तदनन्तर शिव-निर्माल्यका प्रसङ्ग सुनाकर श्रीकृष्णने कहा-
देवि! जगद्गुरु शंकरके दर्प भङ्गका वृत्तान्त तो तुमने सुन लिया। अब मुझसे दुर्गाके दर्पविमोचनकी कथा सुनो सम्पूर्ण देवताओंके तेजसे प्रकट हो जगदम्बाने कामिनीका कमनीय एवं मनोहर रूप धारण किया तथा दानवेन्द्रोंका वध करके देवकुलकी रक्षा की। इसके बाद देवीने दक्षपत्नीके उदरसे जन्म लिया। दक्षकन्या सतीदेवीने पिनाकपाणि शिवको पतिरूपमें ग्रहण किया और बड़ी भक्ति के साथ वे निरन्तर स्वामीकी सेवामें लगी रहीं दैवयोगसे देवताओंकी सभामें दक्षके साथ शिवकी अकारण शत्रुता हो गयी। दक्षने घर आकर एक यज्ञका आयोजन किया। उसमें उन्होंने समस्त देवताओंको आमन्त्रित किया; किंतु क्रोधके कारण शंकरको नहीं बुलाया। सब देवता अपनी पत्नियोंके साथ दक्षके घर आये; परंतु स्वाभिमानवश शंकर अपने गणोंके साथ वहाँ नहीं गये। उनके मनमें भी दक्षके प्रति बड़ा रोष था। सतीके मनमें पिता आदिके प्रति मोह था; इसलिये उन्होंने यत्नपूर्वक पतिदेवको उस यज्ञमें चलनेके लिये समझाया। जब किसी तरह उन्हें वहाँ ले जानेमें वे समर्थ न हो सकीं, तब स्वयं चञ्चल हो उठीं और पतिकी आज्ञा प्राप्त किये बिना ही दर्पवश पिताके घर चली आयीं। पतिके शापसे वहाँ उनका दर्प भङ्ग हुआ। पिताने उनसे बाततक नहीं की। वाणीमात्रसे भी पुत्रीका सत्कार नहीं किया। इतना ही नहीं, उन्हें वहाँ पतिकी निन्दा भी सुननी पड़ी। उसे सुनकर स्वाभिमानवश सतीने अपने शरीरको त्याग दिया। प्रिये ! इस प्रकार सतीके दर्प भङ्गका वृत्तान्त कहा गया। अब तुम उनके जन्मान्तर तथा दर्प दलनकी कथा सुनो। सतीने शीघ्र ही गिरिराज हिमालयकी पत्नी मेनाके गर्भसे जन्म ग्रहण किया। शिवने प्रेमवश सतीकी चिताका भस्म और उनकी अस्थियाँ ग्रहण कीं अस्थियोंकी तो माला बनायी और भस्मसे अङ्गरागका काम लिया। वे प्रेमवश बार-बार सतीको याद करते और उनके विरहमें इधर-उधर घूमते रहते थे। उधर मेनाने देवीको जन्म दिया। उनकी आकृति बड़ी ही मनोहर थी। विधाताकी सृष्टिमें गिरिराजनन्दिनीके लिये कहीं कोई उपमा नहीं थी। गुणोंकी तो वे जननी ही हैं; अतः सभी और सब प्रकारके सद्गुणोंको धारण करती हैं। समस्त देवपत्नियाँ उनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कला बढ़ती है, उसी तरह हिमालयके घरमें वे देवी दिनोंदिन बढ़ने लगीं। जब उन्होंने युवावस्था में प्रवेश किया, तब उन जगदम्बाको सम्बोधित करके आकाशवाणीने कहा- 'शिवे! तुम कठोर तपस्याद्वारा भगवान् शिवको पति रूपमें प्राप्त करो; क्योंकि तपस्याके बिना ईश्वरको पाना अथवा उनके अंशसे गर्भ धारण करना असम्भव है।' यह आकाशवाणी सुनकर यौवनके गर्वसे भरी हुई पार्वती हँसकर चुप हो रहीं। वह मन ही मन सोचने लगीं कि 'जो मेरे दूसरे जन्मकी अस्थि और भस्मको धारण करते हैं; वे इस जन्ममें मुझे सयानी हुई देख कैसे नहीं ग्रहण करेंगे। जो चतुर होकर भी मेरे शोकसे समूचे ब्रह्माण्डमें भटकते फिरे; वे ही मुझ परम सुन्दरीको अपनी आँखोंसे देख लेनेपर क्यों नहीं ग्रहण करेंगे? जिन कृपानिधानने मेरे लिये दक्षयज्ञका विध्वंस कर डाला था; वे अपनी जन्म-जन्मकी पत्नी मुझ पार्वतीको क्यों नहीं ग्रहण करेंगे ? पूर्वजन्मसे ही जो जिसकी पत्नी है और जिसका जो पति है, उन दोनोंमें यहाँ भेद कैसे हो सकता है? क्योंकि प्रारब्धको कोई पलट नहीं सकता।' अत्यन्त अभिमानके कारण अपनेको समस्त रूप और गुणोंका आधार मानकर साध्वी शिवाने तप नहीं किया। उन्होंने शिवको ईश्वर नहीं समझा। 