श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - श्री कृष्ण जनन खंड

20- मोहवश श्रीहरिके प्रभावको जाननेके लिये ब्रह्माजीके द्वारा गौओं, बछड़ों और बालकोंका अपहरण, श्रीकृष्णद्वारा उन सबकी नूतन सृष्टि, ब्रह्माजीका श्रीहरिके पास आना, सबको श्रीकृष्णमय देख उनकी स्तुति करके पहलेके गौओं आदिको वापस देकर अपने लोकको जाना तथा श्रीकृष्णका घरको पधारना

भगवान् श्रीनारायण कहते हैं-

नारद ! एक दिन बलरामसहित माधव खा-पीकर चन्दन आदिसे चर्चित हो ग्वालबालोंके साथ वृन्दावन में गये। वहाँ भगवान् कौतूहलवश उन ग्वाल बालोंके साथ क्रीडा करने लगे। इधर ग्वाल बालोंका मन खेलमें लगा हुआ था, उधर उन सबकी गाँएँ बहुत दूर निकल गयीं। उस समय लोकनाथ ब्रह्मा श्रीकृष्णका प्रभाव जाननेके लिये समस्त गौओं, बछड़ों और ग्वालबालोंको भी चुरा ले गये। उनका अभिप्राय जान सर्वज्ञ एवं सर्वस्स्रष्टा योगीन्द्र श्रीहरिने योगमायासे पुनः उन सबकी सृष्टि कर ली। दिनभर गौएँ चराकर क्रीडाकौतुकमें मन लगानेवाले श्रीहरि संध्या बलराम और ग्वालबालोंके साथ घर गये। इस प्रकार एक वर्षतक भगवान्ने ऐसा ही किया। वे प्रतिदिन गौओं, ग्वालबालों तथा बलरामजीके साथ यमुनातटपर आते और संध्याके समय घरको लौट जाते थे। भगवान्‌के इस प्रभावको जानकर ब्रह्माजीका मस्तक लज्जासे झुक गया। वे भाण्डीर वटके नीचे जहाँ श्रीहरि बैठे हुए थे, आये उन्होंने ग्वालबालोंसे घिरे हुए श्रीकृष्णको वहीं देखा, मानो नक्षत्रों के साथ पूर्णिमाके चन्द्रदेव प्रकाशित हो रहे हों। गोविन्द रत्नमय सिंहासनपर बैठे थे और सानन्द मन्द-मन्द हँस रहे थे। उनके श्रीअङ्गों में पीताम्बरका परिधान शोभा पा रहा था। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान थे। उनकी बाँहों में रत्नोंके बने हुए बाजूबंद, कलाईमें रत्नोंके कंगन तथा पैरोंमें रत्नमय मञ्जीर शोभा दे रहे थे। दो रत्ननिर्मित कुण्डलोंकी प्रभासे उनके गण्डस्थल अत्यन्त उद्दीप्त हो रहे थे। श्यामसुन्दरका श्रीविग्रह करोड़ों कन्दपकी लावण्यलीलाका धाम था। वे मनको मोहे लेते थे। उनके श्रीअङ्ग चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुङ्कुमसे चर्चित थे। वे पारिजातपुष्पोंकी मालाओंसे विभूषित थे। उनकी अङ्गकान्ति नूतन जलधरकी श्याम शोभाको लज्जित कर रही थी। शरीरमें नूतन यौवनका अङ्कुर प्रस्फुटित हो रहा था। मस्तकपर मोरपंखका मुकुट और उसमें मालतीकी मालाओंका संयोग बड़ा मनोहर जान पड़ता था। अपने अङ्गोंकी सौन्दर्यमयी दीप्सिसे वे आभूषणोंको भी भूषित कर रहे थे। शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी प्रभाको लूट लेनेवाले मुखकी कान्तिसे वे परम सुन्दर प्रतीत होते थे। ओठ पके बिम्बाफलकी लालीको लजा रहे थे। नुकीली नासिका पक्षिराज गरुड़की चोंचको तिरस्कृत करती थी। नेत्र शरत्कालके मध्याह्नमें खिले हुए कमलोंकी शोभाको छीने लेते थे। मुक्तापङ्क्तियोंकी शोभाको निन्दित करनेवाली दन्तपङ्क्तिसे उनके मुखकी मनोहरता बढ़ गयी थी। मणिराज कौस्तुभकी दिव्य दीप्तिसे वक्षःस्थल उद्भासित हो रहा था। उन परिपूर्णतम शान्तस्वरूप परमेश्वर राधाकान्तको देखकर ब्रह्माजीने अत्यन्त विस्मित होकर प्रणाम किया। वे बार-बार उन्हें

