गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
34 - इष्टापूर्तकर्मकी महिमा तथा और्ध्वदैहिक कृत्य, दस पिण्डदानसे आतिवाहिक शरीरके निर्माणकी प्रक्रिया, एकादशाहादि श्राद्धका विधान, शय्यादानकी महिमा एवं सपिण्डीकरण - श्राद्धका स्वरूप
श्री कृष्णने कहा - हे गरुड! शास्त्रके अनुसार धर्म और अधर्मका जो लक्षण किया गया है, उसको तुम सुनो। तप, त्रेतायुगमें ज्ञान, द्वापरमें यज्ञ और दान तथा कलियुगमें एकमात्र दानकी प्रशंसा की है।
मनीषियोंने उत्तम प्रकृतिवाले गृहस्थजनोंके लिये इस धर्मको स्वीकार किया है कि वे यथाशक्ति इष्टपूर्तकर्म (तालाब, कुआँ आदि खुदवाना तथा देवालय, औषधालय आदि बनवाना ‘इष्टापूर्तकर्म’ है।) करें, उसके करनेसे उन्हें पातक नहीं होता। जो मनुष्य वृक्षारोपण करता है, गुफा, कुआँ और जलाशय खुदवाता है, उसको यममार्गमें चलते समय अत्यधिक सुखकी प्राप्ति होती है। जो लोग ठंडकसे पीड़ित ब्राह्मणको तापनेके लिये अग्नि प्रदान करते हैं, वे सभी कामनाओंको पूर्ण करके अतिशीतल यमलोकके मार्गमें अग्नि तापते हुए सुखपूर्वक जाते हैं। जिस मनुष्यने पृथ्वीका दान दिया है, उसने मानो स्वर्ण, मणि - मुक्तादि बहुमूल्य रत्न, वस्त्र और आभूषणादिका सम्पूर्ण दान दे दिया। इस पृथ्वीपर मानव जो कुछ दानमें देते हैं, वे सब दिये गये पदार्थ यमलोकके महापथमें उनके समीप उपस्थित रहते हैं। पुत्र विधिपूर्वक अपने मृत पिताके लिये नाना प्रकारके जिन सुन्दर भोज्य - पदार्थोंका दान देता है, वे सभी पिताको प्राप्त होते हैं।
आत्मा (शरीर) ही पुत्रके रूपमें प्रकट होता है। वह पुत्र यमलोकमें पिताका रक्षक है। घोर नरकसे पिताका उद्धार वही करता है, इसलिये उसको पुत्र कहा जाता है। अतः पुत्रको पिताके लिये आजीवन श्राद्ध करना चाहिये, तभी वह अतिवाहात्मक प्रेतरूप पिता पुत्रद्वारा दानमें दिये गये पदार्थोंके भोगोंसे सुख प्राप्त करता है। दग्ध हुए प्रेतके निमित्त परिजनोंके द्वारा जो जलाञ्जालि दी जाती है, उससे प्रसन्न होकर वह प्रेत यमलोकमें जाता है। प्रेतकी संतृप्तिक लिये तीन दिनतक रात्रिमें एक चौराहेपर रस्सी बाँधकर तीन लकड़ियोंके द्वारा बनायी गयी तिगोड़ियाके ऊपर कच्ची मिट्टीके पात्रमें दूध भरकर रखना चाहिये। हे पक्षिन्! वायुभूत वह प्रेत मृत्युके दिनसे लेकर तीन दिनतक आकाशमें स्थित उस दूधका पान करता है। दाहसे चौथे दिन अस्थि - संचयका कार्य करना चाहिये ।( अस्थि - संचयनके विषयमें संवर्त - वचनके अनुसार -
(क) प्रथमेऽह्नि तृतीये वा सप्तमे नवमे तथा।
अस्थिसञ्चयनं कार्यं दिने तद्गोत्रजै: सह॥
(ख) अपेरेद्युस्तृतीये वा दाहानन्तरमेव वा।
प्रथम दिन, तृतीय, सप्तम अथवा नवम दिन या दाहके पश्चात् ही चिताको जलसे शान्त करके अपने गोत्रवालोंके साथ अस्थि - संचयन करना चाहिये।) उसके बाद जलाञ्जलि प्रदान करे, किंतु इन जलाञ्जलियोंको पूर्वाह्ण, मध्याह्न, अपराह्ण तथा उनकी संधिकालोंमें न दे, बल्कि दिनके प्रथम प्रहरके बीत जानेपर दे। नदीमें पुत्रके द्वारा जलाञ्जलि दिये जानेके पश्चात् सभी सगोत्री, हितैषी और बन्धु - बान्धव - स्वजातियों तथा परजातियोंके साथ जलदान करें। किसी भी कारण शीघ्रतावश मुख्य अधिकारी पुत्रके जलाञ्जलि देनेके पूर्व ही जलाञ्जलि नहीं देनी चाहिये। जब स्त्रियाँ श्मशान भूमिसे वापस हो जायँ तभी लोकाचार किया जाय।
