49 - भगवान्‌ विष्णुद्वारा गरूडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश, मनुष्य - योनि प्राप्तिकी दुर्लभताका वर्णन, मनुष्य - शरीर प्राप्तकर आत्म कल्याणके लिये सचेष्ट रहना, संसारकी दुःख रूपता तथा अनित्यता और ईश्वरकी नित्यताका वर्णन, कालके द्वारा सभीके विनाशका प्रतिपादन, सत्संग और विवेक ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति, तत्त्वज्ञानरूपी मोक्षप्राप्तिके उपाय, गरुड पुराणकी वक्तृ- श्रोतृपरम्परा तथा गरुड पुराणका माहात्म्य

गरुडने कहा - हे दयाके सागर! अज्ञानके कारण ही जीवकी उत्पत्ति इस संसारमें होती है, इस बातको मैंने सुन लिया। अब मैं मोक्षके सनातन उपायको सुनना चाहता हूँ। हे देवदेवेश! शरणागत वत्सल! प्रभो! सभी प्रकारके दु:खोंसे मलिन बनाये गये इस दुस्तर असार संसारमें नाना प्रकारके शरीरोंमें प्रविष्ट जीवोंकी अनन्त राशियाँ हैं। वे इसी संसारमें जन्म लेती हैं और इसीमें मर जाती हैं, किंतु उनका अन्त नहीं होता है। वे सदैव दुःखसे व्याकुल ही रहती हैं। यहाँ कहीं कोई भी सुखी नहीं है। हे मोक्षदाता स्वामिन्‌! वे किस उपायसे मुक्त हो सकते हैं? उसको आप मुझे बतानेकी कृपा करें।

श्री भगवानने कहा - हे तार्क्ष्य! जो तुम मुझसे पूछ रहे हो, जिसको सुनने मात्रसे ही मनुष्य इस संसारके आवागमनके चक्रसे मुक्त हो जाता है, उसे मैं कह रहा हूँ; तुम सुनो।

हे खगेश! इस जगत् से परे परब्रह्म स्वरूप, निरवयव, सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सर्वेश, निर्मल, अद्वय - तत्त्व, स्वयंप्रकाश, आदि - अन्तसे रहित, विकारशून्य, परात्पर, निर्गुण और सच्चिदानन्द शिव हैं, उसीके अंश ये जीव हैं। जो अनादि अविद्यासे वैसे ही आच्छादित हैं, जैसे अग्निमें उसके अंश विस्फुल्लिङ्ग स्थित हैं। अनादि कर्मोंके प्रभावसे प्राप्त शरीरादि नाना उपाधियों में होनेके कारण परस्पर भिन्न - भिन्न हो गये हैं, सुख - दुःख प्रदान करनेवाले पुण्य और पापोंका उनके ऊपर नियन्त्रण है। उसी कर्मके अनुसार उन्हें जाति, देह, आयु तथा भोगकी प्राप्त होती है। सूक्ष्म या लिङ्ग शरीरके बने रहनेतक पुनः - पुन: जन्म - मरणकी परम्परा चलती रहती है।

स्थावर, कृमि, पक्षी, पशु, मनुष्य, धार्मिक, देवता और मुमुक्षु यथाक्रम चार प्रकारके शरीरोंको धारण करके हजारों बार उनका परित्याग करते हैं। यदि पुण्य कर्मके प्रभावसे उनमेंसे किसीको मानव योनि मिल जाय तो उसे ज्ञानी बनकर मोक्ष प्राप्त करना चाहिये। चौरासी लाख योनियोंमें स्थित जीवात्माओंको बिना मानव योनि मिले तत्त्व ज्ञानका लाभ नहीं मिल सकता है। इस मृत्यु लोकमें हजार ही नहीं, करोड़ों बार जन्म लेनेपर भी जीवको कदाचित्‌ ही संचित पुण्यके प्रभावसे मानव योनि मिलती है। यह मानव योनि मोक्षकी सीढ़ीके समान है। इस दुर्लभ योनिको प्राप्त कर जो प्राणी स्वयं अपना उद्धार नहीं करता है, उससे बढ़कर पापी इस जगत्‌में दूसरा कौन हो सकता है -

सोपानभूतं मोक्षस्य मानुष्य प्राप्य दुर्लभम्‌।

यस्तारयति नात्मानं तस्मात्‌ पापतरोऽत्र कः॥

अन्य योनियोंसे भिन्न सुन्दर - सुन्दर इन्द्रियोंवाले इस जन्मका लाभ लेकर जो मनुष्य आत्महितका ज्ञान नहीं रखता है, वह ब्रह्मघाती है। किसीका भी पुरुषार्थ शरीरके बिना सम्भव नहीं है। अतः शरीररूपी धनकी रक्षा करते हुए पुण्य कर्म करना चाहिये। आत्मा सभीका पात्र है, इसलिये उसकी रक्षामें मनुष्य सर्वदा संलग्न रहे। जो व्यक्ति आजीवन उस आत्माकी शक्षामें प्रयत्शील रहता है, वह जीवित रहते हुए ही अपना कल्याण देखता है। मनुष्यको ग्राम, क्षेत्र, धन, घर, शुभाशुभ कर्म और शरीर बार - बार नहीं प्राप्त होता है। विद्वान्‌ लोग सदैव शरीरकी रक्षाके उपायमें लगे रहते हैं। कुष्ठादि महा भयंकर रोगोंसे ग्रस्त होनेपर भी मनुष्य उस शरीरको छोड़ना नहीं चाहता है। शरीरकी रक्षा धर्मके लिये, धर्मकी रक्षा ज्ञानके लिये और ज्ञानकी रक्षा ध्यान योगके लिये तथा ध्यान योगकी रक्षा तत्काल मुक्ति प्राप्तिके लिये होती है। यदि आत्मा ही अहितकारी कार्योंसे अपनेको दूर करनेमें समर्थ नहीं हो सकता है तो अन्य दूसरा कौन ऐसा हितकारी होगा जो आत्माको सुख प्रदान करेगा।