देखने और प्रणाम करने लगे। उन्होंने अपने हृदयकमलमें जिस रूपको देखा था, वही उन्हें बाहर भी दिखायी दिया जो मूर्ति सामने थी, वही पीछे और अगल-बगलमें भी दृष्टिगोचर हुई। मुने! वहाँ वृन्दावनमें सब कुछ श्रीकृष्णके ही तुल्य देख जगद्गुरु ब्रह्मा उसी रूपका ध्यान करते हुए वहाँ बैठ गये। गौएँ, बछड़े, बालक, लता, गुल्म और वीरुध आदि सारा वृन्दावन ब्रह्माजीको श्यामसुन्दरके ही रूपमें दिखायी दिया। यह परम आश्चर्य देखकर ब्रह्माजीने फिर ध्यान लगाया। अब उन्हें सारी त्रिलोकी श्रीकृष्ण के सिवा और कुछ भी नहीं दिखायी दी। कहाँ गये वृक्ष ? कहाँ हैं पर्वत ? कहाँ गयी पृथ्वी ? कहाँ हैं समुद्र ? कहाँ देवता? कहाँ गन्धर्व ? कहाँ मुनीन्द्र और मानव ? कहाँ आत्मा? कहाँ जगत्का बीज तथा कहाँ स्वर्ग और गौएँ हैं? श्रीहरिकी मायासे ब्रह्माजीने सब कुछ अपनी आँखोंसे देखा और सबको कृष्णमय पाया। कहाँ जगदीश्वर श्रीकृष्ण और कहाँ मायाकी विभूतियाँ ? सबको श्रीकृष्णमय देखकर ब्रह्माजी कुछ भी बोलनेमें असमर्थ हो गये- किस तरह स्तुति करूँ? क्या करूँ? इस प्रकार मन-ही मन विचार करके जगद्धाता ब्रह्मा वहीं बैठकर जप करनेको उद्यत हुए। उन्होंने सुखपूर्वक योगासन लगाकर दोनों हाथ जोड़ लिये। उनके सारे अङ्ग पुलकित हो गये। नेत्रोंसे अश्रुधारा बहने लगी और वे अत्यन्त दीनके समान हो गये।

तदनन्तर उन्होंने इडा, सुषुम्णा, मध्या, पिङ्गला, नलिनी और धुरा- इन छः नाड़ियोंको प्रयत्नपूर्वक योगद्वारा निबद्ध किया। तत्पश्चात् मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा- इन छः चक्रोंको निबद्ध किया। फिर कुण्डलिनीद्वारा एक-एक चक्रका लङ्घन कराते हुए क्रमश: छहों चक्रोंका भेदन करके विधाता उसे ब्रह्मरन्ध्रमें ले आये। तदनन्तर उन्होंने ब्रह्मरन्ध्रको वायुसे पूर्ण किया। प्राणवायुको वहाँ निबद्ध करके पुनः उसे क्रमशः हृदयकमलमें मध्या नाड़ीके पास ले आये। उस वायुको घुमाकर विधाताने मध्या नाड़ीके साथ संयुक्त कर दिया। ऐसा करके वे निष्पन्द (निश्चल) हो गये और पूर्वकालमें श्रीहरिने जिसका उपदेश दिया था, उस परम उत्तम दशाक्षर मन्त्रका जप करने लगे। मुने! श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका ध्यान करते हुए एक मुहूर्ततक जप करनेके पश्चात् ब्रह्माने अपने हृदयकमलमें उनके सर्वतेजोमय स्वरूपको देखा। उस तेजके भीतर अत्यन्त मनोरम रूप था, दो भुजाएँ, हाथमें मुरली और पीताम्बरभूषित श्रीअङ्ग कानोंके मूलभागमें पहने गये मकराकृति कुण्डल अपनी उज्वल आभा बिखेर रहे थे। प्रसन्न मुखारविन्दपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। भगवान् भक्तपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। ब्रह्माजीने ब्रह्मरन्ध्रमें जिस रूपको देखा और हृदयकमलमें जिसकी झाँकी की, वही रूप बाहर भी दृष्टिगोचर हुआ। वह परम आश्चर्य देखकर उन्होंने उन परमेश्वरकी स्तुति की। मुने! पूर्वकालमें एकार्णवके जलमें शयन करनेवाले श्रीहरिने ब्रह्माजीको जिस स्तोत्रका उपदेश दिया था, उसीके द्वारा विधाताने भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर उन परमेश्वरका विधिवत् स्तवन किया।