शूद्रकी मृत्यु हो जानेपर जो ब्राह्मण उसकी चिताके लिये लकड़ी लेकर जाता है अथवा उसके पीछे - पीछे चलता है, वह तीन रात्रियोंतक अशुद्ध रहता है। तीन रात्रियोंके पश्चात् समुद्रमें मिलनेवाली गङ्गा आदि पवित्र नदीके तटपर पहुँचकर वह स्नान करे। तदनन्तर सौ प्राणायाम करके गोघृतका प्राशन करे, तब उसकी शुद्धि होती है। शूद्र सभी वर्णोंके शवोंका अनुगमन कर उन्हें जलाञ्जलि दे सकता है, वैश्य तीन वर्णों (ब्राह्मण, और क्षत्रिय ) - के शवोंका अनुगमन कर उन्हें जलाञ्जलि दे सकता है, क्षत्रिय दो वर्णों (ब्राह्मण और क्षत्रिय) - के शवोंका अनुगमन कर उन्हें जलाञ्जलि दे सकता है और ब्राह्मण केवल अपने ही वर्णके शवका अनुगमन कर उसे जलाञ्जलि दे सकता है।’
(इसका तात्पर्य यह है कि इस व्यवस्थाके अनुसार शवका अनुगमन करनेमें किसी विशेष प्रकारकी अशुचिता एवं उसकी शुद्धिके लिये किसी विशेष प्रायश्चित्तकी आवश्यकता नहीं होती। किसी तरहके आपत्कालमें अथवा लोकसंग्रहकी दृष्टिसे या अन्य किसी सहायकके अनुपलब्ध होनेपर जिस किसी भी जातिके शवकी अन्त्येष्टिके लिये यथोचित सहयोग सबको ही करना चाहिये और ऐसा करनेपर शास्त्रीय व्यवस्थाके अनुसार अशुचिताके निराकरणके लिये यथाविधान प्रायश्चित्त भी कर लेना चाहिये।) है काश्यप! जलाञ्जलि देनेके पश्चात् दन्तधावन करना चाहिये। सभी सगोत्री नौ दिनोंतक दन्तधावनका परित्याग कर देते हैं तथा यथाविधान नौ दिनतक जलाञ्जलि देनेके लिये जलाशयपर जाते हैं। विद्वानोंका कहना है कि जो भी मनुष्य जिस स्थान, मार्ग अथवा घरमें मृत्युको प्राप्त करता है, उसको वहाँसे श्मशान भूमिके अतिरिक्त कहीं अन्यत्र नहीं ले जाना चाहिये। दाह - संस्कारके पश्चात् स्त्रियोंको आगे - आगे चलना चाहिये। उनके पीछे - पीछे अन्य व्यक्तियोंके समूहको चलना चाहिये। वहाँसे आनेके बाद उन सभीको एक पत्थरके ऊपर बैठकर आचमन करना चाहिये। तत्पश्चात् वे पूर्णपात्रमें रखी गयी यव, सरसों और दूर्वाका दर्शन करें, नीमकी पत्तियोंका प्राशन करें तथा तेल लगाकर स्नान करें। सगोत्रियोंमें जिनके यहाँ मृत्यु हुई है, उनका भोजन नहीं करना चाहिये। अपने घरका अन्न नहीं खाना चाहिये और न ही खिलाना चाहिये। भोजन करनेमें मृत्पात्रका प्रयोग करना चाहिये एवं उस उच्छीष्ट पात्रको ऊपर मुख करके ही एकान्त स्थानमें रख देना चाहिये। मृतकके गुणोंका कीर्तन करे, ‘यमगाथा’ का पाठ करे और पूर्वजन्ममें संचित शुभाशुभका चिन्तन करे।
वह मृत प्राणी वायुरूप धारण करके इधर - उधर भटकता है और वायुरूप होनेसे ऊपरकी ओर जाता है। वह प्राप्त हुए शरीरके द्वारा ही अपने पुण्य और पापके फलोंका भोग करता है। दशाह - कर्म करनेसे मृत मनुष्यके लिये शरीरका निर्माण होता है। नवक एवं षोडश श्राद्ध करनेसे जीव उस शरीरमें प्रवेश करता है। भूमिपर तिल और कुशका निक्षेप करनेपर वह कुटी धातुमयी हो जाती है। मरणासन्न प्राणीके मुखमें पञ्चरत्न डाल देनेसे जीव ऊपरकी ओर चल देता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो जीवको शरीर नहीं मिल पाता अर्थात् वह इधर - उधर भटकता रहता है। इसलिये आदरपूर्वक भूमिपर तिल और दर्भको बिछाना चाहिये।
