भगवान् नारायण कहते हैं-
नारद ! रातमें वृन्दावनके भीतर सब व्रजवासी और नन्दरायजी सो गये। निद्राके स्वामी श्रीकृष्ण भी माता यशोदाके वक्षःस्थलपर प्रगाढ़ निद्राके वशीभूत हो गये। रमणीय शय्याओंपर सोयी हुई गोपियाँ भी निद्रित हो गयीं। कोई शिशुओंको गोदमें लेकर, कोई सखियोंके साथ सटकर, कोई छकड़ोंपर और कोई रथोंपर ही स्थित होकर निद्रासे अचेत हो गयीं। पूर्णचन्द्रमाकी चाँदनी फैल जानेसे जब वृन्दावन स्वर्गसे भी अधिक मनोहर प्रतीत होने लगा, नाना प्रकारके कुसुमोंका स्पर्श करके बहनेवाली मन्द मन्द वायुसे सारा वन प्रान्त सुवासित हो उठा तथा समस्त प्राणी निश्चेष्ट होकर सो गये, तब रात्रिकालिक पञ्चम मुहूर्तके बीत जानेपर शिल्पियोंके गुरुके भी गुरु भगवान् विश्वकर्मा वहाँ आये। उन्होंने दिव्य एवं महीन वस्त्र पहन रखा था। उनके गलेमें मनोहर रत्नमाला शोभा दे रही थी। वे अनुपम रत्ननिर्मित अलंकारोंसे अलंकृत थे। उनके कानोंमें कान्तिमान् मकराकृत कुण्डल झलमला रहे थे। वे ज्ञान और अवस्थामें वृद्ध होनेपर भी किशोरकी भाँति दर्शनीय थे। अत्यन्त सुन्दर, तेजस्वी तथा कामदेव समान कान्तिमान् थे।
उनके साथ विशिष्ट शिल्पकलामें निपुण तीन करोड़ शिल्पी थे। उन सबके हाथोंमें मणिरत्न, हेमरत्न तथा लोहनिर्मित अस्त्र थे। कुबेर वनके किङ्कर यक्षसमुदाय भी वहाँ आ पहुँचे। वे स्फटिकमणि तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थे। किन्हीं-कन्हींके कंधे बहुत बड़े थे। किन्हींके हाथों में पद्मरागमणिके ढेर थे तो किन्हींके हाथों में इन्द्रनीलमणिके कुछ यक्षोंने अपने हाथों में स्यमन्तकमणि ले रखी थी और कुछ यक्षोंने चन्द्रकान्तमणि अन्य बहुत-से यक्षोंके हाथों में सूर्यकान्तमणि और प्रभाकरमणिके ढेर प्रकाशित हो रहे थे। किन्हींके हाथोंमें फरसे थे तो किन्हींके लोहसार। कोई-कोई गन्धसार तथा श्रेष्ठ मणि लेकर आये थे। किन्हींके हाथमें चँवर थे और कुछ लोग दर्पण, स्वर्णपात्र और स्वर्ण कलश आदिके बोझ लेकर आये थे।
विश्वकर्माने वह अत्यन्त मनोहर सामग्री देखकर सुन्दर नेत्रोंवाले श्रीकृष्णका ध्यान करके वहाँ नगर-निर्माणका कार्य आरम्भ किया। भारतवर्षका वह श्रेष्ठ और सुन्दर नगर पाँच योजन विस्तृत था। तीर्थोका सारभूत वह पुण्यक्षेत्र श्रीहरिको अत्यन्त प्रिय है। जो वहाँ मुमुक्षु होकर निवास करते हैं, उन्हें वह परम निर्वाणकी प्राप्ति करानेवाला है। गोलोकमें पहुँचनेके लिये तो वह सोपानरूप है। सबको मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करनेवाला है। वहाँ चार-चार कमरेवाले चार करोड़ भवन बनाये गये थे, जिससे वह नगर अत्यन्त मनोरम प्रतीत होता था श्रेष्ठ प्रस्तरोंसे निर्मित वह विशाल नगर किवाड़ों, खम्भों और सोपानों से सुशोभित था। चित्रमयी पुत्तलिकाओं, पुष्पों और कलशोंसे वहाँके भवनोंके शिखरभाग अत्यन्त प्रकाशमान जान पड़ते थे। पर्वतीय प्रस्तर खण्डोंसे निर्मित वेदिकाएँ और प्राङ्गण उस नगरके भवनोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। प्रस्तर खण्डोंके परकोटोंसे सारा नगर घिरा हुआ था। विश्वकर्माने खेल-खेलमें ही सारे नगरकी रचना कर डाली। प्रत्येक गृहमें यथायोग्य बड़े-छोटे दो दरवाजे थे। हर्ष और उत्साहसे भरे हुए देवशिल्पीने स्फटिक जैसी मणियोंसे उस नगरके भवनोंका निर्माण किया था। गन्धसार निर्मित सोपानों, शंकु रचित खम्भों, लोहसारकी बनी हुई किवाड़ों, चाँदीके समुज्ज्वल कलशों तथा वज्रसारनिर्मित प्राकारोंसे उस नगरकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उसमें गोपोंके लिये यथास्थान और यथायोग्य निवासस्थान बनाकर विश्वकर्माने वृषभानु गोपके लिये पुनः रमणीय भवनका निर्माण आरम्भ किया। उसके चारों ओर परकोटे और खाइयाँ बनी थीं। चारों दिशाओं में चार दरवाजे थे। चार-चार कमरोंसे युक्त बीस भव्य भव बनाये गये थे। उस सम्पूर्ण भवनका निर्माण महामूल्य मणियोंसे किया गया था। रत्नसार रचित सुरम्य तूलिकाओं, सुवर्णाकार मणियोंद्वारा निर्मित अत्यन्त सुन्दर सोपानों, लोहसारकी बनी हुई किवाड़ों तथा कृत्रिम चित्रोंसे वृषभानु भवनकी बड़ी शोभा हो रही थी। वहाँका प्रत्येक सुरम्य मन्दिर सोनेके कलशोंसे देदीप्यमान था। उस आश्रमके एक अत्यन्त मनोहर निर्जन प्रदेशमें, जो मनोहर चम्पा वृक्षोंके उद्यानके भीतर था, पतिसहित कलावतीके उपभोगके लिये विश्वकर्माने कौतूहलवश एक ऐसी अट्टालिका बनायी थी, जिसका निर्माण विशिष्ट श्रेणीकी श्रेष्ठ मणियोंद्वारा हुआ था। उसमें इन्द्रनीलमणिके बने हुए नौ सोपान थे। गन्धसारनिर्मित खम्भों और कपाटोंसे वह अत्यन्त ऊँचा मनोरम भवन सब ओरसे विलक्षण था।
नारदजीने पूछा-
भगवन्! मनोहर रूपवाली कलावती कौन थी और किसकी पत्नी थी, जिसके लिये देवशिल्पीने यत्नपूर्वक सुरम्य गृहका निर्माण किया ?
