नारदजीने पूछा-
भगवन्! तीन मास व्यतीत होनेपर उन गोपाङ्गनाओंका श्रीहरिके साथ किस प्रकार मिलन हुआ ? वृन्दावन कैसा है? रासमण्डलका क्या स्वरूप है? श्रीकृष्ण तो एक थे और गोपियाँ बहुत ऐसी दशामें किस तरह वह क्रीड़ा सम्भव हुई? मेरे मनमें इस नयी-नयी लीलाको सुननेके लिये बड़ी उत्सुकता हो रही है। महाभाग! आपके नाम और यशका श्रवण एवं कीर्तन बड़ा पवित्र है। कृपया आप उस रासक्रीड़ाका वर्णन कीजिये। अहो! श्रीहरिकी रासयात्रा, पुराणोंके सारकी भी सारभूता कथा है। इस भूतलपर उनके द्वारा की गयी सारी लीलाएँ ही सुननेमें अत्यन्त मनोहर जान पड़ती हैं।
सूतजी कहते हैं-
शौनक ! नारदजीकी यह बात सुनकर साक्षात् नारायण ऋषि हँसे और प्रसन्न मुखसे उन्होंने कथा सुनाना आरम्भ किया।
श्रीनारायण बोले-
मुने! एक दिन श्रीकृष्ण चैत्रमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिको चन्द्रोदय होनेके पश्चात् वृन्दावनमें गये। उस समय जूही, मालती, कुन्द और माधवीके पुष्पोंका स्पर्श करके बहनेवाली शीतल, मन्द एवं सुगन्धित मलयवायुसे सारा वनप्रान्त सुवासित हो रहा था। भ्रमरोंके मधुर गुञ्जारवसे उसकी मनोहरता बढ़ गयी थी। वृक्षोंमें नये-नये पल्लव निकल आये थे और कोकिलकी कुहू कुहू ध्वनिसे वह वन मुखरि हो रहा था। नौ लाख रासगृहोंसे संयुक्त वह वृन्दावन बड़ा ही मनोहर जान पड़ता था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमकी सुगन्ध सब ओर फैल रही थी। कर्पूरयुक्त ताम्बूल तथा भोग-द्रव्य सजाकर रखे गये थे। कस्तूरी और चन्दनयुक्त चम्पाके फूलोंसे रचित नाना प्रकारकी शय्याएँ उस स्थानकी शोभा बढ़ा रही थीं। रत्नमय प्रदीपोंका प्रकाश सब ओर फैला था धूपकी सुगन्धसे वह वनप्रान्त महमह महक रहा था। वहीं सब ओरसे गोलाकार रासमण्डल बनाया गया था, जो नाना प्रकारके फूलों और मालाओं से सुसज्जित था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरसे वहाँकी भूमिका संस्कार किया गया था। रासमण्डलके चारों ओर फूलोंसे भरे उद्यान तथा क्रीड़ासरोवर थे उन सरोवरोंमें हंस, कारण्डव तथा जलकुक्कुट आदि पक्षी कलरव कर रहे थे। वे जलक्रीड़ा योग्य सुन्दर तथा सुरत श्रमका निवारण करनेवाले थे। उनमें शुद्ध स्फटिकमणिके समान स्वच्छ तथा निर्मल जल भरा था। उस रासमण्डलमें दही, अक्षत और जल छिड़के गये थे। केलेके सुन्दर खम्भोंद्वारा वह चारों ओरसे सुशोभित था। सूतमें बँधे हुए आमके पल्लवोंके मनोहर बन्दनवारों तथा सिन्दूर, चन्दनयुक्त मङ्गल-कलशोंसे उसको सजाया गया था। मङ्गल कलशोंके साथ मालतीकी मालाएँ और नारियलके फल भी थे। उस शोभासम्पन्न रासमण्डलको देखकर मधुसूदन हँसे। उन्होंने कौतूहलवश वहाँ विनोदकी साधनभूता मुरलीको
