श्रीनारायण कहते हैं—
नारद ! पुरातन परमेश्वर श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने पुष्पशय्यासे उठकर निद्रा में निमग्न हुई अपनी प्राणोपमा प्रियतमा श्रीराधा तत्काल ही जगाया। वस्त्रके अञ्चलसे उनके मुँहको पोंछ निर्मल करके मधुसूदनने मधुर एवं शान्त वाणीमें उनसे कहा।
श्रीकृष्ण बोले-
पवित्र मुस्कानवाली रासेश्वरि ! व्रजस्वामिनि ! क्षणभर रासमण्डलमें ही ठहरो अथवा वृन्दावनमें घूमो या गोष्ठमें ही चली जाओ। अथवा तुम रासकी अधिष्ठात्री देवी हो; इसलिये क्षणभर इस रासमण्डलमें ही रासरसका आस्वादन करो। जैसे ग्राम-ग्राममें सर्वत्र ग्रामदेवता रहते हैं, उसी तरह रासेश्वरीको रासमें सदा रहना चाहिये। अथवा सुन्दरि! तुम अपनी प्यारी सखियोंके साथ क्षणभरके लिये चन्दनवन या चम्पकवनमें घूम आओ, या यहीं रहो; मैं कुछ क्षणके लिये घरको जाऊँगा, वहाँ मुझे एक विशेष कार्य करना है; अतः प्राणवल्लभे! थोड़ी देरके लिये प्रसन्नतापूर्वक मुझको छुट्टी दे दो। तुम मेरे प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हो। तुममें ही मेरे प्राण बसते हैं। प्रिये ! प्राणी अपने प्राणोंको छोड़कर कहाँ ठहर सकता है? तुममें ही सदा मेरा मन लगा रहता है, तुमसे बढ़कर प्यारी मेरे लिये दूसरी कोई नहीं है। केवल तुम्हीं मुझे शंकरसे अधिक प्रिय हो यह सत्य है शंकर मेरे प्राण हैं; परंतु सती राधे! तुम तो प्राणोंसे भी बढ़कर हो।
यों कहकर भगवान् वहाँसे जानेको उद्यत हुए। वे सर्वज्ञ और सब कुछ सिद्ध करनेवाले हैं। सबके आत्मा, पालक और उपकारक हैं। उन्होंने अक्रूरका आगमन जानकर व्रजमें जानेका विचार किया। श्रीकृष्णका मन बँट गया है; वे अन्यत्र जानेको उत्सुक हैं; यह देख राधिका देवी व्यथित हृदयसे बोलीं।
राधिकाने कहा-
हे नाथ! हे रमण श्रेष्ठ! प्रिय लगनेवाले मेरे समस्त सम्बन्धियोंमें तुम्हीं श्रेष्ठ हो। प्राणनाथ! मैं देखती हूँ, इस समय तुम्हारा मन बँटा हुआ है। तुम्हारे चले जानेपर मेरा प्रेम और सौभाग्य सब कुछ लुट जायगा। मुझे शोकके गहरे समुद्रमें डालकर तुम कहाँ चले जा रहे हो? मैं विरहसे व्याकुल हूँ, दीन हूँ और तुम्हारी ही शरणमें आयी हूँ। अब मैं फिर घरको नहीं लौटूंगी; दूसरे वनमें चली जाऊँगी और दिन-रात 'कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण!' का गान करती रहूँगी अथवा किसी वनमें भी नहीं जाऊँगी, प्रेमके समुद्रमें प्रवेश करूँगी और मनमें केवल तुम्हारी कामना लेकर शरीरको त्याग दूँगी। जैसे आकाश, आत्मा, चन्द्रमा और सूर्य सदा साथ रहते हैं; उसी तरह तुम मेरे आँचलमें बँधकर सदा पास ही रहते और साथ-साथ घूमते हो; किंतु दीनवत्सल ! इस समय तुम मुझे निराश करके जा रहे हो! मुझ दीन एवं शरणागत अबलाको त्याग देना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवता जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते हैं; वे परमात्मा तुम हो। तुमने मायासे गोपवेष धारण कर रखा है। मैं ईर्ष्यालु नारी तुम्हें कैसे जान सकती हूँ? देव! मैंने तुम्हें पति समझकर अथवा अभिमानके कारण तुम्हारे