'समस्त सुन्दरियोंमें मुझसे बढ़कर सुन्दरी दूसरी कोई नहीं है'– यह धारणा हृदयमें लेकर शिवादेवी गर्ववश तपस्यामें नहीं प्रवृत्त हुईं। वे यही सोचती थीं कि पुरुष अपनी स्त्रियोंके रूप, यौवन तथा वेश भूषाका ग्राहक है। शिव मेरा नाम सुनते ही बिना तपस्याके मुझे ग्रहण कर लेंगे। मनमें यह विश्वास लेकर गिरिजा हिमवान्के घरमें रहती थीं और दिन-रात सखी सहेलियोंके बीच खेल-कूदमें मतवाली रहा करती थीं। इसी समय शीघ्रतापूर्वक दूतने गिरिराजके भवनमें आकर दोनों हाथ जोड़ उनके सामने मधुर वाणीमें कहा।
दूत बोला-
शैलराज! उठिये, उठिये। अक्षयवटके पास जाइये। वहाँ वृषभवाहन महादेवजी अपने गणोंके साथ पधारे हैं महाराज! आप भक्तिभावसे मस्तक झुका उन्हें मधुपर्क आदि देकर उन इन्द्रियातीत देवेश्वरका पूजन कीजिये। महादेवजी सिद्धिस्वरूप, सिद्धोंके स्वामी, योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु, मृत्युञ्जय, कालके भी काल तथा सनातन ब्रह्मज्योति हैं। वे प्रभु परमात्मस्वरूप, सगुण तथा निर्गुण हैं। उन्होंने भक्तोंके ध्यानके लिये निर्मल महेश्वररूप धारण किया है। दूतकी यह बात सुनकर हिमवान् प्रसन्नता पूर्वक उठे और मधुपर्क आदि साथ भगवान् शंकरके समीप गये। दूतकी पूर्वोक्त बात सुनकर देवी शिवाके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। उन्होंने अपने मनमें यही माना कि महेश्वर मेरे ही लिये आये हैं। यही जानकर उन्होंने विविध दिव्य वस्त्रों तथा दिव्य रत्नालंकारों एवं मालाओं के द्वारा अपने सम्पूर्ण अङ्गोंको सुसज्जित किया। तत्पश्चात् अपने अनुपम रूपको देखकर पार्वतीने मन-ही-मन शंकरजीका ध्यान किया। विशेषतः स्वामीके चरणकमलोंका वे चिन्तन करने लगीं। उस समय शिवको छोड़कर पिता, माता, बन्धु बान्धव, साध्वी वर्ग तथा सहोदर भाई किसीको भी उन्होंने अपने मनमें स्थान नहीं दिया।
इधर गिरिराज हिमालयने वहाँ जाकर भगवान् चन्द्रशेखरके दर्शन किये। वे गङ्गाजीके रमणीय तटसे ऊपरको आ रहे थे। उनके मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी। वे संस्कारयुक्त माला धारण किये मेरे नामका जप कर रहे थे। उनके सिरपर सुनहरी प्रभासे युक्त जटाराशि विराजमान थी। वे वृषभकी पीठपर बैठकर हाथमें त्रिशूल लिये सब प्रकारके आभूषणोंसे सुशोभित थे। सर्पका ही यज्ञोपवीत पहने सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल थी, वे वस्त्रके स्थानमें व्याघ्रचर्म धारण किये, हड्डियोंकी माला पहने तथा अङ्गों में विभूति रमाये बड़ी शोभा पाते थे। दिगम्बर वेष, पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। उनके श्रीअङ्गोंसे करोड़ों सूर्योके समान प्रकाश फैल रहा था। हिमवान्ने उनके चारों ओर एकादश रुद्रोंको देखा, जो ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान थे। शिवके वामभागमें महाकाल और दाहिने भागमें नन्दिकेश्वर खड़े थे। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, बेताल, क्षेत्रपाल, भयानक पराक्रमी भैरव, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन, जैगीषव्य, कात्यायन, दुर्वासा और अष्टावक्र आदि ऋषि- सब उनके सामने खड़े थे। हिमालयने इन सबको मस्तक झुकाकर भगवान् शिवको प्रणाम किया और पृथ्वीपर माथा टेक दण्डकी भाँति पड़कर दोनों हाथ जोड़ लिये। इसके बाद बड़ी भक्ति-भावनासे शिवके चरणकमल पकड़कर पर्वतराजने नमस्कार किया और नेत्रोंसे आँसू बहाते पुलकित शरीर हो धर्मके दिये हुए स्तोत्रसे परमेश्वर शिवकी स्तुति आरम्भ की।