यहीं इसी लोकमें नरकरूपी व्याधिकी चिकित्सा नहीं की गयी तो औषधिविहीन देश (परलोक) - में जाकर रोगी उससे मुक्तिका क्‍या उपाय करेगा? बुढ़ापा तो बाघिनके समान है। जिस प्रकारसे फूटे हुए घड़ेका जल धीरे - धीरे बह जाता है, उसी प्रकार आयु भी क्षीण होती रहती है। शरीरमें विद्यमान रोग शत्रुके सदृश कष्ट देते हैं, इसलिये कल्याण इसीमें है कि इन सभीसे मुक्ति प्राप्त करनेका सत्प्रयास किया जाय। जबतक शरीरमें किसी प्रकारका दुःख नहीं होता है, जबतक विपत्तियाँ सामने नहीं आती हैं और जबतक शरीरकी इन्द्रियाँ शिथिल नहीं पड़ती हैं, तबतक ही आत्म कल्याणका प्रयास हो सकता है। जबतक यह शरीर स्वस्थ है, तबतक ही तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये सम्यक्‌ प्रयत्न किया जा सकता है। कोशागारमें आग लग जानेपर मूर्ख कुआँ खोदता है, ऐसे प्रयत्नसे क्या लाभ -

इहैव नरकव्याथेश्चिकित्सां न करोति यः।

गत्वा निरौषधं देशं व्याधिस्थ: किं करिष्यति॥

व्याघ्नीवास्ते जरा चायुर्याति भिन्‍नघटाम्बुवत्‌।

निघ्नन्ति रिपुवद्रोगास्तस्माच्छ्रेय: समभ्यसेत्‌॥

यावन्नाश्रयते दुःखं यावन्नायान्ति चापदः।

यावन्नेन्द्रियवैकल्यं तावच्छ्रेय: समभ्यसेत्‌॥

यावत्‌ तिष्ठति देहोऽयं तावत्‌ तत्त्वं समभ्यसेत्‌।

संदीप्तकोशभवने कूपं खनति दुर्मति:॥

मनुष्य नाना प्रकारके सांसारिक कार्योंमें व्यस्त रहनेसे (बीतते हुए) समयको नहीं जान पाता है। वह दुःख - सुख तथा आत्महितको भी नहीं जानता है। पैदा होने वालोंको, रोगियोंको, मरने वालेको, आपत्ति ग्रस्तको और दुःखी लोगोंको देखकर भी मनुष्य मोहरूपी मदिराको पीकर (जन्म - मरणादि दुःखसे युक्त संसारसे) नहीं डरता। सम्पदाएँ स्वणके समान हैं, यौवन पुष्पके सदृश है, आयु चञ्चल बिजलीके तुल्य नष्टप्राय है, ऐसा जानकर भी किसको धैर्य हो सकता है? सौ वर्षका जीवन अत्यल्प है। वह भी निद्रा तथा आलस्यमें आधा चला जाता है। तदनन्तर बाल्यावस्था, रोग, वृद्धावस्था एवं अन्यान्य दुःखोंमें व्यतीत हो गया और जो थोड़ा बचा वह भी निष्फल हो जाता है -

कालो न ज्ञायते नानाकार्य: संसारसम्भवै:।

सुखं दुःखं जनो हन्त न वेत्ति हितमात्मनः॥

जातानार्तान्‌ मृतानापद्भ्रष्टान्‌ दृष्ठा च दुःखितान्‌।

लोको मोहसुरां पीत्वा न बिभेति कदाचन॥

सम्पदः स्वप्नसंकाशा यौवन कुसुमोपमम्‌।

तडिच्चपलमायुष्यं कस्य स्याज्जानतो धृति:॥

शतं जीवितमत्यल्पं निद्रालस्यैस्तदर्धकम्‌।

बाल्यरोगजरादु:खैरल्पं तदपि निष्फलम्‌॥

जिस कार्यको तुरंत आरम्भ कर देना चाहिये, उसके संदर्भमें जो उद्योगहीन होकर बैठा है, जहाँ जागते रहना चाहिये, वहाँ जो सोता रहे तथा भयके स्थानपर जो आश्वस्त होकर रहता है - ऐसा वह कौन मनुष्य है, जो मारा नहीं जाता? जलके फेनके समान इस शरीरको आक्रमण करके जीव स्थित है, यहाँ जिन प्रिय वस्तुओंके साथ संनिवास है, वे अनित्य हैं। अतः जीव कैसे निर्भय होकर नितान्त अनित्य, शरीर, भोग और पुत्र - कलत्रादिक साथ रहता है। जो अहितमें हित, अनिश्चितमें निश्चित और अनर्थमें अर्थको विशेष रूपसे जाननेवाला है, वह व्यक्ति अपने मुख्य प्रयोजनको नहीं जानता। जो देखते हुए भी गिर जाता है, जो सुनते हुए भी सद्‌ - ज्ञानको नहीं प्राप्त कर पाता है, जो सद् ग्रन्थोंको पढ़ते हुए भी उसे नहीं समझ पाता है, वह देवमायासे विमोहित है -

