24 - अल्पमृत्युके कारण तथा बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका निरूपण

श्री गरुडने कहा - हे प्रभो! वेदका यह कथन है कि अकालमें किसीकी मृत्यु नहीं होती है तो फिर राजा या श्रोत्रिय ब्राह्मण किस कारणसे अकाल मृत्युको प्राप्त होते हैं। ब्रह्माने जैसा पहले कहा था, वह असत्य दिखायी देता है। हे भगवन्‌! वेदोंमें यह कहा गया है कि मनुष्य सौ वर्षतक जीवित रहता है। इस भारत वर्षमें ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्णवाली द्विजातियाँ, शूद्र और म्लेच्छ रहते है, किस कारणसे कलिकालमें ये शतायु नहीं देखे जाते। बालक, धनवान, निर्धन, सुकुमार, मूर्ख, ब्राह्मण, अन्य वर्णवाले, तपस्वी, योगी, महाज्ञानी, सर्वज्ञानरत, लक्ष्मीवान् , धर्मात्मा, अद्वितीय पराक्रमी - जो कोई भी हों इस वसुधातल पर अवश्य मृत्युको प्राप्त करते हैं। इनके गर्भमें आनेके साथ ही इनके पीछे मृत्यु लगी रहती है। इसका क्या कारण है?

श्री भगवान् ने कहा - हे महाज्ञानी गरुड! तुम्हें साधुवाद है। तुम मेरे प्रिय भक्त हो। अत: प्राणीकी मृत्युसे सम्बन्धित गोपनीय बातको सुनो।

हे पक्षिराज कश्यप पुत्र महातेजस्वी गरुड! विधाताद्वारा निश्चित की गयी मृत्यु प्राणीके पास आती है और शीघ्र ही उसे लेकर यहाँसे चली जाती है। प्राचीन कालसे ही वेदका यह कथन है कि मनुष्य सौ वर्षतक जीवित रहता है, किंतु जो व्यक्ति निन्दित कर्म करता है वह शीघ्र ही विनष्ट हो जाता है, जो वेदोंका ज्ञान न होनेके कारण वंश परम्पराके सदाचारका पालन नहीं करता है, जो आलस्यवश कर्मका परित्याग कर देता है, जो सदैव त्याज्य कर्मको सम्मान देता है, जो जिस - किसीके घरमें भोजन कर लेता है और जो परस्त्रीमें अनुरक्त रहता है, इसी प्रकारके अन्य महा दोषोंसे मनुष्यकी आयु क्षीण हो जाती है। श्रद्धाहीन, अपवित्र, नास्तिक, मङ्गलका परित्याग करनेवाले, परद्रोही, असत्यवादी ब्राह्मणको मृत्यु अकालमें ही यमलोक ले जाती है।

प्रजाकी रक्षा न करनेवाला, धर्माचरणसे हीन, क्रूर, व्यसनी, मूर्ख, वेदानुशासनसे पृथक्‌ और प्रजापीड़क क्षत्रियको यमका शासन प्राप्त होता है। ऐसे दोषी ब्राह्मण एवं क्षत्रिय मृत्युके वशीभूत हो जाते हैं और यम - यातनाको प्राप्त करते हैं। जो अपने कर्मोंका परित्याग तथा जितने मुख्य आचरण हैं, उनका परित्याग करता है और दूसरेके कर्ममें निरत रहता है वह निश्चित ही यमलोक जाता है।

(विधातृविहितो मृत्यु: शीघ्रमादाय गच्छति।

ततो वक्ष्यामि पक्षीन्द्र काश्यपेय महाद्युते॥

मानुष: शतजीवीति पुरा वेदेन भाषितम्‌।

विकर्मण: प्रभावेण शीघ्रं चापि विनश्यति॥

वेदानभ्यसनेनैव कुलाचारं न सेवते।

आलस्यात्कर्मणां त्यागो निषिद्धेऽप्यादर: सदा॥

यत्र तत्र गृहेऽशनाति परक्षेत्ररतस्तथा।

एतैरन्यैर्महादोषैर्जायते चायुष: क्षय:॥

अश्रद्दधानमशुचिं नास्तिकं त्यक्तमङ्गलम्‌।

परद्रोहानृतकरं ब्राह्मणं यत (म) मन्दिरम्‌॥

अरक्षितारं राजानं नित्यं धर्मविवर्जितम्‌।

क्रूरं व्यसनिनं मूर्खं वेदवादबहिष्कृतम्‌॥)

जो शूद्र द्विज - सेवाके बिना अन्य कर्म करता है, वह यमलोक जाता है। तदनन्तर वह उत्तम - मध्यम या अधम कोटिवाले यमलोकमें पहुँचकर दुःख भोगता है।

जिस दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय और देवपूजन नहीं होता है, मनुष्योंका वह दिन व्यर्थ ही जाता है-

स्नानं दानं जपो होमो स्वाध्यायो देवतार्चनम्‌॥

यस्मिन्‌ दिने न सेव्यन्ते स वृथा दिवसो नृणाम्‌।

रसोद्भूत यह शरीर अनित्य, अध्रुव तथा आधारहीन है।

हे पक्षीन्द्र! अब मैं अन्न और जलसे बने हुए इस शरीरके गुणोंका वर्णन करता हूँ।

प्रातःकाल संस्कृत (सुपाचित) अन्न निश्चित ही सायंकाल नष्ट हो जाता है, अत: उस अन्नके रससे पुष्ट शरीरमें नित्यता कैसे आ सकती है ?

