नारदजीने पूछा-
भगवन् ! गोकुल में यशोदाभवनके भीतर श्रीकृष्णको रखकर जब वसुदेवजीने अपने गृहको प्रस्थान किया, तब नन्दरायजीने किस प्रकार पुत्रोत्सव मनाया ? श्रीहरिने वहाँ रहकर क्या किया? वे कितने वर्षोंतक वहाँ रहे ? प्रभो! आप उनकी बालक्रीड़ाका क्रमशः वर्णन कीजिये। पूर्वकालमें गोलोकमें श्रीराधाके साथ भगवान्ने जो प्रतिज्ञा की थी, वृन्दावनमें उस प्रतिज्ञाका निर्वाह उन्होंने किस प्रकार किया ? प्रभो! उस समय भूतलपर वृन्दावनका स्वरूप कैसा था ? उनका रासमण्डल कैसा था ? यह सब बताइये। रासक्रीड़ा और जलक्रीड़ाका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। नन्दने कौन-सी तपस्या की थी? यशोदा और रोहिणीने कौन-सा तप किया था ? श्रीहरिसे पहले हलधरका जन्म कहाँ हुआ था? श्रीहरिका अपूर्व आख्यान अमृतखण्डके समान माना गया है। विशेषतः कविके मुखमें श्रीहरिचरित्रमय काव्य पद-पदपर नूतन प्रतीत होता है। आप अपने रासमण्डलकी क्रीड़ाका स्वयं ही वर्णन कीजिये। काव्यमें परोक्ष वस्तुका वर्णन होता है। परंतु जहाँ प्रत्यक्ष देखी हुई वस्तुका वर्णन हो, उसे उत्तम कहा गया है। साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु हैं जो जिसका अंश होता है, वह उस अंशीके सुखसे सुखी होता है। प्रभो! आपने ही यह वर्णन किया है कि आप दोनों नर और नारायण श्रीहरिके चरणोंमें विलीन हो गये थे। उनमें भी आप ही साक्षात् गोलोकके अंश हैं; अतः उनके समान ही महान् हैं (इसीलिये श्रीकृष्णलीलाएँ आपके प्रत्यक्ष अनुभवमें आयी हुई हैं; अतः आप उनका वर्णन कीजिये) ।
भगवान् नारायण बोले-
नारद! ब्रह्मा, शिव, शेष, गणेश, कूर्म, धर्म, मैं, नर तथा कार्तिकेय- ये नौ श्रीकृष्णके अंश हैं। अहो! उन गोलोकनाथकी महिमाका कौन वर्णन कर सकता है? जिन्हें स्वयं हम भी नहीं जानते और न वेद ही जानते हैं। फिर दूसरे विद्वान् क्या जान सकते हैं? शूकर, वामन, कल्कि, बुद्ध, कपिल और मत्स्य- ये भी श्रीकृष्णके अंश हैं तथा अन्य कितने ही अवतार हैं, जो श्रीकृष्णकी कलामात्र हैं। नृसिंह, राम तथा श्वेतद्वीपके स्वामी विराट् विष्णु पूर्ण अंशसे सम्पन्न हैं। श्रीकृष्ण परिपूर्णतम परमात्मा हैं। वे स्वयं ही वैकुण्ठ और गोकुलमें निवास करते हैं। वैकुण्ठमें वे कमलाकान्त कहे गये हैं और रूप-भेदसे चतुर्भुज हैं। गोलोक और गोकुलमें ये द्विभुज श्रीकृष्ण स्वयं ही राधाकान्त कहलाते हैं। योगी पुरुष इन्हींके तेजको सदा अपने चित्तमें धारण करते हैं। भक्त पुरुष इन्हीं भगवान्के तेजोमय चरणारविन्दका चिन्तन करते हैं। भला, तेजस्वीके बिना तेज कहाँ रह सकता है? ब्रह्मन् ! सुनो। मैं तुमसे यशोदा, नन्द और रोहिणीके तपका वर्णन करता हूँ, जिसके कारण उन्होंने श्रीहरिका मुँह देखा था। वसुओंमें श्रेष्ठ तपोधन द्रोण नन्द नामसे इस धरातलपर अवतीर्ण हुए थे। उनकी पत्नी जो तपस्विनी धरा थीं, वे ही सती साध्वी यशोदा हुई थीं। सर्पोंको जन्म देनेवाली नागमाता कद्रू ही रोहिणी बनकर