प्रारब्धये निरुद्योगी जागर्तव्ये प्रसुप्तक:।

विश्वस्तश्च भयस्थाने हा नर: को न हन्यते॥

तोयफेनसमे देहे जीवेनाक्रम्य संस्थिते।

अनित्यप्रियसंवासे कथं तिष्ठति निर्भय:॥

अहिते हितसंज्ञ: स्थादध्रुवे ध्रुवसंज्ञक:।

अनर्थे चार्थविज्ञान: स्वमर्थं यो न वेत्ति सः॥

पश्यन्नपि प्रस्खलति शृण्वन्नपि न बुध्यति।

पठन्नपि न जानाति देवमायाविमोहितः॥

कालके इस गहरे महासागरमें यह सम्पूर्ण जगत्‌ डूबता - उतराता रहता है। मृत्यु, रोग और बुढ़ापा रूपी ग्राहोंसे जकड़े जानेपर भी किसी व्यक्तिको ज्ञान नहीं हो पाता है। मनुष्यके लिये प्रतिक्षण भय है, समय जीत रहा है, किंतु वह उसी प्रकार दिखायी नहीं देता है, जैसे जलमें पड़ा हुआ कच्चा घड़ा गलता हुआ दिखायी नहीं देता। कदाचित्‌ वायुको बाँधकर रखा जा सकता है, आकाशका खण्डन हो सकता है, तरंगोंको किसी सूत्रादिमें पिरोया जा सकता है; किंतु आयुमें विश्वास नहीं किया जा सकता है। जिसके(प्रलयाग्निके) प्रभावसे पृथ्वी दहकती है, सुमेरु पर्वत विशीर्ण हो जाता है तथा सागरका जल सूख जाता है। फिर इस शरीरके सम्बन्धमें तो बात ही क्या? पुत्र मेरा है, स्त्री मेरी है, धन मेरा है, बन्धु - बान्धव मेरे हैं। इस प्रकार ‘में, में’ चिल्लाते हुए बकरेकी भाँति कालरूपी भेड़िया बलात् मनुष्यको मार डालता है -

तन्निमज्जज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे।

मृत्युरोगजराग्राहैर्न कश्चिदपि बुध्यते॥

प्रतिक्षणभयं काल: क्षीयमाणो न लक्ष्यते।

आमकुम्भ इवाम्भ:स्थो विशीर्णो न विभाव्यते॥

युज्यते वेष्टनं वायोराकाशस्य च खण्डनम्‌।

ग्रथनञ्च तरंगाणामास्था नायुषि युज्यते॥

पृथिवी दह्यते येन मेरुश्चापि विशीर्यते।

शुष्यते सागरजलं शरीरस्य च का कथा॥

अपत्यं मे कलत्रं मे धनं मे बान्धवाश्च मे।

जल्पन्तमिति मर्त्याजं हन्ति कालवृको बलात्॥

यह मैंने किया है, यह मुझे करना है, यह किया गया है या नहीं किया गया है-इस प्रकारकी भावनासे युक्त मनुष्यको मृत्यु अपने वशमें कर लेती है। कल किये जानेवाले कार्यको आज ही कर लेना चाहिये। जो दोपहरके बाद करना है, उसको दोपहरसे पहले ही कर लेना चाहिये, क्योंकि कार्य हो गया है अथवा नहीं हुआ है, इसकी मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती। वृद्धावस्था पथ - प्रदर्शक है, अत्यन्त भयंकर रोग सैनिक है, मृत्यु शत्रु है, ऐसी विषम परिस्थितिमें फँसा हुआ मनुष्य अपने रक्षक भगवान्‌ विष्णुको क्यों नहीं देखता है। तृष्णा रूपी सूईसे छिद्रित, विषय रूपी घृतमें डूबे, राग - द्वेषरूपी अग्निकी आँचमें पकाये गये मानवको मृत्यु खा लेती है। बालक, युवा, वृद्ध और गर्भमें स्थित सभी प्राणियोंको मृत्यु अपनेमें समाहित कर लेती है, ऐसा है यह जगत्। यह जीव अपने शरीरको भी छोड़कर यमलोक चला जाता है तो भला स्त्री, माता - पिता और पुत्रादिका जो सम्बन्ध है, वह किस कारणसे प्रेरित होकर बनाया गया है। संसार दुःखका मूल है, वह किसका होकर रहा है अर्थात्‌ इसकी ओर जिसका मन अधिक रम गया है, वही दुःखित है। जिसने इस सांसारिक व्यामोहका परित्याग कर दिया है, वह सुखी है। उसके अतिरिक्त कहींपर भी अन्य कोई दूसरा सुखी नहीं है -

इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत्कृताकृतम्‌।

एवमीहासमायुक्तं कृतान्तः कुरुते वशम्‌॥

श्व: कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्णिकम्‌।

न हि मृत्यु: प्रतीक्षेत कृतं वाप्यथ वाऽकृतम्‌॥

जरादर्शितपन्थानं प्रचण्डव्याधिसैनिकम्‌।

अधिष्ठितो मृत्युशत्रुं त्रातारं किं न पश्यति॥

तृष्णासूचीविनिर्भिन्नं सिक्तं विषयसर्पिषा।

रागद्वेषानले पक्‍वं मृत्युरश्नाति मानवम्‌॥

बालांश्च यौवनस्थांश्च वृद्धान्‌ गर्भगतानपि।

सर्वानाविशते मृत्युरेवम्भूतमिदं जगत्‌॥

स्वदेहमपि जीवोऽयं मुक्त्वा याति यमालयम्‌।

स्त्रीमातृपितृपुत्रादिसम्बन्ध: केन हेतुना॥

दुःखमूलं हि संसार: स यस्यास्ति स दुःखितः।

तस्य त्याग: कृतो येन स सुखी नापर: क्वचित्‌॥

यह जगत् सभी दुःखोंका जनक, समस्त आपदाओंका घर तथा सब प्रकारके पापोंका आश्रय है। अत: क्षणभरमें ही मनुष्यको इसका त्याग कर देना चाहिये। लौह और काष्ठके जालमें फँसा हुआ पुरुष मुक्त हो सकता है; किंतु पुत्र एवं स्त्रीके मोहजालमें फँसा हुआ वह कभी मुक्त नहीं हो सकता। मनुष्य मनको प्रिय लगनेवाले जितने पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध स्थापित करता जाता है, उतनी शोककी कीलें उसके हृदयमें चुभती जाती हैं। विषयका आहार करनेवाले देहस्थित तथा सभी प्रकारके अशेष सामर्थ्यसे वन्चित कर देनेवाले जिन इन्द्रियरूपी चोरोंके द्वारा लोक विनष्ट हो रहे हैं। हाय, यह बड़े कष्टकी बात है। जैसे मांसके लोभमें फँसी हुई मछली बंसीके काँटेको नहीं देखती है, वैसे ही सुखके लालचमें फँसा हुआ शरीरी यमकी बाधाको नहीं देखता है -

प्रभवं सर्वदुःखानामालयं सकलापदाम्‌।

आश्रयं सर्वपापानां संसारं वर्जयेत्‌ क्षणात्‌॥

लोहदारुमयै: पाशै: पुमान्‌ बद्धो विमुच्यते।

पुत्रदारमयै: पाशैर्मुच्यते न कदाचन॥

यावत: कुरुते जन्तु: सम्बन्धान्‌ मनसः प्रियान्‌।

तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशङ्कव:॥

वञ्चिताशेषवित्तैस्तैर्नित्यं लोको विनाशित।

हा हनत विषयाहारैर्देहस्थेन्द्रियतस्करैः॥

मांसलुब्धो यथा मत्स्यो लोहशंकुं न पश्यति।

सुखलुब्धस्तथा देही यमबाधां न पश्यति॥

हे खगेश! अपने हित - अहितको न जानते हुए जो नित्य कुपथगामी हैं, जिनका लक्ष्य मात्र पेट भरना है, वे मनुष्य नारकीय प्राणी हैं। निद्रा, भय, मैथुन तथा आहारकी अभिलाषा सभी प्राणियोंमें समान रूपसे रहती है; उनमें ज्ञानीको मनुष्य और अज्ञानीको पशु माना गया है। मूर्ख व्यक्ति प्रातःकालमें मल - मूत्र, दोपहरमें भूख - प्यास तथा रातमें मैथुन और निद्रासे पीड़ित रहते हैं। बड़े दुःखकी बात है कि अज्ञानसे मोहित होकर सभी प्राणी अपने शरीर, धन एवं स्त्री आदिमें अनुरक्त होकर जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। अत: व्यक्तिको उनकी ओर बढ़ी हुई अपनी आसक्तिका परित्याग करना चाहिये। यदि आसक्ति छोड़ी न जा रही हो तो महा पुरुषोंके साथ उस आसक्तिको जोड़ देना चाहिये, क्योंकि आसक्ति - रूपी व्याधिकी औषधि सज्जन पुरुष ही हैं -

हिताहितं न जानन्तो नित्यमुन्मार्गगामिनः।

कुक्षिपूरणनिष्ठा ये ते नरा नारकाः खग॥

निद्राभीमैथुनाहारा: सर्वेषां प्राणिनां समाः।

ज्ञानवान्‌ मानव: प्रोक्तो ज्ञानहीनः पशु: स्मृतः॥

प्रभाते मलमूत्राभ्यां क्षुत्तृड्भ्यां मध्यगे रवौ।

रात्रौ मदननिद्राभ्यां बाध्यन्ते मूढमानवा:॥

स्वदेहधनदारादिनिरताः सर्वजन्तव:।

जायन्ते च म्रियन्ते च हा हन्ताज्ञानमोहिता:॥

तस्मात्‌ सङ्ग: सदा त्याज्य: स चेत्‌ त्यक्तुं न शक्यते।

महद्भि: सह कर्तव्य: सन्‍तः सङ्गस्य भेषजम्‌॥

सत्संग और विवेक - ये दो प्राणीके मलरहित, स्वस्थ दो नेत्र हैं। जिसके पास ये दोनों नहीं हैं, वह मनुष्य अन्धा है। वह कुमार्गपर कैसे नहीं जायगा? अर्थात्‌ वह अवश्य ही कुमार्ग गामी होगा -

