श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - श्री कृष्ण जनन खंड

16- वनमें श्रीकृष्णद्वारा बकासुर, प्रलम्बार और केशीका वध, उन सबका गोलोकधाममें गमन, उनके पूर्वजीवनका परिचय, पार्वतीके त्रैमासिक व्रतका सविधि वर्णन तथा नन्दकी आज्ञाके अनुसार समस्त व्रजवासियोंका वृन्दावनमें गमन

भगवान् नारायण कहते हैं-

मुने! एक समयकी बात है। माधव- श्रीकृष्ण अन्यान्य बालकों और हलधरके साथ खा-पीकर खेलनेके लिये श्रीवनमें गये। वहाँ मधुसूदनने नाना प्रकारकी बालोचित क्रीड़ाएँ कीं। वह क्रीड़ा समाप्त करके गोपबालकोंके साथ उन्होंने गोधनको आगे बढ़ाया। वहाँ वनमें स्वादिष्ट जल पीकर वे महाबली श्रीकृष्ण उस स्थानसे गोधनसहित मधुवनमें गये। उस वनमें एक बलवान् और भयंकर दैत्य था, जिसकी आकृति और मुख बड़े विकराल थे। उसका रंग सफेद था। वह पर्वताकार दैत्य बगुलेके आकारमें दिखायी देता था। उसने देखा, गोष्ठमें गौओंका समुदाय है और ग्वालबालोंके साथ केशव और बलराम भी विद्यमान हैं। फिर तो जैसे अगस्त्यने वातापिको उदरस्थ कर लिया था, उसी प्रकार वह दैत्य वहाँ सबको लीलापूर्वक लील गया। श्रीहरि बकासुरके ग्रास बन गये हैं, यह देख सब देवता भयसे काँप उठे। वे संत्रस्त हो हाहाकार करने लगे और हाथों में शस्त्र लेकर दौड़े। इन्द्रने दधीचिमुनिकी हड्डियोंका बना हुआ वज्र चलाया; किंतु उसके प्रहारसे बकासुर मर न सका। केवल उसकी एक पाँख जल गयी। चन्द्रमाने हिमपात किया; किंतु उससे उस दानवको केवल सर्दी के कष्टका अनुभव हुआ सूर्यपुत्र यमने उसपर यमदण्ड मारा; उससे वह कुण्ठित हो गया - हिल डुल न सका। वायुने वायव्यास्त्र चलाया, उससे वह एक स्थानसे उठकर दूसरे स्थानपर चला गया। वरुणने शिलाओंकी वर्षा की; उससे उसको बहुत पीड़ा हुई। अग्निदेवने आग्रेयास्त्र चलाकर उसकी सभी पाँखें जला दीं। कुबेरके अर्धचन्द्रसे उसके पैर कट गये। ईशानके शूलसे वह असुर मूच्छित हो गया। यह देख ऋषि और मुनि भयभीत हो श्रीकृष्णको आशीर्वाद देने लगे। इसी बीचमें श्रीकृष्ण ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो उठे। उन परमेश्वरने बाहर और भीतरसे दैत्यके सारे अङ्गों में दाह उत्पन्न कर दिया। तब उन सबका वमन करके उस दानवने प्राण त्याग दिये। इस प्रकार बकासुरका वध करके बलवान् श्रीकृष्ण ग्वालबालों और गौओंके साथ अत्यन्त मनोहर केलि कदम्ब काननमें जा पहुँचे। इसी समय वहाँ वृषरूपधारी प्रलम्ब नामक असुर आ पहुँचा, जो बड़ा बलवान् महान् धूर्त तथा पर्वतके समान विशालकाय था। उसने दोनों सींगोंसे श्रीहरिको उठाकर वहाँ घुमाना आरम्भ किया। यह देख सब ग्वालबाल इधर-उधर भागने और रोने लगे। परंतु बलवान् बलराम जोर-जोरसे हँसने लगे; क्योंकि वे जानते थे कि मेरा भाई साक्षात् परमेश्वर है। उन्होंने बालकोंको समझाया और कहा- 'भय किस बातका है?' इधर मधुसूदनने स्वयं उसके दोनों सींग पकड़ लिये और उसे आकाशमें घुमाकर

भूतलपर दे मारा। दैत्यराज प्रलम्ब पृथ्वीपर गिरकर अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठा। यह देख सब गोपबालक हँसने, नाचने और खुशीसे गीत गाने लगे। प्रलम्बासुरका वध करके बलरामसहित परमेश्वर श्रीकृष्ण शीघ्र ही गोचारणके कार्यमें जुट गये। वे गौएँ चराते हुए भाण्डीरवनके पास जा पहुँचे।

