गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
8 - और्ध्व॑दैहिक क्रियाके अधिकारी तथा जीवित - श्राद्धकी संक्षिप्त विधि
गरुडने कहा - हे स्वामिन्! इस सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कार्यको सम्पन्न करनेका अधिकारी कौन है? यह क्रिया कितने प्रकारकी है? यह सब मुझे बतानेकी कृपा करें।
श्रीकृष्णने कहा - हे खगेश! [जो मनुष्य मर जाता है, उसका और्ध्वदैहिक कार्य] पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भाई, भाईकी संतान अथवा सपिण्ड या जातिके लोग कर सकते हैं। इन सभीके अभावमें समानोदक संतान इस कार्यको करनेका अधिकारी है। यदि दोनों कुलों (मातृकुल एवं पितकुल) - के पुरुष समाप्त हो गये हों तो स्त्रियाँ इस कार्यको कर सकती हैं। यदि मनुष्यने इच्छापूर्वक अपने सभी सगे - सम्बन्धियोंसे अपना सम्बन्ध - विच्छेद! कर लिया है तो उसका और्ध्वदैहिक कार्य राजाको कराना चाहिये।
यह क्रिया तीन प्रकारकी है, जिनकों पूर्व, मध्यम एवं उत्तर क्रियाओंकी संज्ञा दी गयी है। हे पक्षिन्! इस क्रियाको प्रतिसंवत्सर एकोद्दिष्ट - विधानसे करना अपेक्षित है। इस श्राद्ध - क्रियाके फलको तुम मुझसे सुनो।
ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, सूर्य, अग्नि, वसु, मरुद्गण, विश्वेदेव, प्रितृगण, पक्षी; मनुष्य,पशु, सरीसृप, मातृगण और इनके अतिरिक्त जो भी प्राणी इस संसारमें उत्पन्न हैं, उन सभीको श्रद्धापूर्वक किये जा रहे श्राद्धसे मनुष्य प्रसन्त कर सकता है। ऐसे श्राद्धसे तो सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न हो उठता है। जो लोग अपने सगे - सम्बन्धियोंके द्वारा किये गये श्राद्धसे संतृप्त हो जाते हैं, वे श्राद्धकर्ताको पुत्र, स्त्री और धन आदिके द्वारा तृप्त करते हैं। हे गरुड! इस प्रकार मैंने संक्षेपमें अधिकार और क्रिया - भेदका निरूपण किया।
गरुडने कहा - हे देवश्रेष्ठ! यदि पहले कहे गये अधिकारियोंमेंसे एक भी न हो तो उस समय मनुष्यको क्या करना चाहिये?
श्रीकृष्णने कहा - जब अधिकारी व्यक्ति न हो और न तो किसीके अधिकारका निश्चय ही हो रहा हो तो वैसी स्थितिमें मनुष्यको स्वयं अपने जीवन कालमें ही जीवित - श्राद्ध कर लेना चाहिये। उपवास पूर्वक स्नान करके भगवान् कृष्णके प्रति आसक्त - हृदय होकर मनुष्य एकाग्र मनसे उस कर्ता, भोक्ता, सर्वेश्वर विष्णुकी पूजा करे। उसके बाद वह अपने पितृ गणोंके लिये तिल एवं दक्षिणाके सहित तीन जलधेनु ( दानके लिये कृत्रिम धेनुका विधान है। इसे गोदानप्रसंगमें वराहपुराण आदिमें जलधेनुदानविधिके अन्तर्गत देखना चाहिये।) ‘ॐ पितृभ्यःस्वधा’ कहकर निवेदित करे और धेनुदान करते समय ‘ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नमः’ तथा ‘ॐ सोमाय त्वा पितृमते स्वधा नमः ‘ ऐसा स्मरण करता हुआ वह दक्षिणाभिमुख होकर दक्षिणा सहित तीसरी जलधेनु देते समय विशेषरूपसे ‘यमायाङ्गीरसे स्वधा नमः’ यह स्मरण करता रहे। भगवान् विष्णुके यजन एवं जलधेनुदानके मध्य ही ब्राह्मणोंका आवाहन करके उन्हें भोजन कराना चाहिये। वह पहली जलधेनु उत्तर दिशामें तथा दूसरी जलधेनु दक्षिण दिशामें रखे और उन दोनों धेनुओंके मध्यमें तीसरी धेनु रखकर आवाहन आदि श्राद्धसम्बन्धी कार्य करे। इस आवाहनादि क्रियाके पूर्वमें सर्वप्रथम आवाहन पूर्वक विश्वेदेवोंके प्रतिनिधि भूत ब्राह्मणोंकी भलीभाँति पूजा कर वह यह कहे -
वसुभ्यस्त्वामहं विप्र रुद्रेभ्यस्त्वामहं ततः।
सूर्येभ्यस्त्वामहं विप्र भोजयामीति तान्वदेत्॥