प्रति जो दुर्नीतिपूर्ण बर्ताव तथा सहस्रों अपराध किये हैं; उन्हें क्षमा कर दो। मेरा गर्व चूर्ण हो गया और मेरे सारे मनसूबे दूर चले गये। अपने सौभाग्यको आज मैं अच्छी तरह समझ चुकी हूँ। नाथ! इसके सिवा, तुमसे और क्या कह सकती हूँ? गर्गके मुखसे तुम्हारे विषयमें सुनकर, जानकर भी मैं तुम्हारी मायासे मोहित हो गयी। इस समय प्रेमातिरेक अथवा भक्तिपाशसे बँधकर मैं तुमसे कुछ कह नहीं सकती। प्राणवल्लभ ! प्रभो! तुम्हारे बिना मुझे एक-एक क्षण सौ युगोंके समान जान पड़ता है; फिर सौ वर्षोंतक मैं किस तरह जीवन धारण कर सकूँगी ? मुने! ऐसा कहकर राधिका भूमिपर गिर पड़ीं और सहसा मूच्छित हो चेतना खो बैठीं। उन्हें मूच्छित देख कृपानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक सचेत किया और हृदयसे लगा लिया। फिर शोकहारी योगोंद्वारा उन्हें अनेक प्रकारसे समझाया तथापि शुचिस्मिता श्रीराधा शोकको त्याग न सकी। सामान्य वस्तुका बिछोह भी मनुष्योंके लिये शोकप्रद हो जाता है, फिर जहाँ देह और आत्माका बिछोह होता हो, वहाँ सुख कैसे हो सकता है? उस दिन व्रजराज श्यामसुन्दर व्रजमें नहीं लौट सके। श्रीराधाके साथ क्रीड़ा-सरोवर के तटपर गये। वहाँ उनके साथ भगवान्ने पुनः रास-क्रीड़ा की। तदनन्तर आनन्दमग्ना राधिकाजी सो गयीं।इसी समय लोकपितामह ब्रह्माजी शिव, शेष आदि देवताओं तथा मुनीन्द्रोंके साथ वहाँ आये। आकर उन्होंने धरतीपर माथा टेक प्रणाम किया और हाथ जोड़ वे उन परिपूर्णतम परमेश्वरका सामवेदोक्त स्तोत्रसे स्तवन करने लगे।
ब्रह्माजी बोले-
जगदीश्वर! आपकी जय हो, जय हो। आपके चरणोंकी सभी वन्दना करते हैं। आप निर्गुण, निराकार और स्वेच्छामय हैं। सदा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही दिव्य विग्रह धारण करते हैं और वह श्रीविग्रह नित्य है। मायासे गोपवेष धारण करनेवाले मायापते! आपकी वेश-भूषा तथा शील स्वभाव सभी सुन्दर एवं मनोहर हैं। आप शान्त तथा सबके प्राणवल्लभ हैं। स्वभावतः इन्द्रिय संयम और मनोनिग्रहसे सम्पन्न हैं। नितान्त ज्ञानानन्दस्वरूप, परात्परतर, प्रकृतिसे परे, सबके अन्तरात्मा, निर्लिप्त, साक्षिस्वरूप, व्यक्ताव्यक्तरूप, निरञ्जन, भूतलका भार उतारनेवाले, करुणासागर, शोक संतापनाशन, जरा-मृत्यु और भय आदिको हर लेनेवाले, शरणागतरक्षक, भक्तोंपर दया करनेके लिये व्याकुल रहने वाले, भक्तवत्सल, भक्तोंके संचित धन तथा सच्चिदानन्दस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। सबके अधिष्ठाता देवता तथा प्रीति प्रदान करनेवाले प्रभुको सादर नमस्कार है।इस तरह बारंबार कहते हुए ब्रह्माजी प्रेमावेशसे मूच्छित हो गये जो ब्रह्माजीद्वारा किये गये इस स्तोत्रको एकाग्रचित्त होकर सुनता है, उसके सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थोंकी सिद्धि होती है; इसमें संशय नहीं है।इस प्रकार स्तुति और बारंबार प्रणाम करके जगद्विधाता ब्रह्माजी सचेत हो धीरे-धीरे उठे और पुनः भक्तिभावसे बोले।
ब्रह्माजीने कहा-