उस समय माधवको जाते देख बलवान् दैत्यराज केशीने अपनी टापसे धरतीको खोदते हुए शीघ्र ही इन्हें घेर लिया। उसने श्रीहरिको मस्तकपर चढ़ाकर संतुष्ट हो आकाशमें सौ योजनतक उन्हें उछाल उछालकर घुमाया और अन्तमें पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस पापीने श्रीहरिके हाथको दाँतसे पकड़ लिया और क्रोधपूर्वक चबाना आरम्भ किया। परंतु श्रीहरिके अङ्ग वज्रके समान कठोर थे। उनके अङ्गका चर्वण करते ही दैत्यके सारे दाँत टूट गये। श्रीकृष्णके तेजसे दग्ध होकर उसने भूतलपर प्राणोंका परित्याग कर दिया। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और वहाँ फूलोंकी वर्षा आरम्भ हो गयी। इसी बीचमें

दिव्यरूपधारी पार्षद विमानपर बैठे हुए वहाँ आ पहुँचे। उन सबके दो भुजाएँ थीं। वे पीताम्बरधारी, किरीट और कुण्डलसे अलंकृत तथा वनमालासे विभूषित थे। उन्होंने विनोदके लिये हाथमें मुरली ले रखी थी। उनके पैरोंमें मञ्जीरकी मधुर ध्वनि हो रही थी। पार्षदोंके सभी अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। वे गोपवेष धारण किये बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। उनके प्रसन्नमुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे श्रीकृष्णभक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। रत्नोंके सार तत्त्वसे निर्मित दीप्तिशाली दिव्य रथपर आरूढ़ हो वे भाण्डीरवनमें उस स्थानपर आये, जहाँ श्रीहरि विराजमान थे। उसी समय दिव्य वस्त्र पहने तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित हुए तीन पुरुष आये, जो श्रीहरिको प्रणाम करके उनकी स्तुति करते हुए उसी विमानसे उत्तम गोलोकको चले गये। वे तीनों पहलेके वैष्णव पुरुष थे, जो देह त्यागकर दानवी योनिको प्राप्त हुए थे। वे ही इस समय श्रीकृष्णके हाथों मारे जाकर उनके पार्षद हो गये।

नारदजीने पूछा-

महाभाग ! वे दिव्य वैष्णव पुरुष कौन थे, जो दैत्यरूप हो गये थे? इस बातको बताइये। यह कैसी परम अद्भुत बात सुननेको मिली है?

भगवान् नारायण बोले-

ब्रह्मन् ! सुनो। मैं इसका प्राचीन इतिहास बता रहा हूँ। मैंने पुष्करतीर्थमें सूर्यग्रहणके अवसरपर साक्षात् महेश्वर के मुखसे इस विषयको सुना था। श्रीहरिके गुण कीर्तनके प्रसङ्ग में भगवान् शंकरने यह कथा कही थी। गन्धमादन पर्वतपर गन्धर्वराज गन्धवाह रहा करते थे। वे श्रीहरिकी सेवामें तत्पर रहनेवाले महान् तपस्वी और श्रेष्ठ संत थे। !! उनके चार पुत्र हुए, जो गन्धर्वोमें श्रेष्ठ समझे जाते थे। वे सोते और जागते समय दिन-रात श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ही चिन्तन करते रहते थे। वे सभी दुर्वासाके शिष्य थे और श्रीकृष्णकी आराधनामें लगे रहते थे। प्रतिदिन कमल चढ़ाकर श्रीहरिकी पूजा करनेके पश्चात् ही जल पीते थे। उन चारोंके नाम इस प्रकार हैं- वसुदेव, सुहोत्र, सुदर्शन और सुपार्श्व वे चारों श्रेष्ठ वैष्णव थे और पुष्करमें तपस्या करते थे। चिरकालतक तपस्या करनेके पश्चात् उन्होंने मन्त्रको सिद्ध कर लिया था। उन चारोंमें जो ज्येष्ठ वसुदेव था, वह दुर्वासासे योग्य शिक्षा पाकर योगियोंमें श्रेष्ठ और सिद्ध हो गया। उसने विवाह नहीं किया। वह ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो तत्काल देह त्यागकर श्रीकृष्णका पार्षद हो गया। एक दिन वे तीनों भाई चित्रसरोवरके तटपर गये। वे सूर्योदयकालमें श्रीहरिकी पूजाके लिये कमल लेना चाहते थे। मुने! कमलोंका संग्रह करके जाते हुए उन वैष्णवोंको जब भगवान् शंकरके सेवकोंने देखा, तब वे सब उन्हें बाँधकर अपने साथ ले गये। शंकरके सेवक शरीरसे बलिष्ठ थे; अतः उन दुर्बल वैष्णवोंको पकड़कर उन्हें शंकरजीके पास ले गये। भगवान् शंकरको देखकर उन सब वैष्णवोंने भूतलपर माथा टेक उन्हें प्रणाम किया। शिवजी उन्हें उत्तम आशीर्वाद दे शीघ्र ही उनसे वार्तालापके लिये उद्यत हुए। उस समय उनके प्रसन्नमुखपर मुस्कराहट खेल रही थी और वे उन भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर हो चुके थे।

