श्रीनारायण कहते हैं -
नारद ! जब वायुसे सुवासित, चन्दननिर्मित और फूलोंसे बिछी हुई शय्यापर राधिकाजी सो गयीं तथा गोपिकाएँ भी गाढ़ निद्रामें निमग्न हो गयीं, तब रातमें तीसरे पहरके बीत जानेपर शुभ बेलामें शुभ नक्षत्र से चन्द्रमाका संयोग होनेपर अमृतयोगसे युक्त लग्न आया। लग्नके स्वामी शुभ ग्रहोंमेंसे कोई एक अथवा बुध थे। उस लग्नपर शुभ ग्रहोंकी दृष्टि थी। पापग्रहोंके संयोगसे जो दुर्योग या दोष आदि प्राप्त होते हैं, उनका उस लग्नमें सर्वथा अभाव था। ऐसे समयमें श्रीहरिने स्वयं उठकर माता यशोदाको जगाया, मङ्गल कृत्य करवाया और बन्धुजनों को आश्वासन दिया। जो विश्व ब्रह्माण्डके स्वतन्त्र कर्ता और स्वतन्त्र पालक हैं, उन्हीं भगवान्ने राधिकाजीके भयसे भीत से होकर बाजा बजानेकी मनाही कर दी। वे दोनों पैर धोकर दो शुद्ध वस्त्र धारण करके चन्दन आदिसे लिपे हुए शुद्ध स्थानमें बैठे। उनके वामभागमें चन्दन आदिसे सुसज्जित तथा फल और पल्लवसे युक्त भरा हुआ कलश रखा गया। दाहिने भागमें प्रज्वलित अग्नि तथा ब्राह्मणदेवता उपस्थित हुए सामने पति पुत्रवती सती साध्वी स्त्री, प्रज्वलित दीपक और दर्पण प्रस्तुत किये गये। पुरोहितजीने सुस्निग्ध दूर्वाकाण्ड, श्वेत पुष्प तथा शुभसूचक श्वेत धान्य श्यामसुन्दरके हाथमें दिये। उन सबको लेकर उन्होंने मस्तकपर रख लिया। तत्पश्चात् श्रीहरिने घी, मधु, चाँदी, सोना और दहीके दर्शन किये। ललाटमें चन्दनका लेप करके गलेमें पुष्पमाला धारण की । गुरुजनों तथा ब्राह्मणके चरणोंमें भक्तिभावसे मस्तक झुकाया और शङ्खध्वनि, वेदपाठ, संगीत, मङ्गलाष्टक एवं ब्राह्मणके मनोहर आशीर्वाद बड़े आदरके साथ सुने। सर्वत्र मङ्गल प्रदान करनेवाले अपने ही मङ्गलमय स्वरूपका ध्यान करके उन्होंने परम सुन्दर दाहिने पैरको आगे बढ़ाया नासिकाके वामभागसे वायुको भीतर भरकर भगवान्ने मध्यमा अंगुलिसे वामरन्ध्रको दबाया और नाकके दाहिने छिद्रसे उस वायुको बाहर निकाल दिया। तत्पश्चात् नन्दनन्दन नन्दके श्रेष्ठ प्राङ्गणमें सानन्द आये। वे परमानन्दमय, नित्यानन्दस्वरूप तथा सनातन हैं। नित्य-अनित्य सब उन्हींके रूप हैं। वे नित्यबीजस्वरूप, नित्यविग्रह, नित्याङ्गभूत, नित्येश तथा नित्यकृत्यविशारद हैं। उनके रूप, यौवन, वेश-भूषा तथा किशोर अवस्था - सभी नित्य नूतन हैं। उनके सम्भाषण, प्रेम-प्राप्ति, सौभाग्य, सुधा रससे सराबोर मीठे वचन, भोजन तथा पद भी नित्य नवीन हैं। इस अत्यन्त रमणीय प्राङ्गणमें खड़े खड़े मायायुक्त मायेश्वर अत्यन्त स्नेहमें डूब गये। तत्पश्चात् वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए। केलेके सुन्दर खम्भों और रेशमी डोरेमें गुँथे हुए आम्र-पल्लवोंकी बन्दनवारोंसे उस आँगनको सजाया गया था। विश्वकर्माने