श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - श्री कृष्ण जनन खंड

79- दुःस्वप्न, उनके फल तथा उनकी शान्तिके उपायका वर्णन

तदनन्तर सूर्यग्रहण चन्द्रग्रहणादिके विषयमें कहकर नन्द बाबाके पूछनेपर भगवान् कहने लगे।

श्रीभगवान् बोले-

नन्दजी ! जो स्वप्नमें हर्षातिरेकसे अट्टहास करता है अथवा यदि विवाह और मनोऽनुकूल नाच-गान देखता है तो उसके लिये विपत्ति निश्चित है। स्वप्नमें जिसके दाँत तोड़े जाते हैं और वह उन्हें गिरते हुए देखता है तो उसके धनकी हानि होती है और उसे शारीरिक कष्ट भोगना पड़ता है। जो तेलसे स्नान करके गदहे, ऊँट और भैंसेपर सवार हो दक्षिण दिशाकी ओर जाता है; निःसंदेह उसकी मृत्यु हो जाती है। यदि स्वप्नमें कानमें लगे हुए अड़हुल, अशोक और करवीरके पुष्पको तथा तेल और नमकको देखता है तो उसे विपत्तिका सामना करना पड़ता है। नंगी, काली, नक-कटी, शूद्र विधवा तथा जटा और ताड़के फलको देखकर मनुष्य शोकको प्राप्त होता है। स्वप्नमें कुपित हुए | ब्राह्मण तथा क्रुद्ध हुई ब्राह्मणीको देखनेवाले मनुष्यपर निश्चय ही विपत्ति आती है और लक्ष्मी उसके घरसे चली जाती हैं। जंगली पुष्प, लाल फूल, भलीभाँति पुष्पोंसे लदा पलाश, कपास और सफेद वस्त्रको देखकर मनुष्य दुःखका भागी होता है। काला वस्त्र धारण करनेवाली काले रंगकी विधवा स्त्रीको हँसती और गाती हुई देखकर मनुष्य मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जिसे स्वप्नमें देवगण नाचते गाते, हँसते, ताल ठोंकते और दौड़ते हुए दीख पड़ते हैं; उसका शरीर मृत्युका शिकार हो जायगा जो स्वप्नमें काले पुष्पोंकी माला और कृष्णाङ्गरागसे सुशोभित एवं काला वस्त्र धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन करता है; उसकी मृत्यु हो जायगी। जो स्वप्नमें मृगका मरा हुआ छौना, मनुष्यका मस्तक और हड्डियोंकी माला पाता है; उसके लिये विपत्ति निश्चित है। जो ऐसे रथपर, जिसमें गदहे और ऊँट जुते हुए हों, अकेले सवार होता है और उसपर बैठकर फिर जागता है तो निःसंदेह वह मौतका ग्रास बन जाता है। जो अपनेको हवि, दूध, मधु, मट्ठा और गुड़से सराबोर देखता है; वह निश्चय ही पीड़ित होता है। जो स्वप्रमें लाल पुष्पोंकी माला एवं लाल अङ्गरागसे युक्त तथा लाल वस्त्र धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन करता है; वह रोगग्रस्त हो जाता हैं, यह निश्चित है। गिरे हुए नख और केश, बुझा हुआ अंगार और भस्मपूर्ण चिताको देखकर मनुष्य अवश्य ही मृत्युका शिकार बन जाता है। श्मशान, काष्ठ, सूखा घास- फूस, लोहा, काली स्याही और कुछ-कुछ काले रंगवाले घोड़ेको देखनेसे अवश्यमेव दुःखकी प्राप्ति होती है। पादुका, ललाटकी हड्डी, लाल पुष्पोंकी भयावनी माला, उड़द, मसूर और मूँग देखनेसे तुरंत शरीरमें घाव या फोड़ा हो जाता है। स्वप्नमें सेना, गिरगिट, कौआ, भालू, वानर, नीलगाय, पीब और शरीरके मलका देखा जाना केवल व्याधिका कारण होता है। स्वप्नमें फूटा बर्तन, घाव, शूद्र, गलत्कुष्ठी, रोगी, लाल वस्त्र, जटाधारी, सूअर, भैंसा, गदहा, महाघोर अन्धकार, मरा हुआ भयंकर जीव और योनि चिह्न देखकर मनुष्य निश्चय ही विपत्तिमें फँस जाता है। कुवेषधारी म्लेच्छ और पाश ही जिसका शस्त्र है, ऐसे पाशधारी भयंकर यमदूतको देखकर मनुष्य मृत्युको प्राप्त हो जाता है। ब्राह्मण, ब्राह्मणी, छोटी कन्या और बालक-पुत्र क्रोधवश विलाप करते हों तो उन्हें देखकर दुःखकी प्राप्ति होती है। काला फूल, काले फूलोंकी माला, शस्त्रास्त्रधारी सेना और विकृत आकारवाली म्लेच्छवर्णकी स्त्रीको देखनेसे निस्संदेह मृत्यु गले लग जाती है। बाजा, नाच, गान, गवैया, लाल वस्त्र, बजाया जाता हुआ मृदङ्ग-इन्हें देखकर अवश्यमेव दुःख मिलता है। प्राणरहित (मुर्दे) - को देखकर निश्चय ही मृत्यु होती है और जो मत्स्य आदिको धारण करता है, उसके भाईका मरण ध्रुव है। घायल अथवा बिना सिरका धड़ अथवा मुण्डित सिरवाले एवं शीघ्रतापूर्वक नाचते हुए बेडौल प्राणीको देखकर मनुष्य मौतका भागी हो जाता है। मरा हुआ पुरुष अथवा मरी

