श्रीकृष्ण कहते हैं-
प्रिये ! इसी बीचमें भगवान् शंकर वहाँ उपस्थित हुए। उनके मुखपर मुस्कराहट थी। वे सारे अङ्गों में विभूति लगाये वृषभराज नन्दिकेश्वरकी पीठपर बैठे थे। व्याघ्रचर्मका वस्त्र, सर्पमय यज्ञोपवीत, सिरपर सुनहरे रंगकी जटाका भार, ललाटमें अर्धचन्द्र, हाथोंमें त्रिशूल, पट्टिश तथा उत्तम खट्वाङ्ग धारण ये, श्रेष्ठ रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित स्वर-यन्त्र लिये भगवान् शिव शीघ्र ही वाहनसे उतरे और भक्तिभावसे मस्तक झुका कमलाकान्तको प्रणाम करके उनके वामभागमें बैठे। फिर इन्द्र आदि समस्त देवता, मुनि, आदित्य, वसु, रुद्र, मनु, सिद्ध और चारण वहाँ पधारे। उन सबने पुरुषोत्तमकी स्तुति की। उस समय उनके सारे अङ्ग पुलकित हो रहे थे। फिर समस्त देवताओंने सिर झुकाकर भगवान् शिवको प्रणाम किया। तदनन्तर स्वर यन्त्र लिये भगवान् शंकरने सुमधुर तालस्वरके साथ संगीत आरम्भ किया। प्रिये! उसमें हम दोनोंके गुणों तथा राससम्बन्धी सुन्दर पदोंका गान होने लगा।
मनको मोह लेनेवाले सामयिक राग, (संगीतमें षड्ज आदि स्वरों, उनके वर्णों और अङ्गोंसे युक्त वह ध्वनि जो किसी विशिष्ट तालमें बैठायी हुई हो और जो मनोरञ्जनके लिये गायी जाती हो। संगीत शास्त्र के भारतीय आचार्योोंने छः राग माने हैं; परंतु इन रागोंके नामोंके सम्बन्ध में बहुत मतभेद है। भरत और हनुमत्के मतसे ये छः राग इस प्रकार हैं- भैरव, कौशिक (मालकोस), हिंडोल, दीपक, श्री और मेघ सोमेश्वर और ब्रह्माके मतसे इन छः रागोंके नाम इस प्रकार हैं श्री. वसंत, पञ्चम, भैरव, मेघ और नटनारायण नारद-संहिताका मत है कि मालव, मल्लार, श्री. वसंत, हिंडोल और कर्णाट- ये छः राग हैं परंतु आजकल प्रायः ब्रह्मा और सोमेश्वरका मत ही अधिक प्रचलित है। स्वर भेदसे राग तीन प्रकारके कहे गये हैं- (१) सम्पूर्ण, जिसमें सातों स्वर लगते हों; (२) षाड़व, जिसमें केवल छः स्वर लगते हों और कोई एक स्वर वर्जित हो; और (३) ओड़व, जिसमें केवल पाँच स्वर लगते हों और दो स्वर वर्जित हों। मतङ्गके मतसे रागोंके ये तीन भेद हैं- (१) शुद्ध, जो शास्त्रीय नियम तथा विधानके अनुसार हो और जिसमें किसी दूसरे रागकी छाया न हो; (२) सालंक या छायालग, जिसमें किसी दूसरे रागको छाया भी दिखायी देती हो अथवा जो दो रागोंके योगसे बना हो और (३) संकीर्ण, जो कई रागोंके मेलसे बना हो। संकीर्णको 'संकर राग' भी कहते हैं। ऊपर जिन छः रागोंके नाम बतलाये गये हैं, उनमें से प्रत्येक रागका एक निश्चित सरगम या स्वर-क्रम है। उसका एक विशिष्ट स्वरूप माना गया है। उसके लिये एक विशिष्ट ऋतु समय और पहर आदि निश्चित हैं उसके लिये कुछ रस नियत हैं तथा अनेक ऐसी बातें भी कही गयी हैं, जिनमें से अधिकांश केवल कल्पित ही हैं। जैसे, माना गया है कि अमुक रागका अमुक द्वीप या वर्षपर अधिकार है, उसका अधिपति अमुक ग्रह है, आदि। इसके अतिरिक्त भरत और हनुमत्के मतसे प्रत्येक रागकी पाँच-पाँच रागिनियाँ और सोमेश्वर आदिके मतसे छः छः रागिनियाँ हैं। इस अन्तिम मतके अनुसार प्रत्येक रागके आठ आठ पुत्र तथा आठ-आठ पुत्रवधुएँ भी हैं। (४) यदि वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो राग और रागिनीमें कोई अन्तर नहीं है। जो कुछ अन्तर है, वह केवल कल्पित है। हाँ, रागोंमें रागिनियोंकी अपेक्षा कुछ विशेषता और प्रधानता अवश्य होती है और रागिनियाँ उनकी छायासे युक्त जान पड़ती हैं; अतः हम रागिनियोंको रागोंके अवान्तर भेद कह सकते हैं। इसके सिवा और भी बहुत से राग हैं, जो कई रागोंकी छायापर अथवा मेलसे बनते हैं और 'संकर राग' कहलाते हैं। शुद्ध रागोंकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें लोगोंका विश्वास है कि जिस प्रकार श्रीकृष्णकी वंशी के सात छेदों में से सात स्वर निकले हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्णजीकी १६०८ गोपिकाओंके गानेसे १६०८ प्रकारके राग उत्पन्न हुए थे और उन्होंमेंसे बचते बचते अन्तमें केवल छः राग और उनकी ३० या ३६ रागिनियाँ रह गर्यो। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि महादेवजीके पाँच मुखोंसे पाँच राग (श्री, वसंत, भैरव, पशम और मेघ) निकले हैं और पार्वतीके मुखसे छठा 'नटनारायण' राग निकला है।
कण्ठकी एकतानता, एक मनोहर मान, गुरु-लघुके क्रम पद-भेद विराम, अतिदीर्घ गर्मक तथा मधुर आनन्दके साथ उन्होंने प्रेमपूर्वक स्वयं निर्मित ऐसा संगीत छेड़ा, जो संसारमें अत्यन्त दुर्लभ है। उस समय भगवान् शिवके सम्पूर्ण अङ्गों में रोमाञ्च हो आया था और वे नेत्रोंसे बारंबार आँसू बहाते थे। प्रिये ! संगीतको सुननेमात्रसे वहाँ बैठे हुए मुनि तथा देवता मूच्छित एवं बेसुध हो द्रव (जल) रूप हो गये। श्रीहरिके पार्षदोंकी तथा ब्रह्माजीकी भी यही दशा हुई। भगवान् नारायण, लक्ष्मी तथा गान करनेवाले स्वयं शिव भी द्रवरूप हो गये। प्राणेश्वरि ! उस समय वैकुण्ठधामको जलसे पूर्ण हुआ देख मुझे शङ्का हुई। तब वहाँ जाकर मैंने उन सब देवता आदिकी मूर्तियों (शरीरों) का पूर्ववत् निर्माण किया। उनके वैसे ही रूप, वैसे ही अस्त्र-शस्त्र तथा वैसे ही वाहन भूषण बनाये। उनके स्वभाव, मन तथा विषय वासनाएँ भी पूर्ववत् थीं। तदनन्तर उस जलराशिके लिये वैकुण्ठके चारों ओर स्थान बनाया; फिर उसकी अधिष्ठात्री देवी (गङ्गा) अपने उस वासस्थानमें आयीं। समस्त देवताओंके शरीरोंसे उत्पन्न हुई वह दिव्य जलराशि ही देवनदी गङ्गा नामसे प्रख्यात हुई। वह मुमुक्षुओंको मोक्ष और भक्तोंको हरि भक्ति प्रदान करनेवाली है। उसका स्पर्श करके आयी हुई वायुके सम्पर्कसे भी पापियोंके करोड़ों जन्मोंके नानाविध पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। प्राणेश्वरि! देवनदीके साक्षात् दर्शन तथा स्पर्शका क्या फल होगा- यह मैं भी नहीं जानता; फिर उसके जलमें स्नान करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यके विषयमें तो कहना ही क्या है? उसकी महिमाका सम्यक् निरूपण असम्भव है। पृथ्वीपर 'पुष्कर' को सब तीर्थोंसे उत्तम बताया गया है। वेदोंने उसे सर्वश्रेष्ठ कहा है; परंतु वह भी इस (गङ्गा) की सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है। राजा भगीरथ इस देवनदीको भूतलपर लाये थे, इसलिये यह 'भागीरथी' नामसे प्रसिद्ध हुई। सुरधुनी अपने स्रोतके अंशसे पृथ्वीपर आयी थी; अतः 'गां गता' इस व्युत्पत्तिके अनुसार उसका 'गङ्गा' नाम प्रसिद्ध हुआ। इसके जलपर क्रोध होनेके कारण महात्मा जहुने इस नदीको अपने जानुओं (घुटनों) द्वारा ग्रहण कर लिया था। फिर उनकी कन्यारूपसे इसका प्राकट्य हुआ; अतः इसका दूसरा नाम 'जाह्नवी' है। वसुके अवतार भीष्म इसके गर्भसे उत्पन्न हुए थे, इस कारण यह 'भीष्मसू' (भीष्मजननी) कहलाती है। गङ्गा मेरी आज्ञासे तीन धाराओंद्वारा स्वर्ग, पृथ्वी तथा पातालमें गयी है; अतः 'त्रिपथगा' कही जाती है। इसकी प्रमुख धारा स्वर्गमें है। वहाँ इसे 'मन्दाकिनी' कहते हैं। स्वर्गमें इसका पाट एक योजन चौड़ा है और यह दस हजार योजनकी दूरीमें प्रवाहित होती है। इसका जल दूधके समान स्वच्छ एवं स्वादिष्ट है तथा इसमें सदा ऊँची-ऊँची लहरें उठती रहती हैं। वैकुण्ठसे यह ब्रह्मलोकमें और वहाँसे स्वर्गमें आयी है। स्वर्गसे