जीव जहाँ - कहीं भी पशु या स्थावर योनिमें जन्म लेता है, जहाँ वह रहता है, वहींपर उसके उद्देश्यसे दी गयी श्राद्धीय वस्तु पहुँच जाती है। जिस प्रकार धनुर्धारीके द्वारा लक्ष्यवेधके लिये छोड़ा गया बाण उसी लक्ष्यको प्राप्त करता है, जो उसको अभीष्ट है; उसी प्रकार जिसके निमित्त श्राद्ध किया जाता है, वह उसीके पास पहुँच जाता है। जबतक मृतकके सूक्ष्म शरीरका निर्माण नहीं होता है, तबतक किये गये श्राद्धोंसे उसकी संतृत्ति नहीं होती है। भूख - प्याससे व्यथित होकर वायुमण्डलमें इधर - उधर चक्कर काटता हुआ वह जीवात्मा, दशाहके श्राद्धसे संतृत होता है। जिस मृतकका पिण्डदान नहीं हुआ है, वह आकाशमें भटकता ही रहता है। वह क्रमश: - तीन दिन जल, तीन दिन अग्नि, तीन दिन आकाश और एक दिन (अपने प्रिय जनोंके ममतावश) अपने घरमें निवास करता है। अग्निमें शरीरके भस्म हो जानेपर प्रेतात्माको जलसे ही तृप्त करना चाहिये।
इसके बाद जलसे ही उसकी तेल - स्नानकी क्रिया पूर्ण करे तथा घरमें पूआ और कृशर अन्नसे श्राद्ध करे। मृत्युके पहले, तीसरे, पाँचवें, सातवें, नवें अथवा ग्यारहवें दिन जो श्राद्ध होता है, उसको नवक श्राद्ध कहा जाता है। गृहद्वार, श्मशान, तीर्थ या देवालय अथवा जहाँ - कहीं भी प्रथम पिण्डदान दिया जाता है, वहींपर अन्य सभी पिण्डदान करने चाहिये। एकादशाहके दिन जिस श्राद्धको करनेका विधान है, उसको सामान्य श्राद्ध कहा गया है। ब्राह्मणादि चारों वर्णोंकी शरीर - शुद्धिके लिये स्नान ही एकमात्र साधन है। एकादशाह - संस्कारके पूर्ण हो जानेके पश्चात् पुनः स्नान करके शुद्ध होना चाहिये। अनन्तर शय्यादान करना चाहिये, क्योंकि शय्यादानसे प्रेतको मुक्ति मिलती है। यदि प्रेतका कोई सगोत्री न हो तो उसके अन्त्येष्टि कार्यको किसी औरको करना चाहिये अथवा उसकी भार्या करे या किसी ऐसे पुरुषको करना चाहिये, जो मृत व्यक्तिसे तुष्ट अर्थात् उसके सद्व्यवहारसे उपकृत हो। पहले दिन विधिपूर्वक श्राद्धयोग्य जिस अन्नादिसे पिण्डदान दिया जाता है, उसी अन्नादिसे सभी श्राद्ध करने चाहिये।
(प्रथमेऽहनी यः पिण्डो दीयते विधिपूर्वकम्।
अन्नाद्येन च तेनैव सर्वश्राद्धनि कारयेत् ॥)
दशाह - श्राद्धका कर्म मन्त्रोंका प्रयोग बिना किये ही नाम - गोत्रोच्चारसे हो जाता है। जिन वस्त्रोंको धारण करके संस्कर्ता श्राद्धकर्म करता है, अशौचका दिन बीतनेके बाद उन्हें त्याग करके ही घरमें प्रविष्ट होना चाहिये। पहले दिन जो और्ध्वदैहिक कर्म आरम्भ करे, उसीको दस दिनतक समस्त श्राद्धकृत्य सम्पन्न करना चाहिये। वह क्रिया करनेवाला चाहे सगोत्री हो या दूसरे गोत्रसे सम्बन्धित हो, स्त्री हो अथवा पुरुष हो।
जिस प्रकार गर्भमें स्थित प्राणीके शरीरका पूर्ण विकास दस मासमें होता है, उसी प्रकार दस दिनतक दिये गये पिण्डदानसे जीवके उस शरीरकी संरचना होती है जिस शरीरसे उसे यमलोक आदिकी यात्रा करनी है। जबतक घरमें इसका अशौच होता है, तबतक पिण्डोदक - क्रिया करनी चाहिये। यह विधि ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके लिये मानी गयी है। पुत्रके अभावमें जिनके लिये अशौच तीन रातोंका ही माना जाता है, वे पहले दिन तीन, दूसरे दिन चार और तीसरे दिन तीन पिण्डदान करें। प्रेतके लिये पृथक् - पृथक् मिट्टीके पात्रमें दूध तथा जल और चौथे दिन उसे एकोद्दिष्ट - श्राद्ध करना चाहिये।
है अण्डज! पहले दिन जो पिण्डदान दिया जाता है, उससे जीवकी मूर्द्धाका निर्माण होता है। दूसरे दिनके पिण्डदानसे आँख, कान और नाककी रचना होती है। तीसरे दिनके पिण्डदान द्वारा दोनों गण्डस्थल, मुख तथा ग्रीवाभाग बनकर तैयार होता है। उसी प्रकार चौथे दिन उसके हृदय, कुक्षिप्रदेश एवं उदरभाग, पाँचवें दिन कटिप्रदेश, पीठ और गुदाका आविर्भाव होता है। तत्पश्चात् छठे दिन उसके दोनों ऊरु, सातवें दिन गुल्फ, आठवें दिन जंघा, नौवें दिन पैर तथा दसवें दिन पिण्डदान देनेसे प्रबल क्षुधाकी उत्पत्ति होती है। एकादशाहमें जो पिण्डदान होता है, उसको पायस आदि मधुर अन्नसहित प्रदान करें। निमन्त्रित ब्राह्मणके दोनों पैर धोकर तथा उन्हें अर्घ्य, धूप, दीपादिसे पूजकर और सिद्धान्न, कृशर, अपूप एवं दूध आदिसे परिपूर्ण भोजन कराकर संतृप्त किया जाय। द्वादश मासिक श्राद्ध तथा ऊनमासिक, त्रिपाक्षिक, ऊनषाण्मासिक तथा ऊनाब्दिक - ये षोडश श्राद्ध कहे जाते हैं।
