गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
31 - और्ध्व॑दैहिक क्रियामें विहित पद आदि विविध दानोंका फल तथा जीवको प्राप्त देहके स्वरूपका वर्णन
श्री विष्णुने कहा - हे गरुड! जो मनुष्य पापाचारमें लगे हुए हैं, वे यमलोकको जाते हैं। यदि मुझको साक्षी बनाकर मनुष्यके द्वारा दान दिया जाता है, तो वह अनन्त फलदायी होता है। भूमिदान देनेवाला प्राणी दानमें दी गयी भूमिके रजकणोंकी जितनी संख्या होती है, उतने वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। जो जूतेका दान देते हैं, घोर यममार्गमें वे घोड़ेपर सवार होकर चलते हैं। छत्रदान करनेसे प्रेत यमलोकमें कहींपर भी धूपसे नहीं जलते, वे सुखपूर्वक अपने पथमें चलते चले जाते हैं। जिसके उद्देश्यसे मनुष्य जो अन्न - दान देता है, उससे वह संतृप्त हो जाता है। यमलोकके महापथमें एक ऐसा भी स्थान है, जहाँ घनघोर अन्धकार है, वहाँ कुछ भी दिखायी नहीं देता, किंतु दीपदान देनेसे मनुष्य उस मार्गमें प्रकाशसे युक्त प्राणीके समान जाते हैं। आश्विन, कार्तिक तथा माघमास, मृत - तिथि और चतुर्दशी तिथिमें दिया गया दान सुखकारक होता है। जबतक वर्ष न पूरा हो जाय, तबतक प्रतिदिन प्रेतको ऊबड़ - खाबड़ मार्गमें सुखपूर्वक गमन करानेकी इच्छासे लोगोंको दीपदान करना चाहिये। जो मनुष्य दीपदान करता है, वह स्वयं प्रकाशमय होकर संसारका पूज्य हो जाता है। वह शुद्धात्मा अपने कुलमें चोतित होता है और प्रकाशस्वरूपको प्राप्त करता है।
हे खगेश! देवालयमें पूर्वाभिमुख, ब्राह्मणके लिये उत्तराभिमुख तथा प्रेतके निमित्त दक्षिणाभिमुख होकर सुस्थिर दीपकका दान जलसे संकल्पपूर्वक करना चाहिये। इस संसारमें जो सभी प्रकारके उपहारोंसे युक्त तेरह पददान मृत व्यक्तिके लिये तथा जीवित दशामें अपने लिये करता है, वह महान् कष्टोंसे मुक्त होकर महापथकी यात्रा करता है। आसन, पात्र और भोजन जो ब्राह्मणको देता है, वह उसीके पुण्यसे सुखपूर्वक खाता - पीता हुआ महापथको पार करता है। कमण्डलुका दान देनेसे प्यासा प्रेत जल प्राप्त करता है। प्रेतका उद्धार करनेके लिये एकादशाहको पात्र, वस्त्र, पुष्प तथा अँगूठीका दान देना चाहिये। इसी प्रकार प्रेतका शुभेच्छु बनकर जो पुत्र यथाशक्ति तेरह पदोंका दान करता है, उससे प्रेतको प्रसन्नता प्राप्त होती है। भोजन, तिल, जलपूर्ण तेरह घट, अँगूठी तथा उत्तरीय एवं अधोवस्त्रका जो दान देता है, उस दानके पुण्यसे प्रेत परम गतिको प्राप्त करता है।
जो अश्व, नौका अथवा हाथीका दान ब्राह्मणको देता है वह उसी देय वस्तुकी महिमाके अनुसार उन - उन सुखोंको प्राप्त करता है। जो मनुष्य भैंसका दान देता है, वह नाना प्रकारके लोकोंमें विचरण करता है। यमदूतोंके हर्षवर्धनके लिये ताम्बूल और पुष्पका दान देना चाहिये, इससे संतुष्ट होकर वे दूत उस प्रेतको कष्ट नहीं देते।
प्राणीको यथाशक्ति गौ, भूमि, तिल तथा स्वर्णका दान अवश्य करना चाहिये, ऐसा मनीषियोंने कहा है। जो व्यक्ति मृत प्राणीके लिये जलसे परिपूर्ण मिट्टीका पात्र दान करता है, उसे हजार जलपूर्ण पात्रके दानका फल प्राप्त होता है। यमराजके दूत महाक्रोधी, महाभयंकर आकृतिवाले, काले तथा पीले वर्णके हैं; वे वस्त्र - दान किये जानेपर मृत प्राणीको यमलोकमें कष्ट नहीं देते। तृषा और श्रमसे पीड़ित होकर महापथमें आगे बढ़ता हुआ प्रेत अन्न और जलसे पूर्ण घटका दान देनेसे निश्चित ही सुखी हो जाता है। दक्षिणा, अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र तथा विष्णुकी स्वर्ण - प्रतिमासे युक्त शय्याका दान भी ब्राह्मणको देना चाहिये। ऐसा करनेसे प्रेतयोनिका परित्यागकर प्राणी स्वर्गमें देवताओंके साथ प्रसन्नता पूर्वक निवास करता है।
हे तार्क्ष्य! यह अन्त्येष्टि - कर्ममें होनेवाला दान मैंने तुमसे कहा। मृत प्राणी अन्य शरीरमें कैसे प्रवेश करता है, अब मैं उसको कहूँगा।