चलकर हिमालयके शिखरपर होती हुई यह प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वीपर उतरी है। इसकी उस धाराका नाम 'अलकनन्दा' है। यह क्षार समुद्र में जाकर मिली है। इसकी जलराशि शुद्ध स्फटिकके समान स्वच्छ तथा अत्यन्त वेगवती है। यह पापियोंके पापरूपी सूखे काठको जलानेके लिये अग्रिरूपिणी है। इसीने राजा सगरके पुत्रोंको निर्वाणमोक्ष प्रदान किया है। यह वैकुण्ठधामतक जानेके लिये श्रेष्ठ सोपान है। यदि मृत्युकालमें पहले पुण्यात्मा सत्पुरुषोंके चरणोंको धोकर उस चरणोदकको मुमूर्षु मनुष्यके मुखमें दिया जाय तो उसे गङ्गाजल पीनेका पुण्य होता है। ऐसे पुण्यात्मा सत्पुरुष गङ्गारूपी सोपानपर आरूढ़ हो निरामयपद (वैकुण्ठधाम) को प्राप्त होते हैं। वे ब्रह्मलोकतकको लाँघकर विमानपर बैठे हुए निर्बाध गतिसे ऊपरके लोक (वैकुण्ठ) में चले जाते हैं। यदि दैववश पूर्वकर्मके प्रभावसे पापी पुरुष गङ्गामें डूब जायँ तो वे शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने दिव्य वर्षों तक भगवद्धाममें सानन्द निवास करते हैं। तदनन्तर उन्हें निश्चय ही अपने पाप-पुण्यका फल भोगना पड़ता है। परंतु वह भोग स्वल्पकालमें ही पूरा हो जाता है; तत्पश्चात् भारतवर्षमें पुण्यवानोंके घरमें जन्म ले निश्चल भक्ति पाकर वे भगवत्स्वरूप हो जाते हैं जो शुद्धिके लिये यात्रा करके देवेश्व गङ्गामें नहानेके लिये जाता है, वह जितने पग चलता है, उतने वर्षोंतक अवश्य ही वैकुण्ठधाममें आनन्द भोगता है। यदि आनुषङ्गिरूपसे भी गङ्गाको पाकर कोई पापयुक्त मनुष्य उसमें स्नान करता है तो वह उस समय सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यदि वह फिर पापमें लिप्त न हो तो निष्पाप ही रहता है। कलियुगमें पाँच हजार वर्षोंतक भारतवर्ष में गङ्गाको साक्षात् स्थिति है। उसके विद्यमान होते हुए कलिका क्या प्रभाव रह सकता है? कलिमें दस हजार वर्षोंतक मेरी प्रतिमाएँ तथा पुराण रहते हैं। उनके होते हुए वहाँ कलिका प्रभाव क्या हो सकता है? गङ्गाकी जो धारा पाताललोकको जाती है, उसका नाम भोगवती है। वह सदा दुग्ध फेनके समान स्वच्छ तथा अत्यन्त वेगवती है। अमूल्य रत्नों तथा श्रेष्ठ मणियोंकी वह सदा खान बनी रहती है। सुस्थिर यौवनवाली नागकन्याएँ उसके तटपर सदा ही क्रीड़ा करती हैं। स्वयं देवी गङ्गा वैकुण्ठको चारों ओरसे घेरकर सदा प्रवाहित होती रहती हैं। मेरी इस पुत्रीका विनाश प्रलयकालमें भी नहीं होता। उसका परम मनोहर दिव्य तट नाना रत्नोंकी खान है। इस प्रकार गङ्गाके जन्मका सारा पुण्यदायक प्रसङ्ग मैंने कह सुनाया। अब ब्रह्माजीको मोहिनीके शापसे किस प्रकार छुटकारा मिला, यह सुनो। (अध्याय ३४)
Summary of chapter 30 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
Seeking to reveal the highest spiritual reality to His earthly father and cowherd companions, Lord Kṛshṇa led them to the holy lake known as Brahma-sarovara, where He instructed them to take a plunge into the sacred waters. As the cowherds immersed themselves, they were instantly elevated to the spiritual realm of Vaikuṇṭha, beholding the infinite majesty of Nārāyaṇa seated upon a golden throne surrounded by liberated souls and celestial rays. Stunned by this transcendent vision, Nanda Bābā and the cowherds realized that their beloved Kṛshṇa was none other than the Supreme Parabrahman Himself, returning safely to Vṛndāvana with hearts overflowing with pure devotion.