भगवान् नारायणने कहा-
सुन्दरी कलावती कमलाके अंशसे प्रकट हुई पितरोंकी मानसी कन्या है और वृषभानुकी पतिव्रता पत्नी है। उसीकी पुत्री राधा हुईं जो श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। वे श्रीकृष्णके आधे अंशसे प्रकट हुई हैं; इसलिये उन्हींके समान तेजस्विनी हैं। उनके चरणकमलोंकी रजके स्पर्शसे वसुन्धरा पवित्र हो गयी है। सभी संत-महात्मा सदा ही श्रीराधाके प्रति अविचल भक्तिकी कामना करते हैं।
नारदजीने पूछा-
मुने! व्रजमें रहनेवाले एक मानवने कैसे, किस पुण्यसे और किस प्रकार पितरोंकी परम दुर्लभ मानसी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त किया ? व्रजके महान् अधिपति वृषभानु पूर्वजन्ममें कौन थे, किसके पुत्र थे और किस तपस्यासे राधा उनकी कन्या हुईं ?
सूतजी कहते हैं-
नारदजीकी यह बात सुनकर ज्ञानिशिरोमणि महर्षि नारायण हँसे और प्रसन्नतापूर्वक उस प्राचीन इतिहासको बताने लगे।
भगवान् नारायण बोले-
नारद ! पूर्वकालमें पितरोंके मानससे तीन कन्याएँ प्रकट हुई कलावती, रत्नमाला और मेनका ये तीनों ही अत्यन्त दुर्लभ थीं। इनमेंसे रत्नमालाने कामनापूर्वक राजा जनकको पतिरूपमें वरण किया और मेनकाने श्रीहरिके अंशभूत गिरिराज हिमालयको अपना पति बनाया। रत्नमालाकी पुत्री अयोनिजा सती सत्यपरायणा सीता हुईं, जो साक्षात् लक्ष्मी तथा श्रीरामकी पत्नी थीं। मेनकाकी पुत्री पार्वती हुई, जो पूर्वजन्ममें सती नामसे प्रसिद्ध थीं। वे भी अयोनिजा ही कही गयी हैं। पार्वती श्रीहरिकी सनातनी माया हैं। उन्होंने तपस्यासे नारायणस्वरूप महादेवजीको पतिरूपमें प्राप्त किया है। कलावतीने मनुवंशी राजा सुचन्द्रका वरण किया। वे राजा साक्षात् श्रीहरिके अंश थे। उन्होंने कलावतीको पाकर अपनेको गुणवानोंमें श्रेष्ठ और अत्यन्त सुन्दर माना। वे उसके सौन्दर्यकी प्रशंसा करते हुए मन ही मन कहते थे- 'इसका रूप अद्भुत है। वेष भी आश्चर्यजनक है और इसकी नयी अवस्था कैसी विलक्षण है। सुकोमल अङ्ग, शरत्कालके चन्द्रमासे भी बढ़कर परम सुन्दर मुख तथा गज और खंजनके भी गर्वका गंजन करनेवाली दुर्लभ गति- सभी अद्भुत हैं। इस अपनी परम सुन्दरी पत्नी कलावतीके साथ विभिन्न रमणीय स्थानों में रहकर सुदीर्घकालतक विहार करनेके पश्चात् राजा भोगोंसे विरक्त हो गये और कलावतीको साथ लेकर विन्ध्यपर्वतकी तीर्थभूमिमें तपस्याके लिये चले गये। भारतमें अत्यन्त प्रशंसाके योग्य वह उत्तम स्थान पुलहाश्रमके नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ राजाने मोक्षकी इच्छा मनमें लेकर सहस्र दिव्य वर्षोंतक तप किया। उनके मनमें कोई लौकिक कामना नहीं थी। वे आहार छोड़ देनेके कारण कृशोदर हो गये। श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करते-करते मुनिश्रेष्ठ सुचन्द्रको मूर्च्छा आ गयी। उनके शरीरपर जो बाँबी छा गयी थी, उसे उनकी साध्वी पत्नीने दूर किया। पतिको निश्चेष्ट, प्राणशून्य, मांस और रक्तसे रहित तथा अस्थि चर्मावशिष्टमात्र देख उस निर्जन वनमें कलावती शोकातुर हो उच्च स्वरसे रोने लगी। मूच्छित पतिको वक्षःस्थलसे लगाकर वह महादीना पतिव्रता 'हे नाथ! हा नाथ!' का उच्चारण करती हुई विलाप करने लगी। राजा आहार छोड़ देनेके कारण सूख गये हैं; उनके शरीरकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देती हैं- यह देख और कलावतीका विलाप सुनकर कृपानिधान कमलजन्मा जगत्स्स्रष्टा ब्रह्माजी कृपापूर्वक वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने तुरंत ही राजाके शरीरको अपनी गोदमें लेकर कमण्डलुके जलसे सींचा। फिर ब्रह्मज्ञ ब्रह्माने ब्रह्मज्ञानके द्वारा उसमें जीवका संचार किया। इससे चेतनाको प्राप्त हो नृपवर सुचन्द्रने अपने सामने प्रजापतिको देखकर प्रणाम किया। प्रजापतिने कामके समान कान्तिमान् नरेशसे संतुष्ट होकर कहा- 'राजन्! तुम इच्छानुसार वर माँगो।' विधाताकी यह बात सुनकर श्रीमान् सुचन्द्रके मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल गयी। वे प्रसन्नवदन हो बोले- 'दयानिधे! यदि आप वर देनेको उद्यत हैं तो कृपापूर्वक मुझे मनोवाञ्छित निर्वाण प्रदान करें। इस वरदानके मिल जानेपर मेरी क्या दशा होगी, इसका मन-ही-मन अनुमान करके कलावतीके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये। वह सती संत्रस्त हो वर देनेको उद्यत हुए विधातासे बोली। कलावतीने कहा- कमलोद्भव ब्रह्मन् ! यदि आप महाराजको मुक्ति दे रहे हैं तो मुझ अबलाकी क्या गति होगी, यह आप ही बताइये ? चतुरानन ! कान्तके बिना कान्ताकी क्या शोभा है ? श्रुतिमें सुना गया है कि