भगवान् शिवने पूछा-

पार्वतीके सरोवरमें प्रवेश करके कमल लेनेवाले तुमलोग कौन हो? पार्वतीके व्रतकी पूर्तिके लिये एक लाख यक्ष उस सरोवरकी रक्षा करते हैं। पार्वती पतिविषयक सौभाग्यकी वृद्धिके लिये जब त्रैमासिक व्रत आरम्भ करती हैं, तब वे लगातार तीन महीनेतक श्रीहरिको भक्तिभावसे प्रतिदिन एक सहस्र कमल चढ़ाती हैं। भगवान् शिवका यह वचन सुनकर वे तीनों वैष्णव भयभीत हो भक्तिसे मस्तक झुका हाथ जोड़कर बोले।

गन्धर्वोंने कहा-

प्रभो! हमलोग गन्धर्वराज गन्धवाहके पुत्र गन्धर्वोमें श्रेष्ठ हैं। महेश्वर! हम लोग प्रतिदिन श्रीहरिको कमल चढ़ाकर ही जल पीते हैं। हे नाथ! हम यह नहीं जानते थे कि पार्वतीके द्वारा इस सरोवरकी रक्षा की जाती है। आप यह सारे कमल ले लीजिये और अपने व्रतको सफल बनाइये महादेव! हम आज कमल नहीं चढ़ायेंगे और जल भी नहीं पीयेंगे। हमने आपको ही वे कमल अर्पित कर दिये। जिनके चरण कमलका प्रतिदिन चिन्तन करके हम कमलसे पूजा करते हैं, आज साक्षात् उन्हींको कमल अर्पण करके हम सब के सब पवित्र हो गये। प्रभो ! ब्रह्म एक ही है, दूसरा नहीं है। उनके कहाँ देह और कहाँ रूप ? भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही भगवान् शरीर धारण करते हैं। रूप भेद मायासे ही प्रतीत होता है। प्रभो! आप ये कमल ले लीजिये; क्योंकि आप ही हमारे प्रभु हैं। अच्युत ! हमारा हृदय जिसके ध्यानसे परिपूर्ण है; आप अपने उसी रूपका हमें दर्शन कराइये। जिसकी दो भुजाएँ हैं; कमनीय किशोर अवस्था है; श्यामसुन्दर रूप है; हाथमें विनोदकी साधनभूता मुरली है; जो पीताम्बरधारी है; जिसके एक मुख और दो नेत्र हैं, वे चन्दन और अगुरुसे चर्चित हैं; जिसके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही है; जो रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित है। जिसका वक्षःस्थल मणिराज कौस्तुभकी कान्तिसे अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देता है; जिसकी चूड़ामें मोरका पंख लगा है; जो मालतीकी मालासे विभूषित है; पारिजातके फूलोंके हारोंसे अलंकृत है; करोड़ों कन्दपके लावण्यका मनोहर लीलाधाम है; समूह की समूह गोपियाँ मन्द मुस्कान और बाँकी चितवनसे जिसकी ओर देखा करती हैं; जो नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा राधाके वक्षःस्थलपर विराजमान है; ब्रह्मा आदि जिसकी स्तुति करते हैं; जो सबके लिये वन्दनीय, चिन्तनीय और वाञ्छनीय है और जो स्वात्माराम, पूर्णकाम तथा भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर रहनेवाला है, आपके उसी रूपका हम दर्शन करना चाहते हैं। ऐसा कहकर वे श्रेष्ठ गन्धर्व भगवान् शंकरके सामने खड़े हो गये। श्रीकृष्णके रूपका वर्णन सुनकर भगवान्  शंकरके श्रीअङ्गों में रोमाञ्च हो आया। उनके नेत्रों में आँसू भर आये। वे गन्धर्वोकी उक्त बातें सुनकर उनसे इस प्रकार बोले- 'मैंने यह जान लिया था कि तुमलोग श्रेष्ठ वैष्णव हो और अपने चरणकमलोंकी धूलसे पृथ्वीको पवित्र करनेके लिये भ्रमण कर रहे हो। मैं श्रीकृष्णभक्तके दर्शनकी सदा ही इच्छा करता रहता हूँ; क्योंकि साधु-संत तीनों लोकों में दुर्लभ हैं। तुमलोग मुझे पार्वती और देवताओं से भी बढ़कर सदा प्रिय हो मुझे वैष्णवजन अपने तथा अपने भक्तोंसे भी अधिक प्रिय हैं। परंतु मैंने पूर्वकालमें जो प्रतिज्ञा कर रखी है, वह भी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। महाभाग वैष्णवो! सुनो। मैंने कह रखा है कि पार्वतीके व्रतके समय जो लोग किसी अन्य व्रतके निमित्त इस सरोवरसे कमल ले जायँगे वे शीघ्र ही आसुरी योनिको प्राप्त होंगे, इसमें संशय नहीं है। श्रीकृष्णके भक्तोंका कहीं भी अशुभ नहीं होता है। तुमलोग पहले दानवी योनिमें पड़कर फिर निश्चय ही गोलोकमें पधारोगे। तुम्हारे मनमें श्रीकृष्णके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठा है। अतः बच्चो! तुम्हें भारतवर्षके वृन्दावनमें उस रूपका अवश्य दर्शन होगा। श्रीकृष्णको देखकर उन्हींके हाथसे मृत्युको प्राप्त हो तुम वैष्णवशिरोमणि बन जाओगे और दिव्य विमानपर आरूढ़ हो हरिधामको पधारोगे । तुमलोग अभी यहाँ उस वाञ्छनीय रूपको देखने के लिये उत्सुक हो। अतः वह सब देखो।'