भूतलपर प्रकट हुई थीं। इनके जन्म और चरित्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। एक समयकी बात है, पुण्यदायक भारतवर्ष में गौतम आश्रमके समीप गन्धमादन पर्वतपर धरा और द्रोणने तपस्या आरम्भ की मुने! उनकी तपस्याका उद्देश्य था- भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन सुप्रभाके निर्जन तटपर दस हजार वर्षोतक वे वसु-दम्पति तपस्यामें लगे रहे, परंतु उन्हें श्रीहरिके दर्शन नहीं हुए। तब वे दोनों वैराग्यवश अग्निकुण्डका निर्माण करके उसमें प्रवेश करनेको उद्यत हो गये। उन दोनोंको मरनेके लिये उत्सुक देख वहाँ आकाशवाणी हुई— 'वसुश्रेष्ठ! तुम दोनों दूसरे जन्ममें भूतलपर अवतीर्ण हो गोकुलमें अपने पुत्रके रूपमें श्रीहरिके दर्शन करोगे; योगियोंको भी उन भगवान्का दर्शन होना अत्यन्त कठिन है। बड़े-बड़े विद्वानों के लिये भी ध्यानके द्वारा उन्हें वशमें कर पाना असम्भव है। वे ब्रह्मा आदि देवताओंके भी वन्दनीय हैं। यह सुनकर धरा और द्रोण सुखपूर्वक अपने घरको चले गये और भारतवर्षमें जन्म लेकर उन्होंने श्रीहरिके मुखारविन्दके दर्शन किये। इस प्रकार यशोदा और नन्दका चरित तुमसे कहा गया; अब देवताओंके लिये भी परम गोपनीय रोहिणीका चरित्र सुनो। एक समय देवमाता अदितिने ऋतुमती होनेपर समस्त शृङ्गारोंसे सुसज्जित हो अपने पतिदेव श्रीकश्यपजीसे मिलना चाहा। उस समय कश्यपजी अपनी दूसरी पत्नी सर्पमाता कद्रूके पास थे कश्यपजीके आनेमें विलम्ब होनेपर अदितिको बहुत क्षोभ हुआ और उन्होंने कद्रूको शाप दे दिया कि वे स्वर्गलोकको त्यागकर मानव-योनिको प्राप्त हों।' इस बातको सुनकर कद्रूने भी अदितिको शाप दिया कि वे जरायुक्त होकर मर्त्यलोकमें मानव-योनिमें जायँ।'
इस प्रकार दोनोंक शापग्रस्त होनेपर कश्यपजीने कद्रूको सान्त्वना देकर समझाया कि 'तुम मेरे साथ मर्त्यलोकमें जाकर श्रीहरिके मुखकमलका दर्शन प्राप्त करोगी' तदनन्तर कश्यपजीने अदितिके घर जाकर उनकी इच्छा पूर्ण की। उसी ऋतुसे देवराजका जन्म हुआ। इसके बाद अदितिने देवकीके रूपमें, कद्रूने रोहिणीके रूपमें और कश्यपजीने श्रीकृष्णके पिता श्रीवसुदेवजीके रूपमें जन्म ग्रहण किया।
मुने! यह सारा गोपनीय रहस्य बताया गया। अब अनन्त, अप्रमेय तथा सहस्त्रों मस्तकवाले भगवान् बलदेवजीके जन्मका वृत्तान्त सुनो साध्वि! रोहिणी वसुदेवजीकी प्रेयसी भार्या थीं। मुने! वे वसुदेवजीकी आज्ञासे संकर्षणकी रक्षाके लिये गोकुलमें चली गयीं। कंससे भयभीत होनेके कारण उन्हें वहाँसे पलायन करना पड़ा था। उन दिनों योगमायाने श्रीकृष्णकी आज्ञासे देवकीके सातवें गर्भको रोहिणीके उदरमें स्थापित कर दिया था। उस गर्भको स्थापित करके वे देवी तत्काल कैलासपर्वतको चली गयीं। कुछ दिनोंके बाद रोहिणी नन्दभवनमें श्रीकृष्णके अंशस्वरूप पुत्रको जन्म दिया। उसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान गौर थी। वह बालक साक्षात् ईश्वर था। उसके मुखपर मन्द हास्यकी मनोहर छटा एवं