तदनन्तर आवाहनादिक जो शेष कार्य हैं, उन्हें पितृ - शेष कार्योंकी तरह सम्पादित करे। उसके बाद वह वसुके उद्देश्यसे ब्राह्मणको एक सुशील धेनुका दान दे। तत्पश्चात् आग्नेय कोणमें रुद्रदेव तथा दक्षिण दिशामें सूर्यदेवके निमित्त स्थित ब्राह्मणोंको भी एक - एक गाय देनी चाहिये तथा विश्वेदेवोंके लिये तिलपूर्ण पात्रका निवेदन करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको अक्षयोदक दान करना चाहिये एवं ब्राह्मण ‘ॐ स्वस्ति’ इस प्रतिवचनसे श्राद्ध कृत्यको सम्पूर्णताका आशीर्वाद दें। इसके बाद अष्टाक्षर - मन्त्रसे भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए उनका विसर्जन करे।
इसके पश्चात् स्वस्थचित्त होकर कुलदेवी, ईशानी, शिव तथा भगवान् नारायणका स्मरण करे। तदनन्तर चतुर्दशी तिथिको सुगमतासे उपलब्ध होनेवाली श्रेष्ठ नदीके तटपर जाय। वहाँ वस्त्र तथा लौहखण्डोंका दान करे एवं ‘ॐ जितं ते’ इस मन्त्रका जप करता हुआ स्वयं दक्षिणाभिमुख होकर अग्निको प्रज्वलित करे। तदनन्तर वह पचास कुशोंसे ब्राह्मीप्रतिकृति (पुत्तल) बना करके उसका दाह करे । इसके बाद श्मशानमें विहित होम करके अन्तमें पूर्णाहुतिकी क्रिया सम्पन्न करे। तत्पश्चात् निरग्नि भूमि, यम तथा रुद्रदेवका स्मरण करे। हवन करनेके बाद प्रधान स्थानपर उक्त देवोंका आवाहन करना चाहिये। उसके बाद वह अमिनिमें मूँगमिश्रित चरु पकाये। तदनन्तर तिल - तण्डुल - मिश्रित दूसरा चरु पकाये।
‘ॐ पृथिव्यै नमस्तुभ्यं०’ - इस मन्त्रसे प्रथम चरु निवेदित करे। ‘ॐ यमाय नमश्च०’ इस मन्त्रसे यमको द्वितीय चरु निवेदित करे ‘ॐ नमश्चाथ रुद्राय श्मशानपतये नमः’- इस मन्त्रसे श्मशानपति रुद्रको निवेदित करे। उसके बाद श्राद्धकर्ता सात नामवाले यमराजके लिये निम्न मन्त्रोंसे सात जलाञ्जलियाँ छोड़े-
‘ॐ यमाय स्वधा तस्मै नमः’,’ॐ धर्मराजाय स्वधा तस्मै नमः’, ‘ॐ मृत्यवे स्वथा तस्मै नमः’,’ॐ अन्तकाय स्वधा तस्मै नमः’,’ॐ वैवस्वताय स्वधा तस्मै नमः’,’ॐ कालाय स्वधा तस्मै नमः’और ‘ॐ सर्वप्राणहराय स्वधा तस्मै नमः।’
इसके बाद श्राद्धकर्ता ‘तुम सब अमुक - अमुक गोत्रसे सम्बन्धित हो, यह तिलोदक तुम्हारे लिये होवे’। ऐसा कहते हुए अर्घ्य - पुष्पसे युक्त दस पिण्ड - दान दे। उसके बाद उन्हें धूप, दीप, बलि, गन्ध तथा अक्षय जल प्रदान करे। उक्त दस पिण्डोंका दान देनेके पश्चात् भगवान् विष्णुके सुन्दर सुभग मुखका ध्यान करना चाहिये।
इस कृत्यको करनेके बाद आशौचके अनन्तमें प्रतिमास मासिक श्राद्ध और सपिण्डीकरण करना चाहिये। श्राद्ध चाहे अपने लिये हो या दूसरेके लिये यही नियम है। शक्ति, आरोग्य, धन और आयु - ये चारों अस्थिर होते हैं, अत: ऐसा जानकर जीवित - श्राद्ध करना चाहिये। मैंने इस जीवित - श्राद्धके विषयमें तुम्हें सब कुछ बता दिया है।
Summary of chapter 8 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
Bhagavān Vishṇu highlights the tremendous spiritual merit acquired through Śayyādāna, the sacred gift of a fully furnished bed accompanied by clothes, ornaments, and household goods bestowed upon a virtuous Brāhmaṇa in honor of the deceased. The Lord explains that this generous gift manifests in the subtle world as a luxurious, comfortable resting place for the departed soul during its long and arduous journey through intermediate realms. Through the sincere practice of Śayyādāna, the living family relieves the ancestor’s exhaustion, protects them from harsh weather along the cosmic road, and earns abundant divine grace for their own spiritual lineage.