ऐसा कहकर भगवान् शिवने उन्हें उस रूपके दर्शन कराये उस रूपके दर्शन करके उन वैष्णवोंके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे सर्वरूपी श्रीहरिको प्रणाम करके दानवी योनिमें चले गये। इसलिये वे दानवेश्वर हुए। वसुदेव तो पहले ही मुक्त हो चुका था। सुहोत्र बकासुर, सुदर्शन प्रलम्ब और स्वयं सुपार्श्व केशी हुआ था। भगवान् शंकरके वरदानसे श्रीहरिके परम उत्तम रूपके दर्शन करके उन्हींके हाथसे मृत्युको प्राप्त हो वे उनके परम धाममें चले गये। विप्रवर! श्रीहरिका यह अद्भुत चरित्र कहा गया। बक, प्रलम्ब और केशीके उद्धारका यह प्रसङ्ग वाचकों और श्रोताओंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है।

नारदजीने पूछा-

महाभाग ! आपके कृपा-प्रसादसे यह सारी अद्भुत बात मैंने सुनी। अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पार्वतीने कौन-सा व्रत किया था? उस व्रतके आराध्यदेव कौन हैं? उसका फल क्या है और उसमें पालन करनेयोग्य नियम क्या है? भगवन् ! उस व्रतके लिये उपयोगी द्रव्य कौन-कौन से हैं? कितने समयतक वह व्रत किया जाता है और उसकी प्रतिष्ठामें क्या-क्या करना आवश्यक होता है? प्रभो! भलीभाँति विचारकर बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है।