प्रसन्नता छा रही थी। वह ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहा था। उसके जन्ममात्रसे देवताओंमें आनन्द छा गया। स्वर्गलोकमें दुन्दुभि, आनक और मुरज आदि दिव्य वाद्य बज उठे। आनन्दमन हुए देवता शङ्खध्वनिके साथ जय-जयकार करने लगे। नन्दका हृदय हर्षसे उल्लसित हो उठा। उन्होंने ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दिया। धायने आकर बालककी नाल काटी और उसे नहलाया। समस्त आभूषणों से विभूषित गोपियाँ जय-जयकार करने लगीं। उस पराये पुत्रके लिये भी नन्दने बड़े आदरके साथ महान् उत्सव मनाया। यशोदाजीने गोपियों तथा ब्राह्मणियोंको प्रसन्नतापूर्वक धन दान किया नाना प्रकारके द्रव्य, सिन्दूर एवं तैल प्रदान किये।
वत्स! इस प्रकार मैंने तुमसे नन्द और यशोदाके तपका प्रसङ्ग कहा, हलधरके जन्मकी कथा कही तथा रोहिणीजीके चरित्रको सुनाया है। अब तुम्हें जो अभीष्ट है, वह नन्दपुत्रोत्सवका प्रसङ्ग सुनो। वह सुखदायक, मोक्षदायक तथा जन्म, मृत्यु और जरावस्थाका निवारण करनेवाला सारतत्त्व है। श्रीकृष्णका मङ्गलमय चरित्र वैष्णवोंका जीवन है। वह समस्त अशुभोंका विनाशक तथा श्रीहरिके दास्यभावको देनेवाला है।
वसुदेवजीने श्रीकृष्णको नन्दभवनमें रख दिया और उनकी कन्याको गोदमें लेकर वे हर्षपूर्वक अपने घरको लौट आये। यह प्रसङ्ग तथा उस कन्याका श्रवणसुखद चरित्र पहले कहा जा चुका है। अब गोकुलमें जो श्रीकृष्णकी मङ्गलमयी लीला प्रकट हुई, उसे बताता हूँ, सुनो जब वसुदेवजी अपने घरको लौट गये, तब जया तिथि अष्टमीसे युक्त उस विजयपूर्ण मङ्गलमय सूतिकागारमें नन्द और यशोदाने देखा- उनका पुत्र धरतीपर पड़ा हुआ है। उसके श्रीअङ्गोंसे नवीन मेघमालाके समान तेजःपुञ्जमयी श्यामकान्ति प्रस्फुटित हो रही है। वह नग्न बालक बड़ा सुन्दर दिखायी देता था। उसकी दृष्टि गृहके शिखरभागकी ओर लगी हुई थी। उसका मुख शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। दोनों नेत्र नील कमलकी शोभाको छीने लेते थे। वह कभी रोता था और कभी हँसने लगता था। उसके श्रीअङ्गोंमें धूलिके कण लगे हुए थे। उसके दोनों हाथ धरतीपर टिके हुए थे और युगल चरणारविन्द प्रेमके पुञ्ज से जान पड़ते थे। उस दिव्य बालक श्रीहरिको देखकर पत्नीसहित नन्दको बड़ी प्रसन्नता हुई। धायने ठंढे जलसे बालकको नहलाया और उसकी नाल काट दी। उस समय गोपियाँ हर्षसे जय-जयकार करने लगीं। व्रजकी सारी गोपिकाएँ, बालिका और युवतियाँ भी ब्राह्मणपत्नियोंके साथ सूतिकागारमें आयीं। उन सबने आकर बालकको देखा और प्रसन्नतापूर्वक उसे आशीर्वाद दिया। नन्दनन्दनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करती हुई वे उन्हें अपनी गोदमें ले लेती थीं उनमेंसे कितनी ही