(ग्यारहवें दिन इन श्राद्धोंको करनेकी विधि है।) प्राणीकी जो मृत्यु - तिथि हो, उसी तिथिपर प्रतिमास श्राद्ध करना चाहिये। प्रथम मासिक श्राद्ध मृताहके दिन न करके एकादशाहके दिन करना चाहिये। जिस तिथिको मनुष्य मरता है, वही तिथि (अन्य) मासिक श्राद्धके लिये प्रशस्त होती है ।ऊनमासिक, ऊनषाण्मासिक और ऊनाब्दिक तथा त्रिपाक्षिक - इन श्राद्धोंके लिये मृत्यु - तिथिका विचार नहीं करना चाहिये। उदाहरणार्थ - पूर्णिमा तिथिमें जो व्यक्ति मरता है, उसके लिये अगली चतुर्थी तिथिको ऊनमासिक श्राद्ध करना चाहिये। जिसकी मृत्यु चतुर्थी तिथिको होती है, उसके लिये ऊनमासिक श्राद्ध नवमीको होना चाहिये और जो मनुष्य नवमी तिथिको मरता है, उसके लिये चतुर्दशी ऊनमासिक श्राद्धकी तिथि है। अत: अन्त्येष्टि - कर्मकुशल विद्वान्को यह जान लेना चाहिये कि ये सभी तिथियाँ यथाविहित मृत्यु - तिथिके अनुसार रिक्ता ही होंगी।
एकादशाहको जो श्राद्ध किया जाता है, उसका नाम नवक है। इस दिन चौराहेपर प्रेतके निमित्त भोजन रख करके श्राद्धकर्ता पुन: स्नान करे। एकादशाहसे वर्षपर्यन्त श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रतिदिन सान्नोदक घटका दान करना चाहिये। मानव - शरीरमें जो अस्थियोंका एक समूह विद्यमान है, जिसमें उनकी कुल संख्या तीन सौ साठ है। जलपूर्ण घटका दान देनेसे उन अस्थियोंको पुष्टि मिलती है। इसलिये जो घट - दान दिया जाता है, उससे प्रेतको प्रसन्नता प्राप्त होती है। जंगल या किसी विषम परिस्थितिमें जीवकी मृत्यु जिस दिन होती है, उस दिनसे घरमें सूतक होता है और उसीके अनुसार दशाहादि क्रियाएँ करनी चाहिये, दाह - संस्कार जब कभी भी हो।
तिलपात्र, अन्नादिक भोज्यपदार्थ, गन्ध, धूपादि एवं पूजन - सामग्रीका जो दान है, उसको एकादशाहमें देना चाहिये। उससे ब्राह्मणकी शुद्धि होती है। मृत्यु और जन्ममें घरमें होनेवाले सूतकसे क्रमश: - क्षत्रिय बारहवें दिन, वैश्य पंद्रहवें दिन तथा शूद्र एक मासमें शुद्ध होता है। मृत्युके तीन मास होनेपर त्रिरात्र, छ: मास होनेपर पक्षिणी, संवत्सर पूर्ण होनेसे पूर्व अहोरात्र तथा संवत्सर पूर्ण होनेपर जलदानकी क्रिया करनेसे शुद्धि होती है। इसीके अनुसार सभी वर्णोंकी शुद्धि होती है। कलियुगमें सूतककी समाप्ति दशाहमें ही है। एकादशाहसे ( एकादशाह - श्राद्धके अनन्तर वर्षपर्यन्त किया जानेवाला एकोदिष्ट - श्राद्ध तथा प्रति सांवत्सरिक एकोदिष्ट - श्राद्ध विश्वेदेवपूजनपूर्वक करनेकी परम्परा नहीं है।) लेकर सांवत्सरिक आदि सभी श्राद्धोंके अवसरपर विश्वेदेवोंकी पूजा करके अन्य पिण्डदान करना चाहिये। जैसे सूर्यकी किरणें अपने तेजसे सभी तारागणोंको ढक देती हैं, उसी प्रकार प्रेतत्वपर इन क्रियाओंका आच्छादन होनेसे भविष्यमें पुन: प्रेतत्व नहीं मिलता है। अत: सपिण्डनके अनन्तर कहीं ‘प्रेत’ शब्द प्रयोग नहीं होता।
