श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - श्री कृष्ण जनन खंड

23- धेनुकके पूर्वजन्मका परिचय, बलि पुत्र साहसिक तथा तिलोत्तमाका स्वच्छन्द विहार, दुर्वासाका शाप और वर, साहसिकका गदहेकी योनिमें जन्म लेना तथा तिलोत्तमाका बाणपुत्री 'उषा' होना

नारदजीने पूछा-

भगवन् ! किस पापसे बलि पुत्र साहसिकको गदहेकी योनि प्राप्त हुई ? दुर्वासाजीने किस अपराधसे दानवराजको शाप दिया? नाथ! फिर किस पुण्यसे दानवेश्वरने सहसा महाबली श्रीहरिका धाम एवं उनके साथ एकत्व (सायुज्य) मोक्ष प्राप्त कर लिया ? संदेह भंजन करनेवाले महर्षे! इन सब बातोंको आप विस्तारपूर्वक बताइये। अहो ! कविके मुखमें काव्य पद-पदपर नया नया प्रतीत होता है।

भगवान् श्रीनारायणने कहा-

वत्स! नारद! सुनो। मैं इस विषयमें प्राचीन इतिहास कहूँगा। मैंने इसे पिता धर्मके मुखसे गन्धमादन पर्वतपर सुना था। यह विचित्र एवं अत्यन्त मनोहर वृत्तान्त पाद्म-कल्पका है और श्रीनारायणदेवकी कथासे युक्त होनेके कारण कानोंके लिये उत्तम अमृत है। जिस कल्पकी यह कथा है, उसमें तुम उपबर्हण नामक गन्धर्वके रूपमें थे। तुम्हारी आयु एक कल्पकी थी। तुम शोभायमान, सुन्दर और सुस्थिर यौवनसे सम्पन्न थे। पचास कामिनियोंके पति होकर सदा शृङ्गारमें ही तत्पर रहते थे। ब्रह्माजीके वरदानसे तुम्हें सुमधुर कण्ठ प्राप्त हुआ था और तुम सम्पूर्ण गायकोंके राजा समझे जाते थे। उन्हीं दिनों दैववश ब्रह्माका शाप प्राप्त होनेसे तुम दासीपुत्र हुए और वैष्णवोंके अवशिष्ट भोजनजनित पुण्यसे इस समय साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र हो। अब तो तुम असंख्य कल्पोंतक जीवित रहनेवाले महान् वैष्णवशिरोमणि हो । ज्ञानमयी दृष्टिसे सब कुछ देखते और जानते हो तथा महादेवजीके प्रिय शिष्य हो। मुने! उस पाद्म- कल्पका वृत्तान्त मुझसे सुनो दैत्यके इस सुधा तुल्य मधुर वृत्तान्तको मैं तुम्हें सुना रहा हूँ। एक दिनकी बात है। बलिका बलवान् पुत्र साहसिक अपने तेजसे देवताओंको परास्त करके गन्धमादनकी ओर प्रस्थित हुआ। उसके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। वह रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो रत्नके ही सिंहासनपर विराजमान था। उसके साथ बहुत बड़ी सेना थी। इसी समय स्वर्गकी परम सुन्दरी अप्सरा तिलोत्तमा उस मार्गसे आ निकली। उसने साहसिकको देखा और साहसिकने उसको पुंश्चली स्त्रियोंका आचरण दोषपूर्ण होता ही है। वहीं दोनों एक-दूसरेके प्रति आकर्षित हो गये। चन्द्रमाके समीप जाती हुई तिलोत्तमा वहाँ बीचमें ही ठहर गयी। कुलटा स्त्रियाँ कैसी दुष्टहृदया होती हैं और वे किसी भी पापका विचार न करके सदा पापरत ही रहा करती हैं यह सब बतलाकर भी तिलोत्तमाने अपने बाह्य रूप-सौन्दर्यसे साहसिकको मोहित कर लिया। तदनन्तर वे दोनों गन्धमादनके एकान्त रमणीय स्थानमें जाकर यथेच्छ विहार करने लगे। वहीं मुनिवर दुर्वासा योगासन से विराजमान होकर श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका चिन्तन कर रहे थे। तिलोत्तमा और साहसिक उस समय कामवश चेतनाशून्य थे। उन्होंने अत्यन्त निकट ध्यान लगाये बैठे हुए मुनिको नहीं देखा। उनके उच्छृङ्खल अभिसारसे मुनिका ध्यान सहसा भङ्ग हो गया। उन्होंने उन दोनोंकी कुत्सित चेष्टाएँ देख क्रोधमें भरकर कहा।