श्रीनारायण बोले -

मुने ! यह ' त्रैमासिक' नामक व्रत है, जो नारीके पतिविषयक सौभाग्यको बढ़ानेवाला है। इस व्रतके आराध्य देवता हैं— राधिकासहित भगवान् श्रीकृष्ण उत्तरायणके विषुव (ज्योतिष के अनुसार वह समय जब कि सूर्य विषुव रेखापर पहुँचता है और दिन-रात दोनों बराबर होते हैं।) योगमें इसका आरम्भ होता है और दक्षिणायन आरम्भ होनेतक इसकी समाप्ति हो जाती है। वैशाखकी संक्रान्तिसे एक दिन पहले संयमपूर्वक रहकर निश्चय ही हविष्यका सेवन करे। फिर वैशाखकी संक्रान्तिके दिन स्नान करके गङ्गातटपर व्रतका संकल्प ले। तदनन्तर व्रती पुरुष कलशपर, मणिमें, शालग्राम शिलामें अथवा जलमें राधासहित श्रीकृष्णका पूजन करे। पहले पाँच देवताओंकी पूजा करके भक्तिभावसे राधावल्लभ श्रीकृष्णका ध्यान करे। उनके सामवेदोक्त ध्यानका वर्णन करता हूँ, सुनो। भगवान् श्रीकृष्णकी अङ्गकान्ति सजल जलधरके समान श्याम है। वे रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं। उनका मुख शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मनोहर है। उसपर मन्द हासकी प्रभा फैल रही है। नेत्र शरद् ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत कर रहे हैं। उनमें सुन्दर अञ्जन लगा हुआ है। वे गोपियोंके मनको बारंबार मोहते रहते हैं। राधा उनकी ओर देख रही हैं। वे राधाके वक्षःस्थलमें विराजमान हैं। ब्रह्मा, अनन्त, शिव और धर्म आदि देवता उनकी स्तुति करते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णका ध्यान करके व्रती पुरुष उस ध्यानके द्वारा ही उनका सानन्द आवाहन करे। इसके बाद वह राधाका ध्यान करे। वह ध्यान यजुर्वेदकी माध्यन्दिनशाखामें वर्णित है। राधा रासेश्वरी हैं, रमणीया हैं और रासोल्लास-रसके लिये उत्सुक रहती हैं। रासमण्डलके मध्यभागमें उनका स्थान है। वे रासकी अधिष्ठात्री देवी हैं। रासेश्वरके वक्षःस्थलमें वास करती हैं। रासकी रसिका हैं। रसिकशेखर श्यामसुन्दरकी प्रिया हैं। रसिकाओं में श्रेष्ठ हैं। सुरम्य रमारूपिणी हैं। प्रियतम के साथ रमणके लिये उत्सुक रहती हैं। उनके नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत करते हैं। वे बाँकी भौंहोंसे सुशोभित होती हैं। उनके नेत्रोंमें सुरमा शोभा पा रहा है। शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति सुन्दर मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभाके कारण उनकी मनोहरता बहुत बढ़ गयी है। मनोहर चम्पाके समान उनकी अङ्गकान्ति सुनहरी दिखायी देती है। चन्दन, कस्तूरीकी बेंदी तथा सिन्दूर बिन्दुसे उनका शृङ्गार किया गया है। कपोलोंपर मनोहर पत्रावलीकी रचना शोभा देती है। अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रसे उनकी उज्ज्वलता बढ़ गयी है। उत्तम रत्नोंद्वारा निर्मित कुण्डलोंकी कान्तिसे उनके सुन्दर कपोल प्रकाशित हो रहे हैं। रत्नेन्द्रसाररचित हारसे वक्षःस्थल उद्भासित हो रहा है। रत्ननिर्मित कङ्कण, केयूर तथा किङ्किणी

रत्नसे उनके अङ्गोंकी अपूर्व शोभा हो रही है। उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे रचित मञ्जीरोंकी झनकार उनके दोनों चरण सुशोभित होते हैं। ब्रह्मा आदिके भी सेवनीय श्रीकृष्ण स्वयं ही उनकी सेवा करते हैं। सर्वेश्वरके द्वारा उनकी स्तुति की जाती है तथा वे सबकी कारणस्वरूपा हैं। ऐसी श्रीराधाका मैं भजन करता हूँ। इस प्रकार ध्यान करके श्रीकृष्णके साथ उनका पूजन करे।

प्रतिदिन भक्तिभावसे सोलह उपचार चढ़ाकर पूजा करे। व्रती पुरुष प्रत्येक उपचारको पृथक् पृथक् करके सबको बारी-बारीसे प्रसन्नतापूर्वक अर्पित करे। मुने! नित्यप्रति एक सौ आठ दिव्य सहस्रदल कमल लेकर उनकी एक सौ आठ आहुतियाँ दे भक्तिभावसे 'कृष्णाय स्वाहा' इस मन्त्रका उच्चारण करके यत्नपूर्वक वे आहुतियाँ देनी चाहिये आम और केलेके कच्चे या पके फलको लेकर उसकी एक सौ आठ आहुतियाँ भक्तिभावसे दे फल अखण्ड होने चाहिये। मुने! प्रतिदिन सौ ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक भोजन करावे। व्रतीको नित्य एक सौ आठ आहुतियोंका हवन करना चाहिये। वे आहुतियाँ भक्तिपूर्वक राधिकासहित श्रीकृष्णको देनी चाहिये। नारद घृतमिश्रित तिलसे भी हवन करे। नित्य बाजे बजावे और श्रीहरिका कीर्तन करावे। तीन मासतक इस नियमका पालन करके उसके बाद व्रतकी प्रतिष्ठा करे। नारद! प्रतिष्ठाके दिन जो विधान आवश्यक है, उसे सुनो। विप्रवर! नब्बे हजार अक्षत कमलकी आहुति दे और यत्नपूर्वक नौ हजार ब्राह्मणोंको उत्तम, स्वादिष्ट एवं मीठे अन्न भोजन करावे। नौ हजार सात सौ बीस फल तथा नाना प्रकारके मनोहर द्रव्यका नैवेद्य अर्पण करे। इसके बाद संस्कारयुक्त अग्निकी स्थापना करके विद्वान् पुरुष होम करे। घृतयुक्त तिलकी नब्बे हजार आहुतियाँ देकर ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे वस्त्र, भोजन, यज्ञोपवीत और फलसहित अन्न और तिलके लड्डू दे। उन लड्डुओंको गन्ध पुष्पसे अर्चित करके देना चाहिये। साथ ही शीतल जलसे भरे हुए नब्बे कलशोंका भी दान करना चाहिये। इस प्रकार व्रत करके ब्राह्मणको दक्षिणा देनी चाहिये। दक्षिणाका परिमाण वही है, जो वेदोंमें बताया गया है। एक हजार बैल हों और उनके सींगोंमें सोना मढ़ा गया हो। ब्रह्मन् ! इस प्रकार त्रैमासिक' व्रत बताया गया। इस व्रतका अनुष्ठान कर लिया जाय तो यह विशिष्ट संतति देनेवाला और पतिसौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला होता है। इस व्रतके प्रभावसे सौ जन्मोंतक नारीका अखण्ड सौभाग्य बना रहता है और निश्चय ही वह सौ जन्मोंतक सत्पुत्रकी जननी होती है। उसका कभी पति और पुत्रसे वियोग नहीं होता। पुत्र दासकी भाँति उसकी आज्ञाका पालक होता है तथा पति भी उसकी बातको माननेवाला होता है। वह सती नारी प्रतिक्षण श्रीराधा-कृष्णकी भक्तिसे सम्पन्न होती है। व्रतके प्रभावसे उसको ज्ञान तथा श्रीहरिकी स्मृति प्राप्त होती है। इस सामवेदोक्त व्रतका पूर्वकालमें हम दोनोंने भी पालन किया था। ब्रह्मन् ! दूसरी स्त्रियोंद्वारा उस व्रतका अनुष्ठान होता देख पार्वतीदेवीने प्रसन्नतापूर्वक दोनों हाथ जोड़ भक्तिभावसे सिर झुकाकर भगवान् शंकरसे कहा।

