भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-
प्रिये ! तदनन्तर महादेवजीने वैदिक विधिसे अग्निकी स्थापना करके पार्वतीको अपने वामभागमें बिठाकर वहीं यज्ञ (वैवाहिक होम) किया। वृन्दावन-विनोदिनि ! उस यज्ञके विधिपूर्वक सम्पन्न हो जानेपर भगवान् शिवने ब्राह्मणको दक्षिणाके रूपमें सौ सुवर्ण दिये। तत्पश्चात् गिरिराजके नगरकी स्त्रियोंने प्रदीप लाकर माङ्गलिक कृत्यका सम्पादन किया। फिर वे नव दम्पतिको घरमें ले गयीं। उन सबने प्रेमपूर्वक जयध्वनि तथा शुभ निर्मञ्छन आदि करके मन्द मुस्कराहटके साथ कटाक्षपूर्वक शिवकी ओर देखा। उस समय उनके अङ्गों में रोमाञ्च हो आया था। वास भवनमें प्रवेश करके कामिनियोंने देखा- शंकर अत्यन्त सुन्दर रूप और वेश-भूषासे सुशोभित हैं। उनका प्रत्येक अङ्ग रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित है। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा कुंकुमसे अलंकृत है। उनके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही है। वे कटाक्षपूर्वक देखते और मनको हर लेते हैं। उनकी वेश-भूषा अपूर्व एवं सूक्ष्म है। वे सिन्दूर विन्दुओंसे विभूषित हैं। उनकी गौर - कान्ति मनोहर चम्पाकी आभाको तिरस्कृत कर रही है। वे सर्वाङ्गसुन्दर नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा मुनीन्द्रोंके भी चित्तको मोह लेनेवाले हैं। वहाँ सरस्वती, लक्ष्मी, सावित्री, गङ्गा, रति, अदिति, शची, लोपामुद्रा, अरुन्धती, अहल्या, तुलसी, स्वाहा, रोहिणी, वसुन्धरादेवी, शतरूपा तथा संज्ञा ये सोलह देवाङ्गनाएँ भी उपस्थित थीं। इनके सिवा और भी बहुत सी मनोहर रूपवाली देवकन्याएँ, नागकन्याएँ तथा मुनिकन्याएँ वहाँ आयी थीं। उस समय जो देवाङ्गनाएँ गिरिराजके भवनमें विराजमान थीं, उन सबकी संख्या बतानेमें कौन समर्थ है ?
उनके दिये हुए रत्नमय सिंहासनपर दूलह शिव प्रसन्नतापूर्वक बैठे। उस समय उन सोलह दिव्य देवियोंने सुधाके समान मधुर वाणी में भगवान् शंकरको बधाई दी। उनके साथ विनोदभरी बातें कीं और पार्वतीको सुख पहुँचानेके लिये विनम्र अनुरोध किया। इसी समय भगवान् शंकरने रतिपर कृपा की। रतिने गाँठमें बँधी हुई कामदेवके शरीरकी भस्मराशि उनके सामने रख दी और शिवने अपनी अमृतमयी दृष्टिसे देखकर भस्मके उस ढेरसे पुनः कामदेवको प्रकट कर दिया। तत्पश्चात् योगियोंके परम गुरु निर्विकार भगवान् शंकरने उन परिहासपरायणा देवियोंसे कहा- 'आप सब की सब साध्वी तथा जगन्माताएँ हैं, फिर मुझ पुत्रके प्रति यह चपलता क्यों ?' शिवकी यह बात सुनकर वे देवियाँ सम्भ्रमपूर्वक चित्रलिखी-सी खड़ी रह गयीं। इसके बाद शंकरजीने भोजन किया। फिर उन्होंने मनोहर राजसिंहासनपर विराजमान हो उस दिव्य निवासगृहकी अनुपम शोभा एवं चित्रकारी देखी। यह सब देखकर उन्हें आश्चर्य और परम संतोष हुआ। रातको उन्होंने उसी दिव्य भवनमें विश्राम किया। प्राणवल्लभे! जब प्रातः काल हुआ, तब नाना प्रकारके वाद्योंकी मधुर ध्वनि होने लगी। फिर तो सब देवता वेगपूर्वक उठे और वेश-भूषासे सज्जित हो अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर कैलासकी यात्रा के लिये उद्यत हो गये। उस समय नारायणकी आज्ञासे धर्म उस वासभवनमें गये और योगीश्वर शंकरसे समयोचित वचन बोले।