श्रेष्ठ ब्राह्मण सर्वदा शय्यादानकी प्रशंसा करते हैं। यह जीवन अनित्य है, उसे मृत्युके बाद कौन प्रदान करेगा? जबतक यह जीवन है, तबतक अपने बन्धु - बान्धव हैं और अपने पिता हैं। मृत्यु हो जानेपर यह मर गया है, ऐसा जान करके क्षणभरमें ही वे अपने हृदयसे स्नेहको दूर कर देते हैं। इसलिये आत्मा ही अपना बन्धु है, ऐसा बारम्बार विचार करके जीते हुए ही अपने हितके कार्य कर लेना चाहिये। इस संसारमें मरे हुए प्राणीका कौन पुत्र है, जो बिस्तरके सहित शय्याका दान ब्राह्मणको दे सकता है? ऐसा सब कुछ जानते हुए मनुष्यको अपने जीवन कालमें ही अपने हाथोंसे शय्या दानादि सभी दान कर देना चाहिये। अतः अच्छी एवं मजबूत लकड़ीकी सुन्दर शय्या बनवा करके उसे हाथीके दाँत तथा सोनेकी पट्टियोंसे अलंकृत करके उस शय्याके ऊपर लक्ष्मीके सहित विष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमाको स्थापित करे। उसके बाद उसी शय्याके संनिकट घीसे परिपूर्ण कलश रखे। हे गरुड! वह कलश अपने सुखके लिये ही होता है। विद्वानोंने तो उसको निद्राकलश कहा है। ताम्बूल, केशर, कुंकुम, कपूर, अगुरु, चन्दन, दीपक, पादुका, छत्र, चामर, आसन, पात्र तथा यथाशक्ति सप्तधान्य उसी शय्याके बगलमें स्थापित करे। इन वस्तुओंके अतिरिक्त शयन करनेवालेके लिये जो अन्य उपयोगी वस्तु हो, उसको भी वहाँ रखे। सोने - चाँदी या अन्य धातुसे बनी झारी, करक (करवा), दर्पण और पञ्चरंगी चाँदनीसे उस शय्याको संयुक्त करके उसे ब्राह्मणको दान दे दे।
कल्याणके लिये यजमान स्वर्गमें सुख प्रदान करनेवाली शय्याकी विधिवत् रचना करके सपत्नीक द्विज - दम्पतिकी पूजा करके उसका दान करे। कर्णफूल, कण्ठहार, अंगूठी, भुजबंद तथा चित्रकादि आभूषण एवं गौसे युक्त घरेलू उपकरणोंसे परिपूर्ण घर उसको दानमें दे। तदनन्तर पञ्चरत्न, फल और अक्षतसे समन्वित अर्घ्य उस ब्राह्मणको देकर यह प्रार्था करनी चाहिये।
यथा न कृष्णशयनं शून्यं सागरकन्यया।
शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा जन्मनि जन्मनि॥
जिस प्रकार समुद्रकी पुत्री लक्ष्मीसे भगवान् विष्णुकी शय्या शून्य नहीं होती है, उसी प्रकार जन्म - जन्मान्तरमें मेरी शय्या भी शून्य न हो।
इस प्रकार ब्राह्मणको उस निर्मल शय्याका दान देकर क्षमापन करके उसे विदा करे। यही प्रेतशय्याकी विधि एकादशाह - संस्कारमें बतायी गयी है।
हे गरुड! अपने बान्धवकी मृत्यु होनेपर उनके निमित्त बन्धुजन धर्मार्थ जो दान देते हैं, उसके विषयमें विशेष बात मैं कह रहा हूँ, उसको तुम सुनो।
हे पक्षिराज! अपने घरमें पहलेसे जो कुछ उपयुक्त वस्तु हो, उस मृतकके शरीरसे सम्बन्धित जो वस्त्र, पात्र और वाहन हो, जो कुछ उसको अभीष्ट रहा हो, वह सब एकत्र करे। शय्याके ऊपर भगवान् विष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमाको स्थापित करके विद्वान् व्यक्ति उनकी पूजा करे और जैसा पहले कहा गया है, उसीके अनुसार ब्राह्मणको उस मृतशय्याका दान कर दे।
शय्यादानके प्रभावसे प्राणीको प्राप्त होनेवाला सम्पूर्ण सुख इन्द्र और यमराजके घरमें विद्यमान रहता है। इसके प्रभावसे महाभयंकर मुखवाले यमदूत उसको पीड़ित नहीं करते हैं। वह मनुष्य यमलोकमें कहीं धूप और ठंडकसे कष्ट नहीं पाता है। शय्यादानके प्रभावसे प्रेत बन्धनमुक्त हो जाता है। इस दानसे पापी व्यक्ति भी स्वर्गलेक चला जाता है। जो प्राणी पापसे रहित है, वह अप्सराओंसे सेवित विमानपर चढ़कर प्रलयपर्यन्त स्वर्गमें रहता है। जो नारी अपने पतिके लिये नवक, षोडश और सांवत्सरिक श्राद्ध तथा शय्यादान करती है, उसको अनन्त फल प्राप्त होता है। मृत पतिका उपकार करनेके लिये जो स्त्री जीवित रहती है, उसके साथ मरती नहीं