हुई काले रंगकी भयानक म्लेच्छनारी जिसका स्वप्नमें आलिङ्गन करती है; उसका मर जाना निश्चित है। स्वप्नमें जिनके दाँत टूट जायँ और बाल गिर रहे हों तो उसके धनकी हानि होती है अथवा वह शारीरिक पीड़ासे दुःखी होता है। स्वप्नमें जिसके ऊपर सींगधारी अथवा दंष्ट्रावाले जीव तथा बालक और मनुष्य टूटे पड़ते हों; उसे राजाकी ओरसे भय प्राप्त होता है। गिरता हुआ कटा वृक्ष, शिलावृष्टि, भूसी, छूरा, लाल अङ्गारा और राखकी वर्षा देखनेसे दुःखकी प्राप्ति होती है। गिरते हुए ग्रह अथवा पर्वत, भयानक धूमकेतु अथवा टूटे हुए कंधेवाले मनुष्यको देखकर स्वप्रद्रष्टा दुःखका भागी होता है। जो स्वप्रमें रथ, घर, पर्वत, वृक्ष, गौ, हाथी और घोड़ा आकाश भूतलपर गिरता देखता है; उसके लिये विपत्ति निश्चित है। जो भस्म और अङ्गारयुक्त गड्डोंमें, क्षारकुण्डोंमें तथा धूलिकी राशिपर ऊँचाईसे गिरते हैं; निस्संदेह उनकी मृत्यु होती है। जिसके मस्तकपरसे कोई दुष्ट बलपूर्वक छत्र खींच लेता है; उसके पिता, गुरु अथवा राजाका नाश हो जाता है। जिसके घरसे भयभीत हुई गौ बछड़ेसहित चली जाती है; उस पापीकी लक्ष्मी और पृथ्वी भी नष्ट हो जाती है। म्लेच्छ यमदूत जिसे पाशसे बाँधकर ले जाते हैं; उसकी मृत्यु निश्चित है। जिसे ज्योतिषी ब्राह्मण, ब्राह्मणी तथा गुरु रुष्ट होकर शाप देते हैं; उसे निश्चय ही विपत्ति भोगनी पड़ती है। जिसके शरीरपर शत्रुदल, कौए, मुर्गे और रीछ आकर टूट पड़ते हैं; उसकी अवश्य मृत्यु हो जाती हैं और स्वप्नमें जिसके ऊपर भैंसे, भालू, ऊँट, सूअर और गदहे क्रुद्ध होकर धावा करते हैं; वह निश्चय ही रोगी हो जाता है। जो लाल चन्दनकी लकड़ीको घीमें डुबोकर एक सहस्र गायत्री मन्त्रद्वारा अग्निमें हवन करता है; उसका दुःस्वप्रजनित दोष शान्त हो जाता है। जो भक्तिपूर्वक इन मधुसूदनका एक हजार जप करता है; वह निष्पाप हो जाता है और उसका दुःस्वप्न भी सुखदायक हो जाता है। जो विद्वान् पवित्र हो पूर्वकी ओर मुख करके अच्युत, केशव, विष्णु, हरि, सत्य, जनार्दन, हंस, नारायण इन आठ शुभ नामोंका दस बार जप करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है तथा दुःस्वप्न भी शुभकारक हो जाता है। जो