गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
40 - दुर्मुत्यु होनेपर सद्गतिलाभके लिये नारायणबलिका विधान
तार्क्ष्यने कहा - भगवन्! किन्हीं ब्राह्मणोंकी अपमृत्यु होती है, उनका पारलौकिक मार्ग कैसा है? उन्हें वहाँ कैसा स्थान प्राप्त होता है? उनकी कौन - सी गति होती है? उनके लिये क्या उचित है और क्या विधान है? हे मधुसूदन! मैं उन सभी बातोंको सुनना चाहता हूँ। कृपया आप उनका वर्णन करें।
श्रीकृष्णने कहा - हे गरुड! जो ब्राह्मण विकृत मृत्युके कारण प्रेत हो गये हैं, उनके मार्ग, पारलौकिक गति, स्थान और प्रेतकर्म - विधानको मैं कह रहा हूँ। यह परम गोपनीय है, इसे तुम सुनो। जो ब्राह्मण खाई, नदी, नाला लाँघते हुए और सर्प आदिके काटनेसे मर जाते हैं, जिनकी मृत्यु गला दबाने तथा जलमें डुबानेसे होती है, जो दुर्बल ब्राह्मण हाथीकी सूँड़के प्रहारसे, विषपानसे, क्षीण होकर, अग्निदाह, साँड् - प्रहार तथा विषूचिका (हैजा)रोगसे मरते हैं, जिनके द्वारा आत्महत्या कर ली जाती है, जो गिरकर, फाँसी लगाकर और जलमें डूबकर मर जाते हैं, उनकी स्थितिको तुम सुनो।
जो ब्राह्मण म्लेच्छादि जातियों द्वारा मारे जाते हैं, वे घोर नरक प्राप्त करते हैं। जो कुत्ता, सियारादिके स्पर्श, दाह - संस्कार रहित, कीटाणुओंसे परिव्याप्त, वर्णाश्रम - धर्मसे दूर और महारोगोंसे पीड़ित होकर मरते हैं, दोषसिद्ध, व्यङ्ग्यपूर्ण बात, पापियोंके द्वारा प्रदत्त अन्नका सेवन करते हैं, चाण्डाल, जल, सर्प, ब्राह्मण, विद्युत् –निपात, अग्नि, दन्तधारी पशु तथा वृक्षादि पतनके कारण जिनकी अपमृत्यु होती है, जो रजस्वला, प्रसवा, शूद्रा और धोबिनके सहवाससे दोषयुक्त हो गये हैं, वे सभी उस पापसे नरक - भोग करके प्रेतयोनि प्राप्त करते हैं। परिजनोंको उनका दाह-संस्कार, अशौच - निवृत्ति एवं जलक्रियाका कर्म नहीं करना चाहिये। हे तार्क्ष्य! ऐसे पापियोंका नारायण बलिके बिना मृत्युका आद्य कर्म, और्ध्वदैहिक कर्म भी नहीं करना चाहिये।
हे पक्षिराज! सभी प्राणियोंका कल्याण करनेके लिये पाप और भयकों दूर करनेवाली उस नारायण बलिके विधानको सुनो । छ: मासकी अवधिमें ब्राह्मण, तीन मासमें क्षत्रिय, डेढ़ मासमें वैश्य तथा शूद्रकी तत्काल दाह ( पुत्तलिका - दाह ) -क्रिया करनी चाहिये। गङ्गा, यमुना, नैमिष, पुष्कर, जलपूर्ण तालाब, स्वच्छ जलयुक्त गम्भीर जलाशय, बावली, कूप, गोशाला, घर या मन्दिरमें भगवान् विष्णुके सामने ब्राह्मण इस नारायण बलिको सम्पन्न करायें। पौराणिक और वैदिक मन्त्रोंसे प्रेतका तर्पण किया जाय। इसके बाद यजमान सभी औषधियोंसे युक्त जल तथा अक्षत लेकर विष्णुका भी तर्पण पुरुषसूक्त अथवा अन्य वैष्णवमन्त्रोंसे करके दक्षिणाभिमुख होकर प्रेतका विष्णुरूपमें इस मन्त्रसे ध्यान करे -
अनादिनिधनो देव: शड्खुचक्रगदाधरः॥
अव्यय: पुण्डरीकाक्ष: प्रेतमोक्षप्रदो भवेत्।
अनादि, अनन्त, शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले अव्ययदेव पुण्डरीकाक्ष भगवान् प्रेतको मोक्ष प्रदान करें।
तर्पण समाप्त हो जानेके पश्चात् रागमुक्त, ईर्ष्या द्वेष - रहित, जितेन्द्रिय, पवित्र, धर्मपरायण, दानधर्ममें संलग्न, शान्तचित्त, एकाग्रचित्त होकर भगवान् विष्णुको प्रणाम करके तथा वाणीपर संयम रखते हुए अपने बन्धु - बान्धवोंके साथ यजमान शुद्ध हो। उसके बाद भक्तिपूर्वक वहाँ एकादश श्राद्ध करे। समाहित होकर जल, धान, यव, साठी धान, गेहूँ, कंगनी (टाँगुन), शुभ हविष्यान्न, मुद्रा, छत्र, पगड़ी, वस्त्र, सभी प्रकारके धान्य, दूध तथा मधुका दान ब्राह्मणको दे। वस्त्र और पादुकासे युक्त आठ प्रकारके पददान बिना पंक्तिभेद किये(समानरूपसे ) सभी ब्राह्मणोंको इस अवसरपर देना चाहिये।