पतिव्रता नारीके लिये पति ही व्रत है, पति ही गुरु, इष्टदेव, तपस्या और धर्म है। ब्रह्मन् ! सभी स्त्रियोंके लिये पतिसे बढ़कर परम प्रिय बन्धु कोई नहीं है । पतिसेवा परम दुर्लभ है। वह सब धर्मोंसे बढ़कर है। पतिसेवासे दूर रहनेवाली स्त्रीका सारा शुभ कर्म निष्फल होता है। व्रत, दान, तप, पूजन, जप, होम, सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान, पृथ्वीकी परिक्रमा, समस्त यज्ञोंकी दीक्षा, बड़े-बड़े दान, सब वेदोंका पाठ, सब प्रकारकी तपस्या, वेदज्ञ ब्राह्मणोंको भोजन-दान तथा देवाराधन- ये सब मिलकर पति-सेवाकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। जो स्त्रियाँ पतिकी सेवा नहीं करतीं और पतिसे कटुवचन बोलती हैं, वे चन्द्रमा और सूर्यकी सत्तापर्यन्त कालसूत्र नरकमें गिरकर यातना भोगती हैं। वहाँ सर्पोंके बराबर बड़े-बड़े कीड़े दिन-रात उन्हें हँसते रहते हैं और सदा विपरीत एवं भयंकर शब्द किया करते हैं। उस नरकमें स्त्रियोंको मल, मूत्र तथा कफका भोजन करना पड़ता है। यमराजके दूत उनके मुख में जलती लुआठी डालते हैं। नरकका भोग पूरा करके वे नारियाँ कृमियोनिमें जन्म लेती हैं और सौ जन्मोंतक रक्त, मांस तथा विष्ठा खाती हैं। वेदवाक्यों में यह निश्चित सिद्धान्त बताया गया है। मैं अबला हूँ। विद्वानोंके मुखसे सुनकर उपर्युक्त बातोंको कुछ-कुछ जानती हूँ। आप तो वेदोंका भी प्राकट्य करनेवाले हैं। प्रभु हैं। विद्वानों, योगियों, ज्ञानियों तथा गुरुके भी गुरु हैं। अच्युत ! आप सर्वज्ञ हैं। मैं आपको क्या समझा सकूँगी ? ये मेरे पति मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। यदि इन्हें मुक्ति प्राप्त हो गयी तो मेरा रक्षक कौन होगा ? मेरे धन और यौवनकी रक्षा कौन करेगा? कुमारावस्थामें नारीकी रक्षा पिता करता है। फिर वह कन्याका सुपात्रको दान देकर कृतकृत्य हो जाता है। तबसे पति ही नारीकी रक्षा करता है। पतिके अभावमें उसका पुत्र रक्षक होता है। इस प्रकार तीन अवस्थाओं में नारी तीन रक्षक माने गये हैं। जो स्त्रियाँ स्वतन्त्र हैं, वे नष्ट मानी गयी हैं। उनका सभी धर्मोंसे बहिष्कार किया गया है। वे नीच कुलमें उत्पन्न, कुलटा और दुष्टहृदया कही गयी हैं। ब्रह्मन्! उनके सौ जन्मोंका पुण्य नष्ट हो जाता है। पतिव्रताका अपने पतिके प्रति सर्वदा समान स्नेह होता है। दूध पीते बच्चेपर माताओंका अधिक स्नेह देखा जाता है, परंतु वह पतिव्रताके पतिविषयक स्नेहकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। पतिसे बढ़कर कोई बन्धु, प्रिय देवता तथा गुरु नहीं है। स्त्रीके लिये पतिसे बढ़कर धर्म, धन, प्राण तथा दूसरा कोई पुरुष नहीं है। जैसे वैष्णवोंका मन श्रीकृष्णचरणारविन्दमें ही निमग्न रहता है, उसी प्रकार साध्वी स्त्रियोंका चित्त अपने प्रियतम पतिमें ही संलग्न रहता है। ब्रह्मन्! पतिके बिना पतिव्रता स्त्री एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती। पतिके बिना साध्वी स्त्रियोंके लिये मरण ही जीवन है और जीवन मृत्युसे भी अधिक कष्ट देनेवाला है। ब्रह्मन्! यदि मेरे बिना ही आप इन्हें मुक्त कर देंगे तो प्रभो ! मैं आपको शाप देकर स्त्री हत्याका दारुण पाप प्रदान करूँगी। लल्लकलावतीकी बात सुनकर विधाता विस्मित हो मन-ही-मन भय मानते हुए अमृतके समान मधुर एवं हितकर वचन बोले।
ब्रह्माजीने कहा-
बेटी! मैं तुम्हारे स्वामीको तुम्हारे बिना ही मुक्ति नहीं दूँगा। पतिव्रते! तुम अपने पतिके साथ कुछ वर्षोंतक स्वर्गमें रहकर सुख भोगो। फिर तुम दोनोंका भारतवर्षमें जन्म होगा। वहाँ जब साक्षात् सती राधिका तुम्हारी पुत्री होंगी तब तुम दोनों जीवन्मुक्त हो जाओगे और श्रीराधाके साथ ही गोलोकमें पधारोगे। नृपश्रेष्ठ ! तुम कुछ कालतक अपनी स्त्रीके साथ स्वर्गीय सुखका उपभोग करो। यह स्त्री साध्वी एवं सत्त्वगुणसे युक्त है। तुम मुझे शाप न देना; क्योंकि श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें चित्त लगाये रखनेवाले जीवन्मुक्त संत समदर्शी होते हैं। उनके मनमें श्रीहरिके दुर्लभ दास्यभावको पानेकी इच्छा रहती है। वे निर्वाण नहीं चाहते।