सत्सङ्गश्च विवेकश्च निर्मलं नयनद्वयम्‌।

यस्य नास्ति नरः सोऽन्ध: कथ न स्यादमार्गग:॥

अपने - अपने वर्णाश्रम - धर्मको माननेवाले सभी मानव दूसरेके धर्मको नहीं जानते हैं, किंतु वे दम्भके वशीभूत हो जायँ तो अपना ही नाश करते हैं। व्रतचर्यादिमें लगे हुए प्रयासरत कुछ लोगोंसे क्या बनेगा? क्योंकि अज्ञानसे स्वयं अपने आत्मतत्त्वको ढके हुए लोग प्रचारक बनकर देश - देशान्तरमें विचरण करते हैं। नाममात्रसे स्वयं संतुष्ट कर्मकाण्डमें लगे हुए मनुष्य तथा मन्त्रोच्चार एवं होमादिसे युक्त याज्ञिक यज्ञविस्तारके द्वारा भ्रमित हैं। मेरी मायासे विमोहित मूढ़ लोग शरीरको सुखा देनेवाले एकभक्त तथा उपवासादि नियमोंसे अपने पुण्यरूप अदृष्टकी कामना करते हैं। शरीरकी ताड़ना मात्रसे अज्ञानीजन क्या मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं? क्या वामीको पीटनेसे महाविषधारी सर्प मर सकता है? यह कदापि सम्भव नहीं है। जटाओंके भार और मृगचर्मसे युक्त वेष धारण करनेवाले दाम्भिक ज्ञानियोंकी भाँति इस संसारमें भ्रमण करते हैं और लोगोंको भ्रमित करते हैं। लौकिक सुखमें आसक्त ‘मैं ब्रह्मको जानता हूँ’ ऐसा कहनेवाले, कर्म तथा ब्रह्म - इन दोनोंसे भ्रष्ट, दम्भी एवं ढोंगी व्यक्तिका अन्त्यजके समान परित्याग कर देना चाहिये। घरको वनके समान मानकर निर्वस्त्र और लज्जारहित जो साधु गधे अन्य पशुओंकी भाँति इस जगतमें घूमते रहते हैं, क्या वे विरक्त होते हैं? कदापि नहीं। यदि मिट्टी, भस्म तथा धूलका लेप करनेसे मनुष्य मुक्त हो सकता है तो क्या मिट्टी और भस्ममें ही नित्य रहनेवाला कुत्ता मुक्त नहीं हो जायगा? वनवासी तापसजन घास, फूस, पत्ता तथा जलका ही सेवन करते हैं, क्या इन्हींके समान वनमें रहनेवाले सियार, चूहे और मृगादि जीवजन्तु तपस्वी हो सकते हैं? जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त गङ्गा आदि पवित्रतम नदियोंमें रहनेवाले मेंढक या मछली आदि प्रमुख जलचर प्राणी योगी हो सकते हैं? कबूतर, शिलाहार और चातक पक्षी कभी भी पृथ्वीका जल नहीं पीते हैं, क्या उनका व्रती होना सम्भव है। अतः ये नित्यादिक कर्म लोकरज्जनके कारक हैं। हे खगेश्वर! मोक्षका कारण तो साक्षात्‌ तत्त्वज्ञान है।

हे खगेश्वर! षड्दर्शन रूपी महाकूपमें पशुके समान गिरे हुए मनुष्य पाशसे नियन्त्रित पशुकी भाँति परमार्थको नहीं जानते। वेद - शास्त्रादिके महा समुद्रमें इधर - उधरसे अनुमान लगानेवाले इस षड्दर्शन रूपी तरंगसे ग्रस्त होकर कुतर्की बन जाते हैं। जो वेद - आगम और पुराणका ज्ञाता परमार्थको नहीं जानता है, उस कपटीका सब कथन कौवेका काँव - काँव ही है। यह ज्ञान है, यह जाननेके योग्य है, ऐसी चिन्तासे भलीभाँति बेचैन तथा परमार्थतत्त्वसे दूर प्राणी दिन - रात शास्त्रका अध्ययन करता है। वाक्य ही छन्द है और उस छन्दसे गुम्फित काव्योंमें अलंकार सुशोभित होता है। इस चिन्तासे दुःखित मूर्ख व्यक्ति अत्यधिक व्याकुल हो जाता है। उस परमतत्त्वका अन्य ही अर्थ है; किंतु लोग उसका दूसरा अर्थ लगाकर दुःखित होते हैं। शास्त्रोंका सद्भाव कुछ और ही है; किंतु वे उसकी व्याख्या उससे भिन्न ही करते हैं। उपदेशादिसे रहित कुछ अहंकारी व्यक्ति उन्‍मनीभावकी बात कहते हैं, किंतु स्वयं उसका अनुभव नहीं करते हैं। वे वेद - शास्त्रोंको पढ़ते हैं और परस्पर उसको जाननेका प्रयास करते हैं; किंतु जैसे कलछी पाकका रसास्वाद नहीं कर पाती है, वैसे ही वे परमतत्त्वको नहीं जान पाते हैं। सिर पुष्पोंको ढोता है, परंतु उसकी सुगन्धका अनुभव नासिका ही करती है। बहुत - से लोग वेद - शास्त्र पढ़ते हैं; किंतु उनके भावको समझनेवाला दुर्लभ है। अपने ही भीतर विद्यमान उस परमतत्त्वको न पहचान कर मूर्ख प्राणी शास्त्रोंमें वैसे ही व्याकुल रहता है, जैसे कछारमें आये हुए बकरी या भेंडके बच्चेको एक गोप कुएँमें खोजता है। सांसारिक मोहको विनष्ट करनेमें शब्दज्ञान समर्थ नहीं है; क्योंकि दीपककी वार्तासे कभी अन्धकारको दूर नहीं किया जा सकता है। बुद्धिरहित व्यक्तिका पढ़ना वैसे ही है, जैसे अन्धेके हाथमें दर्पण हो। अत: प्रज्ञावान्‌ पुरुषोंके द्वारा अधीत शास्त्र तत्त्वज्ञानका लक्षण है। यह ज्ञान है, यह जाननेके योग्य है, ऐसे विचारोंमें फँसा हुआ मनुष्य सब कुछ जाननेकी इच्छा करता है, किंतु हजार दिव्य वर्षोंतक पढ़नेपर भी वह शास्त्रोंका अन्त नहीं समझ पाता है। शास्त्र तो अनेक हैं, किंतु आयु बहुत ही कम है और उसमें भी करोड़ों विघ्न - बाधाएँ हैं। इसलिये जलमें मिले हुए क्षीरको जैसे हंस ग्रहण कर लेता है, वैसे ही उनके सार - तत्त्वको ग्रहण करना चाहिये -