उसकी फर्शमें पद्मराग मणि जड़ दी थी। कस्तूरी, केसर और चन्दनसे उसका संस्कार किया गया था। अक्रूर तथा बान्धवजनोंसहित श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ थोड़ी देर खड़े रहे। यशोदाने बायीं ओरसे और आनन्दयुक्त नन्दने दाहिनी ओरसे आकर अपने लालाको हृदयसे लगा लिया। बन्धु बान्धवोंने उनसे प्रेमभरी बातें कीं तथा मैया और बाबाने लालाका मुँह चूमा।
मुने! तदनन्तर श्रीकृष्ण गुरुजनोंको नमस्कार करके आँगनसे बाहर निकले और स्वर्गीय रथपर आरूढ़ हो सुन्दर मथुरापुरीकी ओर चल दिये। मथुरा अपनी शोभासे इन्द्रकी अमरावतीपुरीको परास्त करके अत्यन्त मनोहर दिखायी देती थी। श्रीकृष्णने अक्रूर तथा सखाओंके साथ उस रमणीय नगरीमें प्रवेश किया। श्रेष्ठ रत्नोंसे खचित और विश्वकर्माद्वारा रचित मथुरापुरी सुन्दर बहुमूल्य रत्ननिर्मित कलशोंसे सुशोभित थी। सैकड़ों सुन्दर श्रेष्ठ और अभीष्ट राजमार्गोंसे वह नगरी घिरी हुई थी। वे राजमार्ग चन्द्रकान्त मणियोंके सारभागसे जटित होनेके कारण चन्द्रमाके समान ही प्रकाशित होते थे। वहाँ विचित्र मणियोंके सारतत्त्वसे शत-शत वीथियोंका निर्माण किया गया था। पुण्य वस्तुओंके संचयसे सम्पन्न श्रेष्ठ व्यवसायी अपनी दूकानोंसे उन राजमार्गोंकी शोभा बढ़ाते थे। पुरीके चारों ओर सहस्रों सरोवर शोभा दे रहे थे, जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल तथा पद्मरागमणियोंकी दीप्तिसे देदीप्यमान थे। रत्नमय अलंकारों एवं आभूषणोंसे विभूषित पद्मिनी जातिकी श्रेष्ठ सुन्दरियोंसे वह नगरी शोभायमान थी। वे सब सुन्दरियाँ सुस्थिर यौवनसे युक्त थीं और श्रीकृष्ण-दर्शनकी लालसासे मुँह ऊपर उठाये अपलक नेत्रोंसे राजमार्गकी ओर देख रही थीं। उनके हाथोंमें अक्षतपुञ्ज थे। असंख्य रत्ननिर्मित रथ पुरीकी शोभा बढ़ाते थे। अनेक प्रकारके विचित्र भूषणोंसे उन रथों को विभूषित एवं चित्रित किया गया था। बहुत-से पुष्पोद्यान, जो भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे भरे थे और जिनमें भ्रमर रसास्वादन करते थे, मथुरापुरीकी श्रेयोवृद्धि कर रहे थे। माधुर्य मधुसे युक्त, मधुलोभी तथा मधुमत्त मधुकर मधुकरियोंके समूहसे संयुक्त हो उन उद्यानोंमें आनन्दका अनुभव कर रहे थे। नगरके चारों ओर अनेक प्रकारके दुर्ग थे, जिनके कारण शत्रुओंका वहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन था। रक्षाशास्त्र - विशारद रक्षकोंसे वह पुरी सदा सुरक्षित थी। विश्वकर्माद्वारा श्रेष्ठ एवं विचित्र रत्नोंसे रचित अगणित अट्टालिकाओंसे संयुक्त मथुरानगरी बड़ी मनोहर जान पड़ती थी।