धर्मने कहा-
प्रमथेश्वर! आपका कल्याण हो। उठिये, उठिये और श्रीहरिका स्मरण करते हुए माहेन्द्र योगमें पार्वती के साथ यात्रा कीजिये। वृन्दावनविनोदिनि! धर्मकी बात सुनकर शंकरने पार्वतीके साथ माहेन्द्र योगमें यात्रा आरम्भ की। पार्वती के साथ देवेश्वर शंकरके यात्रा करते समय मेना उच्चस्वरसे रो पड़ीं और उन कृपानिधानसे बोलीं।
मेनाने कहा-
कृपानिधे कृपा करके मेरी बच्चीका पालन कीजियेगा। आप आशुतोष हैं। इसके सहस्रों दोषोंको क्षमा कीजियेगा। मेरी बेटी जन्म-जन्ममें आपके चरणकमलोंमें अनन्यभक्ति रखती आयी है। सोते-जागते हर समय इसे अपने स्वामी महादेवके सिवा दूसरे किसीकी याद नहीं आती है। आपके प्रति भक्तिकी बातें सुनते ही इसका अङ्ग अङ्ग पुलकित हो उठता है और नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहने लगते हैं। मृत्युञ्जय! आपकी निन्दा कानमें पड़नेपर यह ऐसी मौन हो जाती है, मानो मर गयी हो। मेना यह कह ही रही थीं कि हिमवान् तत्काल वहाँ आ पहुँचे और अपनी बच्चीको छातीसे लगा फूट-फूटकर रोने लगे- 'वत्से! हिमालयको - मेरे इस घरको सूना करके तू कहाँ चली जा रही है? तेरे गुणोंको याद करके मेरा हृदय अवश्य ही विदीर्ण हो जायगा।' यों कहकर शैलराजने अपनी शिवा शिवको सौंप दी और पुत्र तथा बन्धु बान्धवोंसहित वे बारंबार उच्चस्वरसे रोदन करने लगे। उस समय कृपानिधान साक्षात् भगवान् नारायणने उन सबको कृपापूर्वक अध्यात्मज्ञान देकर धीरज बँधाया। पार्वतीने भक्तिभावसे माता- पिता और गुरुको प्रणाम किया। वे महामायारूपिणी हैं; अतः मायाका आश्रय ले बारंबार जोर-जोरसे रोने लगीं। पार्वतीके रोनेसे ही वहाँ सब स्त्रियाँ रोने लगीं पत्नियों तथा सेवकगणोंसहित सम्पूर्ण देवता और मुनि भी रो पड़े। फिर वे मानसशायी देवता शीघ्र ही कैलासपर्वतको चल दिये तथा दो ही घड़ीमें शिवके निवासस्थानपर सानन्द जा पहुँचे। यह देखकर वहाँके मङ्गल कृत्यका सम्पादन करनेके लिये देवताओं और मुनियोंकी पत्तियाँ भी दीप लिये शीघ्रतापूर्वक सहर्ष वहाँ आ गयीं वायु, कुबेर और शुक्रकी स्त्रियाँ, बृहस्पतिकी पत्नी तारा, दुर्वासाकी स्त्री, अत्रि भार्या अनसूया, चन्द्रमाकी पत्नियाँ, देवकन्या, नागकन्या तथा सहस्रों मुनिकन्याएँ वहाँ उपस्थित हुई। वहाँ जिन असंख्य कामिनियोंका समूह आया था, उन सबकी गणना करनेमें कौन समर्थ है ? उन सबने मिलकर नवदम्पतिका उनके निवास मन्दिरमें प्रवेश कराया तथा उन महेश्वरको रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बिठाया। वहाँ भगवान् शिवने सतीको उनका पहलेवाला घर दिखाया और प्रसन्नतापूर्वक पूछा- 'प्रिये! क्या तुम्हें अपने इस घरकी याद आती है? यहींसे तुम अपने पिताके निवास स्थानको गयी थीं अन्तर इतना ही है कि इस समय तुम गिरिराजकुमारी हो और उस समय यहाँ दक्षकन्याके रूपमें निवास करती थीं। तुम्हें पूर्वजन्मकी बातोंका सदा स्मरण रहता है; इसीलिये पिछली बातोंकी याद दिला रहा हूँ। यदि तुम्हें उन बातोंका स्मरण है तो कहो।'