ऐसा कहकर उन दोनोंको वर दे विधाता उनके सामने खड़े रहे। वे दोनों उन्हें प्रणाम करके स्वर्गकी ओर चल दिये। फिर ब्रह्माजी भी अपने धामको चले गये। तदनन्तर वे दोनों दम्पति समयानुसार स्वर्गीय भोगोंका उपभोग करके भारतवर्ष में आये, जो परम पुण्यदायक दिव्य स्थान है। ब्रह्मा आदि देवता भी वहाँ जन्म लेनेकी इच्छा करते हैं। सुचन्द्रने गोकुलमें जन्म लिया और वहाँ उनका नाम वृषभानु हुआ। वे सुरभानुके वीर्य और पद्मावती के गर्भसे उत्पन्न हुए। उन्हें पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। वे श्रीहरिके अंश थे और जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं, उसी प्रकार व्रजधाममें प्रतिदिन बढ़ने लगे। धीरे-धीरे वे व्रजके अधिपति हुए। उन्हें सर्वज्ञ और महायोगी माना गया है। उनका चित्त सदा श्रीहरिके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें ही लगा रहता था। वे उदार, रूपवान्, गुणवान् और श्रेष्ठ बुद्धिवाले थे। कलावती कान्यकुब्ज देशमें उत्पन्न हुई। वह भी अयोनिजा, पूर्व जन्मकी बातोंको याद रखनेवाली महासाध्वी, सुन्दरी एवं कमलाकी कला थी। कान्यकुब्ज देशमें महापराक्रमी नृपश्रेष्ठ भनन्दन राज्य करते थे। उन्होंने यज्ञके अन्तमें यज्ञकुण्डसे प्रकट हुई दूध पीती नंगी बालिकाके रूपमें उसे पाया था। वह सुन्दरी बालिका उस कुण्डसे हँसती हुई निकली थी। उसकी अङ्ग - कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी। वह तेजसे उद्भासित हो रही थी। राजेन्द्र भनन्दनने उसे गोदमें लेकर अपनी प्यारी रानी मालावतीको प्रसन्नतापूर्वक दे दिया। मालावतीके हर्षकी सीमा न रही। वह उस बालिकाको अपना स्तन पिलाकर पालने लगी। उसके अन्नप्राशन और नामकरणके दिन शुभ बेलामें जब राजा सत्पुरुषोंके बीच बैठे हुए थे, आकाशवाणी हुई— 'नरेश्वर! इस कन्याका नाम कलावती रखो।' यह सुनकर राजाने वही नाम रख दिया। उन्होंने ब्राह्मणों, याचकों और वन्दीजनोंको प्रचुर धन दान किया। सबको भोजन कराया और बड़ा भारी उत्सव मनाया। समयानुसार उस रूपवती कन्याने युवावस्था में प्रवेश किया। सोलह वर्षकी अवस्थामें वह अत्यन्त सुन्दरी दिखायी देने लगी। वह राजकन्या मुनियोंके मनको भी मोह लेनेमें समर्थ थी। मनोहर चम्पाके समान उसकी अङ्गकान्ति थी तथा मुख शरत्कालके पूर्णचन्द्रकी भाँति परम मनोहर था। एक दिन गजराजकी-सी मन्दगतिसे चलनेवाली राजकुमारी राजमार्गसे कहीं जा रही थी। नन्दजीने उसे मार्गमें देखा। देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उस मार्गसे आने-जानेवाले लोगोंसे आदरपूर्वक पूछा- 'यह किसकी कन्या जा रही थी।' लोगोंने बताया 'यह महाराज भनन्दनकी कन्या है। इसका नाम कलावती है। यह धन्या बाला लक्ष्मीजीके अंशसे राजमन्दिरमें प्रकट हुई है और कौतुकवश खेलनेके लिये अपनी सहेलीके घर जा रही है। व्रजराज! आप व्रजको पधारिये। ऐसा उत्तर देकर लोग चले गये। नन्दके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। वे राजभवनको गये। रथसे उतरकर उन्होंने तत्काल ही राजसभामें प्रवेश किया। राजा उठकर खड़े हो गये। उन्होंने नन्दरायजीसे बातचीत की और उन्हें बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन दिया। उन दोनोंमें परस्पर बहुत प्रेमालाप हुआ। फिर नन्दने विनीत होकर राजासे सम्बन्धकी बात चलायी।
नन्दजीने कहा -
राजेन्द्र ! सुनिये। मैं एक शुभ एवं विशेष बात कह रहा हूँ। आप इस समय अपनी कन्याका सम्बन्ध एक विशिष्ट पुरुषके साथ स्थापित कीजिये। व्रजमें सुरभानुके पुत्र श्रीमान् वृषभानु निवास करते हैं, जो व्रज राजा हैं। वे भगवान् नारायणके अंशसे उत्पन्न हुए हैं और उत्तम गुणोंके भण्डार, सुन्दर, सुविद्वान्, सुस्थिर यौवनसे युक्त, योगी, पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाले और नवयुवक हैं। आपकी कन्या भी यज्ञकुण्डसे उत्पन्न हुई है; अतः अयोनिजा है। त्रिभुवनमोहिनी कन्या कलावती भगवती कमलाकी अंश है और स्वभावतः शान्त जान पड़ती है। वृषभानु आपकी पुत्रीके योग्य हैं तथा आपकी पुत्री भी उन्हींके योग्य है। मुने! राजसभामें ऐसा कहकर नन्दजी चुप हो गये। तब नृपश्रेष्ठ भनन्दनने विनयसे नम्र हो उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया।
भनन्दन बोले-
व्रजेश्वर! सम्बन्ध तो विधाताके वशकी बात है। वह मेरे द्वारा साध्य नहीं है। ब्रह्माजी ही सम्बन्ध करनेवाले हैं। मैं तो केवल जन्मदाता हूँ। कौन किसकी पत्नी या कन्या है तथा कौन किसका साधन-सम्पन्न पति है ? इसे विधाताके सिवा और कौन जानता है? कर्मोंके अनुरूप फल देनेवाले विधाता ही सबके कारण हैं। किया हुआ कर्म कभी निष्फल नहीं होता, उसका फल मिलकर ही रहेगा- ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। अन्यथा असमर्थ पुरुषके उद्यमकी भाँति सारा कर्म निष्फल हो जाता है। यदि विधाताने मेरी पुत्रीको ही वृषभानुकी पत्नी होनेकी बात लिखी है तो वह पहलेसे ही उनकी पत्नी है। मैं फिर कौन हूँ, जो उसमें बाधा डाल तथा दूसरा भी कौन उस सम्बन्धका निवारण कर सकता है ?