अनेकानि च शास्त्राणि स्वल्पायुर्विघ्नकोटय:।

तस्मात्‌ सारं विजानीयात्‌ क्षीरं हंस इवाम्भसि॥

हे तार्क्ष्य! वेद - शास्त्रोंका अभ्यास करके जो बुद्धिमान्‌ व्यक्ति उस परम तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसको उन सभीका परित्याग उसी प्रकार करना चाहिये, जिस प्रकार एक धान्यार्थी पुरुष धान ग्रहण कर लेता है और पुआलको फेंक देता है। जैसे अमृतके पानसे संतृप्त प्राणीका भोजनसे कोई सरोकार नहीं रह जाता है, वैसे ही तत्त्वको जाननेवाले दिद्वान्‌का शास्त्रसे कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है। हे विनतात्मज! वेदाध्ययनसे मुक्ति सम्भव नहीं है और न तो शास्त्रोंको पढ़नेसे वह प्राप्त हो सकती है, वह कैवल्य ज्ञानसे ही सुलभ है, किसी अन्य साधनसे नहीं। आश्रम उस मोक्षका कारण नहीं हो सकता है। दर्शन भी उसकी प्राप्तिकि कारण नहीं हैं। वैसे ही सभी कर्मोंको उसका कारण नहीं मानना चाहिये। उसका कारण ज्ञान है। मुक्ति देनेवाली गुरुकी एक वाणी है। अन्य सभी विद्याएँ विडम्बना करनेवाली हैं। हजार शास्त्रोंका भार सिरपर होनेपर भी प्राणीको तो संजीवन देनेवाला वह परमतत्त्व अकेला ही है। सभी प्रकारकी क्रियाओंसे रहित वह अद्वैत शिवतत्त्व कहा गया है। उसको गुरुके मुखसे प्राप्त करना चाहिये। वह करोड़ों आगम - शास्त्रोंका अध्ययन करनेसे मिलनेवाला नहीं है।

ज्ञान दो प्रकारका कहा जाता है। एक है शास्त्रकथित ज्ञान और दूसरा है विवेकसे प्राप्त हुआ ज्ञान। इसमें शब्द ही ब्रह्म है, ऐसा आगम - शास्त्र कहते हैं। वह परमतत्त्व ही ब्रह्म है, ऐसा विवेकी जन कहते हैं। कुछ लोग अद्वैतको प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं और कुछ लोग द्वैतको चाहते हैं; किंतु वे सभी यह नहीं जानते हैं कि वह परमतत्त्व समभाववाला है। वह द्वैताद्वैतसे रहित है।

बन्धन और मोक्षके लिये इस संसारमें दो ही पद हैं। एक पद है ‘यह मेरा है’ और दूसरा पद है ‘यह मेरा नहीं है। ‘यह मेरा है’ इस ज्ञानसे वह बँध जाता है और ‘यह मेरा नहीं है’ इस ज्ञानसे वह मुक्त हो जाता है -

द्वे पदे बन्धमोक्षाय न ममेति ममेति च।

ममेति बध्यते जन्तुर्न ममेति प्रमुच्यते॥

जो कर्म इस जीवात्माको बन्धनमें नहीं ले जाता है, वही सत्कर्म है। जो प्राणीको मुक्ति प्रदान करनेमें समर्थवती है, वही विद्या है। इसके अतिरिक्त दूसरा कर्म तो परिश्रम करनेके लिये होता है और दूसरी विद्या कलानैपुण्यको प्रदर्शित करनेके लिये होती है। जबतक प्राणियोंको कर्म अपनी ओर आकृष्ट करते हैं, जबतक उनमें सांसारिक वासना विद्यमान है और जबतक उनकी इन्द्रियोंमें चञ्चलता रहती है, तबतक उन्हें परमतत्त्वका ज्ञान कहाँ हो सकता है -

तत्कर्म यन्‍न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तिदा।

आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्‌॥

यावत्‌ कर्माणि दीप्यन्ते यावत्‌ संसारवासना।

यावदिन्द्रियचापल्यं तावत्‌ तत्त्वकथा कुत:॥

जबतक व्यक्तिमें शरीरका अभिमान है, जबतक उसमें ममता है, जबतक उस प्राणीमें प्रयल्लकी क्षमता रहती है, जबतक उसमें संकल्प तथा कल्पना करनेकी शक्ति है, जबतक उसके मनमें स्थिरता नहीं है, जबतक वह शास्त्र - चिन्तन नहीं करता है एवं जबतक उसपर गुरुकी दया नहीं होती है, तबतक उसको परमतत्त्व - कथा कहाँसे प्राप्त हो सकती है?

‘तभीतक ही तप, व्रत, तीर्थ, जप तथा होमादिक कृत्य एवं वेद - शास्त्र तथा आगमकी कथा है, जबतक व्यक्ति उस परमार्थ - तत्त्वको नहीं जान जाता है। हे तार्क्ष्य! यदि व्यक्ति अपना मोक्ष चाहता हो तो वह सभी अवस्थाओंमें प्रयत्नपूर्वक सदैव तत्त्वनिष्ठ होकर रहे। दैहिक, दैविक और भौतिक - इन तीनों तापोंसे संतप्त प्राणीको धर्म और ज्ञान जिसका पुष्प है, स्वर्ग तथा मोक्ष जिसका फल है, ऐसे मोक्षरूपी वृक्षकी छायाका आश्रय करना चाहिये। अत: श्रीगुरु देवके मुखसे प्राप्त ज्ञानके द्वारा आत्मतत्त्वको जानना चाहिये। ऐसा करनेसे जीव इस दुर्धर्ष संसारके बन्धनसे सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है’ -