बजाया। वह वंशीकी ध्वनि उनकी प्रेयसी गोपाङ्गनाओंके प्रेमको बढ़ानेवाली थी। राधिकाने जब वंशीकी मधुर ध्वनि सुनी तो तत्काल ही वे प्रेमाकुल हो अपनी सुध बुध खो बैठीं। उनका शरीर ढूँठे काठकी तरह स्थिर और चित्त ध्यानमें एकतान हो गया। क्षणभरमें चेत होनेपर पुनः मुरलीकी ध्वनि उनके कानों में पड़ी वे बैठी थीं, फिर उठकर खड़ी हो गयीं। अब उन्हें बार-बार उद्वेग होने लगा, वे आवश्यक कर्म छोड़कर घरसे निकल पड़ीं।
यह एक अद्भुत बात थी। चारों ओर देखकर वंशीध्वनिका अनुसरण करती हुई आगे बढ़ीं। मन-ही-मन महात्मा श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती जाती थीं। वे अपने सहज तेज तथा श्रेष्ठ रत्नसारमय भूषणोंकी कान्तिसे वनप्रान्तक प्रकाशित कर रही थीं। राधिकाकी सुशीला आदि जो अत्यन्त प्यारी तैंतीस सखियाँ थीं और समस्त गोपियों में श्रेष्ठ समझी जाती थीं; वे भी श्रीकृष्णके दिये हुए वरसे आकृष्ट चित्त हो डरी हुई-सी घरसे बाहर निकलीं। कुलधर्मका त्याग करके निःशङ्क हो वनकी ओर चलीं। वे सब की सब प्रेमातिरेकसे मोहित थीं। फिर उन प्रधान गोपियोंके पीछे-पीछे दूसरी गोपियाँ भी जो जैसे थीं, वैसे ही-लाखोंकी संख्यामें निकल पड़ीं। वे सब वनमें एक स्थानपर इकट्ठी हुईं और कुछ देरतक प्रसन्नतापूर्वक वहीं खड़ी रहीं। वहाँ कुछ गोपियाँ अपने हाथोंमें माला लिये आयी थीं। कुछ गोपाङ्गनाएँ व्रजसे मनोहर चन्दन हाथमें लेकर वहाँ पहुँची थीं। कई गोपियोंके हाथों में श्वेत चँवर शोभा पा रहे थे। वे सब बड़े हर्षके
साथ वहाँ आयी थीं। कुछ गोपकन्याएँ कुंकुम, ताम्बूल-पात्र तथा काञ्चन, वस्त्र लिये आयी थीं। कुछ शीघ्रतापूर्वक उस स्थानपर आयीं, जहाँ चन्द्रावली (राधा) सानन्द खड़ी थीं। वे सब एकत्र हो प्रसन्नतापूर्वक मुस्कराती हुईं वहाँ राधिकाकी वेश-भूषा सँवारकर बड़े हर्षके साथ आगे बढ़ीं मार्गमें बारंबार वे हरि नामका जप करती थीं। वृन्दावनमें पहुँचकर उन्होंने रमणीय रासमण्डल देखा, जहाँका दृश्य स्वर्गसे भी अधिक सुन्दर था। चन्द्रमाकी किरणें उस वनप्रान्तको अनुरञ्जित कर रही थीं। अत्यन्त निर्जन, विकसित कुसुमोंसे अलंकृत तथा फूलोंको छूकर प्रवाहित होनेवाली मलयवायुसे सुवासित वह रम्य रासमण्डल नारियोंके प्रेमभावको जगानेवाला और मुनियोंके भी मनको मोह लेनेवाला था। उन सबको वहाँ कोकिलोंकी मधुर काकली सुनायी दी। भ्रमरोंका अत्यन्त सूक्ष्म मधुर गुञ्जारव भी बड़ा मनोहर जान पड़ता था। वे भ्रमर भ्रमरियोंके साथ रह फूलोंका मकरन्द पान करके मतवाले हो गये थे।
तदनन्तर शुभ वेलामें सम्पूर्ण सखियोंके साथ श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिन्तन करके श्रीराधिकाने रासमण्डलमें प्रवेश किया। राधाको अपने समीप देखकर श्रीकृष्ण वहाँ बड़े प्रसन्न हुए। वे बड़े प्रेमसे मुस्कराते हुए उनके निकट गये। उस समय प्रेमसे आकुल हो रहे थे। राधा अपनी सखियोंके बीचमें रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित होकर खड़ी थीं। उनके श्रीअङ्गोंपर दिव्य वस्त्रोंके परिधान शोभा पा रहे थे। वे मुस्कराती हुई बाँकी चितवनसे श्यामसुन्दरकी ओर देखती हुई गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चल रही थीं। रमणीय राधा नवीन वेश-भूषा, नयी अवस्था तथा रूपसे अत्यन्त मनोहर जान पड़ती थीं। वे मुनियोंके मनको भी मोह लेनेमें समर्थ थीं। उनकी अङ्गकान्ति सुन्दर चम्पाके समान गौर थी। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। वे सिरपर मालतीकी मालासे युक्त वेणीका भार वहन करती थीं।
श्रीराधाने भी किशोर अवस्थासे युक्त श्यामसुन्दरकी ओर दृष्टिपात किया। वे नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा रत्नमय आभरणोंसे विभूषित थे। करोड़ों कामदेवोंकी लावण्यलीलाके मनोहर धाम प्रतीत होते थे और बाँके नयनोंसे उनकी ओर निहारती हुई उन प्राणाधिका राधिकाको देख रहे थे। उनके परम अद्भुत रूपकी कहीं उपमा नहीं थी। वे विचित्र वेश-भूषा तथा मुकुट धारण किये सानन्द मुस्करा रहे थे। बाँके नेत्रों के कोणसे बार-बार प्रीतमकी ओर देख-देखकर सती राधाने लज्जावश मुखको आँचलसे ढक लिया और वे मुस्कराती हुई अपनी सुध-बुध खो बैठीं। प्रेमभावका उद्दीपन होनेसे उनके सारे अङ्ग पुलकित हो उठे। तदनन्तर श्रीकृष्ण एवं राधिकाका परस्पर प्रेम शृङ्गार हुआ।
मुने! नौ लाख गोपियाँ और उतने ही गोप विग्रहधारी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण- ये अठारह लाख गोपी कृष्ण रासमण्डलमें परस्पर मिले। नारद! वहाँ कङ्कणों, किङ्किणियों, वलयों और श्रेष्ठ रत्न निर्मित नूपुरोंकी सम्मिलित झनकार कुछ कालतक निरन्तर होती रही। इस प्रकार स्थलमें रासक्रीड़ा करके वे सब प्रसन्नतापूर्वक जलमें उतरे और वहाँ जल क्रीड़ा करते-करते थक गये। फिर वहाँसे निकलकर नवीन वस्त्र धारण करके कौतूहलपूर्वक कर्पूरयुक्त ताम्बूल ग्रहण करके सबने रत्नमय दर्पणमें अपना अपना मुँह देखा। तदनन्तर श्रीकृष्ण राधिका तथा गोपियोंके साथ नाना प्रकारकी मधुर मनोहर क्रीड़ाएँ करने लगे।
फिर पवित्र उद्यानके निर्जन प्रदेशमें सरोवरके रमणीय तटपर जहाँ बाहर चन्द्रमाका प्रकाश फैल रहा था, जहाँकी भूमि पुष्प और चन्दनसे चर्चित थी, जहाँ सब ओर अगुरु तथा चन्दनसे सम्पृक्त मलय- समीरद्वारा सुगन्ध फैलायी जा रही थी और भ्रमरोंके गुञ्जारवके साथ नर-कोकिलोंकी मधुर काकली कानोंमें पड़ रही थी; योगियोंके परम गुरु श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने अनेक रूप धारण कर स्थल प्रदेशमें मधुर लीला विलास किये। इसके बाद राधाके साथ सनातन पूर्णब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण यमुनाजीके जलमें प्रवेश किया। श्रीकृष्णके जो अन्य मायामय स्वरूप थे, वे भी गोपियोंके साथ जलमें उतरे। यमुनाजीमें परम रसमयी क्रीड़ा करनेके पश्चात् सबने बाहर निकलकर सूखे वस्त्र पहने