हिमालय बोले -
भगवन्! आप ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। आप ही जगत्पालक विष्णु हैं। आप ही सबका संहार करनेवाले अनन्त हैं और आप ही कल्याणदाता शिव हैं। आप गुणातीत ईश्वर, सनातन ज्योति स्वरूप हैं। प्रकृति और उसके ईश्वर हैं। प्राकृत पदार्थरूप होते हुए भी प्रकृति से परे हैं। भक्तोंके ध्यान करनेके लिये आप अनेक रूप धारण करते हैं। जिन रूपोंमें जिसकी प्रीति है, उसके लिये आप वे ही रूप धारण करते हैं। आप ही सृष्टिके जन्मदाता सूर्य हैं। समस्त तेजोंके आधार हैं। आप ही शीतल किरणोंसे सदा शस्योंका पालन करनेवाले सोम हैं। आप ही वायु, वरुण और सर्वदाहक अग्नि हैं। आप ही देवराज इन्द्र, काल, मृत्यु तथा यम हैं। मृत्युञ्जय होनेके कारण मृत्युकी भी मृत्यु, कालके भी काल तथा यमके भी यम हैं। वेद, वेदकर्ता तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् भी आप ही हैं। आप ही विद्वानोंके जनक, विद्वान् तथा विद्वानों के गुरु हैं। आप ही मन्त्र जप, तप और उनके फलदाता हैं। आप ही वाक् और आप ही वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं। आप ही उसके स्रष्टा और गुरु हैं। अहो ! सरस्वतीका बीज अद्भुत है। यहाँ कौन आपकी स्तुति कर सकता है? ऐसा कहकर गिरिराज हिमालय उनके चरणकमलोंको धारण करके खड़े रहे। भगवान् शिव वृषभपर बैठे हुए शैलराजको प्रबोध देते रहे। जो मनुष्य तीनों संध्याओंके समय इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, वह भवसागर में रहकर भी समस्त पापों तथा भयोंसे मुक्त हो जाता है। पुत्रहीन मनुष्य यदि एक मासतक इसका पाठ करे तो पुत्र पाता है। भार्याहीनको सुशीला तथा परम मनोहारिणी भार्या प्राप्त होती है। वह चिरकालसे खोयी हुई वस्तुको सहसा तथा अवश्य पा लेता है। राज्यभ्रष्ट पुरुष भगवान् शंकरके प्रसादसे पुनः राज्यको प्राप्त कर लेता है। कारागार, श्मशान और शत्रु-संकटमें पड़नेपर तथा अत्यन्त जलसे भरे गम्भीर जलाशयमें नाव टूट जानेपर, विष खा लेनेपर, महाभयंकर संग्रामके बीच फँस जानेपर तथा हिंसक जन्तुओंसे घिर जानेपर इस स्तुतिका पाठ करके मनुष्य भगवान् शंकरकी कृपासे समस्त भयोंसे मुक्त हो जाता है। (अध्याय ३७-३८)
Summary of chapter 32 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
Surrounded by millions of radiant Gopīs who were manifestations of pure devotion, Lord Kṛshṇa expanded Himself through His mystic potency so that every single maiden felt the personal touch of Kṛshṇa standing right beside her in an infinite circle of divine love. As they danced the ecstatic Rāsalīlā under the blossoming kadamba trees, celestial beings watched from the heavens, showering flowers and playing divine music while the rotation of time paused for months in a single divine night. The narrative emphasizes that this dance was completely transcendent, representing the eternal union of the Supreme Soul and His loving devotee energies.