गोपियाँ रातमें वहीं रह गयीं। नन्दने वस्त्रसहित स्नान करके धुली हुई धोती और चादर धारण की फिर प्रसन्नचित्त हो वहाँ परम्परागत विधिका पालन किया। ब्राह्मणोंको भोजन कराया, उनसे मङ्गलपाठ करवाया, नाना प्रकारके बाजे बजवाये और वन्दीजनोंको धन- दान किया। तत्पश्चात् नन्दने आनन्दपूर्वक ब्राह्मणोंको धन दिया तथा उत्तम रत्न, मूँगे और हीरे भी आदरपूर्वक उन्हें दिये। मुने! तिलोंके सात पर्वत, सुवर्णके सौ ढेर, चाँदी, धान्यकी पर्वतोपम राशि वस्त्र, सहस्त्रों मनोरम गौएँ, दही, दूध, शक्कर, माखन, घी, मधु, मिठाई, लड्डू, स्वादिष्ट मोदक, सब प्रकारकी खेतीसे भरी-पूरी भूमि, वायुके समान वेगशाली घोड़े, पान और तेल- इन सबका दान करके नन्दजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सूतिकागारकी रक्षा के लिये ब्राह्मणोंको नियुक्त किया मन्त्रज्ञ मनुष्यों तथा बड़ी-बूढ़ी गोपियोंको लगाया। उन्होंने ब्राह्मणोंद्वारा वेदोंका पाठ कराया। एकमात्र मङ्गलमय हरिनामका कीर्तन कराया तथा देवताओंकी पूजा करवायी युवती तथा बड़ी-बूढ़ी ब्राह्मणपत्नियाँ बालक-बालिकाओंको साथ ले मुस्कराती हुई नन्दभवनमें आयीं। नन्दरायजीने उनको भी नाना प्रकारके धन और रत्न दिये रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित बड़ी बूढ़ी गोपियाँ भी मुस्कराती हुई तीव्र गतिसे नन्द मन्दिरमें आयीं। उन्हें बहुत से वस्त्र, चाँदी और सहस्रों गौएँ सादर अर्पित कीं। ज्योतिष शास्त्रके विशेषज्ञ विविध ज्यौतिषी, जिनकी वाणी सिद्ध थी, हाथमें पुस्तकें लिये नन्दमन्दिरमें पधारे। नन्दजीने उन्हें नमस्कार करके प्रसन्नतापूर्वक उनके सामने विनय प्रकट की। उन सबने आशीर्वाद दिये और उत्तम बालकको देखा। इस प्रकार व्रजराज नन्दने सामग्री एकत्र करके पुत्रोत्सव मनाया और ज्योतिषियोंद्वारा शुभाशुभ भविष्यका प्रकाशन कराया। तदनन्तर वह बालक नन्दभवनमें शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिनोंदिन बढ़ने लगा। श्रीकृष्ण और हलधर दोनों ही माताका स्तनपान करते थे। मुने! वहाँ नन्दके पुत्रोत्सवमें प्रसन्न हुई रोहिणी देवीने आयी हुई स्त्रियोंको प्रसन्नतापूर्वक तैल, सिन्दूर और ताम्बूल प्रदान किये। वे सब बालकके सिरपर आशीर्वाद दे अपने-अपने घरको चली गयीं। केवल यशोदा, रोहिणी और नन्द-ये ही उस घरमें हर्षपूर्वक रहे। (अध्याय ९)
Summary of chapter 7 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
At the auspicious midnight hour of the eighth day of the waning moon in the month of Bhādrapada, while storm clouds thundered and torrential rains lashed Mathura, the divine prison cell suddenly illuminated with self-effulgent celestial light. The Supreme Lord Śrī Kṛshṇa manifested before the astonished eyes of Vasudeva and Devakī in His transcendental four-armed form, adorned with crown, conch, disc, mace, and lotus, radiating infinite beauty and dark-blue splendor. Vasudeva and Devakī fell prostrate in ecstatic adoration, offering sublime prayers of praise to the Supreme Being who had condescended to take birth as their human child.