके लिये प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, जो कौतूहलवश विनोदके लिये मुरलीकी ध्वनिका विस्तार करते रहते हैं, जिनके रूपकी कहीं तुलना नहीं है, जो रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो कोटि कोटि कन्दर्पोका सौन्दर्य धारण करते हैं; उन शान्त स्वरूप परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो वृन्दावनमें कहीं राधाके पास क्रीड़ा करते हैं, कहीं निर्जन स्थलमें राधाके वक्षः- स्थलपर विराजमान होते हैं, कहीं राधाके साथ न जलक्रीड़ा करते हैं, कहीं वनमें राधिकाके केश-कलापोंकी चोटी गूँथते हैं, कहीं राधिका के चरणोंमें महावर लगाते हैं, कहीं राधिकाके चबाये हुए ताम्बूलको सानन्द ग्रहण करते हैं, कहीं बाँके नेत्रोंसे देखती हुई राधाको स्वयं निहारते हैं, कहीं फूलोंकी माला तैयार करके राधिकाको अर्पित करते हैं, कहीं राधाके साथ रासमण्डलमें जाते हैं, कहीं राधाकी दी हुई मालाको अपने कण्ठमें धारण करते हैं, कहीं गोपाङ्गनाओंके साथ विहार करते हैं, कहीं राधाको साथ लेकर चल देते हैं और कहीं उन्हें भी छोड़कर चले जाते हैं। जिन्होंने कहीं ब्राह्मणपत्नियोंके दिये हुए अन्नका भोजन किया है और कहीं बालकोंके साथ ताड़का फल खाया है; जो कहीं आनन्दपूर्वक गोप- किशोरियोंके चित्त चुराते हैं, कहीं ग्वालबालोंके साथ दूर गयी हुई गौओंको आवाज देकर बुलाते हैं, जिन्होंने कहीं कालियनागके मस्तक पर अपने चरणकमलोंको रखा है और जो कहीं मौजमें आकर आनन्द विनोदके लिये मुरलीकी तान छेड़ते हैं तथा कहीं ग्वालबालोंके साथ मधुर गीत गाते हैं; उन परमात्मा श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।

इस स्तवराजसे स्तुति करके इन्द्रने श्रीहरिको भयसे प्रणाम किया। पूर्वकालमें वृत्रासुरके साथ युद्धके समय गुरु बृहस्पतिने इन्द्रको यह स्तोत्र दिया था। सबसे पहले श्रीकृष्णने तपस्वी ब्रह्माको कृपापूर्वक एकादशाक्षर मन्त्र, सब लक्षणोंसे युक्त कवच और यह स्तोत्र दिया था। फिर ब्रह्माने पुष्करमें कुमारको, कुमारने अङ्गिराको और अङ्गिराने बृहस्पतिको इसका उपदेश दिया था। इन्द्रद्वारा किये गये इस स्तोत्रका जो प्रतिदिन भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह इहलोकमें श्रीहरिकी सुदृढ़ भक्ति और अन्तमें निश्चय ही उनका दास्य-सुख प्राप्त कर लेता है। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और शोकसे छुटकारा पा जाता है और स्वप्नमें भी कभी यमदूत तथा यमलोकको नहीं देखता।

भगवान् नारायण कहते हैं-

इन्द्रका वचन सुनकर भगवान् लक्ष्मीनिवास प्रसन्न हो गये और उन्होंने प्रेमपूर्वक उन्हें वर देकर उस पर्वतको वहाँ स्थापित कर दिया। श्रीहरिको प्रणाम करके इन्द्र अपने गणोंके साथ चले गये; तदनन्तर गुफामें छिपे हुए लोग वहाँसे निकलकर अपने घरको गये। उन सबने श्रीकृष्णको परिपूर्णतम परमात्मा माना व्रजवासियोंको आगे करके श्रीकृष्ण अपने घरको गये। नन्दके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया। उनके नेत्रोंमें भक्तिके आँसू भर आये और उन्होंने सनातन पूर्णब्रह्मस्वरूप अपने उस पुत्रका स्तवन किया।