इस प्रकार मथुरापुरीकी शोभा देख आगे बढ़ते हुए कमलनयन श्रीकृष्णने मार्गमें कुब्जाको देखा, जो अत्यन्त जराजीर्ण एवं वृद्धा-सी थी । डंडेके सहारे चलती थी। अत्यन्त झुकी हुई थी और झुर्रियाँ लटक रही थीं। उसकी आकृति रूखी और विकृत थी। वह कस्तूरी और केसर मिला हुआ चन्दनका अनुलेपन लिये आ रही थी, जिसके स्पर्शमात्रसे शरीर सुगन्धित, सुस्निग्ध तथा अत्यन्त मनोहर हो जाता था। उस वृद्धाने शान्त,
ऐश्वर्ययुक्त, श्रीसम्पन्न, श्रीनिवास, श्रीबीज एवं श्रीनिकेतन श्यामसुन्दर श्रीवल्लभको मन्द मुस्कानके साथ देखा। देखते ही उसके दोनों हाथ जुड़ गये। वह भक्तिसे विनीत हो गयी और सहसा चरणोंमें सिर रखकर उसने प्रणाम किया। साथ ही उनके श्याम मनोहर अङ्गमें चन्दन लगाया। श्रीकृष्णके जो सखा थे, उनके अङ्गोंमें भी चन्दनका अनुलेपन किया। फिर चन्दनका सुवर्णमय पात्र हाथमें लिये श्रेष्ठ दासीने बारंबार परिक्रमा करके श्रीकृष्णको प्रणाम किया। श्रीकृष्णकी दृष्टि पड़ते ही वह सहसा अनुपम शोभासे सम्पन्न तथा रूप और यौवनसे लक्ष्मीके समान रमणीय हो गयी। आगमें तपाकर शुद्ध की हुई स्वर्णप्रतिमाके समान दीप्तिमती हो उठी। सुन्दर वस्त्र और रत्नोंके आभूषण उसके अङ्गोंकी शोभा बढ़ाने लगे। वह बारह वर्षकी अवस्थावाली कुमारी कन्याके समान धन्या और मनोहारिणी प्रतीत होने लगी। बहुमूल्य रनों द्वारा निर्मित श्रेष्ठतम हारसे उसका वक्षःस्थल उद्भासित हो उठा। वह गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चलने लगी। रत्नोंके मञ्जीर उसके चरणोंकी शोभा बढ़ाने लगे। सिरपर केशोंकी बँधी हुई वेणी| मालतीकी मालासे आवेष्टित थी, जो सुन्दर और गोलाकार दिखायी देती थी। उसने ललाटमें सिन्दूरकी बेंदी लगा रखी थी, जो अनारके फूलकी भाँति लाल थी। उस बेंदीके ऊपर कस्तूरी और चन्दनके भी बिन्दु थे। उस सुन्दरीने अपने हाथमें रत्नमय दर्पण ले रखा था। श्रीनिवास हरि उसे आश्वासन देकर आगे बढ़ गये। वह कृतार्थ हो प्रसन्नतापूर्वक अपने घर गयी, मानो लक्ष्मी अपने धामको जा रही हो उसने अपने घरको देखा। वह लक्ष्मीके निवास मन्दिरकी भाँति मनोहर हो गया था उसमें रत्नमयी शय्या बिछी थी तथा उस भवनका निर्माण श्रेष्ठ रत्नोंके सारतत्त्वसे हुआ था। रत्नोंकी दीपमालाएँ अपनी प्रभासे उस गृहको उद्भासित कर रही थीं। उस भवनमें सब ओर रत्नमय दर्पण लगे थे, जो उसकी भव्यताको बढ़ा रहे थे। सिन्दूर, वस्त्र, ताम्बूल, श्वेत चँवर और माला लिये दास दासियोंके समुदाय उस दिव्य भवनको घेरकर खड़े थे। मुने! सुन्दरी कुब्जा मन, वाणी और शरीरसे श्रीहरिके चरणोंके ही चिन्तन और समाराधनमें लगी थी। वह निरन्तर यही सोचती रहती थी कि कब श्रीहरिका शुभागमन होगा और कब मैं उनके मनोहर मुखचन्द्रके दर्शन पाऊँगी उसे सारा जगत् सदा श्रीकृष्णमय दिखायी देता था। करोड़ों कन्दपकी लावण्या सुशोभित श्यामसुन्दर पलभरके लिये भी उसे