पृथ्वीपर पिण्डदान हो जानेके पश्चात् शङ्खपात्र तथा ताम्रपात्रमें पृथक् - पृथक् गन्ध - अक्षत - पुष्पयुक्त तर्पण करे। ध्यान - धारणासे एकाग्र मन हो, घुटनोंके बल पृथ्वीपर टिक करके, वेद - शास्त्रोंके अनुसार सभी ब्राह्मणोंकों दान देना चाहिये। एकोदिष्ट श्राद्धमे ऋचाओंसे पृथक् - पृथक् अर्घ्य देना चाहिये उस समय ‘आपोदेवीर्मधुमती०’ इत्यादि मन्त्रसे पहले पिण्डपर अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। उसके बाद ‘उपयाम गृहीतोऽसि०’ इस मन्त्रसे दूसरे, ‘येनापावक चक्षुषा०’ मन्त्रसे तीसरे, ‘ये देवास:०’ मन्त्रसे चौथे, ‘समुद्रं गच्छ०’ मन्त्रसे पाँचवें, ‘अग्निर्ज्योति०’ मन्त्रसे छठे, ‘हिरण्यगर्भ०’ मन्त्रसे सातवें, ‘यमाय०’ मन्त्रसे आठवें, ‘यज्जाग्र०’मन्त्रसे नवें, ‘या फलिनी०’ मन्त्रसे दसवें तथा ‘भद्रं कर्णेभि:०’ मन्त्रसे ग्यारहवें पिण्डपर अर्घ्य प्रदान करके उनका विसर्जन करे।
एकादशदैवत्य श्राद्ध करके दूसरे दिन श्राद्ध आरम्भ करे। उस दिन चारों वेदके ज्ञाता, विद्याशील और सदगुण - सम्मन्न, वर्णाश्रम - धर्मपालक, शीलवान्, श्रेष्ठ अविकल अङ्गोंवाले प्रशस्त और कभी त्याज्य न होनेयोग्य उत्तम पाँच ब्राह्मणोंका आवाहन करे। तदनन्तर सुवर्णसे विष्णु, ताम्रसे रुद्र, चाँदीसे ब्रह्मा, लोहेसे यम, सीसा अथवा कुशसे प्रेतकी प्रतिमा बनवा करके ‘शन्नोदेवी०’ इस मन्त्रसे विष्णुदेवको पश्चिम दिशामें, ‘अग्न आयाहि०’ मन्त्रसे रुद्रको उत्तर दिशामें, ‘अग्निमीळे’ मन्त्रसे ब्रह्माको पूर्व दिशामें, ‘इषेत्वोर्जेत्वा०’ मन्त्रसे यमको दक्षिण दिशामें तथा मध्यमें मण्डल बनाकर कुशमय नर स्थापित करना चाहिये।
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, यम और प्रेत - इन पाँचोंके लिये पञ्चरत्न युक्त कुम्भ अलग - अलग रखे। इन सभी देवताओंके लिये पृथक् - पृथक् रूपसे वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा मुद्रा प्रदान करे एवं पृथक् - पृथक् तत्तन्मन्त्रोंसे उनका जप करे। उसके बाद यथाविधि देवोंके निमित्त पाँच श्राद्ध करने चाहिये। तत्पश्चात् शङ्ख अथवा ताम्रपात्र या इनके अभावमें मिट्टीके पात्रमें सर्वोषधि समन्वित तिलोदक लेकर पृथक् - पृथक् पीठपर प्रदान करे। हे खगेश्वर! आसन, पादुका, छत्र, अँगूठी, कमण्डलु, पात्र, भोजन - पदार्थ और वस्त्र - ये आठ पद माने गये हैं, इनके साथ ही स्वर्ण तथा दक्षिणासे युक्त एक तिलपूर्ण ताम्रपात्र विधिपूर्वक मुख्य ब्राह्मणको दान देना चाहिये। ऋग्वेद - पारंगत ब्राह्मणको हरी - भरी फसलसे युक्त भूमि, यजुर्वेद - निष्णात ब्राह्मणको दूध देनेवाली गाय, शिवके उद्देश्यसे सामवेदका गान करनेवाले ब्राह्मणको स्वर्ण, यमके उद्देश्ससे तिल, लौह और दक्षिणा देनी चाहिये।