दुर्वासा बोले-

ओ गदहेके समान आकार- वाले निर्लज्ज नराधम ! उठ। भक्तशिरोमणि बलिका पुत्र होकर भी तू इस तरह पशुवत् आचरण कर रहा है। देवता, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व तथा राक्षस- ये सभी सदा अपनी जातिमें लज्जाका अनुभव करते हैं। पशुओंके सिवा सभी मैथुन कर्ममें लज्जा करते हैं। विशेषतः गदहेकी जाति ज्ञान तथा लज्जासे हीन होती है; अतः दानवश्रेष्ठ ! अब तू गदहेकी योनिमें जा तिलोत्तमे ! तू भी उठ। पुंश्चली स्त्री तो निर्लज्ज होती ही है। दैत्यके प्रति तेरी ऐसी आसक्ति है तो अब तू दानवयोनिमें ही जन्म ग्रहण कर ऐसा कहकर रोषसे जलते हुए दुर्वासामुनि वहाँ चुप हो गये। फिर वे दोनों लज्जित और भयभीत होकर उठे तथा मुनिकी स्तुति करने लगे।

साहसिक बोला-

मुने! आप ब्रह्मा, विष्णु और साक्षात् महेश्वर हैं। अग्नि और सूर्य हैं। आप संसारकी सृष्टि, पालन तथा संहार करने में समर्थ हैं। भगवन्! मेरे अपराधको क्षमा करें। कृपानिधे! कृपा करें। जो सदा मूढोंके अपराधको क्षमा करे, वही संत-महात्मा एवं ईश्वर है। यों कहकर वह दैत्यराज मुनिके आगे उच्चस्वरसे फूट-फूटकर रोने लगा और दाँतोंमें तिनके दबाकर उनके चरणकमलोंमें गिर पड़ा। तिलोत्तमा बोली – हे नाथ! हे करुणासिन्धो ! हे दीनबन्धो ! मुझपर कृपा कीजिये। विधाताकी सृष्टिमें सबसे अधिक मूढ स्त्रीजाति ही है। सामान्य स्त्रीकी अपेक्षा अधिक मतवाली एवं मूढ कुलटा होती है, जो सदा अत्यन्त कामातुर रहती है। प्रभो! कामुक प्राणीमें लज्जा भय और चेतना नहीं रह जाती है। नारद! ऐसा कहकर तिलोत्तमा रोती हुई दुर्वासाजीकी शरणमें गयी। भूतलपर विपत्ति में पड़े बिना भला किन्हें ज्ञान होता है? उन दोनोंकी व्याकुलता देखकर मुनिको दया आ गयी। उस समय उन मुनिवरने उन्हें अभय देकर कहा दुर्वासा बोले-

दानव ! तू विष्णुभक्त बलिकापुत्र है। उत्तम कुलमें तेरा जन्म हुआ है। तू पैतृक परम्परासे विष्णुभक्त है। मैं तुझे निश्चितरूपसे जानता हूँ। पिताका स्वभाव पुत्र में अवश्य रहता है। जैसे कालियके सिरपर अङ्कित हुआ श्रीकृष्णका चरणचिह्न उसके वंशमें उत्पन्न हुए सभी सर्पोंके मस्तकपर रहता है। वत्स! एक बार गदहेकी योनिमें जन्म लेकर तू निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हो जा। सत्पुरुषोंद्वारा पहले जो चिरकालतक श्रीकृष्णकी आराधना की गयी होती है, इसके पुण्य प्रभावका कभी लोप नहीं होता। अब तू शीघ्र ही व्रजके निकट वृन्दावनके ताल वनमें जा। वहाँ श्रीहरिके चक्रसे प्राणोंका परित्याग करके तू निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेगा। तिलोत्तमे ! तू भारतवर्षमें बाणासुरकी पुत्री होगी; फिर श्रीकृष्ण पौत्र अनिरुद्धका आलिङ्गन प्राप्त करके शुद्ध हो जायगी।

महामुने! यों कहकर दुर्वासामुनि चुप हो गये। तत्पश्चात् वे दोनों भी उन मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके यथास्थान चले गये। इस प्रकार दैत्य साहसिकके गर्दभ योनिमें जन्म लेनेका सारा वृत्तान्त मैंने कह सुनाया। तिलोत्तमा बाणासुरकी पुत्री उषा होकर अनिरुद्धकी पत्नी हुई । (अध्याय २३)