नारद! यों कहकर राजेन्द्र भनन्दनने विनय से सिर झुकाकर नन्दरायजीको आदरपूर्वक मिष्टान्न भोजन कराया। तत्पश्चात् राजाकी अनुमति ले व्रजराज व्रजको लौट गये। जाकर उन्होंने सुरभानुकी सभामें सब बातें बतायीं। सुरभानुने भी यत्नपूर्वक नन्द और गर्गजीके सहयोगसे सादर इस सम्बन्धको जोड़ा। विवाहकालमें महाराज भनन्दनने गजरत्न, अश्वरत्न, अन्यान्य रत्न तथा मणियोंके आभूषण आदि बहुत दहेज दिये। वृषभानु कलावतीको पाकर बड़ी प्रसन्नता के साथ निर्जन एवं रमणीय स्थानमें उसके साथ विहार करने लगे। कलावती एक पलका भी विरह होनेपर स्वामीके बिना व्याकुल हो उठती थी और वृषभानु भी एक क्षणके लिये भी कलावतीके दूर होनेपर उसके बिना विकल हो जाते थे। वह राजकन्या पूर्वजन्मकी बातोंको याद रखनेवाली देवी थी। मायासे मनुष्यरूपमें प्रकट हुई थी। वृषभानु भी श्रीहरिके अंश और जातिस्मर थे तथा कलावतीको पाकर बड़े प्रसन्न थे। उन दोनोंका प्रेम प्रतिदिन नया-नया होकर बढ़ने लगा। लीलावश पूर्वकालमें सुदामाके शाप और श्रीकृष्णकी आज्ञासे श्रीकृष्णप्राणाधिका सती राधिका उन दोनोंकी अयोनिजा पुत्री हुईं। उसके दर्शनमात्रसे वे दोनों दम्पति भवबन्धनसे मुक्त हो गये। नारद! इस प्रकार इतिहास कहा गया। अब जिसका प्रकरण चल रहा है, वह प्रसङ्ग सुनो। उक्त इतिहास पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये प्रज्वलित अग्निकी शिखाके समान है। शिल्पिशिरोमणि विश्वकर्मा वृषभानुके आश्रमपर जाकर वहाँसे अपने सेवकगणोंके साथ दूसरे स्थानपर गये। वे तत्त्वज्ञ थे। उन्होंने मन-ही-मन एक कोस लंबे-चौड़े एक मनोहर स्थानका विचार करके वहाँ महात्मा नन्दके लिये आश्रम बनाना आरम्भ किया। बुद्धिसे अनुमान करके उनके लिये सबसे विलक्षण भवन बनाया। वह श्रेष्ठ भवन चार गहरी खाइयोंसे घिरा हुआ था, शत्रुओंके लिये उन्हें लाँघना बहुत कठिन था। उन चारों खाइयोंमें प्रस्तर जुड़े हुए थे। उन खाइयोंके दोनों तटोंपर फूलोंके उद्यान थे, जिनके कारण वे पुष्पोंसे सजी हुई सी जान पड़ती थीं और सुन्दर एवं मनोहर चम्पाके वृक्ष तटोंपर खिले हुए थे। उन्हें छूकर बहनेवाली सुगन्धित वायु उन परिखाओंको सब ओरसे सुवासित कर रही थी। तटवर्ती आम, सुपारी, कटहल, नारियल, अनार, श्रीफल (बेल), भृङ्ग (इलायची), नीबू, नारंगी, ऊँचे आम्रातक (आमड़ा), जामुन, केले, केवड़े और कदम्बसमूह आदि फूले-फले वृक्षों से खाइयोंकी सब ओरसे शोभा हो रही थी। वे सारी परिखाएँ सदा वृक्षोंसे ढकी होनेके कारण जल-क्रीड़ाके योग्य थीं। अतएव सबको प्रिय थीं। परिखाओंके एकान्त स्थानमें जानेके लिये विश्वकर्माने उत्तम मार्ग बनाया, जो स्वजनोंके लिये सुगम और शत्रुवर्गके लिये दुर्गम था। थोड़े-थोड़े जलसे ढके हुए मणिमय खम्भोंद्वारा संकेतसे उस मार्गपर खम्भोंकी सीमा बनायी गयी थी। वह मार्ग न तो अधिक संकीर्ण था और न अधिक विस्तृत ही था । परिखाके ऊपरी भागमें देवशिल्पीने मनोहर परकोटा बनाया था, जिसकी ऊँचाई बहुत अधिक थी। वह सौ धनुषके बराबर ऊँचा था। उसमें लगा हुआ एक एक पत्थर पचीस-पचीस हाथ लंबा था। सिन्दूरी रंगकी मणियोंसे निर्मित वह प्राकार बड़ा ही सुन्दर दिखायी देता था। उसमें बाहरसे दो और भीतरसे सात दरवाजे थे दरवाजे मणिसारनिर्मित किवाड़ोंसे बंद रहते थे। वह नन्दभवन इन्द्रनीलमणिके चित्रित कलशोंद्वारा विशेष शोभा पा रहा था। मणिसाररचित कपाट भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। स्वर्णसारनिर्मित कलशोंसे उसका शिखरभाग बहुत ही उद्दीस जान पड़ता था। नन्दभवनका निर्माण करके विश्वकर्मा नगरमें घूमने लगे। उन्होंने नाना प्रकारके मनोहर राजमार्ग बनाये। रक्तभानुमणिकी बनी हुई वेदियों तथा सुन्दर पत्तनोंसे वे मार्ग सुशोभित होते थे। उन्हें आर-पार दोनों ओरसे बाँधकर पक्का बनाया गया था, जिससे वे बड़े मनोहर लगते थे। राजमार्गके दोनों ओर मणिमय मण्डप बने हुए थे, जो वैश्योंके वाणिज्य व्यवसायके उपयोगमें आने योग्य थे। वे मण्डप दायें बायें सब ओरसे प्रकाशित हो उन राजमार्गोंको भी प्रकाश पहुँचाते थे।
तदनन्तर वृन्दावनमें जाकर विश्वकर्माने सुन्दर, गोलाकार और मणिमय परकोटोंसे युक्त रासमण्डलका निर्माण किया, जो सब ओरसे एक एक योजन विस्तृत था उसमें स्थान-स्थानपर मणिमय वेदिकाएँ बनी हुई थीं। मणिसाररचित नौ करोड़ मण्डप उस रासमण्डलकी शोभा बढ़ाते थे। वे शृङ्गारके योग्य, चित्रोंसे सुसज्जित और शय्याओंसे सम्पन्न थे नाना जातिके फूलोंकी सुगन्ध लेकर बहती हुई वायु उन मण्डपोंको सुवासित करती थी। उनमें रत्नमय प्रदीप जलते थे सुवर्णमय कलश उनकी उज्ज्वलता बढ़ा रहे थे। पुष्पोंसे भरे हुए उद्यानों तथा सरोवरोंसे सुशोभित रासस्थलका निर्माण करके विश्वकर्मा दूसरे स्थानको गये। वे उस रमणीय वृन्दावनको देखकर बहुत संतुष्ट हुए। वनके भीतर जगह-जगह एकान्त स्थानमें मन बुद्धिसे विचार और निश्चय करके उन्होंने वहाँ तीस रमणीय एवं विलक्षण वनोंका निर्माण किया वे केवल श्रीराधा माधवकी ही क्रीड़ाके लिये बनाये गये थे।
तदनन्तर मधुवनके निकट अत्यन्त मनोहर निर्जन स्थानमें वटवृक्षके मूलभागके निकट सरोवरके पश्चिम किनारे केतकीवनके बीच और चम्पाके उद्यानके पूर्व विश्वकर्माने राधा माधवकी क्रीड़ाके लिये पुनः एक रत्नमय मण्डपका निर्माण किया, जो चार वेदिकाओंसे घिरा हुआ और अत्यन्त सुन्दर था रत्नसाररचित सौ तूलिकाएँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं। अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित नौ जोड़े कपाटों और नौ मनोहर द्वारोंसे उस रत्नमण्डपकी बड़ी शोभा हो रही थी। उस मण्डपकी दीवारोंके दोनों [?????]