तो वह सती जीवित रहते हुए भी अपने पतिका उद्धार कर सकती है। स्त्रीकों अपने मृत पतिके लिये दधि,अन्न, शयन, अञ्जन, कुंकुम, वस्त्राभूषण तथा शय्यादि सभी प्रकारके दान देना चाहिये। स्त्रियोंके लिये इस लोकमें जो कुछ वस्तुएँ उपकारक हों, जो कुछ शरीरपर प्रयोग किये जाने योग्य वस्त्राभूषण और भोग्य वस्तुएँ हों, उन सभीको मिला करके प्रेतकी प्रतिमा बनाकर उन्हें यथा स्थानपर नियोजित करके लोकपाल, इन्द्रादि देवगण, सूर्यादिक ग्रह, गौरी तथा गणेशकी पूजा करे। उसके बाद श्वेत वस्त्र धारण करके पुष्पाञ्जलि सहित ब्राह्मणके समक्ष इस मन्त्रका उच्चारण करे -
प्रेतस्य प्रतिमा ह्येषा सर्वोपकरणैर्युता।
सर्वरत्नसमायुक्ता तव विप्र निवेदिता॥
आत्मा शम्भु: शिवा गौरी शक्रः सुरगणै: सह।
तस्माच्छय्याप्रदानेन सैष आत्मा प्रसीदतु॥
है विप्रदेव! प्रेतकी यह प्रतिमा सभी उपकरणों और समस्त रत्रोंसे युक्त है। मैं आपको इसे प्रदान करता हूँ। आत्मा ही शिव है। यही शिवा और गौरी है। यही सभी देवताओंके साथ इन्द्र है। अतः इस शय्यादानसे यह आत्मा प्रसन्न हो।
इसके बाद उस शब्याको परिवारवाले आचार्य ब्राह्मणको प्रदान करे। ब्राह्मण उसको ग्रहण करनेके बाद ‘कोऽदात०’ इत्यादि मन्त्रका पाठ करें। तत्पश्चात् उस ब्राह्मणकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम करे और उन्हें वहाँसे विदा करे।
हे पक्षिन्! इस विधिसे एक शय्याका एक ही ब्राह्मणको दान देना चाहिये। एक गौ, एक गृह, एक शय्या और एक स्त्रीका दान बहुतोंके लिये नहीं होता है। विभाजित करके दिये गये ये दान दाताको पापकी कोटियें गिरा देते हैं।
हे तार्क्ष्य! इस प्रकार बतायी गयी विधिके अनुसार जो प्राणी शय्यादिका दान करे तो उसे जो फल प्राप्त होता है, उसको तुम सुनो। इस दानसे दाता सौ दिव्य वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। व्यतीपात योग, कार्तिक पूर्णिमा, मकर तथा कर्ककी संक्रान्तिमें, सूर्य - चन्द्रग्रहणमें, द्वारका, प्रयाग, नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, अर्बुद (आबू) पर्वत, गङ्गा, यमुना तथा सिन्धु नदी और सागरके संगम - तटपर जो दान दिया जाता है, यह उससे भी बड़ा दान है। इस शय्यादानके सोलहवें अंशको भी वे सभी दान प्राप्त नहीं कर पाते हैं। वह प्राणी जहाँ जन्म लेता है, वहीं उस पुण्यका फल भोगता है। स्वर्गमें रहनेयोग्य पुण्यके क्षय होनेके बाद वह सुन्दर स्वरूप धारण करके पृथ्वीपर पुन: जन्म लेता है। वह महाधनी, धर्मज्ञ तथा सर्वशास्त्रोंका निष्णात पण्डित होता है और मृत्यु होनेके बाद वह नरश्रेष्ठ पुनः वैकुण्ठलोक चला जाता है। अद्भुत है! अप्सराओंसे चारों ओर घिरा हुआ वह प्राणी दिव्य विमानपर चढ़कर स्वर्गमें अपने पितरोंके साथ हव्य - कव्य ग्रहण करते हुए प्रसन्न रहता है।
हे तार्क्ष्य! यदि पितर प्रेतत्वको प्राप्त हैं तो सपिण्डीकरणके बिना अष्टका, अमावास्या, मघा नक्षत्र तथा पितृपर्वमें किये गये जो-जो श्राद्ध हैं, वे पितरोंको नहीं प्राप्त होते हैं। सपिण्डीकरणका कार्य वर्ष पूरा हो जानेपर करना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। शवकी शुद्धिके लिये आद्य श्राद्ध करके षोडशीका सम्पादन करे। तदनन्तर पितृपंक्तिकी (पितरोंकी पंक्तिमें प्रवेशेके लिये) शुद्धिके लिये पचासवें प्रेतपिण्डका अन्य पिण्डोंके साथ मेलन करे। वृद्धि श्राद्धकी सम्भावना होनेपर एक वर्षके पहले ही (छ: अथवा तीन माह या डेढ़ माहमें एवं बारहवें