नन्दजीने पूछा-
प्रभो ! किस स्वप्रसे कौन सा पुण्य होता है और किससे मोक्ष एवं सुखकी सूचना मिलती है? कौन-कौन-सा स्वप्न शुभ बताया गया है ?
श्रीभगवान् बोले-
तात! वेदोंमें सामवेद समस्त कर्मोंके लिये श्रेष्ठ बताया गया है। इसी प्रकार कण्वशाखाके मनोहर पुण्यकाण्डमें भी इस विषयका वर्णन है। जो दुःस्वप्न है और जो सदा पुण्यफल देनेवाला सुस्वप्न है, वह सब जैसा पूर्वोक्त कण्वशाखामें बताया गया है; उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। यह स्वप्नाध्याय अधिक पुण्य फल देनेवाला है। अतः इसका वर्णन करता हूँ। इसका श्रवण करनेसे मनुष्यको गङ्गास्नान के फलकी प्राप्ति होती है। रातके पहले पहरमें देखा गया स्वप्न एक वर्षमें फल देता है। दूसरे पहरका स्वप्न आठ महीनोंमें, तीसरे पहरका स्वप्न तीन महीनों में और चौथे पहरका स्वप्न एक पक्षमें अपना फल प्रकट करता है। अरुणोदयकी बेलामें देखा गया स्वप्न दस दिनमें फलद होता है। प्रातः कालका स्वप्न यदि तुरंत नींद टूट जाय तो तत्काल फल देनेवाला होता है। दिनको मनमें जो कुछ देखा और समझा गया है, वह सब अवश्य सपनेमें लक्षित होता है। तात! चिन्ता या रोगसे युक्त मनुष्य जो स्वप्न देखता है, वह सब निःसंदेह निष्फल होता है। जो जडतुल्य है, मल-मूत्रके वेगसे पीड़ित है, भयसे व्याकुल है, नग्न है और बाल खोले हुए है, उसे अपने देखे हुए स्वप्रका कोई फल नहीं मिलता। निद्रालु मनुष्य स्वप्न देखकर यदि पुनः नींद लेने लग जाता है अथवा मूढ़तावश रातमें ही किसी दूसरेसे कह देता है; तब उसे उस स्वप्नका फल नहीं मिलता। किसी नीच पुरुषसे, शत्रुसे, मूर्ख मनुष्यसे, स्त्रीसे अथवा रातमें ही किसी दूसरेसे स्वप्नकी बात कह देनेपर मनुष्यको विपत्ति, दुर्गति, रोग, भय, कलह, धनहानि एवं चोर भयका सामना करना पड़ता है। व्रजेश्वर! स्वप्नमें गौ, हाथी, अश्व, महल, पर्वत और वृक्षोंपर चढ़ना, भोजन करना तथा रोना धनप्रद कहा गया है। हाथमें वीणा लेकर गीत गाना खेतीसे भरी हुई भूमिकी प्राप्तिका सूचक होता है। यदि स्वप्नमें शरीर अस्त्र-शस्त्रसे विद्ध हो जाय, उसमें घाव हों, कीड़े हो जायँ, विष्ठा अथवा खूनसे शरीर लिप्त हो जाय तो यह धनकी प्राप्तिका सूचक है। स्वप्नमें अगम्या स्त्रीके साथ समागम भार्याप्राप्तिकी सूचना देनेवाला है। जो स्वप्रमें मूत्रसे भीग जाता, वीर्यपात करता, नरकमें प्रवेश करता, नगर या लाल समुद्र में घुसता अथवा अमृत पान करता है; वह जगनेपर शुभ समाचार पाता है और उसे प्रचुर धनराशिका लाभ होता है। स्वप्नमें हाथी, राजा, सुवर्ण, वृषभ, धेनु, दीपक, अन्न, फल, पुष्प, कन्या, छत्र, ध्वज और रथका दर्शन करके मनुष्य कुटुम्ब, कीर्ति और विपुल सम्पत्तिका भागी होता है। भरे हुए घड़े, ब्राह्मण, अग्नि, फूल, पान, मन्दिर, श्वेत धान्य, नट एवं नर्तकीको स्वप्नमें देखनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। गोदुग्ध और घीके दर्शनका भी यही फल है। सपनेमें कमलके पत्तेपर खीर, दही, दूध, घी, मधु और स्वस्तिक नामक मिष्टान्न खानेवाला मनुष्य भविष्यमें अवश्य ही राजा होता है। छत्र, पादुका और निर्मल एवं तीखे खड्गकी प्राप्ति धान्य लाभकी सूचना देती है। खेल-खेलमें ही पानीके ऊपर तैरनेवाला मनुष्य प्रधान होता है। फलवान् वृक्षका दर्शन और सर्पका दंशन धन प्राप्तिका सूचक है। स्वप्रमें सूर्य और चन्द्रमाके दर्शनसे रोग दूर होता है। घोड़ी, मुर्गी और क्रौञ्चीको देखनेसे भार्याका लाभ होता है। स्वप्रमें जिसके पैरोंमें बेड़ी पड़ गयी, उसे प्रतिष्ठा और पुत्रकी प्राप्ति होती है। जो सपनेमें