ब्रह्माजी बोले-

जो सर्वस्वरूप, सर्वेश्वर, समस्त कारणोंके भी कारण तथा सबके लिये अनिर्वचनीय हैं; उन कल्याणस्वरूप श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ जिनका श्रीविग्रह नवीन मेघमालाके समान श्याम एवं सुन्दर है, जो सम्पूर्ण जीवोंमें स्थित रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होते, जो साक्षीस्वरूप हैं, स्वात्माराम, पूर्णकाम, विश्वव्यापी, विश्वसे परे, सर्वस्वरूप, सबके बीजरूप और सनातन हैं; जो सर्वाधार, सबमें विचरनेवाले, सर्वशक्तिसम्पन्न, सर्वाराध्य, सर्वगुरु तथा सर्वमङ्गलकारण हैं। सम्पूर्ण मन्त्र जिनके स्वरूप हैं, जो समस्त सम्पदाओंकी प्राप्ति करानेवाले और श्रेष्ठ हैं, जिनमें शक्तिका संयोग और वियोग भी

है; उन स्वेच्छामय प्रभुकी मैं स्तुति करता हूँ। जो शक्ति के स्वामी, शक्तिके बीज, शक्तिरूपधारी तथा घोर संसारसागरमें शक्तिमयी नौकासे युक्त हैं; उन भक्तवत्सल कृपालु कर्णधारको मैं नमस्कार करता हूँ जो आत्मस्वरूप, एकान्तमय, लिप्त, निर्लिप्त, सगुण और निर्गुण ब्रह्म हैं; उन स्वेच्छामय परमात्माको मैं स्तुति करता हूँ। जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके अधिदेवता, आवासस्थान और सर्वेन्द्रिय स्वरूप हैं; उन विराट् परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो वेद, वेदोंके जनक तथा सर्ववेदाङ्गस्वरूप हैं; उन सर्वमन्त्रमय परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सारसे सारतर द्रव्य, अपूर्व, अनिर्वचनीय, स्वतन्त्र और अस्वतन्त्र हैं; उन यशोदानन्दनका मैं भजन करता हूँ। जो सम्पूर्ण शरीरों में शान्तरूपसे विद्यमान हैं, किसीके दृष्टिपथमें नहीं आते, तर्कके अविषय हैं, ध्यानसे वशमें होनेवाले नहीं हैं तथा नित्य विद्यमान हैं; उन योगीन्द्रोंके भी गुरु गोविन्दका मैं भजन करता हूँ। जो रासमण्डलके मध्यभागमें विराजमान होते हैं, रासोल्लासके लिये सदा उत्सुक रहते हैं। तथा गोपाङ्गनाएँ सदा जिनकी सेवा करती हैं; उन राधावल्लभको मैं नमस्कार करता हूँ। जो साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें सदैव सत् और असाधु पुरुषोंके मतमें सदा ही असत् हैं, भगवान् शिव जिनकी सेवा करते हैं; उन योगसाध्य योगीश्वर श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ जो मन्त्रबीज, मन्त्रराज, मन्त्रदाता, फलदाता, फलरूप, मन्त्रसिद्धिस्वरूप तथा परात्पर हैं; उन श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सुख-दुःख, सुखद-दुःखद, पुण्य, पुण्यदायक, शुभद और शुभ बीज हैं; उन परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। इस प्रकार स्तुति करके ब्रह्माजीने गौओं और बालकोंको लौटा दिया तथा पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर रोते हुए प्रणाम किया। मुने! तदनन्तर जगत्स्स्रष्टाने आँखें खोलकर श्रीहरिके दर्शन किये। जो ब्रह्माजीके द्वारा किये गये इस स्तोत्रका प्रतिदिन भक्तिभावसे पाठ करता है, वह इहलोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके धाममें जाता है। वहाँ उसे अनुपम दास्यसुख तथा उन परमेश्वरके निकट स्थान प्राप्त होता है। श्रीकृष्णका सांनिध्य पाकर वह पार्षदशिरोमणि बन जाता है।

भगवान् नारायण कहते हैं-

तदनन्तर जगत् विधाता ब्रह्मा जब ब्रह्मलोकमें चले गये, तब भगवान् श्रीकृष्ण ग्वालबालोंके साथ अपने घरको गये। उस दिन गौओं, बछड़ों और ग्वालबालोंने एक वर्षके बाद अपने घरपर पदार्पण किया था; किंतु श्रीकृष्णकी मायासे उन सबने उस एक वर्षके अन्तरको एक दिनका ही अन्तर समझा। गोप और गोपियाँ उस समय कुछ भी अनुमान न लगा सकीं। (पहलेके मायारचित बालकों में और आजके वास्तविक बालकोंमें उन्हें कोई अन्तर नहीं जान पड़ा।) योगीके लिये तो क्या नया और क्या पुराना सारा जगत् कृत्रिम ही है। इस प्रकार श्रीकृष्णका यह सारा शुभ चरित्र कहा गया जो सुखद, मोक्षप्रद, पुण्यमय तथा सर्वकालमें सुख देनेवाला है। (अध्याय २०)