शोभा बढ़ा रहे थे उसमें सब ओर अमूल्य रत्नमय दर्पण लगे थे, जिनके कारण सबको अपने सामनेकी ओरसे ही वह मण्डप दीप्तिमान् दिखायी देता था। वह सौ धनुष ऊपरतक अग्निशिखाके समान प्रकाशपुज फैला रहा था। उसका विस्तार सौ हाथका था। वह रत्नमण्डप गोलाकार बना था। उसके भीतर रत्ननिर्मित शय्याएँ बिछी थीं, जिनसे उस उत्तम भवनके भीतरी भागकी बड़ी शोभा हो रही थी। उक्त शय्याओंपर अग्रिशुद्ध दिव्य वस्त्र बिछे थे। मालाओंके समूहसे सुसज्जित होकर वे विचित्र शोभा धारण करते थे। पारिजातके फूलोंकी मालाओंके बने हुए तकिये उनपर यथास्थान रखे गये थे। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे वह सारा भवन सुवासित हो रहा था उसमें मालती और चम्पाके फूलोंकी मालाएँ रखी थीं। नूतन शृङ्गारके योग्य तथा पारस्परिक प्रेमकी वृद्धि करनेवाले कपूरयुक्त ताम्बूलके बीड़े उत्तम रत्नमय पात्रों में सजाकर रखे गये थे। उस भवनमें रत्नोंकी बनी हुई बहुत सी चौकियाँ थीं, जिनमें हीरे जड़े थे और मोतियोंकी झालरें लटक रही थीं। रत्नसारजटित कितने ही घट यथास्थान रखे हुए थे। रत्नमय चित्रोंसे चित्रित अनेक रत्नसिंहासन उस मण्डपकी शोभा बढ़ाते थे, जिनमें जड़ी हुई चन्द्रकान्त मणियाँ पिघलकर जलकी बूँदोंसे उस भवनको सींच रही थीं। शीतल एवं सुवासित जल तथा भोग्य वस्तुओं से युक्त उस रमणीय मिलन मन्दिर (रत्नमण्डप) - का निर्माण करके विश्वकर्मा फिर नगरमें गये। जिनके लिये जो भवन बने थे, उनपर उनके नाम उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक लिखे। इस कार्यमें उनके शिष्य तथा यक्षगण उनकी सहायता करते थे। मुने! निद्राके स्वामी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण उस समय निद्राके वशीभूत थे। उनको नमस्कार करके विश्वकर्मा अपने घरको चले गये। परमेश्वर श्रीकृष्ण इच्छासे ही भूतलपर ऐसा आश्चर्यमय नगर निर्मित हुआ। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका सारा मङ्गलमय चरित्र कह सुनाया, जो सुखद और पापहारी है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ?
नारदजीने पूछा-
भगवन् ! भारतवर्षमें इस काननका नाम 'वृन्दावन' क्यों हुआ? इसकी व्युत्पत्ति अथवा संज्ञा क्या है? आप उत्तम तत्त्वज्ञ हैं, अतः इस तत्त्वको बताइये ।
सूतजी कहते हैं-
नारदजीका प्रश्न सुनकर नारायण ऋषिने सानन्द हँसकर सारा ही पुरातन तत्त्व कहना आरम्भ किया। भगवान् नारायण बोले- नारद! पहले सत्ययुगकी बात है। राजा केदार सातों द्वीपोंके अधिपति थे। ब्रह्मन् ! वे सदा सत्य धर्ममें तत्पर रहते थे और अपनी स्त्रियों तथा पुत्र-पौत्रवर्गके साथ सानन्द जीवन बिताते थे। उन धार्मिक नरेशने समस्त प्रजाओंका पुत्रोंकी भाँति पालन किया। सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी राजा केदारने इन्द्रपद पानेकी इच्छा नहीं की। वे नाना प्रकारके पुण्यकर्म करके भी स्वयं उनका फल नहीं चाहते थे। उनका सारा नित्यनैमित्तिक कर्म श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये ही होता था। केदार समान राजाधिराज न तो कोई पहले हुआ है और न पुनः होगा ही। उन्होंने अपनी त्रिभुवनमोहिनी पत्नी तथा राज्यकी रक्षाका भार पुत्रोंपर रखकर जैगीषव्य मुनिके उपदेशसे तपस्याके लिये वनको प्रस्थान किया। वे श्रीहरिके अनन्य भक्त थे और निरन्तर उन्हींका चिन्तन करते थे। मुने! भगवान्का सुदर्शनचक्र राजाकी रक्षाके लिये सदा उन्हीं के पास रहता था। वे मुनिश्रेष्ठ नरेश चिरकालतक तपस्या करके अन्तमें गोलोकको चले गये। उनके नामसे केदारतीर्थ प्रसिद्ध हुआ। अवश्य ही आज भी वहाँ मरे हुए प्राणीको तत्काल मुक्तिला होता है।
उनकी कन्याका नाम वृन्दा था, जो लक्ष्मीकी अंश थी। उसने योगशास्त्रमें निपुण होनेके कारण किसीको अपना पुरुष नहीं बनाया। दुर्वासाने उसे परम दुर्लभ श्रीहरिका मन्त्र दिया। वह घर छोड़कर तपस्याके लिये वनमें चली गयी। उसने साठ हजार वर्षोतक निर्जन वनमें तपस्या की। तब उसके सामने भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए। उन्होंने प्रसन्नमुखसे कहा- 'देवि! तुम कोई वर माँगो।' वह सुन्दर विग्रहवाले शान्तस्वरूप राधिका कान्तको देखकर सहसा बोल उठी 'तुम मेरे पति हो जाओ।' उन्होंने 'तथास्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। वह | कौतूहलवश श्रीकृष्णके साथ गोलोकमें गयी और वहाँ राधाके समान श्रेष्ठ सौभाग्यशालिनी गोपी हुई। वृन्दाने जहाँ तप किया था, उस स्थानका नाम 'वृन्दावन' हुआ अथवा वृन्दाने जहाँ क्रीड़ा की थी, इसलिये वह स्थान 'वृन्दावन' कहलाया। वत्स! अब दूसरा पुण्यदायक इतिहास सुनो - जिससे इस काननका नाम 'वृन्दावन' पड़ा। वह प्रसङ्ग मैं तुमसे कहता हूँ, ध्यान दो। राजा कुशध्वजके दो कन्याएँ थीं। दोनों ही धर्मशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थीं। उनके