दिन सपिण्डीकरण श्राद्ध कर देना चाहिये। शूद्रका श्राद्ध स्वेच्छापूर्वक हो सकता है। अग्निहोत्री ब्राह्मणकी मृत्यु होनेपर द्वादशाहको सपिण्डन - कर्म होना चाहिये। जबतक वह कर्म नहीं किया जाता है, तबतक वह मृत अग्निहोत्री ब्राह्मण प्रेतयोनिमें ही रहता है। अत: अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मणको द्वादशाहमें ही सपिण्डीकरणकी क्रिया कर देनी चाहिये। गङ्गा आदि महानदियोंमें अस्थि - क्षेपण, गयातीर्थ - श्राद्ध, पितृपक्षमें होनेवाले श्राद्ध सपिण्डीकरणके बिना वर्षके मध्यमें नहीं करना चाहिये। यदि बहुत - सी सपत्नियाँ हों और उनमेंसे एक भी स्त्री पुत्रवती हो जाय तो उसी एक पुत्रसे ही वे सभी पुत्रवती होती हैं।
असपिण्ड अग्निहोत्री पुत्रको पितृयज्ञ नहीं करना चाहिये। यदि वह ऐसा आचरण करता है तो पापी होगा और उसे पितृहत्याका भी पाप लगेगा। पतिकी मृत्यु होनेपर जो स्त्री अपने प्राणोंका परित्याग कर देती है तो पतिके साथ ही उसका भी सपिण्डीकरण कर देना चाहिये। पिताकी अनुचित रूपसे लायी गयी विवाहिता वैश्यवर्णा अथवा क्षत्रिया जो भी पत्नियाँ हों, उनका सपिण्डन कोई भी पुत्र कर सकता है। जब प्रमादवश ब्राह्मण किसी शूद्रा कन्यासे ही विवाह कर लेता है तो मरनेके बाद उसके लिये एकोद्दिष्ट - श्राद्ध बताया गया है और सपिण्डीकरण-श्राद्ध उसीके साथ करना चाहिये। अन्य चारों वर्णोंसे ब्राह्मणके चाहे दसों पुत्र हों, किंतु उन्हें अपनी - अपनी माँके सपिण्डीकरणकी क्रियामें नियुक्त होना चाहिये। अन्वष्टका पौष, माघ और फाल्गुन मासके कृष्णपक्षकी नवमी तिथि (जो साग्नियोंका मातृक श्राद्ध होता है) - को होनेवाला तथा वृद्धिहेतुक श्राद्ध एवं सपिण्डन - श्राद्धमें पितासे पृथक् माताका पिण्ड प्रदान करना चाहिये।
(अन्वष्टकासु यच्छ्राद्धं यच्छ्राद्धं वृद्धिहेतुकम्।
पितुः पृथक् प्रदातव्यं स्त्रिया: पिण्डं सपिण्डने॥)
हे तार्क्ष्य! पितामहीके साथ माता और पितामहके साथ पिताका सपिण्डन अपेक्षित है, ऐसा मेरा अभिमत है। यदि स्त्री पुत्रहीन ही मर जाती है तो उसका सपिण्डन पति करे। धर्मत: पतिको अपनी माता, पितामही एवं प्रपितामही - इन तीनोंके साथ अपनी पत्नीका सपिण्डन करना चाहिये।
हे गरुड! यदि स्त्रियोंके पुत्र तथा पति दोनों नहीं हैं तो वृद्धिकालके आनेपर स्त्रीका भाई अथवा दायभागका गृहीता या देवर उसका सपिण्डन करें। यदि पति एवं पुत्ररहित स्त्रियोंक न तो कोई सगोत्री हो और न देवर ही हो तो उस समय अन्य व्यक्ति उसके भाइयोंके साथ उसका एकोदिष्ट विधानसे श्राद्ध कर सकता है। यदि भूलवश अथवा विघ्नके कारण सपिण्डन - क्रिया किसीकी नहीं हो सकी है तो उसके पुत्र या बन्धु - बान्धवको चाहिये कि वे नवक श्राद्ध, षोडश श्राद्ध तथा आब्दिक श्राद्ध करे।
जिसका दाह नहीं हुआ है, उसके लिये श्राद्ध नहीं करना चाहिये। दर्भका पुत्तल बनाकर अग्निसे उसे जलाकर ही श्राद्ध करना चाहिये। पुत्रके द्वारा पिताका सपिण्डीकरण किया जा सकता है, किंतु पुत्रमें पिताका पिण्डमेलन नहीं किया जा सकता। प्रेमाधिक्यके कारण भी पिताको पुत्रमें सपिण्डीकरण नहीं करना चाहिये। जब बहुत - से पुत्र हों, तब भी ज्येष्ठ पुत्र ही उस क्रियाको सम्पन्न करे। नवक, सपिण्डन तथा षोडशादि अन्य सभी श्राद्धोंको करनेका अधिकारी वही एक है। धनका बँटवारा न होनेपर भी एक ही पुत्रको पिताके समस्त और्ध्वदेहिक कृत्य करना चाहिये। मुनियोंने भी इस बातको कहा है कि पिताकी अन्त्येष्टि एक ही पुत्र करता है। यदि पुत्रोंमें परस्पर बँटवारा हो गया है तो उन सभी पुत्रोंको पृथक् - पृथक् सांवत्सरादिक क्रिया करनी चाहिये। स्वयं प्रत्येक पुत्रको अपने पिताका श्राद्ध करना चाहिये। जिनके निमित्त ये षोडश प्रेतश्राद्ध सम्पन्न नहीं किये जाते हैं, उनका अन्य सैकड़ों श्राद्ध करनेपर भी पिशाचत्व स्थिर रहता है।