पार्वती बोलीं- जगन्नाथ ! आज्ञा कीजिये। मैं उत्तम व्रतका पालन करूँगी। हम दोनोंके इष्टदेव श्रीहरिके व्रतोंमें यह श्रेष्ठ व्रत है। नाथ ! श्रीहरिकी आराधना समस्त मङ्गलोंकी कारणरूपा है। यज्ञ, दान, वेदाध्ययन, तीर्थसेवन और पृथ्वीको परिक्रमा- ये सब श्रीहरिकी आराधनाकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जिसके बाहर और भीतर प्रतिक्षण श्रीहरिकी स्मृति बनी रहती है, उस जीवन्मुक्त पुरुषके दर्शनसे ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है। उसके चरणकमलोंकी धूल पड़ने से वसुधा उसी क्षण शुद्ध हो जाती है तथा उसके दर्शनमात्रसे तीनों लोक पवित्र हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, धर्म, शेषनाग, आप महेश्वर और गणेश ये सब लोग जिनके चरणकमलोंका चिन्तन करते-करते उन्हींके समान महातेजस्वी हो गये हैं। जो जिसका सदा ध्यान करता है, वह निश्चय ही उसे प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं— ध्याता पुरुष गुण, तेज, बुद्धि और ज्ञानकी दृष्टिसे अपने ध्येयके समान ही हो जाता है। श्रीकृष्ण के चिन्तन, तप, ध्यान और सेवासे मैंने आप जैसा स्वामी और पुत्र भी प्राप्त किया है। मुझे अनायास ही सब कुछ मिल गया। मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया। मुझे आप जैसे स्वामी मिले। कार्तिकेय और गणेश जैसे पुत्र प्राप्त हुए तथा श्रीकृष्णके अंशस्वरूप हिमवान् जैसे पिता मिले। प्रभो ! मेरे लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ है ? पार्वतीकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर बहुत प्रसन्न हुए। उनका शरीर पुलकित हो उठा और वे हँसकर मधुर वाणीमें बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—

