श्रीनारायण कहते हैं-
नारद! भगवान् श्रीकृष्ण परमानन्दमय परिपूर्णतम प्रभु हैं। भक्तोंपर अनुग्रहके लिये व्याकुल रहनेवाले परम परमात्मा हैं। पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अवतीर्ण हुए वे भगवान् निर्गुण, प्रकृतिसे परे तथा परात्पर हैं। ब्रह्मा, शिव और शेष भी उनके चरणोंकी वन्दना करते हैं। नन्दजीकी स्तुति सुनकर वे जगदीश्वर बहुत संतुष्ट हुए। नन्द बाबा विरहज्वरसे कातर हो गोकुलसे उनके पास आये थे।
श्रीभगवान्ने कहा-
'बाबा! शोक और भ्रमको छोड़ो तथा व्रजको लौट जाओ। वहाँ जाकर सबको आनन्दित करो। मैं जो परम सत्य ज्ञान बता रहा हूँ, इसे सुनो। यह ज्ञान शोकग्रन्थिका उच्छेद करनेवाला है।' यों कह पञ्चभूतोंका वर्णन करते हुए श्रीहरिने नन्द बाबाको उत्तम ज्ञानका उपदेश दिया और अन्तमें कहा—'तात! मेरे भक्तोंका कहीं अमङ्गल नहीं होता। मेरा सुदर्शनचक्र प्रतिदिन उनकी सब ओरसे रक्षा करता है। मेरी यह बात यशोदा मैयासे, गोपियोंसे और गोपगणोंसे कहो उन सबके साथ शोकको त्याग दो अच्छा अब घरको जाओ।' यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण यादवोंकी सभामें चुप हो गये। तब आनन्दमन नन्दने पुनः उनसे पूछा।
नन्द बोले –
परमानन्दस्वरूप गोविन्द ! मैं मूढ़ हूँ और तुम वेदोंके उत्पादक हो। मुझे ऐसा लौकिक ज्ञान बताओ, जिससे तुम्हारे चरणोंको प्राप्त कर सकूँ। नन्दजीकी यह बात सुनकर सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें श्रुतिदुर्लभ आह्निक-कृत्यसम्बन्धी ज्ञान प्रदान किया।
श्रीभगवान् बोले-
तात! मैं तुम्हें वह परम अद्भुत ज्ञान प्रदान करता हूँ, जो वेदोंमें अत्यन्त गोपनीय और पुराणों में अत्यन्त दुर्लभ है, कुलटा स्त्रियाँ मोक्ष मार्गके द्वारको ढकनेके लिये अर्गलाएँ हैं, भ्रम और मायाकी सुन्दर भूमियाँ हैं; उनपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। ब्रजराज ! असाध्वी स्त्रियाँ हरिभक्ति के विरुद्ध होती हैं। वे नाशकी बीजरूपा हैं। उनपर विश्वास करना कदापि उचित नहीं है। प्रतिदिन प्रातः काल उठकर रातमें पहने हुए कपड़ोंको त्याग दे और हृदय कमलमें इष्टदेवका तथा ब्रह्मरन्ध्रमें परम गुरुका चिन्तन करे। मन ही मन उनका चिन्तन करके प्रातःकालिक कृत्य पूर्ण करनेके पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष निश्चय ही निर्मल जलमें स्नान करे। कर्मका उच्छेद करनेवाला भक्त कोई कामना या संकल्प नहीं करता। वह स्नान करके भगवान्का स्मरण करता और संध्या करके घरको लौट जाता है। दरवाजेपर दोनों पैर धोकर वह घरमें प्रवेश करे और धुले हुए दो वस्त्र (धोती चादर) धारण करके मोक्षके कारणभूत मुझ परमात्माका ही पूजन करे। शालग्राम, मणि, यन्त्र, प्रतिमा, जल, ब्राह्मण, गौ तथा गुरुमें सामान्यरूपसे मेरी स्थिति मानकर इनमें कहीं भी मेरी पूजा करनी चाहिये। कलशमें, अष्टदल कमलमें तथा चन्दननिर्मित पात्रमें भी मेरी पूजा की जा सकती है। सर्वत्र पूजनके समय आवाहन करे; परंतु शालग्राम शिलामें और जलमें पूजा करनी हो तो आवाहन न करे। मन्त्रके अनुरूप ध्यानका श्लोक पढ़कर मेरा ध्यान करनेके पश्चात् व्रती पुरुष षोडशोपचारकी सामग्री क्रमशः अर्पित करे और भक्तिभावसे मूलमन्त्रद्वारा पूजा करे मेरे साथ ही प्रथम आवरणमें श्रीदामा, सुदामा, वसुदामा, वीरभानु और शूरभानु – इन पाँच गोपोंका पूजन करे। तत्पश्चात् सुनन्द, नन्द, कुमुद और सुदर्शन- इन