गरुड महा पुराणम् - प्रेत खंड
41 - वृषोत्सर्गकी संक्षिप्त विधि
श्रीविष्णुने कहा - हे खगेश्वर! कार्तिक आदि महीनोंकी पूर्णमासी तिथिको पड़नेवाले शुभ दिनपर विधिपूर्वक वृषोत्सर्ग करना चाहिये। नान्दीमुख श्राद्ध करके वत्सतरीके साथ वृषका विवाह और वृषके खुरके पास श्राद्ध करनेके पश्चात् उन दोनोंका उत्सर्ग करे।
वापी और कूपके निर्माणोत्सर्गके समय गोशालामें विधिवत् संस्कारके अनन्तर अग्निकी स्थापना करनी चाहिये। (काम्य और नैमित्तिक दो प्रकारका वृषोत्सर्ग होता है। काम्यमें गणेशपूजन, नान्दी श्राद्ध आदि करके ही वृषोत्सर्ग किया जाता है। मरणाशौचके ग्यारहवें दिन किया जानेवाला वृषोत्सर्ग नैमित्तिक वृषोत्सर्ग है। इसमें नान्दीश्राद्ध नहीं किया जाता।) विवाह - विधिके समान ब्रह्मा - वरण करना चाहिये। यज्ञीय पात्रोंकी क्रमिक स्थापना, पायस - खीरका पाक, उपयमन कुशादिका क्रमश: स्थापन करे। यज्ञीय पात्रोंका सिंचन करनेके बाद होम करना चाहिये। प्रथम दो आहुति आघार और उसके बाद दो आज्य - भाग संज्ञक आहुतियाँ हैं। अत: ‘प्रथमेऽहरिति०’ मन्त्रसे यजमानको छः आहुतियाँ देनी चाहिये।
आघार और आज्य - भाग संज्ञक चार आहुतियोंके अनन्तर अङ्गदेवता, अग्नि, रुद्र, शर्व, पशुपति, उग्र, शिव, भव, महादेव, ईशान और यमको आहुति दे। तत्पश्चात् ‘पूषागा०’ इस मन्त्रसे एक पिष्टक होम, चरु तथा पायस दोनोंसे स्विष्टकृत् होम करे। तदनन्तर प्रथम व्याहति होम, प्रायश्चित्त होम, प्रजापति होम, संस्त्रव (अवशिष्ट जल) प्राशन करे। इसके बाद प्रणीताका परिमोक्षण करे। पवित्र - प्रतिपत्ति (परित्याग) करके ब्राह्मणको दक्षिणा दे। षडङ्ग रुद्रसूक्तका पाठ करनेसे प्रेतको मोक्षकी प्राप्ति होती है।
एक रंगके वृष और एक वत्सतरीको स्नान कराकर सभी अलंकारोंसे विभूषित करके उन दोनोंको प्रतिष्ठापित करनेसे प्रेतको मोक्ष प्राप्त होता है। इस कर्मके बाद वृषभकी पूँछसे गिरे हुए जलके द्वारा मन्त्रपूर्वक तर्पण - कार्य करना चाहिये। उसके बाद ब्राह्मणोंको भोजनसे संतृप्त करके दक्षिणासे संतुष्ट करे।
तदनन्तर यथाविधि एको दिष्टि श्राद्ध करनेका विधान है। उसे करके प्रेतके उद्धार - हेतु ब्राह्मणको जल और अन्नका दान दिया जाता है। उसके बाद द्वादशाह श्राद्ध और मासिक श्राद्ध पृथक् - पृथक् करने चाहिये। इस विधिका सम्यक् पालन करनेवाला प्रेतको उस योनिसे मुक्त कर देता है।
Summary of chapter 39 of the Garuda Mahā Purana - Preta Khaṇḍa is as follows:
Bhagavān Vishṇu extols the sacred pilgrimage city of Gayā as the supreme sanctuary for ancestral redemption, revealing its divine origin and unique spiritual energy. The Lord explains that offering a single Piṇḍa at Gayā, especially upon the sacred footprint of Lord Vishṇu, bestows permanent satisfaction upon all ancestors for seven generations past and future. The Supreme Lord promises that even if an ancestor is suffering in the deepest hellish realm or trapped in ghostly bondage, the performance of Gayā Śrāddha instantly elevates them to the exalted realm of Brahma-loka.