भूलते नहीं थे। कुब्जाको बिदा करनेके पश्चात् श्रीकृष्णने एक मनोहर मालीको देखा, जो मालाओंका समूह लिये राजभवनकी ओर जा रहा था। उसने भी श्रीकान्तको देख पृथ्वीपर माथा टेककर उन्हें प्रणाम किया और अपनी सारी मालाएँ परमात्मा श्रीकृष्णको अर्पित कर दीं। श्रीकृष्ण उसे अत्यन्त दुर्लभ दास्यभावका वरदान दे मालाएँ पहनकर उस सुन्दर राजमार्गपर आगे बढ़ गये। तदनन्तर उन्हें एक धोबी दिखायी दिया, जो वस्त्रोंका गट्ठर लिये जा रहा था। वह बड़ा बलवान् और अहंकारी था तथा यौवनके मदसे उन्मत्त हो सदा उद्दण्डतापूर्ण बर्ताव किया करता था। महामुने! श्रीकृष्णने उससे विनयपूर्वक वस्त्र माँगा। उसने वस्त्र तो उन्हें दिया नहीं, उलटे कठोर बातें सुनायीं।
धोबी बोला-
ओ मूढ़ तू गोप-जनोंका लाड़ला है। यह वस्त्र गायके चरवाहोंके योग्य नहीं है; अत्यन्त दुर्लभ और राजाओंके ही उपयोगमें आने योग्य है। धोबीकी यह बात सुनकर मधुसूदन हँसे बलदेव, अक्रूर और गोपगण भी हँसने लगे। श्रीकृष्णने एक ही तमाचेमें उस धोबीका काम तमाम करके कपड़ोंका वह गट्ठर ले लिया और सखाओंसहित उन्होंने अपनी रुचिके अनुसार वस्त्र धारण किये। वह रजकराज (धोबियोंका सरदार) दिव्य देह धारण करके श्रीकृष्ण पार्षदोंसे वेष्टित रत्नमय विमानद्वारा गोलोकको चला गया। उसका वह दिव्य शरीर अक्षय यौवनसे युक्त, जरा और मृत्युका निवारक, श्रेष्ठ पीताम्बरसे सुशोभित, मन्द मुस्कानसे विलसित, श्यामकान्तिसे कमनीय और मनोहर था। गोलोकमें पहुँचकर वह भी वहाँके पार्षदोंमें एक पार्षद हो गया। वहाँ अपने मनको वशमें रखकर वह नित्य निरन्तर श्रीकृष्णके शुभागमनका चिन्तन करता रहा। इधर मथुरा में सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। तब श्रीकृष्णकी आज्ञा लेकर अक्रूर अपने घरको गये और श्रीकृष्ण भी नन्द एवं बलदेव आदिके सा आनन्दपूर्वक किसी वैष्णवके घर गये, जो कपड़ा बुननेका व्यवसाय करता था। उसने अपना सर्वस्व भगवान्को समर्पित कर रखा था। उस भक्तने श्रीनिवासको प्रणाम करके उनका पूजन किया और भगवान्ने उसको अपना वह दास्यभाव प्रदान किया जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। वहाँ उत्तम मिष्टान्न भोजन करके सब लोग पलंगपर सो गये। तदनन्तर श्रीकृष्ण कुब्जाके घर पधारे। उसने स्वागत किया। भगवान्ने उसको बताया- 'प्रिये ! श्रीरामावतारके समय तुमने मेरे लिये तप किया था; अतः अब मुझसे मिलकर जरा मृत्युरहित और अत्यन्त दुर्लभ मेरे परमधाम गोलोकको जाओ। इसी समय गोलोकसे एक रत्ननिर्मित रथ वहाँ आया और कुब्जा दिव्य देह धारण करके उसीके द्वारा गोलोकको चली गयी। मुने! वह वहीं चन्द्रमुखी गोपी हो गयी और कितनी ही गोपियाँ उसकी परिचारिका हुई।