नाम थे तुलसी और वेदवती। संसार चलानेका जो कार्य है, उससे उन दोनों बहिनोंको वैराग्य था। उनमेंसे वेदवतीने तपस्या करके परम पुरुष नारायणको प्राप्त किया। वह जनककन्या सीताके नामसे सर्वत्र विख्यात है। तुलसीने तपस्या करके श्रीहरिको पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा की, किंतु दैववश दुर्वासाके शापसे उसने शङ्खचूड़को प्राप्त किया। फिर परम मनोहर कमलाकान्त भगवान् नारायण उसे प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त हुए। भगवान् श्रीहरिके शापसे देवेश्वरी तुलसी वृक्षरूपमें प्रकट हुई और तुलसीके शापसे श्रीहरि शालग्रामशिला हो गये। उस शिलाके वक्षः- स्थलपर उस अवस्थामें भी सुन्दरी तुलसी निरन्तर स्थित रहने लगी। मुने! तुलसीका सारा चरित्र तुमसे विस्तारपूर्वक कहा जा चुका है, तथा यहाँ प्रसङ्गवश पुनः उसकी कुछ चर्चा की गयी। तपोधन! उस तुलसीकी तपस्याका एक यह भी स्थान है; इसलिये इसे मनीषी पुरुष 'वृन्दावन' कहते हैं। (तुलसी और वृन्दा समानार्थक शब्द है) अथवा मैं तुमसे दूसरा उत्कृष्ट हेतु बता रहा हूँ, जिससे भारतवर्षका यह पुण्यक्षेत्र वृन्दावन के नामसे प्रसिद्ध हुआ। राधाके सोलह नामोंमें एक वृन्दा नाम भी है, जो श्रुतिमें सुना गया है। उन वृन्दा नामधारिणी राधाका यह रमणीय क्रीडा वन है; इसलिये इसे 'वृन्दावन' कहा गया है। पूर्वकालमें श्रीकृष्णने श्रीराधाकी प्रीतिके लिये गोलोकमें वृन्दावनका निर्माण किया था। फिर भूतलपर उनकी क्रीडाके लिये प्रकट हुआ वह वन उस प्राचीन नामसे ही 'वृन्दावन' कहलाने लगा।
नारदजीने पूछा-
जगदुरो ! श्रीराधिकाके सोलह नाम कौन-कौन से हैं? मुझ शिष्यसे उन्हें बताइये; उन्हें सुननेके लिये मेरे मनमें उत्कण्ठा है। मैंने सामवेदमें वर्णित श्रीराधाके सहस्र नाम सुने हैं; तथापि इस समय आपके मुखसे उनके सोलह नामोंको सुनना चाहता हूँ। विभो ! वे सोलह नाम उन सहस्र नामोंके ही अन्तर्गत हैं या उनसे भिन्न हैं? अहो! उन भक्तवाञ्छित पुण्यस्वरूप नामोंका मुझसे वर्णन कीजिये। साथ ही उन सबकी व्युत्पत्ति भी बताइये। जगत्के आदिकारण ! जगन्माता श्रीराधाके उन सर्वदुर्लभ पावन नामों को मैं सुनना चाहता हूँ।
श्रीनारायणने कहा-
राधा, रासेश्वरी,रासवासिनी , रसिकेश्वरी, कृष्णप्राणाधिका, कृष्णप्रिया, कृष्णस्वरूपिणी, कृष्णवामाङ्गसम्भूता, परमानन्दरूपिणी, कृष्णा, वृन्दावनी, वृन्दा, वृन्दावनविनोदिनी, चन्द्रावली, चन्द्रकान्ता और शरच्चन्द्रप्रभानना- ये सारभूत सोलह नाम उन सहस्र नामोंके ही अन्तर्गत हैं। राधा शब्दमें 'धा' का अर्थ है संसिद्धि (निर्वाण) तथा 'रा' दानवाचक है। जो स्वयं निर्वाण (मोक्ष) प्रदान करनेवाली हैं; वे 'राधा' कही गयी हैं। रासेश्वरकी ये पत्नी हैं; इसलिये इनका नाम 'रासेश्वरी' है। उनका रासमण्डलमें निवास है; इससे वे 'रासवासिनी' कहलाती हैं। वे समस्त रसिक देवियोंकी परमेश्वरी हैं; अतः पुरातन संत-महात्मा उन्हें 'रसिकेश्वरी' कहते हैं। परमात्मा श्रीकृष्णके लिये वे प्राणों से भी अधिक प्रियतमा हैं; अतः साक्षात् श्रीकृष्ण ने ही उन्हें 'कृष्णप्राणाधिका' नाम दिया है। वे श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया कान्ता हैं अथवा श्रीकृष्ण ही सदा उन्हें प्रिय हैं; इसलिये समस्त देवताओंने उन्हें 'कृष्णप्रिया' कहा है। वे श्रीकृष्णरूपको लीलापूर्वक निकट लानेमें समर्थ हैं तथा सभी अंशोंमें श्रीकृष्णके सदृश हैं; अतः 'कृष्णस्वरूपिणी' कही गयी हैं। परम सती श्रीराधा श्रीकृष्ण के आधे वामाङ्गभागसे प्रकट हुई हैं; अतः श्रीकृष्ण स्वयं ही उन्हें 'कृष्णवामाङ्गसम्भूता' कहा है। सती श्रीराधा स्वयं परमानन्दकी मूर्तिमती राशि हैं; अतः श्रुतियोंने उन्हें 'परमानन्दरूपिणी' की संज्ञा दी है। 'कृष्' शब्द मोक्षका वाचक है, 'ण' उत्कृष्टताका बोधक है और 'आकार' दाताके अर्थ में आता है। वे उत्कृष्ट मोक्षकी दात्री हैं; इसलिये 'कृष्णा' कही गयी हैं। वृन्दावन उन्हींका है; इसलिये वे 'वृन्दावनी' कही गयी हैं अथवा वृन्दावनकी अधिदेवी होनेके कारण उन्हें यह नाम प्राप्त हुआ है। सखियोंके समुदायको 'वृन्द' कहते हैं और 'अकार' सत्ताका वाचक है। उनके समूह-की समूह सखियाँ हैं; इसलिये वे 'वृन्दा' कही गयी हैं। उन्हें सदा वृन्दावनमें विनोद प्राप्त होता है; अतः वेद उनको 'वृन्दावनविनोदिनी' कहते हैं। वे सदा मुखचन्द्र तथा नखचन्द्रकी अवली ( पंक्ति) से युक्त हैं; इस कारण श्रीकृष्णने उन्हें 'चन्द्रावली' नाम दिया है। उनकी कान्ति दिन रात सदा ही चन्द्रमाके तुल्य बनी रहती है; अतः श्रीहरि हर्षोल्लासके कारण उन्हें 'चन्द्रकान्ता कहते हैं। उनके मुखपर दिन-रात शरत्कालके चन्द्रमाकी-सी प्रभा फैली रहती है; इसलिये मुनिमण्डलीने उन्हें 'शरच्चन्द्रप्रभानना' कहा है।