देवदेवेश्वर! उठिये। परमानन्दकारण ! सानन्द, नित्यानन्दमय नन्दनन्दन! आपको नमस्कार है। नाथ! नन्दभवनमें पधारिये और वृन्दावनको छोड़िये सौ वर्षोंके लिये जो सुदामका शाप प्राप्त हुआ है, उसको स्मरण कीजिये। भक्तके शापको सफल बनानेके लिये प्रियाजीको उतने समयके लिये त्याग दीजिये। फिर इन्हें पाकर आप गोलोकमें पधारियेगा। देव! आप पिताके घर जाकर वहाँ आये हुए अक्रूरजीसे मिलिये वे आपके पितृव्य (चाचा), माननीय अतिथि तथा धन्यवादके योग्य सर्वसमर्थ वैष्णव हैं। भगवन् ! अब उनके साथ मधुपुरीकी यात्रा कीजिये। हरे! वहाँ शिवके धनुषको तोड़िये और शत्रुगणोंको हतोत्साह कीजिये मार भगाइये। दुरात्मा कंसका वध कीजिये और पिता-माताको सान्त्वना दीजिये। द्वारकापुरीका निर्माण कीजिये, भूतलका भार उतारिये, भगवान् शंकरकी वाराणसीपुरीको दग्ध कीजिये और इन्द्रके भवनपर भी धावा बोलिये। युद्धमें शिवजीको जृम्भास्त्र जृम्भित करके बाणासुरकी भुजाओंको काटिये। नाथ! इससे पहले आपको रुक्मिणीका हरण, नरकासुरका वध तथा सोलह हजार राजकुमारियोंका पाणिग्रहण करना है। व्रजेश्वर! अब इन प्राणतुल्या प्रियतमाको छोड़िये और व्रजमें चलिये उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो। जबतक राधाकी नींद नहीं टूटती है; तभीतक चल दीजिये। इतना कहकर ब्रह्माजी इन्द्र आदि देवताओंके साथ ब्रह्मलोकको चले गये। साथ ही शेषनाग तथा शंकरजी भी अपने स्थानको पधारे। देवताओंने श्रीकृष्णके ऊपर प्रेम और भक्तिसे पुष्प और चन्दनकी वर्षा की फिर आकाशवाणी हुई–'प्रभो! कंस वधके योग्य है; अतः उसका वध कीजिये; अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाइये और पृथ्वीके भारका निवारण कीजिये।' नारद! इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर भूतभावन भगवान् श्रीकृष्ण भगवती राधाको छोड़कर धीरे-धीरे वहाँसे उठे। बारंबार पीछेकी ओर देखते हुए श्रीहरि कुछ दूरतक गये; फिर चन्दनवनमें वासस्थानके पास ही थोड़ी देरके लिये ठहर गये। उधर राधा निद्रा त्यागकर अपनी शय्यासे उठ बैठीं और शान्त, कान्त, प्राणवल्लभ श्रीहरिको वहाँ न देख विलाप करती हुई बोलीं- 'हा नाथ! हा रमण श्रेष्ठ! हा प्राणेश्वर! हा प्राणवल्लभ ! हे प्राणचोर प्रियतम! तुम कहाँ गये?' फिर एक क्षणतक अन्वेषण करती हुई वे मालतीवनमें घूमती फिरीं। कभी क्षणभरके लिये बैठ जातीं, कभी उठ जातीं और कभी भूतलपर सो जाती थीं। कुछ क्षणोंतक अत्यन्त उच्चस्वरसे बारंबार रोदन और विलाप करती रहीं। 'हे नाथ! आओ आओ' ऐसा बारंबार कहकर वे संतापसे मूच्छित हो गयीं। विरहानलसे संतप्त हो घास- फूससे ढके हुए भूतलपर इस तरह गिरीं, मानो प्राणान्त हो गया हो।
ब्रह्मन् ! उस समय वहाँ अगणित गोपियाँ आ पहुँचीं। किन्हींके हाथोंमें चँवर थे और कोई चन्दनका अनुलेपन लिये आयी थीं। उन सबके बीच जो प्रियाली (प्यारी सखी) थी, उसने श्रीराधाको अपनी छातीसे लगा लिया। वह प्रियाजीको मरणासन्न-सी देख प्रेमसे विह्वल हो रोने लगी। उसने पङ्कके ऊपर सजल कमलदल बिछाकर उसपर श्रीराधाको सुलाया। वे चेष्टाहीन और मृतक सी जान पड़ती थीं। गोपियाँ सुन्दर श्वेत चँवर डुलाती हुई उनकी सेवामें लग गयीं। उनके