नदीके किनारे नये अथवा फटे-पुराने कमलके पत्तेपर दही मिला हुआ अन्न और खीर खाता है; वह भविष्यमें राजा होता है। जलौका (जोंक), बिच्छू और साँप यदि स्वप्नमें दिखायी दें तो धन, पुत्र विजय एवं प्रतिष्ठाकी प्राप्ति होती है। सींग और बड़ी-बड़ी दाढ़वाले पशुओं, सूअरों और वानरोंसे यदि स्वप्नमें पीडा प्राप्त हो तो मनुष्य निश्चय ही राजा होता और प्रचुर धन राशि प्राप्त कर लेता है। जो स्वप्नमें मत्स्य, मांस, मोती, शङ्ख, चन्दन, हीरा, शराब, खून, सुवर्ण, विष्ठा तथा फले-फूले बेल और आमको देखता है; उसे धन मिलता है। प्रतिमा और शिवलिङ्गके दर्शनसे विजय और धनकी प्राप्ति होती है। प्रज्वलित अग्निको देखकर मनुष्य धन, बुद्धि और लक्ष्मी पाता है। आँवला और कमल धनप्राप्तिका सूचक है। देवता, द्विज, गौ, पितर और साम्प्रदायिक चिह्नधारी पुरुष स्वप्रमें परस्पर जिस वस्तुको देते हैं; उसका फल भी वैसा ही होता है। श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत अनुलेपनसे सुसज्जित सुन्दरियाँ स्वप्नमें जिस पुरुषका आलिङ्गन करती हैं, उसे सुख और सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है। जो पुरुष स्वप्रमें पीत वस्त्र, पीले पुष्पोंकी माला और पीले रंगका अनुलेपन धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन करता है; उसे कल्याणकी प्राप्ति होती है। स्वप्नमें भस्म, रूई और हड्डीको छोड़कर शेष सभी श्वेत वस्तुएँ प्रशंसित हैं और कृष्णा गौ, हाथी, घोड़े, ब्राह्मण तथा देवताको छोड़कर शेष सभी काली वस्तुएँ अत्यन्त निन्दित हैं।
रत्नमय आभूषणों से विभूषित दिव्य ब्राह्मणजातीय स्त्री मुस्कराती हुई जिसके घरमें आती है; उसे निश्चय ही प्रिय पदार्थकी प्राप्ति होती है। स्वप्रमें ब्राह्मण देवताका स्वरूप है और ब्राह्मणी देवकन्याका ब्राह्मण और ब्राह्मणी संतुष्ट हो मुस्कराते हुए स्वप्नमें जिसको कोई फल दें, उसे पुत्र होता है। पिताजी! ब्राह्मण स्वप्नमें जिसे शुभाशीर्वाद देते हैं, उसे अवश्य ऐश्वर्य प्राप्त होता है सपनेमें संतुष्ट ब्राह्मण जिसके घर आ जाय; उसके यहाँ नारायण, शिव और ब्रह्माका प्रवेश होता है; उसे सम्पत्ति, महान् सुयश, पग-पगपर सुख, सम्मान और गौरवकी प्राप्ति होती है। यदि स्वप्नमें अकस्मात् गौ मिल जाय तो भूमि और पतिव्रता स्त्री प्राप्त होती है। स्वप्नमें जिस पुरुषको हाथी सूँड़से उठाकर अपने माथेपर बिठा ले; उसे निश्चय ही राज्य लाभ होगा। स्वप्नमें संतुष्ट ब्राह्मण जिसे हृदयसे लगाये और फूल हाथमें दे; वह निश्चय ही सम्पत्तिशाली, विजयी, यशस्वी और सुखी होता है। साथ ही उसे तीर्थस्नानका पुण्य प्राप्त होता है। स्वप्नमें तीर्थ, अट्टालिका और रत्नमय गृहका दर्शन हो तो उससे भी पूर्वोक्त फलकी ही प्राप्त होती है। स्वप्रमें यदि कोई भरा हुआ कलश दे तो पुत्र और सम्पत्तिका लाभ होता है। हाथमें कुडव या आढक लेकर स्वप्नमें कोई वाराङ्गना जिसके घर आती है; उसे निश्चय ही लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। जिसके घर पत्नी के साथ ब्राह्मण आता है; उसके यहाँ पार्वतीसहित शिव अथवा लक्ष्मीके साथ नारायणका शुभागमन होता है। ब्राह्मण और ब्राह्मणी स्वप्रमें जिसे धान्य, पुष्पाञ्जलि, मोतीका हार, पुष्पमाला और चन्दन देते हैं तथा जिसे स्वप्नमें गोरोचन, पताका, हल्दी, ईख और सिद्धान्नका लाभ होता है; उसे सब ओर से लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। ब्राह्मण और ब्राह्मणी स्वप्रावस्थामें जिसके मस्तकपर छत्र लगाते अथवा श्वेत धान्य बिखेरते हैं या अमृत, दही