पार्षदोंका; लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, राधा, गङ्गा और पृथ्वी - इन देवियोंका; गुरु, तुलसी, शिव, कार्तिकेय और विनायकका तथा नवग्रहों और दस दिक्पालोंका सब दिशाओं में विद्वान् पुरुष पूजन करे। सबसे पहले विघ्र निवारणके लिये गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वती — इन छः देवताओंका पूजन करना चाहिये। ये वेदोक्त देवता कर्मबन्धनको काटनेवाले और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। विघ्नोंके नाशके लिये गणेशका, रोगनिवारणके लिये सूर्यका, अभीष्टकी प्राप्ति तथा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये अग्निका, मोक्षके निमित्त विष्णुका, ज्ञानदानके लिये शिवका तथा बुद्धि और मुक्तिके लिये विद्वान् पुरुष पार्वतीका पूजन करे। तीन बार पुष्पाञ्जलि देकर उन-उन देवताओंके स्तोत्र और कवचका पाठ करे। गुरुका वन्दन और पूजन करनेके पश्चात् देवताको प्रणाम करे। नित्यकर्म करके देवपूजनके पश्चात् सुखपूर्वक यथाप्राप्त कार्य करनेका विधान है। यह नित्यकर्म वेदवर्णित है। इसका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषकी आत्मशुद्धि होती है।
बुद्धिमान् पुरुष मल मूत्र, गुप्ताङ्ग, स्त्रियों के अङ्ग, कटाक्ष और हास्य आदि न देखे; क्योंकि ये सब विनाशके बीज हैं। उनका रूप सदा ही विपत्तिका कारण है। दिनमें अपनी स्त्रीके साथ भी समागम न करे; क्योंकि दिनमें स्त्री सहवास करनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है; नेत्रों और कानोंमें पीड़ा होती है। जब आकाशमें एक ही तारा उगा हो, उस समय उधर नहीं देखना चाहिये; अन्यथा रोगोंका भय प्राप्त होता है। यदि उस एक तारेको देख ले तो देवताओंका दर्शन
और भगवान्का स्मरण करके सात बार नारदजीका नाम जपे। अस्तके समय सूर्य और चन्द्रमाको न देखे; क्योंकि उस समय उन्हें देखनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है। कृष्णपक्षमें खण्डित चन्द्रमाके उदयकालमें उसे न देखे; अन्यथा रोग होता है। जलमें सूर्य और चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब देखने मनुष्यको शोककी प्राप्ति होती है। पराया मैथुन देखनेसे भाईका वियोग होता है; इसलिये उसे न देखे। पापीके साथ एक जगह सोना, बैठना, भोजन करना और घूमना-फिरना निषिद्ध है; क्योंकि वह सब नाशका लक्षण है। किसीके साथ बात करने, शरीरको छूने, सोने, बैठने और भोजन करनेसे उन दोनोंके पाप एक-दूसरेमें अवश्य संचरित होते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे तेलका बिन्दु पानीमें पड़नेसे फैल जाता है। हिंसक जन्तुके समीप न जाय; क्योंकि उसके पास जाना दुःखका कारण होता है। दुष्टके साथ मेल जोल न बढ़ावे; क्योंकि वह शोकप्रद होता है। ब्राह्मणों, गौओं तथा विशेषतः वैष्णवोंकी हिंसा न करे; उनकी हिंसा सर्वनाशका कारण बन जाती है। देवता, देवपूजक, ब्राह्मण और वैष्णवोंके धनका अपहरण न करे; क्योंकि वह धन सर्वनाशका कारण होता है जो अपने या दूसरेके द्वारा दी हुई ब्राह्मणवृत्तिका अपहरण करता है; वह साठ हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। ब्राह्मणको देनेके लिये जो दक्षिणा संकल्प की जाती है, वह यदि तत्काल न दे दी जाय तो एक रात बीतनेपर दूनी, एक मास बीतनेपर सौगुनी और दो मास बीतनेपर वह सहस्रगुनी हो जाती है। एक वर्ष बीत जाय तो दाता नरकमें पड़ता है। यदि दाता न दे और मूर्ख गृहीता न माँगे तो दोनों नरकमें पड़ते हैं। दाता रोगी होता है। ब्राह्मणोंकी हिंसा करनेसे अवश्य ही वंशकी हानि होती है। हिंसक मनुष्य धन और लक्ष्मीको खोकर भिखमंगा हो जाता है। देवता और ब्राह्मणको देखकर जो मस्तक नहीं झुकाता, वह शोकका भागी होता है। जो गुरुके प्रति भक्तिभाव नहीं रखता, उसे रौरव नरकका कष्ट भोगना पड़ता है।