अङ्गोंमें चन्दनका लेप किया। उस अवस्थामें सती राधाके वस्त्र गीले हो गये थे। इतनेमें ही श्रीकृष्ण वहाँ लौट आये और अपनी उन प्राणवल्लभाको पूर्वोक्त अवस्थामें देखा। नारद! जब वे पास आने लगे तो बलवती गोपियोंने उन्हें रोक दिया और उन्हें इस तरह पकड़कर ले आयीं, जैसे राजभय आदिसे प्रेरित हो किसी दण्डनीय अपराधीको बाँधकर लाया गया हो निकट आकर कृपानिधान श्रीकृष्णने राधाको गोदमें बिठा लिया, उन्हें सचेत किया और प्रबोधक वचनोंद्वारा समझाया। होशमें आकर देवी राधाने जब प्राणवल्लभको देखा, तब वे सुस्थिर हो गयीं और उन्होंने विरह-ज्वरको त्याग दिया। उस समय राधाकी चतुर सखी रत्नमालाने जो सबके द्वारा सम्मानित थी, श्रीकृष्णसे नीतिका सारभूत परम उत्तम मधुर वचन कहा।
रत्नमाला बोली-
श्रीकृष्ण! सुनो। मैं ऐसी बात बताती हूँ, जो परिणाममें सुख देनेवाली, हितकारक, सत्य, नीतिका सारभूत तथा पति पत्नीमें प्रीति बढ़ानेवाली है। वह नीतिसम्मत, वेदों और पुराणोंद्वारा अनुमोदित, लोक व्यवहार में प्रशंसनीय तथा उत्तम यशकी प्राप्ति करानेवाली है। नारियोंको जैसे माता प्यारी होती है, उसी तरह बन्धुजनोंमें भाई प्रिय होता है। भाईसे प्रिय पुत्र और पुत्रसे प्रिय पति होता है। साध्वी स्त्रियोंके लिये सत्पुरुषोंद्वारा समादृत स्वामी सौ पुत्रोंसे भी अधिक प्रिय होता है। रसिका और चतुरा स्त्रियोंके लिये पतिसे बढ़कर प्यारा दूसरा कोई नहीं है। इस मिथ्या संसारमें पति-पत्नीकी परस्पर प्रीति, समता तथा प्रेम सौभाग्य परम अभीष्ट है जिस-जिस घरमें पति-पत्नी एक दूसरेके प्रति समभाव नहीं रखते, वहीं दरिद्रताका निवास है। वहाँ उन दोनोंका जीवन निष्फल है (दम्पत्योः समता नास्ति यत्र यत्र हि मन्दिरे अलक्ष्मीस्तत्र तत्रैव विफलं जीवनं तयोः ॥ (६९।६४))। स्त्रीके लिये स्वामीसे मतभेद या फूट होना महान् दुःखकी बात है। वैसा जीवन शोक और संतापका बीज तथा मरणसे भी अधिक कष्टदायक है। सोते और जागते समय भी स्त्रियोंके प्राण पतिमें ही बसते हैं। पति ही इहलोक और परलोकमें स्त्रीका गुरु है। नाथ! ज्यों ही आप यहाँसे गये त्यों ही राधाको मूर्च्छा आ गयी। ये सहसा घाससे ढकी हुई भूमिपर गिर पड़ीं। उस समय मैंने इनके मुँहपर उत्तम शीतल जलका छींटा दिया, तब इनकी साँस चलने लगी और कुछ-कुछ चेतना आयी। मेरी सखी क्षण-क्षणमें पुकार उठती थीं—'हे नाथ! हे कृष्ण!' फिर दूसरे ही क्षण संतप्त हो रोने लगतीं और तत्काल मूच्छित हो जाती थीं। राधिकाका शरीर विरहाग्निसे संतप्त हो तपायी हुई लोहेकी छड़ीके समान अग्नितुल्य हो गया था; इसे छूआ नहीं जाता था। राधाके लिये सोने और जागनेमें, दिन और रातमें, घर और वनमें, जल, थल और आकाशमें तथा चन्द्रोदय और सूर्योदयमें कोई भेद नहीं रह गया है। इनकी आकृति मृतकतुल्य एवं जडवत् हो गयी है। ये एक ही स्थानपर रहकर सदा सम्पूर्ण जगत्को विष्णुमय देखती हैं। चिकने पङ्कपर कमलोंके सजल पत्र बिछाकर जो शय्या तैयार की गयी थी; उसपर ये आपके लिये विरहातुर होकर सोयी थीं। प्यारी सखियाँ निरन्तर श्वेत चँवर डुलाकर सेवा करने लगीं। इनके