यह अर्थ और व्याख्याओंसहित षोडश नामावली कही गयी; जिसे नारायणने अपने नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माको दिया था। फिर ब्रह्माजीने पूर्वकालमें मेरे पिता धर्मदेवको इन नामावलीका उपदेश दिया और श्रीधर्मदेवने महातीर्थ पुष्करमें सूर्य ग्रहणके पुण्य पर्वपर देवसभाके बीच मुझे कृपापूर्वक इन सोलह नामोंका उपदेश दिया था। श्रीराधाके प्रभावकी प्रस्तावना होनेपर बड़े प्रसन्नचित्तसे उन्होंने इन नामोंकी व्याख्या की थी। मुने! यह राधाका परम पुण्यमय स्तोत्र है, जिसे मैंने तुमको दिया। महामुने! जो वैष्णव न हो तथा वैष्णवोंका निन्दक हो, उसे इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। जो मनुष्य जीवनभर तीनों संध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसकी यहाँ राधा माधवके चरणकमलोंमें भक्ति होती है। अत वह उन दोनोंका दास्यभाव प्राप्त कर लेता है और दिव्य शरीर एवं अणिमा आदि सिद्धिको पाकर सदा उन प्रिया प्रियतमके साथ विचरता है। नियमपूर्वक किये गये सम्पूर्ण व्रत, दान और उपवाससे, चारों वेदोंके अर्थसहित पाठसे, समस्त यज्ञों और तीर्थोके विधिबोधित अनुष्ठान तथा सेवनसे, सम्पूर्ण भूमिकी सात बार की गयी परिक्रमासे, शरणागतकी रक्षासे, अज्ञानीको ज्ञान देनेसे तथा देवताओं और वैष्णवोंका दर्शन करनेसे भी जो फल प्राप्त होता है, वह इस स्तोत्रपाठकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है। इस स्तोत्रके प्रभावसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है।
नारदजीने कहा-
प्रभो! यह सर्वदुर्लभ परम आश्चर्यमय स्तोत्र मुझे प्राप्त हुआ। देवी श्रीराधाका 'संसारविजय' नामक कवच भी उपलब्ध हुआ। सुयज्ञने जिसका प्रयोग किया था, वह दुर्लभ स्तोत्र भी मुझे सुलभ हो गया। भगवान् श्रीकृष्णकी विचित्र कथा सुनकर आपके चरणकमलोंके प्रसादसे मैंने बहुत कुछ पा लिया। अब मैं जिस रहस्यको सुनना चाहता हूँ, उसका वर्णन कीजिये। मुने! वृन्दावनमें प्रातः काल उस अद्भुत नगरको देखकर गोपोंने क्या कहा ?
भगवान् श्रीनारायण बोले-
नारद ! जब वहाँ रात बीत गयी, विश्वकर्मा चले गये और अरुणोदयकी बेला आयी, तब सब लोग जाग उठे। उठते ही सबसे विलक्षण उस नगरको देख व्रजवासी आपसमें कहने लगे—'यह क्या आश्चर्य है? यह क्या आश्चर्य है ?' किन्हीं गोपोंने कुछ अन्य गोपोंसे पूछा- 'यह कैसे सम्भव हुआ ? न जाने भूतलपर किस रूपसे कौन प्रकट हो सकता है?' परंतु नन्दरायजी गर्गके वाक्योंका स्मरण करके मन-ही-मन सब कुछ जान गये। उन्होंने भीतर ही भीतर विचार किया- 'यह समस्त चराचर जगत् श्रीहरिकी इच्छासे ही उत्पन्न हुआ है। जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारा जगत् आविर्भूत और तिरोभूत होता रहता है, उनके लिये क्या और कैसे असाध्य है? अहो ! जिनके रोमकूपोंमें ही | सारे ब्रह्माण्ड स्थित हैं, उन परमेश्वर महाविष्णु श्रीहरिके लिये क्या असाध्य हो सकता है ? ब्रह्मा, शेषनाग, शिव और धर्म जिनके चरणारविन्दोंका दर्शन करते रहते हैं, उन माया मानव-रूपधारी परमेश्वरके लिये कौन-सा ऐसा कार्य है, जो असाध्य हो?' नन्दजीने उस नगरमें घूम-घूमकर, एक-एक घरको देख-देखकर और वहाँ लिखे हुए नामोंको पढ़कर सबके लिये घरोंका वितरण किया। नन्द और वृषभानुने शुभ मुहूर्त देखकर प्रवेशकालिक मङ्गलकृत्यका सम्पादन करके अपने सेवकगणोंके साथ अपने-अपने आश्रम में प्रवेश किया। वृन्दावनमें रहकर उन सबके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। उन सब गोपोंने बड़े आनन्दके साथ अपने-अपने उत्तम आश्रममें पदार्पण किया। अपने अपने मनोहर स्थानपर सब गोपोंको बड़ा आनन्द मिला। वहाँके बालक और बालिकाएँ हर्षपूर्वक खेलने-कूदने लगीं। श्रीकृष्ण और बलदेव भी कौतूहलवश गोपशिशुओंके साथ वहाँ प्रत्येक मनोहर स्थानपर बालोचित क्रीड़ा करने लगे। नारद! इस प्रकार मैंने नगर निर्माणका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। वनमें गोपबालाओंके लिये जो रासमण्डल बना था, उसकी भी बात बतायी। (अध्याय १७)
Summary of chapter 15 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
During a grand celebration when baby Kṛshṇa was lying peacefully in a cradle beneath a heavy wooden cart loaded with pots of milk and curds, a powerful demon named Shakaṭāsura entered the cart to crush the infant. Awakening and feeling hungry, baby Kṛshṇa gently kicked His tiny lotus feet in the air, creating a divine shockwave that shattered the heavy cart into a thousand pieces and hurled the demon demon to his death. The astonished cowherd women rushed to the spot, praising the divine grace that protected the child from unseen dangers, while mother Yashodā lovingly lifted little Kṛshṇa into her arms.