(यत्प्रात: संस्कृतं सायं नूनमन्‍नं विनश्यति॥

 तदीयरससम्पुष्टकाये का बत नित्यता।)

हे गरुड! अपने प्राकृत कर्मोंके अनुसार शरीर तो मिल चुका है, इस तरह यथायोग्य शरीर - निर्माणरूप आधा कार्य तो हो

चुका है, पर आगे दुष्कर्मोंसे बचनेके लिये एवं अपनी सुरक्षाके लिये परम औषधका सेवन करना चाहिये। क्‍या यह शरीर अन्नदाता पिता या जन्म देनेवाली माताका है अथवा उन दोनोंका है? यह राजाका है या बलवान् का है, अग्नि अथवा कुत्तेका है? कीटाणु, विष्ठा अथवा भस्मके रूपमें परिणत होनेवाले इस शरीरके लिये श्रेष्ठतम यज्ञ कौन हो सकता है? पाप - विनाशके निमित्त प्राणीको उत्कृष्ट यत्न करना चाहिये। जीवने अनेक बार इस संसारमें जन्म ग्रहणकर मन, वाणी और शरीरके द्वारा पापकर्म किया है। मनुष्य - जन्म मिलनेपर प्राणीको पूर्व सभी जन्मोंके पापोंका स्मरण करके तफपके द्वारा उन्हें विनष्ट करनेका प्रयास करना चाहिये। कर्मके अनुसार प्राप्त होनेवाले गर्भवासके महान्‌ कष्ठको देखकर भी जो मनुष्य पुनः गर्भवासमें आता है अर्थात्‌ मानवयोनिमें ही उससे मुक्तिका प्रयास नहीं करता, वह पातकी अण्डजादि योनियोंमें जहाँ - जहाँ जाता है, वहीं आधियाँ - व्याधियाँ, क्लेश और वृद्धावस्थाजनित रूप - परिवर्तन होते रहते हैं।

(कर्तव्य: परमो यत्न: पातकस्य विनाशने।

अनेकभवसम्भूतं पातकं तु त्रिधा कृतम्‌॥

यदा प्राप्नोति मानुष्यं तदा सर्वं तपत्यपि।

सर्वजन्मानि संस्मृत्य विषादी कृतचेतन:॥

अवेक्ष्य गर्भवासांश्च कर्मजा गतयस्तथा।

मानुषोदरवासी चेत्तदा भवति पातकी॥

अण्डजादिषु भूतेषु यत्र यत्र प्रसर्पति।

आधयो व्याधय: क्लेशा जरारूपविपर्यय:॥)

हे द्विजोत्तम (पश्षिश्रेष्ठ)! गर्भवाससे निकला हुआ प्राणी अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छन्न हो जाता है। बाल्यावस्थामें रहनेके कारण वह सदसत्‌का कुछ भी ज्ञान नहीं रखता है। यौवनान्धकारसे वह अन्धा हो जाता है। इस बातको जो देखता है वह मुक्तिका भागी होता है। प्राणी चाहे बालक हो चाहे युवा हो अथवा वृद्ध हो, वह जन्म लेनेके बाद मृत्युको अवश्य प्राप्त होता है। धनी - निर्धन, सुकुमार, कुरूप, मूर्ख, विद्वान, ब्राह्मण या अन्य वर्णवाले जनोंकी भी वही स्थिति होती है। मनुष्य चाहे तपस्वी, योगी, परमज्ञानी, दानी, लक्ष्मीवान्‌,धर्मात्मा, अतुलनीय पराक्रमी कोई भी हो मृत्युसे नहीं बच सकता है। बिना मनुष्यदेहको प्राप्त किये सुख - दुःखका अनुभव नहीं किया जा सकता है। व्यक्ति प्राकृत कर्मके पाशमें बँधकर मृत्युको प्राप्त करता है। गर्भसे लेकर पाँच वर्षतक मनुष्यके ऊपर पापका अल्प प्रभाव पड़ता है, किंतु उसके बाद वह यथायोग्य पापके न्यूनाधिक प्रभावका भागी होता है। इस प्रकार प्राणीको बार - बार इस संसारमें आना - जाना पड़ता है। इस पृथ्वीपर मरा हुआ मनुष्य दानादि सत्कर्मोंके प्रभावसे पुनः जन्म लेकर अधिक दिनोंतक जीवित रहता है।