सर्वौषधिसे समन्वित कुशद्वारा निर्मित पुरुषाकृति पुत्तलकका निर्माण करके कृष्णाजिनको बिछाकर उसे स्थापित करे और पलाशका विभाग करके तीन सौ साठ वृन्तोंसे पुत्तलककी हड्डियोंका निर्माण करे। यथा - शिरोभागमें चालीस वन्त, ग्रीवामें दस, वक्ष:स्थलमें बीस, उदरमें बीस, दोनों भुजाओंमें सौ, कटिप्रदेशमें बीस, दोनों ऊरुओंमें सौ, दोनों जंघाओंमें तीस, शिश्न - स्थानमें चार, दोनों अण्डकोशोंमें छः और पैरकी अंगुलियोंमें दस वृन्तोंसे उस कल्पित प्रेत - पुरुषकी अस्थियोंका निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात् उसके शिरोभागपर नारियल, तालुप्रदेशमें लौकी, मुखमें पञ्चरत्न, जिह्वाभागमें केला, आँतोंके स्थानपर कमलनाल, प्राणभागमें बालू, वसाके स्थानपर मेदक नामक अर्क, मूत्रके स्थानपर गोमूत्र, धातुओंके स्थानमें गन्धक, हरिताल एवं मन:शिला तथा वीर्यस्थानमें पारद, पुरीष (मल) - के स्थानमें पीतल, सम्पूर्ण शरीरमें मन:शिल, संधिभागोंमें तिलकी पीठी, मांसभागमें यवका आटा, मधु और मोम, केशराशिके स्थानमें बरगदकी बरोह, त्वचाभागमें मृगचर्म, दोनों कर्ण प्रदेशमें तालपत्र, दोनों स्तनोंके स्थानमें गुंजाफल, नासिका भागमें कमलपत्र, नाभि प्रदेशमें कमलपुष्प, दोनों अण्ड कोशोंके स्थानमें बैगन, लिंगभागमें सुन्दर गाजर एवं नाभिमें घी भरे। कौपीनके स्थानपर त्रपु, दोनों स्तनोंमें मुक्ताफल, सिरमें कुंकुमका लेप, कर्पूर, अगुरु, धूप तथा सुगन्धित पुष्प - मालाओंका अलंकरण, परिधानके स्थानपर पटूटसूत्र और हृदयभागमें रजत - पत्र रखे। उसकी दोनों भुजाओंमें ऋद्धि तथा वृद्धि इन दोनों सिद्धियोंको संकल्पित करके यजमान दोनों नेत्रोंमें एक - एक कौड़ी भरे। तदनन्तर नेत्रोंके कोणभागमें सिन्दूर भरकर उसको ताम्बूलादि विभिन्न उपहारोंसे सुशोभित करे।
इस प्रकार नाना वस्तुओंसे निर्मित और अलंकृत उस प्रेतको सर्वौषधि प्रदान करके जैसा कहा गया है, उसीके अनुसार उसकी पूजा करनी चाहिये। जो प्रेत अग्निहोत्र करनेवाला हो, उसको यथाविधि यज्ञपात्र भी देना आवश्यक है। उसके बाद ‘शिरोमे श्री०’ तथा ‘पुनन्तु वरुण०’-इन मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा शालग्राम शिलाको धोकर यजमान उसीसे प्रेतका पवित्रीकरण करे। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये एक दूध देनेवाली सुशील गौका दान किया जाय। तिल, लौह, स्वर्ण, रूई, नमक, सप्तधान्य, पृथ्वी और गौ एक - से - एक बढ़कर पुण्यदायक होते हैं। अत: गोदान करनेके बाद यजमान तिलपात्र - दान और पद - दान एवं महादान दे। उसके बाद सभी अलंकारोंसे विभूषित वैतरणी घेनुका दान करे।
प्रेतकी मुक्तिके लिये इस अवसरपर आत्मवान्को भगवान् विष्णुके निमित्त श्राद्ध करना चाहिये। तत्पश्चात् हृदयमें भगवान् विष्णुका ध्यान करके प्रेतमोक्षका कार्य करे। अतएव ‘ॐ विष्णुरिति०’- इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित उस प्रकल्पित प्रेत-पुतलेकी मृत्यु मानकर उसका दाह - संस्कार करे। तदनन्तर तीन दिन सूतक माने। दशाह कर्म करनेवाला यजमान इस बीच प्रेतमुक्तिके लिये पिण्डदान और सभी वार्षिक क्रियाओंको सम्पन्न करता है तो प्रेत अपनी मुक्तिका अधिकार प्राप्त कर लेता है।
Summary of chapter 38 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
The Supreme Lord imparts supreme metaphysical wisdom regarding the true nature of the Ātman, revealing to Garuḍa that the individual soul is eternal, immutable, and beyond physical destruction. Bhagavān Vishṇu explains that just as a person discards worn-out garments to put on new ones, the Ātman casts off decaying physical bodies while remaining entirely untouched by birth, death, disease, or sorrow. By realizing one's true identity as the immortal self rather than the perishable physical vessel, the seeker conquers all fear of death and rests in eternal peace.