तावत् तपो व्रतं तीर्थं जपहोमार्चनादिकम्‌।

वेदशास्त्रागमकथा यावत् तत्त्वं न विन्दति॥

तस्मात्‌ सर्वप्रयत्नेन सर्वावस्थासु सर्वदा।

तत्त्वनिष्ठो भवेत्‌ तार्क्ष्य यदीच्छेन्मोक्षमात्मन:॥

धर्मज्ञानप्रसूनस्य स्वर्गमोक्षफलस्य च।

तापत्रयादिसंतप्तश्छायां मोक्षतरो: श्रयेत्‌॥

तस्माज्ज्ञानेनात्मतत्त्वं विज्ञेयं श्रीगुरोर्मुखात्‌।

सुखेन मुच्यते जन्तुर्घोरसंसारबन्धनात्‌॥

हे गरुड! उस तत्त्वज्ञका अन्तिम कृत्य सुनो, जिसके द्वारा ब्रह्मपद या निर्वाण नामवाला मोक्ष प्राप्त होता है, अब मैं उसे कहूँगा ।

अन्त समय आ जानेपर पुरुष भयरहित होकर असंगरूपी शस्त्रसे देहादिकी आसक्तिको काट दे। घरसे संन्‍यासी बनकर निकला धीरवान्‌ पुरुष पवित्र तीर्थमें जाकर उसके जलमें स्नान करे। तदनन्तर वहींपर एकान्त देशमें किसी स्वच्छ एवं शुद्ध भूमिमें विधिवत्‌ आसन लगाकर बैठ जाय तथा एकाग्रचित्त होकर गायत्री आदि मन्त्रोंके द्वारा उस परम शुद्ध ब्रह्माक्षरका ध्यान करे। ब्रह्मके बीज मन्त्रको बिना भुलाये वह अपनी श्वासको रोककर मनको वशमें करे। मनरूपी घोड़ेको बुद्धिरूपी सारथीद्वारा सांसारिक विषयोंसे उसका नियन्त्रण करे। अन्य कर्मोंसे मनको रोककर बुद्धिके द्वारा शुभकर्ममें मनको लगाये।

मैं ब्रह्म हूँ। मैं परम धाम हूँ। मैं ही ब्रह्म हूँ। परमपद मैं हूँ। इस प्रकारकी समीक्षा करके आत्माको निष्कल आत्मामें प्रविष्ट करना चाहिये। ‘जो मनुष्य ‘ॐ’ इस एकाक्षर ब्रह्मका जप करता है, वह अपने शरीरका परित्याग कर परमपद प्राप्त करता है’-

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्‌।

य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्‌॥

जहाँ ज्ञान - वैराग्यसे रहित अहंकारी प्राणी नहीं जाते हैं वहाँ सुधीजन जाते हैं। उनके विषयमें तुम्हें बताता हूँ - मान - मोहसे रहित, आसक्ति - दोषसे परे, नित्य अध्यात्म - चिन्तनमें दत्तचित्त, सांसारिक समस्त कामनाओंसे रहित और सुख - दुःख नामक द्वन्द्वसे मुक्त जो ज्ञानी पुरुष हैं, वे ही उस अव्ययपदको प्राप्त करते हैं -

निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा:।

द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु: खसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत्‌॥

‘जो व्यक्ति ज्ञानरूपी हृदमें राग - द्वेष नामवाले मलको दूर करनेवाले सत्यरूपी जलसे भरे हुए मानस तीर्थमें स्नान करता है, उसीको मोक्ष प्राप्त होता है’-

ज्ञानह्रदे सत्यजले रागद्वेषमलापहे।

यः स्नाति मानसे तीर्थे स वै मोक्षमवाप्नुयात्‌॥

‘प्रौढ़ वैराग्यमें स्थित होकर अनन्यभावसे जो मनुष्य मेरा भजन करता है, वह पूर्ण दृष्टिवाला प्रसन्नात्मा व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है’-

प्रौढवैराग्यमास्थाय भजते मामनन्यभाक्‌।

पूर्णदृष्टिः प्रसन्‍नात्मा स वै मोक्षमवाप्नुयात्‌॥

‘घर छोड़कर मरनेकी अभिलाषासे जो तीर्थमें निवास करता है और मुक्ति - क्षेत्रमें मरता है, उसे मुक्ति प्राप्त होती है। अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, काञ्ची, अवन्तिका तथा द्वारका - ये सात पुरियाँ मोक्षप्रदा हैं’ -

त्यक्त्वा गृहं च यस्तीर्थे निवसेन्मरणोत्सुक:।

मुक्तिक्षेत्रेषु म्रियते स वै मोक्षमवाप्लुयात्‌॥

अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका।

पुरी द्वारवती ज्ञेया: सप्तैता मोक्षदायिका:॥

हे तार्क्ष्य! ज्ञान - वैराग्यसे युक्त यह सनातन मोक्ष - धर्म ऐसा ही है। इसको तुम्हें सुना भी दिया है। दूसरा प्राणी भी ज्ञान - वैराग्य पूर्वक इसको सुनकर मोक्ष प्राप्त करता है।

‘तत्त्वज्ञ मोक्ष प्राप्त करते हैं, धर्मनिष्ठ स्वर्ग जाते हैं। पापी नरकमें जाते हैं। पक्षी आदि इसी संसारमें अन्य योनियोंमें प्रविष्ट होकर घूमते रहते हैं’ -

