गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
28 - 29 - प्रेतत्वमुक्तिके उपाय
गरुडजीने कहा - हे मधुसूदन! जिस दान या सत्कर्मसे प्राणीकी प्रेतयोनि छूट जाती है, उसे बतानेकी कृपा करें, इसके ज्ञानसे लोगोंका बड़ा कल्याण होगा।
श्रीकृष्णने कहा - हे पक्षिराज! सुनो! मैं तुम्हें समस्त अमङ्गलोंको विनष्ट करनेवाले दानको बता रहा हूँ। शुद्ध स्वर्णका घट बनाकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा लोकपालोंसहित उसकी पूजाकर दुग्ध और घृतसे परिपूर्ण उस घटको सुपात्र ब्राह्मणको दानमें देनेसे प्रेतत्वसे मुक्ति मिल जाती है।
हे गरुड! पुत्रहीन व्यक्तिकी सदगति नहीं होती, अत: यथाविधान पुत्र उत्पन्न करना चाहिये। मृत व्यक्तिको गोबरसे लीपी गयी मण्डलाकार भूमिमें स्थापित करना चाहिये। भूमि गोबरसे लीपनेपर पवित्र हो जाती है तथा मण्डलका निर्माण करनेसे उस स्थानपर देवताओंका वास हो जाता है। ऐसे ही मृत व्यक्तिके नीचे तिल और कुश बिछानेसे जीवको उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है, साथ ही मृत व्यक्तिके मुँहमें पदञ्चरत्न डालनेसे जीवको शुभ गति मिलती है।
हे तार्क्ष्य! तिल मेरे पसीनेसे उत्पन्न हैं, इसलिये वे सदा पवित्र हैं -
‘मम स्वेदसमुद्भूतास्तिलास्तार्क्ष्य पवित्रका: ।’
इसी प्रकार कुशकी उत्पत्ति मेरे रोमसे हुई है ‘दर्भा मल्लोमसम्भूता:। कुशयुक्त भूमि अपने ऊपर विद्यमान मृत जीवको नि:संदेह स्वर्ग पहुँचा देती है। कुशमें ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव - ये तीनों देव प्रतिष्ठित रहते हैं - ‘त्रयो देवा: कुशे स्थिता:।’ हे पक्षिराज! ब्राह्मण, मन्त्र, कुश, अग्नि तथा तुलसी - ये बार - बार प्रयोगमें लाये जानेपर भी पर्युषित (बासी)नहीं होते -
विप्रा मन्त्रा: कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर।
नैते निर्माल्यतां यान्ति क्रियमाणाः पुनः पुनः॥
इसी तरह विष्णु, एकादशीव्रत, भगवद्गीता, तुलसी, ब्राह्मण तथा गौ - ये छः इस संसार सागरसे मुक्ति दिलानेवाले हैं; -
विष्णुरेकादशीगीतातुलसीविप्रधेनव:।
अपारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी॥
इसीलिये हे गरुड! तिल, कुश और तुलसी - ये आतुर व्यक्तिकी दुर्गतिको रोककर उसे सदगति दिलाते हैं। आतुर - कालमें दानकी भी विशेष महिमा है। भगवान् विष्णुकी देहसे लवणका प्रादुर्भाव है, अत: आतुर - कालमें लवण - दान करनेसे भी जीवकी दुर्गति नहीं होती। (28 वें तथा 29 वें अध्यायका विषय प्रथम तथा द्वितीय अध्यायमें पूर्णरूपसे आ गया है, इसलिये इसे यहाँ संक्षिप्त रूपमें दिया गया है। पूर्ण विवरण प्रथम तथा द्वितीय अध्यायमें देखना चाहिये।)
Summary of chapter 27 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
Bhagavān Vishṇu extols the incomparable spiritual potency of holy pilgrimage sites and sacred rivers such as Kāśī, Prayāga, Kurukshetra, and the divine Gaṅgā. The Lord reveals that performing Śrāddha, making charitable gifts, or bathing in these sanctified waters generates infinitely multiplied spiritual merit capable of liberating even the most sinful ancestors from darkness. The Supreme Lord assures Garuḍa that a single Piṇḍa offered at a holy Tīrtha with a pure and humble heart reaches the ancestor instantly, breaking long-standing karmic blockages and granting them residence in heavenly abodes.