हे खगेश्वर! पुत्रहीनका सपिण्डीकरण उसके भाई, भतीजे, सपिण्ड अथवा शिष्यको करना चाहिये। सभी पुत्रहीन पुरुषोंका सपिण्डन पत्नी करे अथवा ऋत्विज् या पुरोहितसे उस कार्यको सम्पन्न कराये। पिताकी मृत्यु हो जानेपर वर्षके मध्य जब सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण हों तो पुत्रोंको पार्वणश्राद्ध, नान्दीश्राद्ध नहीं करना चाहिये। माता - पिता और आचार्यकी मृत्यु होनेपर वर्षके मध्यमें तीर्थश्राद्ध, गयाश्राद्ध तथा अन्य पैतृक श्राद्ध नहीं करना चाहिये। पितृपक्ष, गजच्छाया योग, मन्वादि और युगादि तिथियोंमें सपिण्डीकरणके बिना पिताको पिण्डदान नहीं देना चाहिये। कुछ लोगोंका विचार है कि वर्षके मध्यमें भी यज्ञपुरुष तथा देवतादिके लिये जो देय है, उसका दान देना चाहिये। पितरोंको भी अर्घ्य और पिण्डसे रहित जो कुछ देय है, वह सब दिया जा सकता है। यही विधि कही गयी है।
देवोंके लिये पितर देवता हैं, पितरोंके पितर ऋषि हैं, ऋषियोंके पितर देवता हैं, इस कारण पिता सर्वश्रेष्ठ है। पितर, देवतागण और मनुष्योंके यज्ञनाथ भगवान् विभु हैं। यज्ञनाथको जो कुछ दिया जाता है, वह समस्त शरीरधारियोंकों दिया हुआ माना जाता है। पिताके मरनेपर वर्षके मध्य जो पुत्र अन्य श्राद्ध करता है, निस्संदेह सात जन्मोंमें किये गये अपने धर्मसे हीन हो जाता है। पिण्डोदक क्रियादिसे रहित प्राणी प्रेत हो जाते हैं, वे इसी रूपमें भूख - प्याससे अत्यन्त पीड़ित होकर वायुके साथ चक्कर काठते हैं। यदि पिता प्रेतत्वयोनिमें पहुँच जाता है तो पुत्रके द्वारा की गयी समस्त पैतृकी क्रिया नष्ट हो जाती है। यदि माताकी मृत्यु हो जाती है तो पितृकार्य नष्ट नहीं होता है।
यदि माताकी मृत्यु हो जाय, पिता और पितामही अर्थात् दादी जीवित रहती है तो माताका सपिण्डन प्रपितामहीके (‘विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्य:’ - इस वार्तिकसे ‘प्र’ शब्दका लोप हो जानेसे मूलमें पितामही पदको ‘प्रपितामही ‘ समझना चाहिये।) साथ ही करना चाहिये। हे गरुड! मेरे इस वचनको सुनो। यह सर्वथा सत्य है। इस पृथ्वीपर जिन मरे हुए मनुष्योंका पिण्डमेलन अर्थात् सपिण्डीकरण नहीं होता है, उनके लिये पुत्रोंके द्वारा अनेक प्रकारसे दिया गया हन्तकार, उपहार, श्राद्ध तथा जलाञ्जलि उन्हें प्राप्त नहीं होती है।
Summary of chapter 32 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
The Divine Lord vividly describes the painful process of rebirth and the soul’s confinement within the mother's womb, shedding light on the hidden suffering of incarnation. Bhagavān Vishṇu explains how the Jīva, bound by its past Karma, enters the microscopic embryo and undergoes physical formation in a cramped, dark, and warm environment over nine months. The Lord reveals that while inside the womb, the soul retains memory of its previous lives and laments its past errors, fervently praying to Bhagavān Vishṇu for deliverance from the endless cycle of birth and death.