अङ्गोंपर चन्दनमिश्रित जल छिड़का गया। इनके सारे वस्त्र गीले हो गये, तथापि राधाके अङ्गका स्पर्श होनेमात्रसे वहाँका सारा पङ्क सूख गया। स्निग्ध कमलदल तत्क्षण जलकर भस्म हो गये। चन्दन सूख गया। राधाका चम्पाके समान कान्तिमान् सुनहरा वर्ण केशके रंगकी भाँति काला पड़ गया। सिन्दूरके सुन्दर बिन्दु तत्काल श्याम हो गये। वेश-भूषा, विलास, लीला एवं क्रीड़ा छूट गयी। कमलाकान्त कृष्ण! यदि आप शीघ्र लौटकर नहीं आयेंगे तो आपके वियोगमें मेरी सखी निश्चय ही अपने प्राणोंका परित्याग कर देगी। अतः नीतिविशारद श्रीकृष्ण! आप मन ही मन विचारकर जो उचित हो वह करें, जिससे आपके प्रति अनुरक्त अबलाकी हत्या न हो रत्नमालाकी यह बात सुनकर माधव हँस पड़े और हितकर, सत्य, नीतिसार एवं परिणाम में सुखद वचन बोले।
श्रीभगवान् ने कहा-
प्रिये रत्ने! यद्यपि मैं ईश्वर हूँ और मिलनमें बाधा डालनेवाले शापका खण्डन कर सकता हूँ, तथापि ऐसा करना मेरे लिये उचित नहीं है। मैं नियतिके नियमको बदला नहीं करता हूँ। समस्त ब्रह्माण्डोंमें मैंने जो मर्यादा स्थापित की है, उसीका सहारा लेकर देवता मुनि और मनुष्य कर्म करते हैं (फिर उसको मैं ही कैसे तोड़ दूँ)। सुन्दरि सुदाम शापसे हम दोनों दम्पतिको परस्पर जो कुछ समयके लिये वियोग प्राप्त होनेवाला है, वह यद्यपि हमें अभीष्ट नहीं है, तथापि होकर ही रहेगा। सुमध्यमे मैं राधाको वर देता हूँ। उस वरके अनुसार जाग्रत् अवस्थामें ही इन्हें मुझसे वियोगका अनुभव होगा; परंतु स्वप्रमें राधाको निरन्तर मेरा आलिङ्गन प्राप्त होता रहेगा। मैंने प्रियाजीको अध्यात्मकी बुद्धि प्रदान की है। उससे इनका शोक मिट जायगा। रत्नमाले! तुम्हारा कल्याण हो तुम राधाको समझाओ अब मैं नन्दभवनको जा रहा हूँ। नारद! यों कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण नन्दभवनकी ओर चल दिये और सखियाँ राधाको समझाने लगीं। घर जाकर श्यामसुन्दरने माता पिताको प्रणाम किया। माताने उन्हें गोदमें बिठा लिया और तुरंतका तैयार किया हुआ माखन खिलाया। फिर शीतल जल पीकर उन्होंने माताका दिया हुआ पान खाया और वहीं माँके समीप बैठे रहे। समस्त गोपसमूह श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगे। उन्होंने भी श्यामसुन्दरको प्रसन्नतापूर्वक हार, चन्दन और ताम्बूल दिये। (अध्याय ६८-६९)
Summary of chapter 74 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
Unveiling the confidential glory of the divine feminine, Maharshi Nārada revealed the transcendent stotra and holy names of Goddess Śrī Rādhā. He explained that the name Rādhā is derived from the power to bestow supreme devotion, where the syllable Rā bestows spiritual perfection and Dhā leads the soul directly to the lotus feet of Śrī Kṛshṇa. Chanting Her divine name with tears of love pleases Lord Śrī Kṛshṇa more than thousands of Vedic sacrifices, as She is the soul of His soul and the living personification of His supreme pleasure potency.