श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - श्री कृष्ण जनन खंड

11- तृणावर्तका उद्धार तथा उसके पूर्वजन्मका परिचय

भगवान् नारायण कहते हैं-

नारद! एक दिन गोकुलमें सती साध्वी नन्दरानी यशोदा बालकको गोदमें लिये घरके कामकाजमें लगी हुई थीं। उस समय गोकुलमें बवंडरका रूप धारण करनेवाला तृणावर्त आ रहा था। मन-ही- मन उसके आगमनकी बात जानकर श्रीहरिने अपने शरीरका भार बढ़ा लिया। उस भारसे पीड़ित होकर मैया यशोदाने लालाको गोदसे उतार दिया और खाटपर सुलाकर वे यमुनाजीके किनारे चली गयीं। इसी बीचमें वह बवंडररूपधारी असुर वहाँ आ पहुँचा और उस बालकको लेकर घुमाता हुआ सौ योजन ऊपर जा पहुँचा। उसने वृक्षोंकी डालियाँ तोड़ दीं तथा इतनी धूल उड़ायी कि गोकुलमें अँधेरा छा गया। उस मायावी असुरने तत्काल यह सब उत्पात किया फिर वह स्वयं भी श्रीहरिके भारसे आक्रान्त हो वहीं पृथ्वीपर गिर पड़ा। श्रीहरिका स्पर्श प्राप्त करके वह असुर भी भगवद्धामको चला गया। अपने कर्मोंका नाश करके सुन्दर दिव्य रथपर आरूढ़ हो गोलोकमें जा पहुँचा। वह पाण्ड्यदेशका राजा था और दुर्वासाके शापसे असुर हो गया था। श्रीकृष्णके चरणोंका स्पर्श पाकर उसने गोलोकधाममें स्थान प्राप्त कर लिया।

मुने! बवंडरका रूप समाप्त होनेपर भयसे विह्वल गोप-गोपियोंने जब खोज की, तब बालकको शय्यापर न देखकर सब लोग शोकसे व्याकुल हो भयसे अपनी-अपनी छाती पीटने लगे। कुछ लोग मूच्छित हो गये और कितने ही फूट-फूटकर रोने लगे। खोजते खोजते उन्हें वह बालक व्रजके भीतर एक फुलवाड़ीमें पड़ा दिखायी दिया। उसके सारे अङ्ग धूलसे धूसर हो रहे थे। एक सरोवरके बाहरी तटपर जो पानीसे भीगा हुआ था, पड़ा हुआ वह बालक आकाशकी ओर एकटक देखता और भयसे कातर होकर बोलता था। नन्दजीने तत्काल बच्चेको उठाकर छातीसे लगा लिया और उसका मुँह देख-देखकर वे शोकसे व्याकुल हो रोने लगे। माता यशोदा और रोहिणी भी शीघ्र ही बालकको देखकर रो पड़ीं तथा उसे गोदमें लेकर बार-बार उसका मुँह चूमने लगीं। उन्होंने बालकको नहलाया और उसकी रक्षाके लिये मङ्गलपाठ करवाया। इसके बाद यशोदाजी अपने लालाको स्तन पिलाया। उस समय उनके मुख और नेत्रों में प्रसन्नता छा रही थी।

नारदजीने पूछा- भगवन्! पाण्ड्यदेशके राजाको दुर्वासाजीने क्यों शाप दिया? आप इस प्राचीन इतिहासको भलीभाँति विचार करके कहिये।

भगवान् नारायण बोले -

एक बार पाण्ड्यदेशके प्रतापी राजा अपनी एक हजार पत्नियोंको साथ लेकर मनोहर निर्जन प्रदेशमें गन्धमादन पर्वतकी नदी तीरस्थ पुष्पवाटिका में जाकर सुखसे विहार करने लगे। एक दिन वे नदीमें अपनी पत्नियोंके साथ जलक्रीडा कर रहे थे। उस समय उन लोगोंके वस्त्र अस्तव्यस्त थे।

इसी बीच अपने हजारों शिष्योंको साथ लिये महामुनि दुर्वासा उधरसे निकले। मतवाले सहस्त्राक्षने उनको देख लिया, पर वे न जलसे निकले, न प्रणाम किया, न वाणीसे या हाथके संकेतसे ही कुछ कहा। इस निर्लज्जता और उद्दण्डताको देखकर दुर्वासाने उनको योगभ्रष्ट होकर भारतमें लाख वर्षोंतक असुरयोनिमें रहनेका शाप दे दिया और कहा कि 'इसके अनन्तर श्रीहरिके चरण कमलका स्पर्श प्राप्त होनेपर असुरयोनिसे उद्धार होकर तुम्हें गोलोककी प्राप्ति होगी। और उनकी पत्रियोंसे कहा कि 'तुमलोग भारतमें जाकर विभिन्न स्थानों में राजाओंके घरोंमें जन्म धारण करके राजकन्या होओगी।'

मुनीन्द्रके शापको सुनकर सब लोग हाहाकार कर उठे। राजा सहस्राक्षकी पत्नियाँ करुण विलाप करने लगीं अन्तमें राजाने एक बड़े अग्निकुण्डका निर्माण किया और श्रीहरिके चरणकमलोंका हृदयमें चिन्तन करते हुए वे पत्नियोंसहित उसमें प्रविष्ट हो गये।

इस प्रकार वे राजा सहस्राक्ष तृणावर्त नामक असुर होनेके पश्चात् श्रीहरिका स्पर्श पाकर उनके परमधाममें चले गये और उनकी रानियोंने भारतवर्षमें मनोवाञ्छित जन्म ग्रहण किया। इस तरह श्रीहरिका यह सारा उत्तम माहात्म्य कहा गया। साथ ही मुनिवर दुर्वासाके शापवश असुरयोनिमें पड़े हुए पाण्ड्यनरेशके उद्धारका प्रसङ्ग भी सुनाया गया। (अध्याय ११)