ईश्वरि ! तुम महालक्ष्मीस्वरूपा हो। तुम्हारे लिये क्या असाध्य है? तुम सर्वसम्पत्स्वरूपा और अनन्तशक्तिरूपिणी हो। देवि! तुम जिसके घरमें हो, वह सम्पूर्ण ऐश्वर्यका भाजन है। शुभप्रदे! मैं, ब्रह्मा और विष्णु तुममें भक्ति रखकर तुम्हारे कृपाप्रसादसे ही संसारकी सृष्टि, पालन और संहारमें समर्थ हुए हैं। हिमालय कौन है? मेरी क्या बिसात है और कार्तिकेय तथा गणेश क्या हैं? तुम्हारे बिना हम सब लोग असमर्थ हैं और तुम्हारा सहयोग पाकर हम सभी सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। जो पतिव्रताके योग्य है और जो प्राचीनकालसे श्रुतिमें सुनी गयी है, वह आज्ञा परमेश्वरकी आज्ञा है। पतिव्रते उस ईश्वरीय आज्ञाको स्वीकार करके तुम व्रतका पालन करो अबतक जिन स्त्रियोंने इस व्रतका पालन किया है, उन सबकी अपेक्षा विलक्षण ढंगसे तुम इस त्रैमासिक व्रतका अनुष्ठान करो। इस व्रतमें भगवान् सनत्कुमार तुम्हारे पुरोहित हों सुन्दरि! इसमें जितने कमलों, ब्राह्मणों और द्रव्योंकी आवश्यकता हो, उन सबको देनेके लिये मैं उद्यत हूँ। तुम कुबेरको द्रव्यकोशका संरक्षक नियत करो। इस व्रतमें दानाध्यक्ष मैं रहूँगा और स्वयं भगवती लक्ष्मी धन देनेवाली होंगी। अग्निदेव वेदका पाठ करेंगे, वरुण देवता जल देंगे, यक्षलोग वस्तुओंको ढोकर लानेका काम करेंगे और स्कन्द उनके अध्यक्ष रहेंगे। इस व्रतमें स्थानको झाड़-बुहारकर शुद्ध करनेका काम स्वयं वायुदेव करेंगे। इन्द्र रसोई परोसेंगे चन्द्रमा व्रतके अधिष्ठापक होंगे। प्रिये ! सूर्यदेव दानका निर्वचन करेंगे; योग्यायोग्यक यथोचित व्याख्या करेंगे। सुन्दरि! व्रतके लिये जो उपयोगी और नियमित द्रव्य हो, उसे देकर उससे भी अधिक फल-फूल तुम श्रीहरिकी सेवामें समर्पित करो। व्रतमें जितने ब्राह्मणोंको भोजन करानेका नियम है, उतनोंको भोजन कराकर तुम उससे भी अधिक असंख्य ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे भोजनके लिये निमन्त्रित करो। समाप्तिके दिन सुवर्ण, रत्न, मोती और मूँगा आदि व्रतोक्त दक्षिणा देकर सारा धन ब्राह्मणोंको बाँट दो।

ऐसा कहकर भगवान् शंकरने पार्वतीसे उस व्रतका अनुष्ठान करवाया। पार्वतीने सब स्त्रियोंकी अपेक्षा विलक्षण रूपसे उस व्रतका सम्पादन किया। नारद! इस प्रकार पार्वतीजीने जो व्रत किया था, वह सब मैंने कह सुनाया। पार्वतीके व्रतमें ब्राह्मणलोग रत्न ढोकर ले जानेमें असमर्थ हो गये। नारद! यह सारा इतिहास तो तुमने सुन लिया, अब जिसका प्रकरण चल रहा है, वह श्रीकृष्णका बालचरित्र सुनो। यह श्रीकृष्णकी बाललीला पद-पदमें नयी नयी प्रतीत होगी। पूर्वोक्त दानवेन्द्रोंका वध करके श्रीकृष्ण ग्वालबालों के साथ गोकुलमें अपने घरको गये, जो कुबेरभवनके समान समृद्धिशाली था। वहाँ बालकोंने प्रसन्नतापूर्वक सब लोगोंसे वनमें घटित घटनाओंकी बातें बतायीं। यह सुनकर सब लोग चकित रह गये, किंतु नन्दजीको बड़ा भय हुआ। उन्होंने वृद्ध गोपों तथा बड़ी-बूढ़ी गोपियोंको घरपर बुलवाया और उन सबके साथ समयोचित कर्तव्यका विचार करके उक्त संकटसे बचनेके लिये युक्ति ढूँढ़ निकाली। युक्ति निश्चित कर गोपराज उस स्थानका त्याग कर देनेको उद्यत हो गये। मुने! उन्होंने उसी क्षण सबको वृन्दावनमें चलनेकी आज्ञा दी। नन्दजीकी आज्ञा सुनकर सब लोग वहाँ जानेको उद्यत हो गये। गोप, गोपियाँ, बालक, बालिकाएँ– सब इस नयी यात्रा के लिये तैयार हो गये। समस्त ग्वाल-बाल श्रीकृष्ण और हलधरके साथ प्रसन्नतापूर्वक चल दिये। अनेक प्रकारकी वेश-भूषावाले वे बालक गीत गाते हुए जा रहे थे। कोई वंशीकी तान छेड़ते थे। तो कोई सींग बजाते थे। किन्हींके हाथों में करताल थे। कुछ लोगोंने अपने हाथोंमें वीणा ले रखी थी। किन्हींके हाथों में शरयन्त्र थे तो किन्हींके सिंगे। कुछ गोपबालकोंने अपने कानोंमें नये पल्लव पहन रखे थे। कितनोंने अधखिले कमल और दूसरे दूसरे फूल धारण कर रखे थे। किन्हींके हाथों में फूलोंके नये-नये गजरे थे। कुछ लोगों ने आजानुलम्बिनी वनमाला गलेमें डाल रखी थी। कुछ बालकोंने पल्लवों तथा फूलोंसे अपनी चोटियाँ सजा रखी थीं। विप्रवर! सब ग्वाल बाल, तरुण अवस्थावाली गोपियोंके यूथ और बड़ी-बूढ़ी गोपियोंकी अपार संख्या थी। मुने! श्रीराधाकी जो सुशीला आदि सहेली गोपियाँ थीं, वे नाना प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित हो बड़ी भव्य दिखायी देती थीं। दिव्य वस्त्र धारण कर हर्षसे मुस्कराती हुई वे सब की सब वृन्दावनकी ओर चलीं। कोई शिबिकापर सवार थीं तो कोई रथपर। राधिकादेवी रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित हो सुवर्णमय उपकरणोंसे युक्त रथपर बैठकर उन सब सहेलियों के साथ यात्रा कर रही थीं। यशोदा और रोहिणीजी भी रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत हो सुवर्णमय उपकरणोंसे सुसज्जित रथपर चढ़कर जा रही थीं। नन्द, सुनन्द, श्रीदामा, गिरिभानु, विभाकर, वीरभानु और चन्द्रभानु- ये प्रमुख गोपगण हाथीपर बैठकर सानन्द यात्रा कर रहे थे। श्रीकृष्ण और बलदेव दोनों भाई रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित हो सुवर्णमय रथपर बैठकर बड़े हर्ष के साथ वृन्दावनकी ओर जा रहे थे। कोटि-कोटि