और उत्तम पात्र अर्पित करते हैं अथवा जो स्वप्नमें श्वेत माला और चन्दनसे अलंकृत हो रथपर बैठकर दही या खीर खाता है; वह निश्चय ही राजा होता है। स्वप्नमें रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित आठ वर्षकी कुमारी कन्या जिसपर संतुष्ट हो जाती है और जिस पुण्यात्माको पुस्तक देती है; वह विश्वविख्यात कवीश्वर एवं पण्डितराज होता है जिसे स्वप्नमें माताकी भाँति वह पढ़ाती है; वह सरस्वती पुत्र होता है और अपने समयका सबसे बड़ा पण्डित माना जाता है। यदि विद्वान् ब्राह्मण किसीको पिताकी भाँति यत्नपूर्वक पढ़ावे या प्रसन्नतापूर्वक पुस्तक दे तो वह भी उसीके समान विद्वान् होता है जो स्वप्नमें मार्गपर या जहाँ कहीं भी पड़ी हुई पुस्तक पाता है; वह भूतलपर विख्यात एवं यशस्वी पण्डित होता है। जिसे ब्राह्मण-ब्राह्मणी स्वप्रमें महामन्त्र दें; वह पुरुष विद्वान्, धनवान् और गुणवान् होता है। ब्राह्मण स्वप्नमें जिसे मन्त्र अथवा शिलामयी प्रतिमा देता है; उसे मन्त्रसिद्धि प्राप्त होती है। यदि ब्राह्मण स्वप्रमें ब्राह्मणसमूहका दर्शन एवं वन्दन करके आशीर्वाद पाता है तो वह राजाधिराज अथवा महान् कवि एवं पण्डित होता है। स्वप्नमें ब्राह्मण जिसे संतुष्ट होकर श्वेत धान्ययुक्त भूमि देता है; वह राजा होता है। ब्राह्मण जिसे स्वप्नमें रथपर बिठाकर नाना प्रकारके स्वर्ग दिखाता है; वह चिरंजीवी होता है तथा उसकी आयु एवं सम्पत्तिकी निश्चय ही वृद्धि होती है। सपनेमें संतुष्ट ब्राह्मण जिस ब्राह्मणको अपनी कन्या देता है; वह सदा धनाढ्य राजा होता है। स्वप्नमें सरोवर, समुद्र, नदी, नद, श्वेत सर्प और श्वेत पर्वतका दर्शन करनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। जो स्वप्रमें अपनेको मरा हुआ देखता है, वह चिरंजीवी होता है। रोगी देखनेपर नीरोग होता है। और सुखी देखनेपर निश्चय ही दुःखी होता है। दिव्य नारी जिससे स्वप्नमें कहती है कि आप मेरे स्वामी हैं और वह उस स्वप्रको देखकर तत्काल जाग उठता है तो अवश्य राजा होता है। स्वप्रमें कालिकाका दर्शन करके और स्फटिककी माला, इन्द्र धनुष एवं वज्रको पाकर मनुष्य अवश्य ही प्रतिष्ठा भागी होता है। स्वप्नमें ब्राह्मण जिससे कहे कि तुम मेरे दास हो जाओ, वह मेरी दास्यभक्ति पाकर वैष्णव हो जाता है। स्वप्नावस्था में ब्राह्मण शिव और विष्णुका स्वरूप है। ब्राह्मणी लक्ष्मी एवं पार्वतीका प्रतीक है तथा श्वेतवर्णा स्त्री वेदमाता सावित्री, गङ्गा एवं सरस्वतीका रूप है। ग्वालिनका वेष धारण करनेवाली बालिका मेरी राधिका है और बालक बाल-गोपालका स्वरूप है। स्वप्रविज्ञानके जाननेवाले विद्वानों ने इस रहस्यको प्रकाशित किया है। पिताजी! यह मैंने पुण्यदायक उत्तम स्वप्नोंका वर्णन किया है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? (अध्याय ७७ )
Summary of chapter 80 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
This practical chapter outlines the immense spiritual merits gained by observing strict vows and fasts on sacred days, particularly Ekādashī and Śrī Kṛshṇa Janmāshṭamī. The text asserts that fasting on Ekādashī cleanses all physical and subtle sins, purifies the mind, and attracts the special mercy of Lord Śrī Kṛshṇa. Celebrating the midnight advent of Śrī Kṛshṇa on Janmāshṭamī with worship, fasting, and devotional chanting bestows the spiritual benefit of performing thousands of pilgrimages, guaranteeing freedom from rebirth.