मोक्ष गच्छन्ति तत्त्वज्ञा धार्मिका: स्वर्गतिं नरा:।

पापिनो दुर्गतिं यान्ति संसरन्ति खगादयः॥

सूतजीने कहा - हे महर्षियो! अपने प्रश्नके उत्तरके रूपमें भगवान्‌के मुखसे इस प्रकार सिद्धान्तको सुनकर प्रसन्न शरीरवाले गरुडने जगदीश्वरको प्रणाम किया और कहा - प्रभो! आपके इन आह्लादकारी वचनोंसे मेरा बहुत बड़ा संदेह दूर हो गया। ऐसा कहकर उन्होंने भगवान्‌ विष्णुसे जानेकी आज्ञा ली और वे कश्यपजीके आश्रममें चले गये।

हे ब्राह्मणो! जिस प्रकार प्राणी मृत्युके बाद तत्काल दूसरी योनिमें चला जाता है अथवा जैसेवह विलम्बसे देहान्तरको प्राप्त करता है, इन दोनों बातोंमें परस्पर कोई विरोध नहीं है। हे तात! जैसा मैंने भगवानूसे सुना है, वैसा ही मैंने आपको सुना दिया है। लक्ष्मीपति भगवान्‌ नारायणके इन वाक्योंको सुनकर मरीचपुत्र कश्यप भी बहुत प्रसन्न हुए। ब्रह्मासे इस महा पुराणको सुनकर मैंने आप लोगोंको भी वही सुनाया है। इससे आप सभीका संदेह भी दूर हो गया। गरुडके द्वारा कहा गया यह महा पुराण बड़ा ही विचित्र है।

इस महा पुराणको गरुडने हरिसे प्राप्त किया था। उसके बाद गरुडसे भृगुको प्राप्त हुआ। तदनन्तर भृगुसे वसिष्ठ, वसिष्ठसे वामदेव, वामदेवसे पराशर मुनि, पराशर मुनिसे व्यास और व्याससे मैंने इसे सुना है। है ऋषियो! मेरे द्वारा अब आप सबको परम गोपनीय यह वैष्णव पुराण सुनाया गया है। जो मनुष्य इस महा पुराणको सुने या जो इसको पढ़े, वह इस लोक और परलोक सभीमें सुख प्राप्त करता है। संयमनी पुरीमें जाते हुए प्रेतको जो दुःख प्राप्त होता है, उसका जैसा निरूपण इस महा पुराणमें किया गया है। इसे सुननेसे जो पुण्य होता है, उसके कारण वह प्रेत मुक्त हो जाता है। इस महा पुराणमें कहे गये कर्म - विपाकादिको सुननेसे मनुष्यको यहींपर वैराग्य प्राप्त हो जाता है। अत: जिस प्रकारसे हो सके प्राणीको इसे अवश्य सुनना चाहिये।

है जितेन्द्रिय ऋषियों! आप लोग मुनीश भगवान्‌ श्री कृष्णका भजन करें, जिनके मुखसे निकली हुई सुधासारकी धाराके मात्र एक वर्णरूपी करको श्रुतिपूरक रूपी चिल्लूसे पीकर परमात्माके साथ ऐक्य प्राप्त हो जाता है।

व्यासजीने कहा - इस प्रकार सूतके मुखसे निकली हुई समस्त शास्त्रोंके अर्थसे सुशोभित भगवान्‌ विष्णुकी वाणीका अमृत पान करके ऋषिगण परम संतुष्ट हुए। परस्पर उन लोगोंके बीच सर्वार्थदर्शी सूतजी महा राजकी प्रशंसा होने लगी। शौनक आदि ऋषियोंको भी अत्यन्त प्रसन्नता हुई। सूतजीके द्वारा कही गयी पक्षिराज गरुडके संदेहोंको विनष्ट करनेवाली भगवान्‌ विष्णुकी वाणीको सुनकर जितेन्द्रिय मुनिराज शौनकने मन - ही - मन अपनेको धन्य माना। उस समय अपनी उदार वाणीसे उन मुनियोंने सूतजीको बार - बार धन्य हैं, आप धन्य हैं - कहकर धन्यवाद दिया। तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर उन्हें विदाई दी।

यह गरुड महापुराण बड़ा ही पवित्र और पुण्य दायक है। यह सभी पापोंका विनाशक एवं सुनने वालोंकी समस्त कामनाओंका पूरक है। इसका सदैव श्रवण करना चाहिये’-

पुराणं गारुडं पुण्यं पवित्र पापनाशनम्‌।

श्रृण्वतां कामनापूरं श्रोतव्यं सर्वदेव हि॥

इस महा पुराणको सुननेके बाद वाचककों शय्यादि सभी प्रकारके विधिवत्‌ दान देनेका विधान है अन्यथा कथा सुननेका लाभ उन्हें नहीं प्राप्त होता। श्रोताको सर्वप्रथम इस महा पुराणकी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद वस्त्र, अलंकार, गौ तथा दक्षिणा आदिसे वाचककी सम्मान पूजा करनी चाहिये। अधिक पुण्य - लाभके लिये अधिकाधिक अन्नदान, स्वर्णदान और भूमिदानसे वाचककी पूजा करनी चाहिये। ‘जो मनुष्य इस महा पुराणको सुने या जैसे भी हो, जैसे ही उसका पाठ करे तो वह प्राणी यमराजकी भयंकर यातनाओंको तोड़कर निष्पाप होकर स्वर्गको प्राप्त करता है’-

यश्चेदं शृणुयान्मर्त्यो यश्चापि परिकीर्तयेत्‌।

विहाय यातनां घोरां धूतपापो दिवं व्रजेत्‌॥

॥ धर्मकाण्ड - प्रेतकल्प सम्पूर्ण ॥