और माला आदि धारण कीं। तदनन्तर सब गोप- किशोरियाँ पुनः रासमण्डलमें गयीं। वहाँके उद्यानमें सब ओर तरह-तरहके फूल खिले हुए थे। उन्हें देखकर परमेश्वरी राधाने कौतुकपूर्वक गोपियोंको पुष्पचयनके लिये आज्ञा दी। कुछ गोपियोंको उन्होंने माला गूँथनेके काममें लगाया। किन्हींको पानके बीड़े सुसज्जित करनेमें तथा किन्हींको चन्दन घिसनेमें लगा दिया। गोपियोंके दिये हुए पुष्पहार, चन्दन तथा पानको लेकर बाँके नेत्रोंसे देखती हुई सुन्दरी राधाने मन्द हास्यके साथ श्यामसुन्दरको प्रेमपूर्वक वे सब वस्तुएँ अर्पित कीं। फिर कुछ गोपियोंको श्रीकृष्णकी लीलाओंके गानमें और कुछको मृदङ्ग, मुरज आदि बाजे बजानेमें उन्होंने लगाया। इस प्रकार रासमें लीला-विलास करके राधा निर्जन वनमें श्रीहरिके साथ सर्वत्र मनोहर विहार करने लगीं। रमणीय पुष्पोद्यान, सरोवरोंके तट, सुरम्य गुफा, नदों और नदियोंके समीप, अत्यन्त निर्जन प्रदेश, पर्वतीय कन्दरा, नारियोंके मनोवाञ्छित स्थान, तैंतीस वन- भाण्डीरवन, रमणीय श्रीवन, कदम्बवन, तुलसीवन, कुन्दवन, चम्पकवन, निम्बवन, मधुवन, जम्बीरवन, नारिकेलवन, पूगवन, कदलीवन, बदरीवन, बिल्ववन, नारंगवन, अश्वत्थवन, वंशवन, दाडिमवन, मन्दारवन, तालवन, आम्रचूतवन, केतकीवन, अशोकवन, खर्जूरवन, आम्रातकवन, जम्बूवन, शालवन, कटकीवन, पद्मवन, जातिवन, न्यग्रोधवन, श्रीखण्डवन और विलक्षण केसरवन इन सभी स्थानों में तीस दिन-राततक कौतूहलपूर्वक शृङ्गार किया, तथापि उनका मन तनिक भी तृप्त नहीं हुआ। अधिकाधिक इच्छा बढ़ती गयी, ठीक उसी तरह, जैसे घीकी धारा पड़नेसे अग्नि प्रज्वलित होती है। देवता, देवियाँ और मुनि, जो रास-दर्शनके लिये पधारे थे, अपने-अपने घरको लौट गये। उन सबने रास रसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और आश्चर्यचकित हो हर्षका अनुभव करते हुए वे वहाँसे विदा हुए। बहुत-सी देवाङ्गनाओंने श्रीहरिके साथ प्रेम-मिलनकी लालसा लेकर भारतवर्षके श्रेष्ठ नरेशोंके घर घरमें जन्म लिया। (अध्याय २८)
Summary of chapter 26 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa is as follows:
During a joyous game of hide-and-seek in the forests of Vṛndāvana, a powerful demon named Pralamba infiltrated the cowherd boys in disguise, waiting for an opportunity to kidnap Balarāma. Pairing up for a piggyback racing game where the losers carried the winners, Pralamba carried Balarāma on his back and began flying rapidly into the sky. Balarāma increased His divine weight until Pralamba was forced to resume his massive demon form, whereupon Balarāma struck him fiercely on the head with His fist, crushing the demon's skull and liberating his soul before returning joyfully to His friends.