जो दुराचारिणी मूढा स्त्री साक्षात् श्रीहरिस्वरूप अपने पतिकी ओर नहीं देखती, उलटे उसे डाँट बताती है; वह निश्चय ही कुम्भीपाकमें जाती है। वाणीद्वारा डाँट बतानेके कारण वह कौएकी योनिमें जन्म लेती है। हिंसा करनेसे सूकरी होती है। क्रोध करनेसे सर्पिणी और दर्प दिखानेसे गर्दभी होती है। कुवाक्य बोलनेसे कुक्कुरी और विष देनेसे अन्धी होती है। पतिव्रता स्त्री निश्चय ही पतिके साथ वैकुण्ठधाममें जाती है। जो मूढ़ शिव, पार्वती, गणेश, सूर्य, ब्राह्मण, वैष्णव तथा विष्णुकी निन्दा करता है; वह महारौरव नामक नरकमें गिरता है। पिता, माता, पुत्र, सती पत्नी, गुरु, अनाथा स्त्री, बहिन और पुत्रीकी निन्दा करके मनुष्य नरकगामी होता है। जो क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ब्राह्मणोंके प्रति भक्तिभावसे रहित हैं और भगवद्भक्तिसे भी दूर हैं; वे निश्चय ही नरकमें पकाये जाते हैं। यही दशा पतिभक्तिसे शून्य नराधमा स्त्रियोंकी होती है। जो ब्राह्मण शालग्रामका चरणामृत पीते और भगवान् विष्णुका प्रसाद खाते हैं वे तीर्थोको भी पवित्र कर देते हैं। अपनी सौ पीढ़ियोंको तारते और पृथ्वीको भी उबारते हैं। जो भगवान् विष्णुका प्रसाद ग्रहण करता और मछली मांस नहीं खाता है; वह निश्चय ही पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। जो एकादशी और कृष्णजन्माष्टमीका व्रत करते हैं, वे सौ जन्मोंके किये हुए पापसे मुक्त हो जाते हैं; इसमें संशय नहीं है। बाल्यावस्था, कुमारावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्थामें भी जो-जो पाप बन गये हैं, वे सब भस्म हो जाते हैं। रोगी, अत्यन्त वृद्ध और बालकके लिये उपवासका नियम नहीं है। भक्त ब्राह्मणको द्विगुण भोजनका दान करके दाता शुद्ध
हो जाता है। जो उपवासमें समर्थ होकर भी शिवरात्रि तथा श्रीरामनवमीके दिन भोजन करता है; वह महारौरव नरकमें पड़ता है। अमावास्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी और अष्टमीको स्त्री, तैल तथा मांसका सेवन करनेसे मनुष्य चाण्डाल योनिमें जन्म लेता है। रविवारको काँस्यपात्र में भोजन न करे। उस दिन मसूरकी दाल, अदरख और लाल रंगका शाक भी न खाय। ब्रजेश्वर! जो ब्राह्मण रजस्वला और वेश्याके हाथका तथा मदिरामिश्रित अन्न खा लेता है; वह निश्चय ही मलभोजी जन्तु होता है। वह उस दिन जो सत्कर्म करता है, उसका फल उसे नहीं मिलता। वह सदा अपवित्र रहता है। उसका अशौच उसके मरनेके बाद ही समाप्त होता है। जिस स्त्रीने अपने जीवनमें चार पुरुषोंके साथ समागम कर लिया; उसे वेश्या समझना चाहिये। वह देवताओं और पितरोंके लिये भोजन बनानेकी अधिकारिणी नहीं है। जो प्रातः काल और सायंकालकी संध्योपासना नहीं करता, उसका समस्त द्विजोचित कर्मोंसे शूद्रकी भाँति बहिष्कार कर देना चाहिये। संध्याही द्विज नित्य अपवित्र तथा समस्त कर्मोंके लिये अयोग्य होता है। वह दिनमें जो सत्कर्म करता है; उसका फल उसे नहीं मिलता। राममन्त्र हीन ब्राह्मण नरकमें पड़ता