नन्द बोले -

जो ब्राह्मणोंके हितकारी, गौओं तथा ब्राह्मणोंके हितैषी तथा समस्त संसारका भला चाहनेवाले हैं; उन सच्चिदानन्दमय गोविन्ददेवको बारंबार नमस्कार है। प्रभो! आप ब्राह्मणोंका प्रिय करनेवाले देवता हैं; स्वयं ही ब्रह्म और परमात्मा हैं; आपको नमस्कार है। आप अनन्तकोटि ब्रह्माण्डधामोंके भी धाम हैं; आपको सादर नमस्कार है। आप मत्स्य आदि रूपोंके जीवन तथा सा हैं; आप निर्लिप्त, निर्गुण और निराकार परमात्माको नमस्कार है। आपका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है।आप स्थूलसे भी अत्यन्त स्थूल हैं। सर्वेश्वर, सर्वरूप तथा तेजोमय हैं; आपको नमस्कार है। अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूपधारी होनेके कारण आप योगियोंके भी ध्यानमें नहीं आते हैं; ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी आपकी वन्दना करते हैं; आप नित्य स्वरूप परमात्माको नमस्कार है। आप चार युगोंमें चार वर्णोंका आश्रय लेते हैं; इसलिये युग क्रमसे शुक्ल, रक्त, पीत और श्याम नामक गुणसे सुशोभित होते हैं; आपको नमस्कार है। आप योगी, योगरूप और योगियोंके भी गुरु हैं। सिद्धेश्वर, सिद्ध एवं सिद्धोंके गुरु हैं; आपको नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, शेषनाग, धर्म, सूर्य, गणेश, षडानन, सनकादि समस्त मुनि, सिद्धेश्वरोंके गुरुके भी गुरु कपिल तथा नर नारायण ऋषि भी जिनकी स्तुति करने में असमर्थ हैं; उन परात्पर प्रभुका स्तवन दूसरे कौन-से जडबुद्धि प्राणी कर सकते हैं? वेद, वाणी, लक्ष्मी, सरस्वती तथा राधा भी जिनकी स्तुति नहीं कर सकतीं; उन्हींका स्तवन दूसरे विद्वान् पुरुष क्या कर सकते हैं? ब्रह्मन् ! मुझसे क्षण क्षणमें जो अपराध बन रहा है, वह सब आप क्षमा करें। करुणासिन्धो ! दीनबन्धो भवसागरमें पड़े हुए मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये। प्रभो ! पूर्वकालमें तीर्थस्थानमें तपस्या करके मैंने आप सनातनपुरुषको पुत्ररूपमें प्राप्त किया है। अब आप मुझे अपने चरण कमलोंकी भक्ति और दास्य प्रदान कीजिये। ब्रह्मत्व, अमरत्व अथवा सालोक्य आदि चार प्रकारके मोक्ष आपके चरणकमलोंकी दास्य- भक्तिकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं; फिर इन्द्रपद, देवपद, सिद्धि प्राप्ति, स्वर्गप्राप्ति, राजपद तथा चिरंजीवित्वको विद्वान् पुरुष किस गिनतीमें रखते हैं? क्या समझते हैं ?) ईश्वर! यह सब जो पूर्वकथित ब्रह्मत्व आदि पद हैं, वे आपके भक्तके आधे क्षणके लिये प्राप्त हुए सङ्गकी क्या समानता कर सकते हैं! कदापि नहीं जो आपका भक्त है, वह भी आपके समान हो जाता है। फिर आपके महत्त्वका अनुमान कौन लगा सकता है? आपका भक्त आधे क्षणके वार्तालापमात्रसे किसीको भी भवसागरसे पार कर सकता है। आपके भक्तोंके सङ्गसे भक्तिका विविध अङ्कुर अवश्य उत्पन्न होता है। उन हरिभक्तरूप मेघोंके द्वारा की गयी वार्तालापरूपी जलकी वर्षासे सींचा जाकर भक्तिका वह अङ्कर बढ़ता है। जो भगवान्‌के भक्त नहीं हैं, उनके आलापरूपी तापसे वह अङ्कुर तत्काल सूख जाता है और भक्त एवं भगवान्के गुणोंकी स्मृतिरूपी जलसे सींचनेपर वह उसी क्षण स्पष्टरूपसे बढ़ने लगता है। उनमें उत्पन्न आपकी भक्तिका अ जब प्रकट होकर भलीभाँति बढ़ जाता है, तब वह नष्ट नहीं होता। उसे प्रतिदिन और प्रतिक्षण बढ़ाते रहना चाहिये। तदनन्तर उस भक्तको ब्रह्मपदकी प्राप्ति कराकर भी उसके जीवन के लिये भगवान् उसे अवश्य ही परम उत्तम दास्यरूप फल प्रदान करते हैं। यदि कोई दुर्लभ दास्यभावको पाकर भगवान्का दास हो गया तो निश्चय ही उसीने समस्त भय आदिको जीता है।

यों कहकर नन्द श्रीहरिके सामने भक्तिभावसे खड़े हो गये। तब प्रसन्न हुए श्रीकृष्णने उन्हें मनोवाञ्छित वर दिया। इस प्रकार नन्दद्वारा किये गये स्तोत्रका जो भक्तिभावसे प्रतिदिन पाठ करता है, वह शीघ्र ही श्रीहरिकी सुदृढ़ भक्ति और दास्यभाव प्राप्त कर लेता है। जब द्रोण नामक वसुने अपनी पत्नी धराके साथ तीर्थमें तपस्या की, तब ब्रह्माजीने उन्हें यह परम दुर्लभ स्तोत्र प्रदान किया था सौभरिमुनिने पुष्करमें संतुष्ट होकर ब्रह्माजीको श्रीहरिका षडक्षर मन्त्र तथा सर्वरक्षणकवच प्रदान किया था। वही कवच, वही स्तोत्र और वही परम दुर्लभ मन्त्र ब्रह्माके अंशभूत गर्गमुनिने तपस्यामें लगे हुए नन्दको दिया था पूर्वकालमें जिसके लिये जो मन्त्र, स्तोत्र, कवच, इष्टदेव गुरु और विद्या प्राप्त होती है, वह पुरुष उस मन्त्र आदि तथा विद्याको निश्चय ही नहीं छोड़ता है। इस प्रकार यह श्रीकृष्णका अद्भुत आख्यान और स्तोत्र कहा गया, जो सुखद, मोक्षप्रद सब साधनोंका सारभूत तथा भवबन्धनको छुटकारा दिलानेवाला है। (अध्याय २१)