भगवान् शंकरकी बात सुनकर पार्वती मुस्करायीं और बोलीं- 'प्राणनाथ! मुझे सब बातोंका स्मरण है; किंतु इस समय आप चुप रहें (उन बीती बातोंकी चर्चा न करें)।' तत्पश्चात् शिवने सामग्री एकत्र करके नारायण आदि देवताओंको नाना प्रकारके मनोहर पदार्थ भोजन कराये। भोजनके पश्चात् भाँति-भाँतिके रत्नोंसे अलंकृत हो अपनी स्त्रियों और सेवकगणोंसहित सब देवता भगवान् चन्द्रशेखरको प्रणाम करके बिदा हुए। भगवान् नारायण और ब्रह्माको शंकरजीने स्वयं ही प्रणाम किया। वे दोनों उन्हें हृदयसे लगाकर आशीर्वाद दे अपने-अपने स्थानको चले गये। इसके बाद हिमवान् और मेनाने मैनाकको बुलाया और कहा- 'बेटा! तुम्हारा कल्याण हो। तुम शिव और पार्वतीको शीघ्र यहाँ बुला लाओ।' उनकी बात सुनकर मैनाक शीघ्र ही शिवधाममें गया और पार्वती एवं परमेश्वरको लिवाकर आ गया। पार्वतीका आगमन सुनकर बालक-बालिका, वृद्धा तथा युवती स्त्रियाँ भी उन्हें देखनेके लिये दौड़ी आयीं। पर्वतगण भी सानन्द भागे आये। मेना अपने पुत्रों और बहूके साथ मुस्कराती हुई दौड़ीं। हिमालय भी प्रसन्नतापूर्वक पुत्रीकी अगवानीके लिये दौड़े आये। देवी पार्वतीने रथसे उतरकर बड़े हर्षके साथ माता-पिता तथा गुरुजनोंको प्रणाम किया। उस समय वे आनन्दके समुद्रमें गोते लगा रही थीं। हर्ष विह्वल मेना और मोदमन हिमालयने पार्वतीको हृदयसे लगा लिया। उन्हें ऐसा लगा, मानो गये हुए प्राण वापस आ गये हों। पुत्रीको घरमें रखकर गिरिराजने उसके लिये रत्नसिंहासन दिया और शूलपाणि शिव तथा उनके पार्षदगणोंको मधुपर्क आदि दे सहर्ष उनका सत्कार किया। पार्षदोंसहित भगवान् चन्द्रशेखर अपने ससुरके घरमें रहने लगे। वहाँ प्रतिदिन पत्नीसहित उनकी सोलह उपचारोंसे पूजा होने लगी। राधे! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् शंकरके मङ्गल-परिणयकी कथा कह सुनायी, जो हर्ष बढ़ानेवाली तथा शोकका नाश करनेवाली है। अब और क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ४५-४६)
Summary of chapter 39 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
The morning of departure arrived as Kṛshṇa and Balarāma mounted Akrūra's royal chariot to journey toward Mathura. The cowherd women clung to the chariot wheels, weeping bitterly and singing heart-wrenching songs of separation, declaring that life without Kṛshṇa was completely meaningless. Kṛshṇa turned back with loving eyes, offering comforting words and promising to return after fulfilling His mission, yet the forest of Vṛndāvana fell into a profound silence of grief as the chariot rolled away toward the distant horizon of Mathura, carrying their life and soul.