भक्त भक्तिपूर्वक विष्णु, नारायण, कृष्ण, माधव, मधुसूदन, हरि, नरहरि, राम, गोविन्द, दधिवामन - इन दस माङ्गलिक नामोंको जपता है; वह सौ बार जप करके नीरोग हो जाता है। जो एक लाख जप करता है; वह निश्चय ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। दस लाख जप करके महावन्ध्या पुत्रको जन्म देती है। शुद्ध एवं हविष्यका भोजन करके जपनेवाला दरिद्र इनके जपसे धनी हो जाता है। एक करोड़ जप करके मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। नारायणक्षेत्रमें शुद्धतापूर्वक जप करनेवाले मनुष्यको सारी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। जो जलमें स्नान करके 'ॐ नमः' के साथ शिव, दुर्गा, गणपति, कार्तिकेय, दिनेश्वर, धर्म, गङ्गा, तुलसी, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती - इन मङ्गल नामोंका जप करता है; उसका मनोरथ सिद्ध हो जाता है और दुःस्वप्न भी शुभदायक हो जाता है।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गतिनाशिन्यै महामायायै स्वाहा' यह सप्तदशाक्षर मन्त्र लोगोंके लिये कल्पवृक्षके समान है। इसका पवित्रतापूर्वक दस बार जप करनेसे दुःस्वप्र सुखदायक हो जाता है। एक करोड़ जप करनेसे मनुष्योंको मन्त्र सिद्ध हो जाता है और सिद्धमन्त्रवाला मनुष्य अपनी सारी अभीष्ट सिद्धियोंको पा लेता है। जो मनुष्य ॐ नमो मृत्युञ्जयाय स्वाहा' – इस मन्त्रका एक लाख जप करता है, वह स्वप्नमें मरणको देखकर भी सौ वर्षकी आयुवाला हो जाता है। पूर्वोत्तरमुख होकर किसी विद्वान्से ही अपने स्वप्रको कहना चाहिये; किंतु जो शराबी, दुर्गतिप्राप्त, नीच, देवता और ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाला, मूर्ख और (स्वप्नके शुभाशुभ फलका) अनभिज्ञ हो; उसके सामने स्वप्रको नहीं प्रकट करना चाहिये। पीपलका वृक्ष, ज्योतिषी, ब्राह्मण, पितृस्थान, देवस्थान, आर्यपुरुष, वैष्णव और मित्रके सामने दिनमें देखा हुआ स्वप्न प्रकाशित करना चाहिये। इस प्रकार मैंने आपसे इस पवित्र प्रसङ्गका वर्णन कर दिया; यह पापनाशक, धनकी वृद्धि करनेवाला, यशोवर्धक और आयु बढ़ानेवाला है। अब और क्या सुनना चाहते हैं ? (अध्याय ७९-८२)