बूढ़े और जवान गोप उस यात्रामें सम्मिलित थे। कोई घोड़ेपर सवार थे, कोई हाथियोंपर बैठे थे और कितने ही रथपर चढ़कर यात्रा करते थे। नन्दके सेवक उद्धत गोपगण बड़े हर्षके साथ चल रहे थे। उनमें से कुछ लोग बैलोंपर सवार थे। वे सब के सब संगीतकी तानमें तत्पर थे। राधिकाकी दूसरी दूसरी दासियाँ बहुत बड़ी संख्या में यात्रा कर रही थीं, उनके मनमें बड़ा उल्लास था। मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी और वे सब की सब सोनेके गहनोंसे सजी थीं। उनमेंसे कितनोंके हाथमें सिन्दूर थे, कितनी ही काजल लेकर चल रही थीं। किन्हींके हाथोंमें कन्दुक थे तो किन्हींके पुतलियाँ। कुछ सुन्दरी दासियाँ अपने हाथोंमें भोग-द्रव्य और क्रीड़ा-द्रव्य लेकर चल रही थीं। किन्हींके हाथोंमें वेषरचनाकी सामग्री थी तो किन्हींके हाथोंमें फूलोंकी मालाएँ। कुछ गोपियाँ हाथोंमें वीणा आदि वाद्य लिये सानन्द यात्रा कर रही थीं। कुछ अपने साथ अनिशुद्ध दिव्य वस्त्रोंका भार लिये चल रही थीं। कितनी ही चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरका द्रव ले जा रही थीं। कोई संगीतमें मग्न थीं तो कोई विचित्र कथाएँ कह रही थीं। उस समय कोटि कोटि शिबिकाएँ, रथ, घोड़े, गाड़ियाँ, बैल और लाखों हाथी आदि चल रहे थे। मुने! वृन्दावनमें पहुँचकर सबने उसे गृहशून्य देखा। तब वे सभी लोग वृक्षोंके नीचे यथास्थान ठहर गये। उस समय श्रीकृष्णने गोपोंको अभीष्ट गृह और गौओंके ठहरनेके स्थान बताते हुए कहा- 'आज इसी तरह ठहरो कल सब व्यवस्था हो जायगी।' श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गोपोंने पूछा- 'कन्हैया ! यहाँ कहाँ घर हैं।' उनका यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण बोले – ' इस स्थानपर बहुत से स्वच्छ गृह हैं, जिन्हें देवताओंने बनाया है; परंतु उन देवताओंको प्रसन्न किये बिना कोई भी गृह हमारी दृष्टिमें नहीं आ सकते। अतः गोपगण! आज वनदेवताओंकी पूजा करके बाहर ही ठहरो प्रातः काल तुम्हें यहाँ निश्चय ही बहुत से रमणीय गृह दिखायी देंगे। धूप, दीप, नैवेद्य, भेंट, पुष्प और चन्दन आदिके द्वारा वटके मूलभागमें स्थित चण्डिकादेवीकी पूजा करो।' श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गोपोंने दिनमें देवताओंकी पूजा करके भोजन आदि किये और रातमें वहीं प्रसन्नतापूर्वक शयन किया। (अध्याय १६)