‘हे परंतप! मृत्युलोकमें जन्म लेनेवाले प्राणीकी मृत्यु निश्चित है, इसलिये अपने - अपने धर्मके अनुसार मृत व्यक्तिका श्राद्धादिक कृत्य करना चाहिये। हे खगेश्वर! मरे हुए प्राणियोंके मुख मण्डलसे पहले जीवात्मा वायुका सूक्ष्म रूप धारण करके निकल जाता है। लोगोंके नेत्र आदि नौ द्वार, रोम तथा तालुरन्ध्रसे भी जीवात्मा बाहर हो जाता है; किंतु जो पापी हैं उनका जीवात्मा अपान - मार्गसे शरीर छोड़ता है’-
जातस्य मृत्युलोके वै प्राणिनो मरणं ध्रुवम्।
मृतिः कुर्यात् स्वधर्मेण यास्यतश्च परंतप॥
पूर्वकाले मृतानां च प्राणिनां च खगेश्वर।
सूक्ष्मो भूत्वा त्वसौ वायुर्नि्गच्छत्यास्यमण्डलात्॥
नवद्वारै रोमभिश्च जनानां तालुरन्ध्रके।
पापिष्ठानामपानेन जीवो निष्क्रामति ध्रुवम्॥
प्राणवायुके निकल जानेपर शरीर पृथ्वीपर वैसे ही गिर पड़ता है, जैसे वायुके थपेड़ोंसे आहत होकर निराधार वृक्ष भूमिपर गिर पड़ता है। मृत्युके बाद शरीरमें स्थित पृथ्वीतत्त्व पृथ्वीमें, जलतत्त्व जलमें, तेजस्तत्त्व तेजमें, वायुतत्त्व वायुमें, आकाशतत्त्व आकाशमें तथा सर्वव्यापी आत्मतत्त्व शिवमें लीन हो जाता है।
हे तार्क्ष्य! काम - क्रोध तथा पञ्चेन्द्रियोंका समूह शरीरमें चोरके समान स्थित कहा गया है। देहमें काम - क्रोध तथा अहंकार सहित मन भी रहता है, वही सबका नायक है। पुण्य - पापसे संयुक्त होकर काल उसका संहारक बन जाता है। संसारमें भोगके लिये योग्य शरीरका निर्माण अपने कर्मके अनुसार होता है। मनुष्य अपने सत्कर्म और दुष्कर्मसे दूसरे शरीरमें प्रविष्ट होता है। जिस प्रकार पुराने घरके जल जानेपर गृही नये घरमें जाकर शरण लेता है, उसी प्रकार यह जीव भी विषयोंके साथ पञ्चेन्द्रियोंसे युक्त नौ द्वारवाले एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें आश्रय ग्रहण करता है। शरीरमें विद्यमान धातुएँ माता - पितासे ही प्राप्त हैं, इन्हींसे निर्मित यह शरीर षाट्कौशिक (त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, मज्जा तथा अस्थि - इन षट् धातुओंसे निर्मित शरीर ‘षाटकोशिक’ कहलाता है।)कहलाता है। हे गरुड! शरीरमें सभी प्रकारके वायु रहते हैं, मूत्र -पुरीष तथा उन्हींके योगसे उत्पन्न अन्यान्य व्याधियाँ रहती हैं। अस्थि, शुक्र तथा स्नायु शरीरके साथ ही जल जाते हैं।
हे पक्षिन्! सभी प्राणियोंके शरीरका विनाशक्रम यही है, इसे मैंने कह दिया। प्राणियोंका शरीर कैसा होता है, उसको अब मैं फिरसे कह रहा हूँ।
हे गरुड! पुरुषका शरीर छोटी - बड़ी नसोंसे बँधा हुआ एक स्तम्भ है, जिसको नीचेसे पैररूपी दो अन्य स्तम्भ धारण किये हैं। पञ्चेन्द्रियों सहित उसमें नौ द्वार हैं। सांसारिक विषयोंसे युक्त एवं काम - क्रोधसे बेचैन जीव इसी शरीरमें रहता है। राग - द्वेषसे व्याप्त यह शरीर तृष्णाका दुस्तर दुर्ग है। नाना प्रकारके लोभोंसे भरे हुए जीवका यह शरीर पुर है। यही स्थिति सभी शरीरोंकी है। इसी शरीरमें सभी देवता और चौदहों लोक स्थित हैं। जो लोग अपनेको नहीं पहचानते, वे पशुके समान माने गये हैं।
है पक्षिराज! इस प्रकार ऊपर बतायी गयी प्रक्रियासे निर्मित शरीरका वर्णन मैंने किया। सृष्टिमें चौरासी लाख योनियाँ बतायी गयी हैं, जो उद्धिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज - इन चार मुख्य भागोंमें विभक्त हैं।
Summary of chapter 29 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
Bhagavān Vishṇu glorifies the magnificent Vṛshotsarga ceremony, explaining the profound cosmic significance of consecrating and releasing a young bull during the funeral rites or on auspicious lunar days. The Lord reveals that the bull symbolizes Dharma itself, and as it roams freely across grass lands, every grain of dirt lifted by its hooves grants thousands of years of celestial bliss to the performer's ancestors. The Supreme Lord declares that no gift equals Vṛshotsarga in its ability to permanently liberate spirits from ghosthood, wipe away severe family doshas, and bestow long-lasting prosperity.