भगवान् नन्दनन्दन भी क्षणभर कुब्जाके यहाँ ठहरकर पुनः अपने निवास मन्दिरमें लौट आये, जहाँ नन्दजी सानन्द विराजमान थे। उधर भयविह्वल कंसने रातको नींद आ जानेपर दुःखद दुःस्वप्न देखा, जो उसकी मृत्युका सूचक था। उसने देखा, सूरज आकाशसे गिरकर पृथ्वीपर पड़ा है और उसके चार खण्ड हो गये हैं। मुने। इसी तरह चन्द्रमण्डल भी आकाशसे भूमिपर गिरकर दस खण्डोंमें विभक्त दिखायी दिया। उसने कुछ ऐसे पुरुष देखे, जिनकी आकृति विकृत थी। वे हाथोंमें रस्सी लिये नंग-धड़ंग दिखायी देते थे। एक विधवा शूद्री दृष्टिगोचर हुई, जो नंगी थी और जिसकी नाक कटी हुई थी। वह हँसती थी। उसने चूनेका तिलक लगा रखा था और उसके सफेद और काले केश ऊपरकी ओर उठे थे। वह एक हाथमें तलवार और दूसरेमें खप्पर लिये हुए थी। उसकी जीभ लपलपा रही थी और उसके गलेमें मुण्डमाला पड़ी थी। उसके सिवा कंसने गदहा, भैंस, बैल, सूअर, भालू, कौआ, गीध, कङ्क, वानर, सफेद कुत्ता, घड़ियाल, सियार, भस्मपुञ्ज, हड्डियोंका ढेर, ताड़का फल, केश, कपास, बुझे अङ्गार (कोयले), उल्का, चितापर चढ़ा हुआ मुर्दा, कुम्हार और तेलीके चक्र, टेढ़ी मेढ़ी कौड़ी, मरघट, अधजला काठ, सूखा काठ, कुश, तृण, चलता हुआ धड़, मुर्देका चिल्लाता हुआ मस्तक, आगसे जला हुआ स्थान, भस्म युक्त सूखा तालाब, जली मछली, लोहा, दावानलसे जलकर बुझे हुए वन, गलित कोढ़से युक्त नंगा शूद्र, शिखा खोले और अत्यन्त रोषसे भरकर शाप देते हुए ब्राह्मण एवं गुरु, अधिक कुपित हुए संन्यासी, योगी एवं वैष्णव मनुष्य देखे। ऐसा दुःस्वप्न देख कंसकी नींद खुल गयी और उसने माता, पिता, भाई तथा पत्नीसे वह सब कह सुनाया। पत्नी प्रेमसे विह्वल होकर रोने लगी। कंसने रङ्गभूमिमें दर्शकों के बैठनेके लिये मञ्च बनवाये और सभाके द्वारपर हाथीको खड़ा कर दिया। हाथीके साथ ही पहलवान और जुझारू सेना भी स्थापित कर दी। तत्पश्चात् धनुर्यज्ञका मङ्गल कृत्य आरम्भ किया। सभा बनवायी। पुण्यदायक स्वस्तिवाचन एवं मङ्गलपाठ कराया तथा योगयुक्त पुरोहितको यत्नपूर्वक आवश्यक कार्यके अनुष्ठानमें नियुक्त किया। राजा कंस हाथमें विलक्षण तलवार ले रमणीय मञ्चपर जा बैठा। मल्लयुद्धके लिये उस कलामें निपुण योद्धाको नियुक्त किया। आमन्त्रित श्रेष्ठ राजाओं, ब्राह्मणों, मुनीश्वरों, सुहृद्वर्गके लोगों, धर्मात्मा पुरुषों तथा युद्धकुशल पुरुषोंको यथास्थान बैठाया। नारद! इसी समय बलरामके साथ भगवान् श्रीकृष्ण रङ्गभूमिमें आये और महादेवजी धनुषको लीलापूर्वक बीचसे ही तोड़ डाला। धनुष टूटनेकी भयंकर आवाजसे सारी मथुरापुरी बहरी-सी हो गयी। कंसको बड़ा दुःख हुआ और देवकीनन्दन श्रीकृष्ण हर्षसे खिल उठे। द्वारवर्ती मल्लसहित हाथीका वध करके वे सभामें उपस्थित हुए। योगीजनोंने उन्हें साक्षात् परमात्मदेव परमेश्वरके रूपमें देखा। वे