(गर्भवासाद्विनिर्मुक्तस्त्वज्ञानतिमिरावृत:।

न जानाति खगश्रेष्ठ बालभावं समाश्रित:॥

यौवने तिमिरान्धश्च य: पश्यति स मुक्तिभाक्।

अधानान्मृत्युमाप्नोति बालो वा स्थविरो युवा॥

सधनो निर्धनश्चैव सुकुमारः कुरूपवान्।

अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणस्त्वितरो जन:॥

तपोरतो योगशीलो महाज्ञानी च यो नर:।

महादानरत: श्रीमान्‌ धर्मात्मातुलविक्रम:।

विना मानुषदेहं तु सुखं दुःखं न विन्दति॥

प्राकृतै: कर्मपाशैस्तु मृत्युमाप्नोति मानव:।

आधानात्पञ्च वर्षणि स्वल्पपापैर्विपच्यते॥

पञ्चवर्षाधिको भूत्वा महापापैर्विपच्यते।

योनिं पूरयते यस्मान्मृतोऽप्यायाति याति च॥

मृतो दानप्रभावेण जीवनमर्त्यश्चीरं भुवि।)

सूतजीने कहा - भगवान्‌ कृष्णके ऐसे वचनको सुनकर गरुडजीने यह कहा - गरुडने कहा - हे प्रभो! बालककी मृत्यु हो जानेपर पिण्ड दानादि क्रियाओंको कैसे करना चाहिये? यदि विपन्नावस्थामें फँसे हुए भ्रूणकी मृत्यु गर्भमें ही हो जाती है अथवा चूडाकरणके बीच शिशु मर जाता है तो कैसे, किसके द्वारा दान दिया जाना चाहिये? मृत्युके बाद कौन - सी विधि है?

गरुडके ऐसे वाक्यको सुनकर भगवान्‌ विष्णुने कहा -

हे गरुड! यदि स्त्रीका गर्भपात हो जाय अथवा गर्भस्राव हो जाय तो जितने मासका गर्भ होता है, उतने दिनका अशौच मानना चाहिये। आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले व्यक्तिको उसके लिये कुछ भी नहीं करना चाहिये। यदि जन्मसे लेकर चूडाकरण - संस्कारके बीच बालककी मृत्यु हो जाती है तो उसके निमित्त यथाशक्ति बालकोंको दूधका भोजन देना चाहिये। यदि चूडाकरण संस्कार होनेके बाद पाँच वर्षतक बालककी मृत्यु होती है तो शरीर दाहका विधान है, उसके लिये दूध देना चाहिये और बालकोंको भोजन कराना चाहिये। पाँच वर्षसे अधिक आयुवाले बालककी मृत्यु होनेपर अपनी जातिके लिये विहित समस्त औरध्वदैहिक क्रियाओंको सम्पन्न करना अपेक्षित है। ऐसे मृत बालकके कल्याणार्थ जलपूर्ण कुम्भ तथा खीरका दान करना चाहिये; क्योंकि उसका ऋणानुबन्ध हो जाता है।

हे पक्षीन्द्र! जन्म लेनेवालेकी मृत्यु और मृत्युको प्राप्त हुए प्राणीका जन्म निश्चित है। अतः पुनः शरीरका जन्म न हो इसके लिये व्यक्तिको जीवन कालमें जो कुछ अच्छा लगता था, उसीका दान करना चाहिये। ऐसा न करनेपर उस प्राणीका जन्म निर्धनकुलमें होता है। वह स्वल्पायु और निर्धन होकर प्रेम तथा भक्तिसे दूर रहता है। उसे पुनर्जन्म प्राप्त होता है, अत: मृत शिशुके लिये यथेप्सित दान आवश्यक है। ऐसा होनेपर ब्राह्मण - बालकोंको मिष्टानन - भोजन अवश्य देना चाहिये। पुराणमें इससे सम्बन्धित जिस गाथाका गान हुआ है सब प्रकारसे वह मुझे सत्य प्रतीत होती है। गाथा इस प्रकार है -

भोज्ये भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वरस्त्रिय:॥

विभवे दानशक्तिश्च नाल्‍पस्थ तपसः फलम्‌।

दानाद्भोगानवाप्नोति सौख्यं तीर्थस्य सेवनात्‌।

सुभाषणान्मृतो यस्तु स विद्वान्धर्मवित्तम:॥

अदत्तदानाच्च भवेद्दरिद्रो दरिद्रभावाच्च करोति पापम्‌।

पापप्रभावान्नरकं प्रयाति पुनर्दरिद्र: पुनरेव पापी ॥

भोज्य वस्तु एवं भोजनशक्ति, रति शक्ति रहनेपर श्रेष्ठ स्त्रीकी प्राप्ति तथा धन - वैभव एवं दानशक्ति - ये तीनों अल्प तपस्याका फल नहीं है, ऐसा साथ - साथ होना बड़ा ही दुर्लभ है। दान देनेसे प्राणीको भोगोंकी प्राप्ति होती है। तीर्थसेवनसे सुख मिलता है और सुभाषण करता हुआ जो मरता है, वह विद्वान्‌ धर्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ है। दान न देनेपर प्राणी दरिद्र होता है, दरिद्र होनेपर पाप करता है, पापके प्रभावसे नरकमें जाता है, तदनन्तर बार - बार वह दरिद्र एवं पापी बनता जाता है।