है। नदीके बीचमें, गड्ढेमें, वृक्षकी जड़में, पानीके निकट, देवताके समीप और खेतीसे भरी हुई भूमिपर समझदार मनुष्य मलत्याग न करे। बाँबीसे निकली हुई, चूहेकी खोदी हुई, पानीके भीतरसे निकाली हुई, शौचसे बची हुई और घरके लीपनेसे प्राप्त हुई मिट्टीको शौचके काममें न ले। जिस मिट्टीमें चींटी आदि प्राणी हों, उसे भी शौचके काममें न ले। व्रजेश्वर! हल चलानेसे उखड़ी हुई, पौधोंके थालेसे निकाली हुई, जिस खेतमें खेती लहलहा रही हो उसकी मिट्टी, वृक्षकी जड़से खोदकर ली हुई मिट्टी तथा नदीके पेटेसे निकाली हुई मृत्तिका-इन सबको शौचके काममें त्याग देना चाहिये। कुम्हड़ा काटने या फोड़नेवाली स्त्री और दीपक बुझानेवा पुरुष कई जन्मोंतक रोगी होते हैं और जन्म जन्ममें दरिद्र रहते हैं। दीपक, शिवलिङ्ग, शालग्राम, मणि, देवप्रतिमा, यज्ञोपवीत, सोना और शङ्ख इन सबको भूमिपर न रखे। दिनमें और दोनों संध्याओंके समय जो नींद लेता या स्त्री सहवास करता है, वह कई जन्मोंतक रोगी और दरिद्र होता है। मिट्टी, राख, गोबर- इसके पिण्डसे या बालूसे भी शिवलिङ्गका निर्माण करके एक बार उसकी पूजा कर लेनेवाला पुरुष सौ कल्पोंतक स्वर्गमें निवास करता है। सहस्त्र शिवलिङ्गोंके पूजनसे मनुष्यको मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है और जिसने एक लाख शिवलिङ्गोंकी पूजा कर ली है, वह निश्चय ही शिवत्वको प्राप्त होता है। जो ब्राह्मण शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह जीवन्मुक्त होता है और जो शिवपूजासे रहित है, वह ब्राह्मण नरकगामी होता है। जो मनुष्य मेरे द्वारा पूजित प्रियतम शिवकी निन्दा करते हैं, वे सौ ब्रह्माओंकी आयुपर्यन्त नरककी यातना भोगते हैं। समस्त प्रियजनों में ब्राह्मण मुझे अधिक प्रिय हैं। ब्राह्मणसे अधिक शंकर प्रिय हैं। मेरे लिये शंकरसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय नहीं है। 'महादेव, महादेव, महादेव' – इस प्रकार बोलनेवाले पुरुषके पीछे-पीछे मैं नामश्रवणके लोभसे फिरता रहता हूँ। शिव नाम सुनकर मुझे बड़ी तृप्ति होती है। मेरा मन भक्तके पास रहता है। प्राण राधामय हैं, आत्मा शंकर हैं। शंकर मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, जो सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली आद्या नारायणी शक्ति है, जिसके द्वारा मैं सृष्टि करता हूँ, जिससे ब्रह्मा आदि देवता उत्पन्न होते हैं, जिसका आश्रय लेनेसे जगत् विजयी होता है, जिससे सृष्टि चलती है और जिसके बिना संसारका अस्तित्व ही नहीं रह सकता; वह शक्ति मैंने शिवको अर्पित की है। (अध्याय ७४-७५)
Summary of chapter 78 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
Illustrating the unyielding power of Truth and Dharma, Maharshi Nārada narrated the histories of King Trishanku and his illustrious descendant King Harishchandra. King Harishchandra sacrificed his kingdom, wealth, wife, and freedom to uphold a solemn promise made to Sage Vishvāmitra, enduring immense personal suffering without ever uttering a falsehood. Pleased by his flawless adherence to Truth, Lord Śrī Vishṇu Himself appeared on the cremation grounds, restored the king's family and kingdom, and elevated Harishchandra and his citizens directly to the heavenly realms.