अपने हृदयकमलमें जिस स्वरूपका ध्यान करते थे, वही उन्हें बाहर दृष्टिगोचर हुआ राजाओंकी दृष्टिमें वे सर्वशासक दण्डधारी राजेन्द्र थे। माता पिताने उनको स्तनपान करनेवाले दुधमुँह बालकके रूपमें देखा। कामिनियोंकी दृष्टिमें वे करोड़ों कन्दर्पोकी लावण्य-लीला धारण करनेवाले रसिकशेखर थे। कंसने कालपुरुष समझा और उसके भाइयोंने शत्रु मल्लोंने अपनी मृत्युका स्थान माना और यादवोंने उनको प्राणोंके समान प्रिय देखा। श्रीकृष्णने सभामें बैठे हुए मुनियों, ब्राह्मणों तथा माता, पिता एवं गुरुजनोंको नमस्कार किया। फिर वे हाथमें सुदर्शनचक्र लिये राजमञ्चके निकट गये। मुने! उन्होंने कंसको भक्तके रूपमें देखा।
भक्तोंके तो वे जीवनबन्धु ही हैं। कृपानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक कंसको मञ्चसे खींच लिया और लीलासे ही उसको मार डाला। उस समय राजा कंसको सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णमय दिखायी दे रहा था। मृत्युके पश्चात् उसके निकट हीरेके हारोंसे विभूषित रत्नमय विमान आ पहुँचा और वह दिव्य रूप धारण करके समृद्धिशाली हो उस विमानसे विष्णुधाममें जा पहुँचा। मुने! कंसका उत्कृष्ट तेज श्रीकृष्णके चरणारविन्दमें प्रविष्ट हो गया। उसका और्ध्वदैहिक संस्कार एवं सत्कार करके श्रीहरिने ब्राह्मणोंको धनका दान किया। इसके बाद राज्य एवं राजाका छत्र बुद्धिमान् उग्रसेनको सौंप दिया। चन्द्रवंशी उग्रसेन पुनः यादवोंके 'राजेन्द्र' हो गये।
कंसकी माता, पत्रियाँ, पिता, बन्धुबान्धव, मातृवर्गकी स्त्रियाँ, बहिन तथा भाइयोंकी स्त्रियाँ भी विलाप करने लगीं। वे बोलीं- 'राजेन्द्र उठो, राजसिंहासनपर बैठकर हमें दर्शन दो ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त चराचर प्राणियोंका आधारभूत जो असंख्य विश्व हैं, उन सबकी जो स्वयं ही लीलापूर्वक सृष्टि करते हैं; ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म, सूर्य तथा गणेश आदि देवता, मुनीन्द्रवर्ग और देवेन्द्रगण जिनका दिन रात ध्यान करते हैं; वेद और सरस्वती भयभीत हो जिनका स्तवन करती हैं; प्रकृतिदेवी भी हर्षसे उल्लसित हो जिनके गुण गाती हैं; जो प्रकृतिसे परे, प्राकृतस्वरूप, स्वेच्छामय, निरीह, निर्गुण, निरञ्जन, परात्परतर ब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर, नित्यज्योतिः स्वरूप, भक्तोंपर अनुग्रहके लिये ही दिव्य देह धारण करनेवाले, नित्यानन्दमय, नित्यरूप तथा नित्य अविनाशी शरीर धारण करनेवाले हैं; वे ही मायापति भगवान् गोविन्द भूतलका भार उतारनेके लिये मायासे गोपबालकके वेषमें अवतीर्ण हुए हैं। वे सर्वेश्वर प्रभु जिसे मारते हैं, उसकी रक्षा कौन पुरुष कर सकता है? इसी प्रकार वे सर्वात्मा श्रीहरि जिसकी रक्षा करते हों उसे मारनेवाला भी कोई नहीं है। (स यं हन्ति च सर्वेशो रक्षिता तस्य कः पुमान् स यं रक्षति सर्वात्मा तस्य हन्ता न कोऽपि च ॥ (७२।१०५)) महामुने! ऐसा कहकर सब लोग चुप हो गये। परिवारके लोगोंने ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें सब प्रकारका धन दिया सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी पिताके निकट गये और उनकी बेड़ी-हथकड़ी काटकर उन्होंने माता और पिता दोनोंको बन्धनसे मुक्त किया। तत्पश्चात् उन देवेश्वरने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर माता पिताको साष्टाङ्ग प्रणाम किया और भक्तिसे मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति की।
श्रीभगवान् बोले-
जो पुरुष पिता और माताका तथा विद्यादाता एवं मन्त्रदाता गुरुका पोषण नहीं करता, वह जीवनभर पापसे शुद्ध नहीं होता। समस्त पूजनीयोंमें पिता वन्दनीय महान् गुरु हैं परंतु माता गर्भमें धारण एवं पोषण करती है; इसलिये पितासे भी सौगुनी श्रेष्ठ है। माता पृथ्वीके समान क्षमाशीला और सबका समानरूपसे हित चाहनेवाली है; अतः भूतलपर सबके लिये मातासे बढ़कर बन्धु दूसरा कोई नहीं है। साथ ही यह भी सच है कि विद्यादाता और मन्त्रदाता गुरु मातासे भी बहुत बढ़-चढ़कर आदरके योग्य हैं। वेदके अनुसार गुरुसे बढ़कर वन्दनीय और पूजनीय दूसरा कोई नहीं है। मुने! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण और बलरामने माताको प्रणाम किया। फिर माता-पिताने भी उन दोनोंको आदरपूर्वक गोदमें बिठा लिया और उन्हें उत्तम मिष्टान्न भोजन कराया नन्द और ग्वालबालोंको भी बड़े आदरसे खिलाया। बच्चोंका मङ्गल कृत्य कराया और उसके उपलक्ष्य में भी बहुत से ब्राह्मणोंको जिमाया। उस समय वसुदेवने प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया। (अध्याय ७१-७२)
Summary of chapter 53 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
When Pradyumna, the valiant son of Lord Kṛshṇa and Rukmiṇī, fell in love withUshā, the daughter of the thousand-armed demon emperor Bāṇāsura of Shonitapura, a fierce war erupted when Bāṇāsura imprisoned the young prince. Lord Kṛshṇa, accompanied by Balarāma and Pradyumna, marched upon Shonitapura and dismantled Bāṇāsura's massive fortifications. Even Lord Śiva, who fought to protect His devotee Bāṇāsura, was gently pacified by Kṛshṇa's divine sleep missile. Kṛshṇa severed most of Bāṇāsura's thousand arms until the humbled demon surrendered, whereupon the grand marriage of Pradyumna and Ushā was celebrated with celestial jubilation.