श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - श्री कृष्ण जनन खंड

31- ब्रह्माजीका मोहिनीके शापसे अपूज्य होना, इस शापके निवारणके लिये उनका वैकुण्ठधाममें जाना और वहाँ अन्यान्य ब्रह्माओं के दर्शनसे उनके अभिमानका दूर होना

तदनन्तर श्रीराधिकाने पूछा-

श्यामसुन्दर ! ब्रह्माजीको क्यों और किससे शाप प्राप्त हुआ था ?

श्रीकृष्ण बोले-

प्रिये ! एक बार मोहिनीने ब्रह्माजीसे मिलनकी प्रार्थना की बहुत समयतक उसका इसके लिये प्रयास चलता रहा; परंतु ब्रह्माजीने उसके उस प्रस्तावको ठुकरा दिया और एक दिन मुनियोंके सामने मोहिनीका उपहास किया। इससे मोहिनी कुपित हो उठी और शाप देती हुई बोली- 'ब्रह्मन्! मैं आपकी दासी समान हूँ, विनयशील हूँ और दैववश आपकी शरणमें आयी हूँ तो भी आप घमंडमें आकर मेरी हँसी उड़ा रहे हैं; अतः सुदीर्घ कालके लिये आप अपूजनीय हो जायँ स्वयं भगवान् श्रीहरि शीघ्र ही आपके दर्पका दलन करेंगे। अन्य देवताओंकी प्रत्येक युगमें वार्षिक पूजा होगी; किंतु आपकी नहीं होगी। इस कल्पमें या कल्पान्तरमें, इस देहमें अथवा देहान्तरमें फिर आपकी पूजा नहीं होगी। अबतक जो हो गयी, सो हो गयी।' यों कहकर मोहिनी शीघ्र ही कामलोकमें गयी और पुनः सचेत होनेपर अपने कुकृत्यको याद करके विलाप करने लगी। जगद्विधाता ब्रह्मा मोहिनीका शाप सुनकर काँप उठे। उनका मस्तक झुक गया। उस समय कल्याणकारी मुनियोंने उन्हें एक उपाय बताया- 'आप भगवान् वैकुण्ठनाथकी शरणमें जाइये।' ऐसा कहकर वे ऋषि-मुनि अपने-अपने आश्रमोंको चले गये। तत्पश्चात् ब्रह्माजी मेरे ही दूसरे स्वरूप परम शान्त कमलाकान्त श्यामवर्ण भगवान् नारायणकी शरण में गये। वहाँ जा खिन्नवदन हो चार भुजाधारी श्रीहरिको प्रणाम करके वे जगत्स्स्रष्टा ब्रह्मा उनके पास ही बैठे। उन्होंने विपत्तिसे उबारनेवाले, दयासिन्धु दीनबन्धु भगवान्से अपने आगमनका रहस्य बताया। वह सारा रहस्य सुनकर भगवान् विष्णु हँसते हुए बोले।

श्रीनारायणने कहा-

लोकनाथ! क्षणभर ठहरो। इसी बीचमें कोई शीघ्रगामी द्वारपाल श्रीहरिके सामने आया और उन्हें प्रणाम करके बोला 'भगवन्! दूसरे किसी ब्रह्माण्डके अधिपति दशमुख ब्रह्मा स्वयं पधारकर द्वारपर खड़े हैं। वे आपके महान् भक्त हैं और आपका दर्शन करनेके लिये ही आये हैं।' द्वारपालकी यह बात सुनकर भगवान् नारायणने उक्त ब्रह्माको भीतर बुला लानेके लिये उसे अनुमति दे दी। द्वारपालकी आज्ञासे ब्रह्माने भीतर आकर भक्तिभावसे भगवान्की स्तुति की। उन्होंने ऐसे-ऐसे अति विचित्र स्तोत्र सुनाये, जो चतुर्मुख ब्रह्माने कभी नहीं सुने थे। स्तुति करके भगवान् विष्णुकी आज्ञा पाकर वे चतुर्मुख ब्रह्माको पीछे करके बैठे। तदनन्तर भगवान् नारायणने अपने चार भुजाधारी द्वारपालोंसे कहा— 'जो कोई भी आगन्तुक सज्जन हों, उन्हें आदरपूर्वक भीतर ले आओ।' वृन्दावनविनोदिनि! इसी समय वहाँ अत्यन्त विनीतभावसे स्वयं शतमुख ब्रह्माका आगमन हुआ। उन्होंने भी अत्यन्त सुन्दर दिव्य स्तोत्रों द्वारा गूढ़भावसे भगवान्‌का स्तवन किया। उनके मुखसे निकले हुए श्रेष्ठ स्तोत्र सभीके लिये अश्रुतपूर्व (सर्वथा नवीन) थे। वे भी स्तुतिके पश्चात् भगवान्की आज्ञा पाकर पहलेके आये हुए दोनों ब्रह्माओंके आगे बैठ गये। इसके बाद दूसरे किसी ब्रह्माण्डके अधिपति सहस्रमुख ब्रह्मा श्रीहरिके सामने उपस्थित हुए। उन्होंने भी भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर किसीके द्वारा भी अबतक नहीं सुने गये उत्तम स्तोत्रोंसे भगवान्की स्तुति की। तत्पश्चात् वे भी आज्ञा पाकर सबसे आगे बैठे। उनसे श्रीहरिने समस्त ब्रह्माण्डोंके ब्रह्माओंका और उनके राज्यमें रहनेवाले देवताओंका क्रमशः कुशल- समाचार पूछा। उन सब ब्रह्माओंको देखकर अपनेको विष्णु-तुल्य माननेवाले चतुर्मुख ब्रह्माका घमंड चूर-चूर हो गया। इसके बाद श्रीहरिने विभिन्न ब्रह्माण्डोंमें रहनेवाले अन्यान्य ब्रह्माओंके भी दर्शन कराये। उन्हें देखकर चतुर्मुख ब्रह्मा मृतक तुल्य हो गये। उस समय भगवान्ने कहा- 'मुझ नारायणके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने ही ब्रह्माण्ड और उनके उतने ही ब्रह्मा विद्यमान हैं।' यह सुनकर वे सभी आगन्तुक ब्रह्मा नारायणको प्रणाम करके शीघ्र ही अपने- अपने स्थानको चले गये। चतुर्मुख ब्रह्माने अपनेको अत्यन्त छोटा तथा अल्प राज्यका अधिपति माना। लज्जासे उनका सिर झुक गया और वे भगवान् विष्णुके चरणोंमें पड़ गये। तब भगवान्ने उनसे पूछा- 'ब्रह्मन्! बोलो, इस समय तुमने स्वप्रकी भाँति यह क्या देखा है।' उनका प्रश्न सुनकर ब्रह्मा बोले- 'प्रभो! भूत, वर्तमान और भविष्य - सारा जगत् आपकी मायासे ही उत्पन्न हुआ है। यों कह चतुर्भुज ब्रह्मा वैकुण्ठकी सभामें लज्जाका अनुभव करते हुए चुप हो गये। तब सर्वान्तर्यामी भगवान् श्रीहरिने उनके शाप निवारणका उपाय किया। (अध्याय ३१-३३)